कुंदन शाह निर्देशित और एनएफडीसी निर्मित, यह फिल्म भ्रष्टाचार पर सीधी चोट करती है. सिस्टम, बिजनेसमैन और मीडिया के गठजोड़ पर तीखा व्यंग्य होने के बावजूद, यह फिल्म सरकारी मदद से बन सकी. एनएफडीस... Read more
ऋषिकेश मुखर्जी की कालजयी फिल्म: किसी से न कहना
ऋषिकेश मुखर्जी, दिलचस्प और जीवंत सिनेमा के फन मे माहिर सिनेकार रहे हैं. उनकी फिल्मों में बेहद हल्के-फुल्के अंदाज में सांस्कृतिक विमर्श तो रहता ही था, साथ ही उसमें एक गहरा संदेश भी निहित होता... Read more
‘मैने प्यार किया’ के प्रोड्यूसर बड़जात्या को कौन भूल सकता है. वे निर्देशक सूरज बड़जात्या के पिता थे. बड़जात्या की फिल्मों के बारे मे यह आम राय कायम होकर रह गई कि, वे रामचरितमानस के... Read more
नामवर सिंह: साहित्यिक-वाचिक परंपरा के प्रतिमान
‘तुम बहुत बड़े नामवर हो गए हो क्या.’ नामवर का नाम एक दौर में असहमति जताने का एक तरीका बनकर रह गया था. वक्ता को हैसियत-बोध कराने का मुहावरा. किंवदंती बनने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल... Read more
अंगूर, बांग्ला फिल्म भ्रांतिविलास की रीमेक थी, जो ईश्वर चंद्र विद्यासागर के नाटक पर आधारित थी. यह नाटक विलियम शेक्सपियर के ‘द कॉमेडी ऑफ एरर्स’ पर आधारित था. फिल्म की थीम व कई दृश्य हू-ब-हू क... Read more
पिता-पुत्री का घर नीलामी की भेंट चढ़ जाता है. वे नायक के यहाँ शरण लेते हैं, जिसके खुद के हालात शरणार्थी जैसे रहते हैं. झेंप के भाव, क्षमाप्रार्थी की सी भंगिमा. जैसे ही उसके मालिकान की नजर नवय... Read more
फिल्म ‘कथा’ (1982) का बैकड्राप, खरगोश-कछुए की कथा पर आधारित है. बदलते हुए परिवेश में, परिवर्तित होते नैतिक मूल्यों को फिल्म में प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया गया है. राजाराम (नसीरुद्दीन शाह) एक... Read more
हल्के-फुल्के मिजाज की फिल्म चश्मेबद्दूर
चश्मेबद्दूर (Chashme Buddoor) एक पर्सियन शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- बुरी नजर से दूर या नजर ना लगे. चश्मे बद्दूर (1981) दिल्ली विश्वविद्यालय के तीन दोस्तों की कहानी है, जो रूम शेयरिंग कर... Read more
ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित गोलमाल (1979) हिंदी सिनेमा की सफलतम फिल्मों में से एक है. शिष्ट हास्य को परदे पर उकेरना बड़ा ही दुष्कर काम होता है. इस फिल्म में निर्मल हास्य का सृजन हुआ है. कथासार... Read more
बहुत बड़ी और क्लासिक फिल्म है ‘छोटी सी बात’
वर्ष 1975 हिंदी सिने-इतिहास में खास तौर पर याद किए जाने लायक साल है. इस वर्ष शोले, दीवार, धर्मात्मा, जमीर, अमानुष, धरम-करम जैसी फिल्में प्रदर्शित हुईं, तो दूसरी ओर चुपके-चुपके, छोटी सी बात ज... Read more
Popular Posts
- कुमाऊं में रामलीला की परम्परा
- ‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…
- हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें
- ‘पायर’ पहाड़ की ठोस पीठ है
- धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’
- गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी
- देवदार या देव दारु
- कसारदेवी : जहां स्वर्ग के सबसे करीब होने का अहसास होता है
- दुर्गम पहाड़ों तक कैसे पहुंचे महाराष्ट्र-गुजरात के पर्व
- पिथौरागढ़ में स्विट्ज़रलैंड बनने की है पूरी क्षमता
- अलमोड़े में नंदादेवी मेले की ताज़ा तस्वीरें
- अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक
- सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन
- उत्तराखण्ड की महिलाएं : स्थितियों, संघर्षों और चुनौतियों का दस्तावेज
- कामिनी तुम कौन?
- पूर्वी नयार नदी की वो बाढ़
- कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा
- बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार
- आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”
- भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्
- उत्तराखण्ड के सरोवर
- दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध
- सिंधुजा की कविता : स्मृति यात्रा
- पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल
- घी संक्रान्ति का लोक विज्ञान
