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गुमानी पन्त की प्राप्त रचनाएं

कुमाऊनी साहित्य की शुरुआत लोकरत्न गुमानी से मानी जाती है. कवि गुमानी का जन्म 1790 ई. माना गया है. इस लिहाज से जब कवि गुमानी ने कविता लिखना शुरु किया होगा तब कुमाऊं प्रदेश में गोरखाओं का शासन खत्म हुआ होगा और ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन शुरु हुआ होगा. गार्डनर, ट्रेल या फिर लसिंग्टन उनके युग के कुमाऊं कमिश्नर रहे होंगे.

गुमानी के जीवन वृत्त का मुख्य स्त्रोत देवी दत्त पांडे द्वारा दिया गया कवि जीवन चरित्र और कवि के वंशजों से प्राप्त जानकारी है. गुमानी जन्म 1790 ई. में काशीपुर में हुआ था. गुमानी के पूर्वज पिथौरागढ़ जिले के गंगोल क्षेत्र में उप्राड़ा गांव के थे.

गुमानी के दादा का नाम पुरुषोत्तम पन्त और पिता का नाम देवनिधि पन्त था. माता का नाम देवमंजरी बताया जाता है. उनकी मां उनके पिता की दूसरी पत्नी थी. देवीदत्त पन्त के अनुसार गुमानी पन्त का वास्तविक नाम लक्ष्मी नन्दन पन्त था.

गुमानी पन्त के पूर्वज चंद शासकों के राजवैद्य रहे, उनके पिता नेपाल नरेश के राजवैद्य रहे. गुमानी अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने चाचा राजवैद्य पंडित राधाकृष्ण से प्राप्त की. उसके बाद कलौन गांव के निवासी पंडित हरिदत्त ज्योतिविंद के शिष्य रहे.

24 वर्ष विद्यार्जन के बाद 12 वर्ष तक उन्होंने ब्रह्मचर्यं का कठोरता से पालन किया इस दौरान गुमानी पन्त प्रयाग, हरिद्वार, देवप्रयाग बदरिकाश्रम आदि स्थानों पर रहे. कहा जाता है कि इन दिनों उन्होंने कठोर साधना की और कुछ समय तक केवल डूब के रस को पिया.

गुमानी पन्त के दो विवाह बताये जाते हैं. पहला विवाह विद्यार्जन के दौरान हुआ दूसरा काफ़ी समय बाद हुआ. कहा जाता है कि उनके दूसरे विवाह की पत्नी काफ़ी कम उम्र की थी. गुमानी पन्त के दो पुत्र हुए. रामदत्त और गंगादत्त. भगत सिंह ने एक पुत्री का भी उल्लेख किया है.

गुमानी पन्त काशीपुर में रह रहे चंद राजा गुमान सिंह और टिहरी नरेश सुदर्शन साह के दरबार में रहे. कांगड़ा, अलवर और नहान के राजाओं के यहां गुमानी के सम्मानित होने और इन राजाओं की प्रशंसा में काव्य रचने का उल्लेख मिलता है. हालांकि गुमानी पन्त की स्वाभिमान की कथाएं कही जाती हैं वे उन्हें दरबारी कवि से भिन्न व्यक्तित्व देती है.

अंग्रेजों से गुमानी पन्त के कैसे संबंध थे इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है लेकिन वे अंग्रेजों द्वारा गुणीजनों का आदर न करने से दुखी जरुर थे. गुमानी का सम्मान राजदरबारों में तो था ही लेकिन आम जनता के बीच वे ख़ासा लोकप्रिय थे. उनकी रचनाएं आम जनता के बीच ही उपलब्ध भी हुई हैं.

गुमानी के रचनाकाल के विषय में विद्वानों के बीच विवाद है. देवीदत्त पांडे की माने तो उनका रचनाकाल 1826 के आसपास रहता है. यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ के अनुसार वे 1812 में राजा गुमान सिंह के राजकवि नियुक्त हुए. पं. बद्रीदत्त पांडे ने गुमानसिंह का काल 1828 से 1836 माना है सो इसके अनुसार गुमानी का रचनाकाल 1828 ठहरता है.

गुमानी के उपलब्ध साहित्य में सर्वाधिक रचनाएं संस्कृत में हैं. भक्ति,नीति और ज्ञान उनके प्रमुख विषय हैं.गुमानी की रचनाओं का सबसे पहले संकलन गुमानी नीति को रेवादत्त उप्रेती ने 1894 में अल्मोड़े से और दूसरे संकलन गुमानी कवि विरचित संस्कृत और भाषा काव्य को रैमजे कालेज अल्मोड़ा में संस्कृत के अध्यापक, पिथौरागढ़ छाना गांव के देवीदत्त पांडे ने 1897 में इटावा से प्रकाशित कराया.

गियार्सन ने गुमानी साहित्य के दो संकलनों का जिक्र किया है- गुमानी नीति और गुमानी कवि विरचित काव्य संग्रह. गुमानी नीति में समस्या पूर्ति काव्य है जिसमें तीन चरण संस्कृत में और चौथे चरण में हिन्दी कुमाऊनी या नेपाली लोकोक्तियां हैं. तीन चरण में नेपाली और चौथे में संस्कृत के प्रयोग भी गुमानी ने किये हैं. गियर्सन ने इसी को अंग्रेजी अनुवाद सहित इंडियन एन्टीक्वेरी (1909) में प्रकाशित कराया था.

अंग्रेजी राज पर कुमाऊँनी के प्रथम कवि गुमानी पन्त की कविता

इसके अलावा तीन निर्णय ग्रंथो का उल्लेख देवी दत्त पांडे किया है उनकी हस्तलिखित प्रतियां गुमानी गुटका या गुमानी निर्णयसार के नाम से व्यक्तिगत संग्रहों में उपलब्ध है. यह भी कहा जाता है कि गुमानी ने सत्यनारायण कथा का कुमाऊनी में अनुवाद किया था. इस तरह फिलहाल गुमानी की दो प्रकाशित पुस्तकें गुमानी नीति और गुमानी विरचित संस्कृत एवं भाशाकाव्य और अप्रकाशित रचना निर्णय-सार उपलब्ध हैं. इनके अलावा राम सहस्त्रगणदण्डक कमल कुमार पाण्डेय के अप्रकाशित शोध प्रबंध कुमाऊं के संस्कृत कवि गुमानी : व्यक्तित्व एवं कृतित्व (1986) में संकलित है.

-काफल ट्री डेस्क

संदर्श ग्रन्थ – पहाड़ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका कहै गुमानी

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