हल्के-फुल्के मिजाज की फिल्म चश्मेबद्दूर
चश्मेबद्दूर (Chashme Buddoor) एक पर्सियन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- बुरी नजर से दूर या नजर ना लगे. चश्मे बद्दूर (1981) दिल्ली विश्वविद्यालय के तीन दोस्तों की कहानी है, जो रूम शेयरिंग कर... Read more
ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित गोलमाल (1979) हिंदी सिनेमा की सफलतम फिल्मों में से एक है. शिष्ट हास्य को परदे पर उकेरना बड़ा ही दुष्कर काम होता है. इस फिल्म में निर्मल हास्य का सृजन हुआ है. कथासार... Read more
बहुत बड़ी और क्लासिक फिल्म है ‘छोटी सी बात’
वर्ष 1975 हिंदी सिने-इतिहास में खास तौर पर याद किए जाने लायक साल है. इस वर्ष शोले, दीवार, धर्मात्मा, जमीर, अमानुष, धरम-करम जैसी फिल्में प्रदर्शित हुईं, तो दूसरी ओर चुपके-चुपके, छोटी सी बात ज... Read more
समूचा हिंदुस्तान नजर आता है ‘बावर्ची’ फिल्म में
बावर्ची (1972) विघटित होते पारिवारिक मूल्यों की पुनर्स्थापना को लेकर आई एक नए मिजाज की फिल्म थी. तब के दौर के हिसाब से यह फिल्म, एक बिल्कुल नये विषय को लेकर आई. ऋषि दा की फिल्मों के विषय आम... Read more
लड़के फल नहीं खाएंगे, तो कौन खाएगा
[पूर्वकथन: ललित मोहन रयाल की यह सीरीज खासी लोकप्रिय रही है और इसे हमारे पाठकों ने न केवल पसंद किया है इसे खूब सारे फेसबुक शेयर्स भी मिले हैं. इस सीरीज का यह अंतिम हिस्स्सा है. अपने पैतृक गाँ... Read more
मेहमान बनने का शौक
उसे जान-पहचान में मेहमान बनने का बहुत शौक था. वह इतना भी जरूरी नहीं समझता था कि जान-पहचान बहुत गहरी हो, बस कामभर की ही सही. गाँव में इक्का-दुक्का बार आमने-सामने पड़े हों, देखा-देखी हुई हो, इत... Read more
बचपन के बहाने
हमारे कनिष्ठ पुत्र चिरंजीव नचिकेता, ढाई बरस के हैं. वे रोज रात को सोने से पहले जिद करते हैं. उनकी बालहठ रहती है, यूट्यूब पर फिल्मी गाने देखने की. घर पर टेलीविजन अथवा एलसीडी स्क्रीन जैसे साधन... Read more
फोर्ब्स सूची में आने के लिए सियार सिंगी की तलाश
गाँव-देहात में तब बैंक नहीं खुले थे. साहूकार सूद पर रुपए चलाते थे. सूद की एक तय सीमा रहती थी. क्रेडिट कार्ड का तब तक चलन शुरू नहीं हुआ था. अब सवाल उठता है कि, जब साहूकारी का नाम सुनकर ही झुर... Read more
रंगरूटी में निखरती हनुमंत की जवानी
हनुमंत सिंह के बड़े भाई फौज में थे. उन दिनों वे किसी अफसर के ‘खास आदमी’ थे. कहने का तात्पर्य है कि, वे ‘बटमैन’ का ओहदा संभाले हुए थे. संयोग से वही अफसर ‘रिक्रूट... Read more
फेल होने पर भागने का एक ट्रेंड
परीक्षाफल का दिन नजदीक आते ही डर और आशंका का माहौल बनने लगता था. तब रिजल्ट निकलता भी बहुत खौफनाक तरीक़े से था. इलाके-के-इलाके साफ हो जाते. कई दिनों तक भारी नरसंहार जैसा माहौल बना रहता था. तो... Read more
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