10 मार्च 2026 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड के वन मंत्री ने विधानसभा में जानकारी दी कि 2000 से जनवरी 2026 तक प्रदेश में वन्य जीवों के हमलों में कुल 1296लोगों की मृत्यु हुई और 6,624 लोग घायल हुए. आँकड़ों के अनुसार सबसे ज्यादा 548 मौतें तेंदुए के हमले में हुई, जो वन्य जीवों द्वारा मारे गये लोगों का 42-43 प्रतिशत है. सांपों ने 260, हाथियों ने 230, बाघों ने 106 और भालुओं ने 70 इंसानों की जान ली. इस अवधि में तेंदुओं ने 2167, भालुओं ने 2023तथा हाथियों ने 234 व्यक्तियों को घायल भी किया. विशेषज्ञों के अनुसार तेंदुओं के हमले पूरे प्रदेश में साल भर होते रहते हैं जबकि भालुओं के हमले अक्टूबर से दिसम्बर महीनों में सबसे ज्यादा होते हैं. चिंताजनक बात यह है कि उत्तराखण्ड में वन्य-जीवों के हमले निरंतर तेजी से बढ़ रहे हैं.
2024 में वन्य जीवों के हमलों में 64 लोगों की जान चली गयी जबकि 342 लोग घायल हुए. 2025 के अंतिम महीनों में जंगली जानवरों, खासकर भालुओं के अभूतपूर्व हमले हुए जिनमें 8 लोगों की मृत्यु हुई और 107 लोग घायल हुए. केवल पौड़ी गढ़वाल के थलीसैण ब्लॉक में ही 40 मवेशियों को भालुओं ने मार डाला. विशेष रूप से उल्लेखनीय बात यह है कि भालुओं ने अधिकतर हमले जंगल में नहीं बल्कि गांवों में घुस कर किये. यहां तक कि चमोली जिले के एक स्कूल में दो भालुओं ने घुसपैठ की और एक बच्चे को स्कूल परिसर के अंदर से ले जाकर दूर झाड़ियों तक घसीट ले गये. पिछले महीनों के दौरान उत्तराखण्ड में आक्रामक वन्य जीवों के आंतंक के कारण अनेक गांवों में स्कूलों को बन्द करने तथा वन विभाग के कर्मचारियों की सुरक्षा में बच्चों को स्कूल तक पहुंचाने या सुरक्षा के साये में परीक्षाएं कराने तक की नौबत आ गयी.
उत्तराखण्ड में वन्य जीवों का आतंक या मानव-वन्यजीव संघर्ष का बहुत पुराना इतिहास रहा है. इसका उल्लेख सर्वप्रथम हमें एडवर्ड जेम्स ‘जिम कॉर्बेट’ की किताबों में मिलता है जिन्होंने बीसवीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में अनेक आदमखोर बाघों और तेंदुओं का शिकार करके स्थानीय ग्रामीणजनों को इनके आतंक से निजात दिलाई.
कॉर्बेट के अनुसार सरकारी रिकॉर्ड में 1905 से पहले किसी नरभक्षी का विवरण नहीं है. मौतें हुई होंगी लेकिन वन्य जीवों द्वारा मारे या घायल किये गये लोगों की सूचना दर्ज़ नहीं है. ‘चम्पावत मैनइटर’ नामक कुख्यात बाघिन पहले आदमखोर के रूप में दर्ज़ है जिसने नेपाल में 200 मनुष्यों को अपना शिकार बनाया और वहां से खदेड़े जाने के बाद चार सालों तक चम्पावत के इलाके में आतंक का पर्याय बन गयी. 12 मई 1907 को जिम कॉर्बेट द्वारा मारे जाने तक इसके द्वारा मारे गये निर्दोष मनुष्यों का आंकड़ा 434 पहुंच गया. कॉर्बेट लिखते हैं कि 1907 में जब वह चम्पावत की नरभक्षी बाघिन के शिकार में व्यस्त थे तभी उन्होंने पहली बार पनार के आदमखोर तेंदुए के बारे में सुना. कॉर्बेट द्वारा 2010 में मारे जाने तक यह 400निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार चुका था. चार-पांच वर्षों तक समूचे इलाके में इसका कितना आतंक था इसका अनुमान इस बात से लग जाता है कि इसकी चर्चा ब्रिटिश संसद तक में हुई थी. रुद्रप्रयाग के नरभक्षी तेंदुए ने 1918 से 1925 के बीच लगभग सात वर्षों की लम्बी अवधि में 125 मनुष्यों को मार डाला था. कॉर्बेट के अनुसार इस तेंदुए की चर्चा भारत ही नहीं युनाइटेट किंगडम, अमेरिका, कनाडा,, आस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में हुई.
