कुमाऊं में दीवाली का आखिरी दिन होता है आज
आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन है. उत्तराखंड के गावों में कार्तिक महीने की एकादशी बड़ी पावन मानी जाती है. पहाड़ों में आज का दिन पुरानी दीवाली, इगास, तुलसी एकादशी या बल्दिया एकादशी जै... Read more
इगास बग्वाल के दिन भैला खेलने का विशिष्ट रिवाज है
इगास बग्वाल के दिन भैला खेलने का विशिष्ठ रिवाज है. यह चीड़ की लीसायुक्त लकड़ी से बनाया जाता है. यह लकड़ी बहुत ज्वलनशील होती है. इसे दली या छिल्ला कहा जाता है. जहां चीड़ के जंगल न हों वहां लो... Read more
जोहार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
वर्तमान का अतीत में समाहित होकर भविष्य में उजागर होना ही इतिहास है. यह आलेख, शिलालेख, गुहा चित्र, ताम्र पत्र, धातु या मृदा भांड, मूर्ति अथवा जीवाश्म के रूप में प्राप्त वस्तुओं के सूक्ष्म अध्... Read more
कुमाऊनी में चाणक्य नीति श्लोक
जीवन में सफलता के लिए चाणक्य नीति श्लोक बार-बार दोहराए जाते हैं. यहां चाणक्य नीति श्लोक का कुमाऊनी में भावानुवाद किया गया है. बालम सिंह जनौटी द्वारा किया गया यह भावानुवाद पुरवासी पत्रिका में... Read more
पिछली कड़ी यहां पढ़ें- वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई: पिथौरागढ़ महाविद्यालय में मेरा पहला दिन वर्ष 1979 सितम्बर का महीना भीगी भीगी सी सुबह. दीप तो साढ़े चार बजे ही आ मेरा दरवाजा खटखटा चुका थ... Read more
कुमाऊं का ऐसा गुप्त संगठन जिसकी सदस्यता खून से हस्ताक्षर करने पर ही मिलती थी
भारत की स्वतंत्रा के लिए राष्ट्रीय आन्दोलन में अनेक रूपों में जनता ने अपना योगदान दिया. देश के कोने-कोने में राष्ट्रीय जागरण का दौर चला और अपने अपने तरीकों से लोगों ने इसमें अपनी समिधा डाली.... Read more
मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘सौत’
जब रजिया के दो-तीन बच्चे होकर मर गये और उम्र ढल चली, तो रामू का प्रेम उससे कुछ कम होने लगा और दूसरे व्याह की धुन सवार हुई. आये दिन रजिया से बकझक होने लगी. रामू एक-न-एक बहाना खोजकर रजिया पर ब... Read more
कत्यूर राजधानी बैजनाथ पर एक महत्वपूर्ण लेख
कौसानी के डॉडे से सामने दूर नगाधिराज के श्वेत हिममण्डित सैकड़ों शिखरों की श्रेणियाँ दिखाई पड़ती हैं या पर्वत निः श्रेणियों के निचले भाग में विशाल कत्यूर उपत्यका लेटी पड़ी है- सोई हुई है. यह... Read more
अगर पहाड़ हैं जिन्नत तो रास्ता है यही
सुना करते थे वह बाग़ पुरफ़िज़ा है यहीअगर पहाड़ हैं जिन्नत तो रास्ता है यही हम वक्त के उस दौर में हैं जब समय को बेधने की हमारी कुव्वत बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है. ये टूट–फूट दुतरफा है.... Read more
वो भूली दास्तां लो फिर याद आ गई: पिथौरागढ़ महाविद्यालय में मेरा पहला दिन वर्ष 1979
पिछली कड़ी यहां पढ़ें: छिपलाकोट अंतर्कथा : मुझे एक जगह आराम नहीं, रुक जाना मेरा काम नहीं डॉ मुन्ना भाई शाह अलमस्त से वह, जो पिथौरागढ़ महाविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग के अध्यक्ष रहे और मुझे... Read more


























