उत्तराखंड के इतिहास में काला दिन है 1 सितम्बर
1 सितम्बर, 1994 की सुबह खटीमा में हमेशा की तरह एक सामान्य सुबह की तरह शुरू हुई. लोगों ने अपनी दुकानें खोली थी. सुबह दस बजे तक बाजार पूरा खुल चुका था. तहसील के बाहर वकील अपने-अपने टेबल लगा कर... Read more
सोचो मत, जागो और पूरे मन से अपना कर्म करो
जिसे यह बात समझ में आ जाए कि जीवन जीने के लिए है, सोचने के लिए नहीं, उसे कभी कोई दुख नहीं सता सकता, क्योंकि जीने के लिए इतने सारे अनुभव हैं. आखिर हम अनुभवों और अनुभूतियों के लिए ही तो जीते ह... Read more
‘चले साथ पहाड़’ अरुण कुकसाल की नई किताब
इस दुनिया को बेहतर और जीवंत बनाने की पहल करने वाला वाला निश्चित ही एक घुमक्कड़ रहा होगा. भारी भरकम बंद किताबों में ठूँसे गए गरिष्ठ ज्ञान-ध्यान से कहीं अधिक रोचकता और अपनेपन का अहसास घुमक्कड़... Read more
अगर आप केवल टी-शर्ट में ‘पहाड़ी’ लिखकर तनकर चलने वाले पहाड़ियों में हैं तो ‘यकुलाँस’ का पहला मिनट उत्साह से देखने के बाद आपके मन में क्या है? क्यों हैं? फ़ॉरवर्ड करके देखो तो, गाना सिंक नहीं... Read more
नैनीताल की झील में एक खतरनाक जीवाणु का घर है
यह शोध हमारे विश्वविद्यालय में वनस्पति-विज्ञान के प्रोफ़ेसर साहब ने किया था. हिंदी समाज के आम प्राध्यापक की तरह वो एकेडेमिक विषयों पर हिंदी में बोलने में संकोच करते थे, जब मज़बूरी हुई तब भी... Read more
बाघिन का घातक हमला
कुछ दिनों पहले की बात है, मैं रामनगर की कोसी नदी पर सूर्यास्त को अपने मोबाइल पर क़ैद कर रहा था. पानी में पढ़ती हुई सूर्य की गुलाबी किरणें नदी को एक अलग ही सौन्दर्य प्रदान कर रही थी. (M... Read more
अफ़गान बादशाह जो देहरादून में ‘बासमती चावल’ लाया
‘देहरादून की बासमती’ सुनते ही मुंह में खुशबू, मिठास और कोमल चावल के दानों के स्वाद से भर जाता है बशर्ते आपने कभी देहरादून का बासमती चावल खाया हो. जितना दिलचस्प स्वाद देहरादून की बासमती का है... Read more
वंशीनारायण मंदिर: उत्तराखंड का एक ऐसा मंदिर जो साल में केवल एक दिन खुलता है
वंशीनारायण का मंदिर चमोली जिले की उर्गम घाटी के पास स्थित है. उर्गम घाटी से करीब 12 किमी की पैदल दूरी पर स्थित हैं वंशीनारायण मंदिर. समुद्र तट से 12 हजार फीट की ऊंचाई ओअर स्थित है वंशीनारायण... Read more
बचपन की छवियाँ
इजा कहती हैं कि मैं जब पेट में था तो कभी स्थिर नहीं रहा. जब मैं नौ महीने बीत जाने पर भी पैदा नहीं हुआ तो घर में घबराहट शुरू हो गई. पिता जी कहा करते थे कि इस बार भागा की मतारी का बचना मुश्किल... Read more
1942 का साल था महिना अगस्त का. अंग्रेजों के खिलाफ़ विरोध की चिंगारियां अब गाँवों में विरोध की लपटों के रूप में साफ देखी जा सकती थी. कुमाऊं के आंतरिक क्षेत्रों में तेज होते विरोध के स्वर देखक... Read more
























