‘जय हिंद’ का नारा नेताजी सुभाष चंद्र बोस या किसी अन्य ने नहीं बल्कि अल्मोड़ा (उत्तराखंड) के जैंती निवासी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम सिंह धौनी जी ने नेता जी से भी काफी पहले... Read more
महिला सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण है लेह-लद्दाख
21वीं सदी में एक तरफ भारत जहां चांद और मंगल ग्रह पर इंसानी बस्तियां बसाने की तैयारी कर रहा है वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी हकीकत यह है कि इसी भारतीय समाज में महिलाओं के साथ अन्याय और अत्याचार बदस्त... Read more
अल्मोड़ा में लंबी कविता और पूरन पोली की मौज
रात की पार्टी समाप्त होने के बाद अगले दिन मुहल्ले के हर कायाधारी के चेहरे पर अजीब सी खुशी के साथ एकदम साफ न दिखने वाली झेंप भी थी. रात के नाच गाने में थोडे़ बहुत आपसी विवाद, हाॅलिडे होम की ख... Read more
भमोरा, कॉर्नस कैपिटाटा (Cornus Capitata) उत्तराखंड के कुमाऊँ की पहाड़ियों में खिला अद्भुत फूल बहुत से प्राकृतिक रहस्यों को छुपाए है, ये बहुत सारी कहानियां भी कहता है मानव इतिहास की. इस... Read more
हिमालय की सुन्दरतम चिड़ियों में एक है सेटर ट्रेगोपन : सुरेन्द्र पवार का फोटो निबंध
कुमाऊँ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों के आसपास के जंगलों में देर शाम और सुबह एक बच्चे के रोने की आवाज आती है जिसे सुनकर लगता है कि या तो वह आदमी का बच्चा है या बिल्ली का. आज भी गाँव वाले कहते हैं... Read more
कुमाऊँ में लकड़ी पर नक्काशी करने वाले आख़िरी उस्तादों में से एक धनीराम जी का इंटरव्यू
अठहत्तर साल के धनीराम जी कुमाऊँ की गौरवशाली काष्ठकला परंपरा के आखिरी उस्ताद ध्वजवाहक हैं. उन्होंने आज से साठ बरस पहले एक गांव के घर में बारह आना रोज की दिहाड़ी पर अपना पहला नक्काशीदार दरवाज़... Read more
निमक का है हरामी यह खुदा भेजा क्यों हिन्दुस्तां
गढ़वाल शैली की चित्रकला के प्रवर्तक महान चित्रकार और कवि मौलाराम (1743-1833) की कला बहुत लम्बे समय तक जनता के सम्मुख न आ सकी. उनकी मृत्यु के करीब डेढ़ सौ सालों बाद बैरिस्टर मुकुंदीलाल ने उनके... Read more
पहाड़ में रोजगार को लेकर पलायन की कहानियां अक्सर सुनने को मिलती हैं. कभी पानी का न होना तो कभी बंदर, सुअर आदि जंगली जानवरों से खेती को नुकसान होना, बहुत सी समस्यायें सुनने व देखने को मिलती ह... Read more
पहाड़ियों की मेहनत के प्रतीक घास के लूटे
बरसात के बाद मौसम में पहाड़ हरी लम्बी घास से लद जाते हैं. इस घास का प्रयोग यहां के लोग अपने जानवरों को खिलाने के लिये करते हैं. इन दिनों हरे पहाड़ों के बीच लाल-पीली रंगीन साड़ियों में पहाड़ की म... Read more
उस ज़माने के अफ़सर ऐसे हुआ करते थे : कुमाऊं कमिश्नर पर्सी विंडहैम का किस्सा
वर्ष 1913 एक दिन, करीब 8 बजे जब मैं किच्छा में एक स्कूल का निरीक्षण कर रहा था, एक अध्यापक ने मुझे सूचित किया कि कमिश्नर स्कूल देखने आने वाले हैं. मुझे बुखार था और शिथिलता के कारण कोट-पैन्ट प... Read more


























