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1 Comments

  1. Chaitanya

    “हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
    दिल बहलाने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है”।
    लेख बहुत सोच विचार कर लिखा है और बहुत अच्छे सुझाव भी हैं लेकिन यह लेखक और पाठकों की आत्मतुष्टि तक ही सीमित रहेंगे। सरकारी तंत्र को इससे कोई मतलब नहीं। आख़िर राज्य विकास और व्यवस्था के बारे में उनसे ज्यादा किसी और को कैसे समझ हो सकती है। शायद आपको पता नहीं है कि पहाड़ की रग रग, पहाड़ का दर्द और पहाड़ की समस्याएं पहाड़ में नहीं देहरादून और दिल्ली में रह कर ही पहचानी जा सकती है।

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