नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी के पास अमेरिका चला गया. उसके ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दिनों में भी और उसके बाद तब भी जबकि उसने काम करना शुरू किया. पर इस बार भीतर पहाड़ मुझे बहुत गहरी आवाज दे रहे थे. ऐसी जो आत्मा को खींचती है. पिथौरागढ़ पहुंचना लेकिन इतना आसान न था. कॉलेज के दिनों में जब भी दिल्ली से पिथौरागढ़ जाना हुआ, तो वह बस की लंबी, थकाने वाली यात्रा के जरिए ही हुआ. बाद के वर्षों में कार से जाना थोड़ा आसान हुआ. पर इस बार पहली बार हवाई यात्रा का मौका मिला. पिथौरागढ़ के नैनी-सैनी एयरपोर्ट पर पिछले कुछ समय से एक जहाज दिल्ली से उतरने लगा है.
मैं मुंबई में ही यह सोच-सोचकर रोमांचित था कि दिल्ली से मात्र एक घंटे में पिथौरागढ़ पहुंच जाऊंगा. पर पहाड़ अपने ढंग से ही स्वागत करते हैं. बीच रास्ते में मौसम खराब हो गया और विमान को आधे रास्ते से वापस लौटना पड़ा. अब सड़क का रास्ता ही बचा था. रात के अंधेरे में पहाड़ी मोड़ों से होकर सफर और टैक्सी ड्राइवर भी ऐसा जिसे कि पहाड़ों में गाड़ी चलाने का अनुभव न था. घर वालों ने मना कर दिया. नहीं, टनकपुर से ऊपर पहाड़ शुरू होते हैं. टनकपुर में ही होटल लेकर रात वहीं रुक जाओ. सुबह जाना. सभी का एक ही निर्देश था. पर मन न माना. मन में बस एक ही धुन थी कि जल्दी पहुंचना है. नौ साल का इंतज़ार और एक रात का फासला अब असहनीय लग रहा था. और मैंने कोड्राइवर की सीट संभाली और रात के ढाई बजे बारिश की बूंदाबांदी से महकती मिट्टी की खुशबू लेते हुए मैं अंतत: अपने पिथौरागढ़ पहुंच ही गया. सुरक्षित. अभिभूत.
कुछ घंटों की नींद के बाद सुबह साढ़े सात बजे उठा. मैं जिम जाने को बेचैन था. क्योंकि पिछले दो दिन से कोई रनिंग नहीं संभव हो सकी था. न कोई वर्कआउट. यहां होटल मनार, जहां मैं रुका था, उसी के पास ही “फिटनेस हब” नाम का एक जिम था. वहां जो मैंने देखा वह चौंका देने वाला था. इतना बड़ा और सुसज्जित जिम तो मुंबई में भी मिलना मुश्किल है. और मासिक शुल्क मात्र हज़ार रुपये. मुझे बताया गया कि इस जिम में छह सौ सदस्य रजिस्टर्ड हैं. मन में आया कि इतनी बेहतरीन सुविधा के लिए यह संख्या बहुत कम है. पर यह देखकर अच्छा लगा कि पहाड़ के युवा अब अपनी हेल्थ और बॉडी में निवेश कर रहे हैं. मेरे कॉलेज के दिनों में तो यहां एक छोटा-सा कमरा हुआ करता था जिसमें कुछ बुनियादी उपकरण थे. उन्हीं से हम बॉडी बनाते थे. जाहिर है कि अब समय बदल चुका था और अच्छे के लिए बदला था.
आज पिथौरागढ़ एक नए कारण से भी चर्चा में है – आदि कैलाश की यात्रा. आदि कैलाश और ओम पर्वत यात्रा में पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है. यह केवल धार्मिक यात्रा नहीं, एक आध्यात्मिक अनुभव है. हिमालय की गोद एक निराला अनुभव देती है. उस ऊंचाई का अनुभव जहां प्रकृति स्वयं मंदिर बन जाती है. पर इस संभावना के साथ एक ज़िम्मेदारी भी जुड़ी है.
हिमालयी क्षेत्र संवेदनशील है. मुझे याद है बरसों पहले पूजा बेदी की मां प्रोतिमा बेदी की कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान भूस्खलन में मृत्यु हुई थी. यहां आए दिन भूस्खलन से दुर्घटनाएं होती रहती हैं. इसलिए बहुत जरूरी है कि यहां प्रकृति के संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाकर रखा जाए. मेरा मानना है कि यदि सरकार और प्रशासन गंभीरता और संवेदनशीलता से काम करें, तो पिथौरागढ़ जैसा कम छुआ हुआ हिमालयी क्षेत्र एक वास्तविक आध्यात्मिक गंतव्य बन सकता है. मेडिटेशन रिट्रीट, माइंडफुलनेस सेंटर, प्रकृति के बीच ठहरने की सुविधाएं आदि – ये सब मिलकर पिथौरागढ़ को केवल एक यात्रा का पड़ाव नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर लौटने की जगह बना सकते हैं. जैसा कि मेरे साथ भी हो रहा है.
सुन्दर चन्द ठाकुर

कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.
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