हैप्पी बर्थडे कॉर्बेट साहब
जिम कॉर्बेट उन चुनिंदा विदेशी मूल के भारतीयों में से एक हैं जिन्होंने भारत में रहकर भारतीयों से भारतीय नागरिक जैसा प्यार, सम्मान और अपनत्व पाया. अंग्रेजी शासन के दौरान उत्तराखंड के विकट... Read more
28 साल के युवा से जब टिहरी रियासत डर गई
रात का वक्त था. जुलाई की बारिश पहाड़ों को भिगो रही थी, और भिलंगना नदी हमेशा की तरह अपने पूरे वेग में बह रही थी. लेकिन उस रात नदी सिर्फ पानी नहीं, एक सत्ता का डर भी बहा रही थी. टिहर... Read more
दुनिया में शांतिपूर्ण आंदोलनों का संक्षिप्त इतिहास
मानव इतिहास में सत्ता के विरुद्ध विरोध उतना ही पुराना है जितना संगठित शासन. प्रारंभिक सभ्यताओं में विरोध का स्वरूप आज की तरह रैलियों और धरनों का नहीं था. लोग शासकों के सामने सामूहिक याचिकाएँ... Read more
12 मार्च 1930 की सुबह साबरमती आश्रम के बाहर बड़ी संख्या में लोग एकत्र थे. महात्मा गांधी ने अपने हाथ में लाठी ली और 78 सत्याग्रहियों के साथ दांडी की ओर पैदल चलना शुरू किया. अगले 24 दिनों में... Read more
आज भारत में किसी बड़े प्रदर्शन, छात्र आंदोलन या राजनीतिक रैली के दौरान पुलिस द्वारा आँसू गैस के गोले छोड़े जाना एक सामान्य दृश्य है. भारतीय पुलिस की भीड़ नियंत्रण प्रणाली में यह हथियार... Read more
पिछली कड़ी : सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन कुमाऊं में जाति व भूमि के संबंध का विश्लेषण करने वाले अनुसन्धान के जनक रहे राम दत्त सनवाल (192... Read more
हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम
हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं. तस्वीरें खिंचती हैं, अभियान चलते हैं और कुछ दिनों तक इसकी खूब चर्चा भी होती है. लेकिन कुछ महीनों बाद अगर उन्हीं जगहों पर जाकर... Read more
हरेले के रंग में पहाड़ : फोटो निबन्ध
आज उत्तराखंड का लोक पर्व हरेला है जो हरियाली और प्रकृति से जुड़ा है. हरेले का रंग और उत्साह उत्तराखंड के कुमाऊँ की बौरारो (सोमेश्वर) घाटी और लोध में हरेला आने से एक माह पूर्व तब से ही शुरू ह... Read more
अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत
आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पैदा होने वाली जड़ी-बूटियों या मसालों की, या फिर विभिन्न प्रजाति के चावल या दालों की, आपकी मंजिल... Read more
खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया विचरती रही है—एकदंत गजराज. अब वह इस अंचल की लोककथाओं का जीवंत पात्र बन चुके हैं. उनके एक ही दाँत होने के पीछे भी एक लोक... Read more


