औपनिवेशिक शासनकाल में मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या को फ़ॉरेस्ट ग्रीवान्सेज कमेटी की रिपोर्ट, 1921 में भी प्रमुखता से उठाया गया था. विशेष रूप से जंगली जानवरों के खतरे का ज़िक्र करते हुए इस बात पर प्रकाश डाला गया था कि इनके शिकार पर आधिकारिक औपनिवेशिक प्रतिबन्धों और बंदूक लाइसेंसों के निषेध ने ग्रामीणों को बढ़ते वन्यजीवों के हमलों से खुद को तथा अपने पशुधन को बचाने से रोक दिया है.
जिम कॉर्बेट लिखते हैं कि ‘आतंक’ शब्द का इस्तेमाल रोज़मर्रा की ज़िंदगी में छोटी-मोटी बातों के लिये इतना अधिक किया जाता है कि हम नहीं समझ सकते कि 1918 से 1926 के बीच पांच सौ वर्ग मील क्षेत्र में रहने वाले पचास हजार लोगों और प्रतिवर्ष वहां से गुजरने वाले हजारों तीर्थयात्रियों के लिये इसका क्या अर्थ था. रुद्रप्रयाग के नरभक्षी द्वारा लगाये ‘कफ्र्यू’ का जितनी कड़ाई से पालन होता था उतना किसी कफ्र्यू आदेश का नहीं हुआ. वह लिखते हैं – जैसे-जैसे सूरज पश्चिमी क्षितिज के नजदीक आने लगता और परछाई लंबी होने लगती लोगों के व्यवहार में अचानक और स्पष्ट बदलाव आ जाता. बाजारों या घर से दूर टहल रहे पुरुष जल्दी-जल्दी घर लौटने लगते, घास के बड़े बड़े गट्ठर ले जा रही महिलायें पहाड़ी ढलानों से लड़खड़ाते हुए नीचे उतरने लगतीं, स्कूल से या अपनी बकरियां चरा कर लौट रहे जो बच्चे घर के रास्ते में होते उन्हें उनकी चिंतित माताएं पुकारने लगतीं तथा थके हारे तीर्थयात्रियों को राहगीरों द्वारा जल्दी से आश्रय स्थल तक पहुंचने को कहा जाता. रात होते ही पूरे इलाके में सन्नाटा पसर जाता, न कोई हलचल न कोई आवाज. सब लोग अपने दरवाजे कस कर बंद किये रखते और कइयों ने अतिरिक्त दरवाजे लगा कर सुरक्षा बढ़ा ली थी. यह वह आतंक है जो गढ़वाल के लोगों और तीर्थयात्रियों ने आठ सालों तक भोगा.
जिम कॉर्बेट जैसे अत्यन्त कुशल तथा लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से समर्पित शिकारी होने के बावज़ूद वर्तमान की तुलना में तब किसी नरभक्षी बाघ या गुलदार को मारने में बहुत ज्यादा लम्बा वक्त (सात साल तक) लगता था और केवल एक नरभक्षी के द्वारा मारे गये मनुष्यों की संख्या चार सौ से अधिक हो जाती थी. इसकी एक प्रमुख वजह यह समझ में आती है कि उन दिनों आवागमन के लिये मोटर सड़कों का अभाव था और संचार के साधन भी बहुत सीमित थे. आज के समय में दूरदराज के किसी गांव में भी जैसे ही नरभक्षी जानवर सक्रिय होता है इसकी सूचना तत्काल वन विभाग, प्रशासन और राजधानी तक पहुंच जाती है. गांव-गांव तक सड़कों के पहुंचने के साथ ही गाड़ियों, पिंजड़ों, ट्रैंक्विलाइजरों/बन्दूकों के साथ ही ड्रोन या ट्रैप कैमरे इत्यादि उपकरणों के ज़रिये आदमखोर जन्तु की निगरानी भी संभव हो गयी है. उन दिनों किसी गांव में हुई वारदात की सूचना उस गांव के व्यक्तियों द्वारा पदयात्रा करके सरकार/नियुक्त किये गये शिकारी तक पहुंचायी जाती थी जिस कारण सूचना मिलने में कई दिन या सप्ताह तक लग जाते थे. जब तक शिकारी वहां पहुंचता आदमखोर मीलों दूर दूसरे गांव में किसी अभागे को अपना निवाला बना लेता.
एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि वन्य जीवों के आतंक को इनके हमलों में मारे गये या घायल हुए निर्दोष ग्रामीण स्त्री-पुरुषों और बच्चों की संख्या तक सीमित नहीं रखा जा सकता. इनका शिकार होने वाले हरेक इंसान के पीछे पति/पत्नी, माता-पिता या बच्चे होते हैं जो उसकी मुत्यु से गंभीर रुप से प्रभावित होते हैं लेकिन उन्हें प्रभावितों के रूप में कभी नहीं गिना जाता है. इसके अलावा नरभक्षी बाघ या तेंदुवे से प्रभावित बड़े इलाके की हजारों की आबादी लम्बी समय अवधि तक हर रोज तथा हर पल भय और आतंक के साये में रहती है. क्या यह बहुत भयावह नहीं है? उनका जीवन, जीवनचर्या, शिक्षा, आजीविका इत्यादि सभी पर बुरा असर पड़ता है.
उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में वन्य जीवों के आतंक का इतिहास देखें तो गांवों का जंगलों से घिरा होना इसका मुख्य कारण है. उत्तराखण्ड के ग्रामीणजनों को हिंसक जीवों के आतंक से मुक्ति दिलाने वाले मशहूर शिकारी जॉय हूकिल वन्य जीवों की आबादी बढ़ने को मानव-वन्य जीवों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण मानते हैं. 1972 में वन्य-जीव संरक्षण कानून बनने तथा वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध की वजह से तेंदुओं व बाघों संख्या बहुत बढ़ी है लेकिन वन क्षेत्र नहीं बढ़ा है और अच्छे प्राकृतिक वनो का क्षेत्रफल कम ही हुआ है. कोई भी वन क्षेत्र मांसाहारी या शाकाहारी जानवरों की एक निश्चित संख्या का ही पोषण कर सकता है जो उसकी ‘धारक क्षमता’ कहलाती है. ऐसे में इस बढ़ी हुई संख्या को भोजन कैसे मिलेगा? दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम बाघों या तेंदुवों की आवादी बढ़ने की खुशी मनाते समय इनमूलभूत सवालों पर विचार तक नहीं करते. जंगलों में भोजन की कमी होना तेंदुओं, बन्दरों, लंगूरों, जगली सुअरों आदि जंगली जानवरों के गांवों की तरफ रुख करने का एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है. भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को भालुओं के बढ़ते हमलों के लिये जिम्मेदार ठहराया है जिसकी वजह से भालू शीत निद्रा में नहीं जा पा रहे और आक्रामक हो रहे हैं.
प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक है जो ग्रामीण किसानों, बागवानों और पशुपालकों की आजीविका से जुड़ा है. उत्तराखण्ड पलायन नियंत्रण आयोग की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में फ़सलों का 60 प्रतिशत नुकसान बन्दरों व ज्रगली सुअरों के कारण हो रहा है. इसका ग्रामीण आजीविका व आय पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है तथा गांवों से पलायन बढ़ रहा है. शहरों में लोग बन्दरों के द्वारा घरों में रखे गमलों, किचन गार्डन, फलदार पेड़ों को नुकसान पहुंचाने या यदाकदा घर के अंदर घुस कर खाने-पाने की चीजें उठा ले जाने से बहुत परेशान हो जाते हैं. वास्तव में यह ग्रामीण क्षेत्रों में बन्दरों,लंगूरों, सुअरों इत्यादि द्वारा किये जा रहे भारी नुकसान की तुलना में कुछ भी नहीं है जो आजीविका के संसाधनों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है.
ब्रिटिश शासनकाल में जगली जानवरों द्वारा इंसानों को मारने या घायल करने पर सरकार द्वारा मुआवजा नहीं दिया जाता था. मुआवजा देने का प्रावधान वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 लागू होने के बाद किया गया. क्योंकि उस समय दूरदराज के इलाकों में चिकित्सा सुविधाओं का पूरी तरह अभाव था इसलिये जिम कॉर्बेट ने सरकार से नरभक्षी बाघों/तेंदुओं से प्रभावित इलाकों में इनके हमलों में घायल होने वाले लोगों के लिये आवश्यक दवाइयां उपलब्ध कराने का आग्रह किया था जिसे सरकार ने तुरंत ही मान लिया था.
वर्तमान में उत्तराखण्ड की सरकार वन्य जीवों के हमले में मारे जाने या स्थायी तौर पर विकलांग होने पर 10लाख रुपये की धनराशि अनुग्रह के रूप में प्रभावित परिवार को प्रदान करती है. 1990 के दशक में मुआवजे की ये रकम 20-22 हजार रुपये थी. बन्दर, लंगूर, सांप व मधुमक्खी के हमले में मृत्यु हाने या घायल होने पर भी मुआवजा दिया जाता है. जंगली जानवरों द्वारा पालतू पशु के मारे जाने तथा मकान को क्षति हाने पर भी पर भी मुआवजा दिया जाता है.
