कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा
रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के पनघट पर पहुँचीं, तो अचानक सुबनी की नज़र एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो बांझ के पेड़ के नीचे, खुले आसमान में अपनी लोईया (ऊन की शॉल... Read more
चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार
चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये जाते हैं. चीड़ के तने व शाखाओं को मुख्य रूप से इमारती ... Read more
मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब
2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ छापकर सराहनीय कार्य किया है. 140 रुपये मुनासिब दामों की यह किताब मेवाड़ी ने खुद के बचप... Read more
पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे
नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी के पास अमेरिका चला गया. उसके ग्रेजुएशन की पढ़ाई के दिनों में भी और उसके बाद तब भी जबकि उसने काम करना शुरू कि... Read more
‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है
देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत दिला रहा है. मनिला डांडे की देवी को ही नहीं हमारे पूरे समाज को कि – लस्का कमर बांधा, हिम्मत का साथा,फिर... Read more
सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन
पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक विश्लेषण श्याम दत्त पंत ने किया. उन्होंने ब्रिटिश काल में उच्च शिक्... Read more
मानव और प्रकृति का संबंध अत्यंत प्राचीन, गहरा और अविभाज्य है. प्रकृति तथा वायुमंडल से मिलकर बने पर्यावरण के विभिन्न तत्व—जैसे जल, वायु, मिट्टी, वनस्पति, खनिज और जीव-... Read more
दूधातोली की मुरलीकोठा चोटी (3000 मीटर) के चारों ओर के परिदृश्य को समझाते हुए कुलदीप ने पूरे रोमांच के साथ नरेन्द्र सिंह नेगी का यह गीत गाया. इस पद-यात्रा में नयार की मातृ धाराओं के प्रवाह के... Read more
कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा
बड़ी पुरानी बात है. पांडु राजा के पाँच पुत्र थे, पांडव और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे, कौरव. राज्य आधा-आधा बँटा था, पर कौरवों में सबसे बड़ा दुर्योधन बड़ा कपटी और हठी था. उसने छल से पांडवों को... Read more
हमारे इलाक़े में लंगड़ा आम अमूमन इन्हीं दिनों यानी जून के तीसरे-चौथे हफ़्ते में सलीके से पकना शुरू होता है. पके हुए इस दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है... Read more
























