1994 में मुजफ्फरनगर की अमानवीय घटना घट चुकी थी और संभवतः आजादी के बाद पहली बार उत्तराखंड के छोटे-छोटे कस्बों में कर्फ्यू लगा था. उत्तराखंड के सीधे-साधे ग्रामीण और कस्बेवासियों के लिये नित्ता... Read more
कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में
कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में -सूरज प्रकाश मैं 1989 से 1995 लगभग 75 महीने अहमदाबाद में रहा. ज्यादातर अकेले ही रहना हुआ. बेशक मैं उस मायने में पियक्कड़ या शराबी नहीं माना जा सकता जिस मायने... Read more
हिंदी सिनेमा की पहली ब्लैक कॉमेडी
यदि हिंदी सिनेमा में अभिनय की विभिन्न पाठशालाओं पर एक मोटी-मोटी नजर दौड़ाई जाये तो दो स्कूल सबसे पहले दिखलाई देंगे. एक नाटकीय अभिनय का और दूसरा स्वाभाविक अभिनय का. सर्वश्रेष्ठ नाटकीय अभिनेता... Read more
मोहनजोदड़ो की आखिरी सीढ़ी से -रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ मैं साइमन न्याय के कटघरे में खड़ा हूं प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दे! मैं वहां से बोल रहा हूं जहां मोहनजोदड़ो के तालाब के आखिरी सीढ़ी है... Read more
ये चरवाहे और मेमने भी तो हमारे ही हैं सरकार!
क्या आपने उत्तराखण्ड के अन्वाल समुदाय का नाम सुना है? यदि नहीं तो आज हम आपको उनकी कथा सुनाने जा रहे हैं. हम आपको बताएंगे कि कम्प्यूटर और रोबोट से संचालित इस इक्कीसवीं सदी में भी हिमालय की ऊं... Read more
उत्तराखण्ड की वनरावत जनजाति
उत्तराखंड के सामाजिक गठन का एक अन्य वर्णेत्तर घटक है वनरौत या वनराजी. पिथौरागढ़ जनपद के अस्कोट खंड के निकटस्थ सघन वनों में आखेटकीय एवं गुहावासी जीवन बिताने वाले वनरौतों (राजियों) को अपनी पृथ... Read more
माता महेश गिरि
मोहिनीदी से फिर मुलाकात की उम्मीद कम होती जा रही है. अब कहां भेंट होगी! हमसे गांव कबके छूट गया. वह भी क्या करने जाएगी गांव. उसकी ईजा, हमारी जेड़जा, जिंदा थी तो वर्षों में कभी एक चक्कर लगा लेत... Read more
बहुत कमाया लेकिन अच्छे से जीना नहीं सीखा
क्या आप सिर्फ नौकरी पैसों के लिए ही करते हैं. कहीं यह नौकरी आपकी सेहत को नुकसाान तो नहीं पहुंचा रही है. पैसे की बेतहाशा चाहत आपको परिवार से दूर तो नहंी कर रही है. प्रोफेशनल दोस्तों के चलते आ... Read more
वे तुम्हारी नदी को मैदान बना जाएंगे
अमृतलाल वेगड़ और रजनीकांत के नर्मदा वृत्त के आगे यह नर्मदा की दुर्दशा की अगली कहानी है. शिरीष खरे की यात्रा के लंबे कथोयकथन का यह एक अंश है. लेखक ने यह यात्रा कुछ साल पूर्व ‘तहलका’ में... Read more
दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ – 4
(पिछली क़िस्त – दिल्ली से तुंगनाथ वाया नागनाथ – 3) मैं दूकानों से थोड़ा आगे निकला और नीचे जंगल की ढलान की ओर देखा. वह प्लास्टिक के कचरे से अटा पड़ा था. दूकानों के आगे साफ सड़क और उनके पिछवाड़े इत... Read more


























