घोर कलजुग इसी को कहते हैं
उन दिनों समाज में नैतिकता का जोरदार आग्रह रहता था. हर किसी पर घनघोर नैतिकता छाई रहती थी. लड़के, अपने परिवार के सदस्यों से तो डरते ही थे, मोहल्ले वालों से उनसे भी ज्यादा डरते थे. अपनों ने देख... Read more
मुठ्ठी भर कंचे
तब गाँव क्या था, श्याम-श्वेत सिनेमा के दौर का सा गाँव लगता था. चौतरफा खेत-ही-खेत थे, गन्ने-सरसों की फसलों से लहलहाते हुए. गाँव में कुएँ थे, तो रहट भी. यातायात के साधनों में, बैलगाड़ी से लेकर... Read more
विषय से ज्यादा कठिन शिक्षक
गणित से लड़के दूर- दूर भागते थे. इस पर अफसोस इस बात का था कि, भविष्य के बेहतर मौके, केवल इसी विषय में मौजूद बताए जाते थे. ‘अगर गणित के साथ अच्छे दर्जे में पास हो जाएँ’ तो, अनेक क... Read more
मैं ही मैं हूँ, मैं ही सूर्य हूँ, मैं ही मनु…
कॉलेज के दिन थे. रंगीन रुमाल मे इत्र के फाहे रखने की उम्र थी. तो दूसरी तरफ परंपरा-विद्रोह की अवस्था. साइकिल खींचना, तौहीन मानने की उम्र हो चली थी. कॉलेज जाये बिना गुजर भी नहीं थी. युक्ति और... Read more
गुर्जी अगर सँभलोगे नहीं तो ऐसे गिर पड़ोगे – हलवाहे राम और लेक्चरार साब की नशीली दास्तान
दोनों में अटूट दोस्ती थी. कुछ ऐसी कि, लंबे समय तक इस दोस्ती ने खूब सुर्खियाँ बटोरी. दोनों के घर आस-पास ही थे. एकदम निकट पड़ोसी समझ लीजिए. उनमें से एक, पूरे गाँव-जवार में सबसे ज्यादा पढ़े-लिख... Read more
परीक्षा माने – ‘पर इच्छा’
दो दोस्त थे. दोनों में काफी घनिष्ठता थी. दाँत काटी दोस्ती समझ लीजिए. ये बात, इस नजरिए से बखूबी साबित होती थी कि, बेहद नाजुक मौकों पर भी दोनों ने हमेशा एक ही जैसे कदम उठाए. मास्टर डिग्री के द... Read more
विशाल हृदय वाले गुरूजी और हिरन का आखेट
हेडमास्टर साहब, मस्तमौला आदमी थे. टेंशन बिल्कुल नहीं पालते थे. बरसात के दिनों को छोड़कर, सालभर कक्षाएँ बाहर लगती थीं. स्कूल- बिल्डिंग के आगे एक खुला सा मैदान था. पहाड़ के हिसाब से अच्छा-खासा... Read more
आकाशमुखी लेखन का एंड्रॉयड युग
कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद, स्कूल-इंस्पेक्टर थे. वे अक्सर देहातों में दौरों पर रहते थे. आवागमन के साधन तब बहुत सीमित होते थे. मजबूरन उन्हें वहीं रुकना पड़ता था. कामकाज के बाद, जन जीवन को गहरे... Read more
बाली उमर का सिनेमा प्रेम और सच बोलने का कीड़ा
लड़के, पढ़ने के लिए देहात से शहर जाते थे. आसपास के इलाकों में अव्वल तो कोई इंटर कॉलेज नहीं था. अगर था भी, तो तब तक उसमें साइंस नहीं खुला था.लड़कों की मजबूरी थी, रोज का तीस किलोमीटर आना-जाना.... Read more
मलूक दादा का अगला दांव
उत्तिष्ठ अर्थात् उठो, न कि उठाओ क्षीण कटि, क्षीण स्वभाव. वैसे उनकी संपूर्ण ही काया क्षीण थी. सुतवाँ शरीर.साहस और उत्साह में भरे-पूरे. लगभग दुस्साहसी. शर्त बदने को हमेशा तैयार. दाँव खेलने के... Read more
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