सोचने की बात यह है कि अनुग्रह राशि चाहे कितनी ही ज्यादा हो इससे न तो किसी मौत की भरपाई हो सकती है न मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या हल हो सकती है. यह बात अनुभवों से स्वतः साबित हो चुकी है. यदि वर्तमान नीतियों से मानव-वन्यजीव संघर्ष का समाधान निकल सकता तो यह मुद्दा रहता ही नहीं. लेकिन वास्तव में समस्या निरंतर बढ़ती जा रही है. ऐसे में वन्यजीव संरक्षण के कानूनों की समीक्षा नितान्त ज़रूरी है. इसके साथ ही वर्तमान कानून के उन प्रावधानों को बिना देरी किये लागू करने की आवश्यकता है जिनमें मनुष्यों, मवेशियों, खेती आदि के लिये खतरा उत्पन्न करने वाले संरक्षित जीवों को मारने की अनुमति पहले से दी गयी है. प्रसिद्ध शिकारी नवाब शफथ अली खान जो महाराष्ट्र व भारत के अन्य प्रदेशों में मानव-वन्यजीव संघर्ष पर व्यापक अनुभाव रखते हैं की यह टिप्पणी सटीक लगती है कि जब वन्यजीव संरक्षण कानूनों के कारण मानव जीवन के लिये खतरा बन चुके किसी वन्य जन्तु विशेष को पकड़ने या मारने में अनावश्यक देरी की जाती है तो इस कारण बढ़ने वाले जनाक्रोश के चलते वन्यजीव संरक्षण की कोशिशें बेकार हो जाती हैं. आज मुख्य तौर पर इन बिन्दुओं पर विचार मंथन की जरुरत है-
- मानव और वन्य जीवों में प्राथमिकता किसे दी जानी चाहिये. यदि किसी एक का जीवन (और जीवन निर्वाह के लिये आजीविका) बचाना हो तो वह मानव होगा या वन्य जन्तु?
- प्रदेश के अलग-अलग राष्ट्रीय पार्कों, वन्यजीव अभयारण्यों, आरक्षित वनों में विभिन्न जीवों की ज्यादा से ज्यादा कितनी-कितनी संख्या रह सकती है? हर प्रजाति एक जन्तु के लिये आवश्यक वन क्षेत्र, भोजन इत्यादि के अनुसार उस क्षेत्र की धारक क्षमता पर आधारित.
- किसी वन क्षेत्र में जिन प्रजातियों के जीव जीवों की संख्या धारक क्षमता (कैरीइंग कैपेसिटी) से ज्यादा है उनके बारे में क्या तात्कालिक व दीर्घकालिक नीति होगी? अन्य वन क्षेत्रों को भेजना, मारना (कलिंग), बन्ध्याकरण या अन्य?
- बन्दरों, जंगली सुअरों आदि पीड़क (वर्मिन) जीवों को निश्चित समय अवधि के लिये निश्चित क्षेत्र में मारने (कलिंग) की सशर्त अनुमति देना क्या पर्याप्त और प्रभावी उपाय है? क्या यह सफल रहा है? उत्तराखण्ड के ग्रामीणों में कितनों के पास समुचित संसाधन (बन्दूक, कारतूस आदि) हैं? क्या वे प्रशिक्षित हैं? क्या इतनी बड़ी संख्या में कारतूस खरीदने के लिये उनके पास धन हैं? इन प्रश्नों पर व्यावहारिक दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता है. यदि उत्तर ’नहीं’ में मिले तो क्या किया जा सकता है?
- क्या आर्थिक अनुग्रह राशि बढ़ाना किसी के जीवन की भरपाई कर सकता है? यदि नहीं तो इसे समस्या के समाधान के तौर पर प्रस्तुत किया जाना चाहिये?
उत्तराखण्ड में लोग, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र में रह रहे लोग वन्य जीवों द्वारा हो रहे जानलेवा हमलों तथा खेती, बागवानी, पशुधन को गंभीर नुकसान से बहुत परेशान हैं. लेकिन इसके बावज़ूद उनका दर्द और नाराजी संगठित रूप में प्रकट नहीं होने के कारण अवाज दब जा रही है. विडम्बना ही कह सकते हैं कि इतना ज्वलन्त मुद्दा केन्द्र, प्रदेश सरकार यहां तक कि विपक्षी दलों की प्राथमिकता सूची से गायब है!
कमल जोशी
अल्मोड़ा के रहने वाले कमल जोशी का यह लेख काफल ट्री को ईमेल आईडी पर भेजा गया. कमल से उनके मोबाइल नम्बर 9412909566 पर सम्पर्क किया जा सकता है.
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