बचपन में हमें होली-दिवाली और राखी के अलावा मकर संक्रांति, घी त्यार और फूलदेई जैसे उत्सवों का बड़ा इंतज़ार रहता. तब सामान्य खाने से अलग कुछ बढ़िया खाने को मिलता. आज हमारे आसपास इतने पर्व... Read more
अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक
उत्तराखण्ड के पहाड़ों में मेले केवल मनोरंजन के अवसर नहीं रहे हैं. वे लोकजीवन की धड़कन, सामाजिक मेल-मिलाप, व्यापार, लोककला, आस्था और सामुदायिक उल्लास के जीवंत केन्द्र रहे... Read more
घी संक्रान्ति का लोक विज्ञान
उत्तराखंड अपनी निराली संस्कृति के लिए जाना जाता है. यहां के लोक जीवन के कई रंग और कई उत्सव हैं. ऐसा ही एक पारंपरिक उत्सव है घी संक्रांति. उत्तराखण्ड में घी संक्रान्ति पर्व को घ्यू संग्यान,... Read more
कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा
रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के पनघट पर पहुँचीं, तो अचानक सुबनी की नज़र एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो बांझ के पेड़ के नीचे, खुले आसमान में अपनी लोईया (ऊन की शॉल... Read more
कर्ज पर युधिष्ठिर का जवाब : लोककथा
बड़ी पुरानी बात है. पांडु राजा के पाँच पुत्र थे, पांडव और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे, कौरव. राज्य आधा-आधा बँटा था, पर कौरवों में सबसे बड़ा दुर्योधन बड़ा कपटी और हठी था. उसने छल से पांडवों को... Read more
शकटाल का प्रतिशोध
पिछली कथा में हमने देखा कि कैसे योगनंद सत्ता तक पहुँचा, शकटाल ने अपने सौ पुत्र खो दिए, और वररुचि राज्य के प्रधान मंत्री बने. पर सत्ता का स्थिर रहना ही अंत नहीं होता, वास्तविक परीक्षा तब शुरू... Read more
भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते हैं जो एक दूसरे से मिलते जुलते दिखाई देते हैं. कभी यह समानता अलग अलग समाजों के संपर्क से बनती है, कभी किसी एक... Read more
आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’
उत्तराखंड को केवल ‘देवभूमि’ ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर पर्वों, मेलों और त्यौहारों की अनोखी रौनक देखने को मिलती है.... Read more
अनूठी शान है कुमाऊनी महिला होली की
यूं तो होली पूरे देश में मनाए जाने वाला एक उमंग पर्व है परन्तु अलग अलग अंचलों में इस पर्व की विविधता देखने को मिलती है. उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में होली का विशिष्ट स्वरूप दृष्टिगोचर होता है... Read more
एक गुरु की मूर्खता
केरल की मिट्टी में कुछ तो है, या शायद वहाँ की हवा में, जो मलयालियों के स्वभाव में हल्की-सी बेबाकी, तंज और व्यंग्य भर देती है. इसलिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि मध्यकालीन केरल के कई प्रसिद्ध लो... Read more


























