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सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी

हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक विश्लेषण श्याम दत्त पंत ने किया. उन्होंने ब्रिटिश काल में उच्च शिक्षा अध्ययन किया. उनकी गहन रूचि अर्थशास्त्र व समाज शास्त्र में रही. उनकी शोध मुख्यतः हिमालयी समाज की आर्थिक संरचना पर केंद्रित रही. उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय” 1935 में जॉर्ज एलन एंड अनविन, म्यूजियम स्ट्रीट, ग्रेट ब्रिटेन से प्रकाशित हुई. इस पुस्तक ने पश्चिमी मानव शास्त्रियों व भूगोलविदों के साथ भारत व नेपाल के विकास अर्थशास्त्रियों व हिमालय अध्ययन के चिंतकों पर पड़ा.

आरंभिक ब्रिटिश व यूरोपीय विद्वानों में एडवर्ड ब्लँट ने पंत की पुस्तक की प्रस्तावना लिखी. उन्होंने ब्रिटिश प्रशासनिक नृवंश शास्त्र की परंपरा में हिमालयी समाज को समझने के लिए पंत के सर्वेक्षण को महत्वपूर्ण बताया. 1936 में मेस्टन ने इंटरनेशनल अफेयर्स पत्रिका (खंड 15,नंबर 4) में हिमालयी समाज की विशिष्ट आर्थिकी प्रस्तुत करने के लिए पंत की सराहना की. इसी वर्ष “द इकोनॉमिक जनरल (खंड,45) में जी ऍम चटर्जी ने इसे विशिष्ट अध्ययन बताया.

1996 में विनीता हून ने अपनी पुस्तक “लिविंग ऑन द मूव: भोटियाज ऑफ द कुमाऊं हिमाल्या” का प्रारंभिक आधार पंत के सर्वेक्षण पर रचा. श्री मन्नारायण ने अपनी पुस्तक “इंडिया एंड नेपाल : एन एक्सरसाइज इन ओपन डिप्लोमैसी” में पंत के कार्यों का उल्लेख किया. नेपाल की विकास योजना व पर्वतीय अर्थव्यवस्था में यादव प्रसाद पंत की शोध पंत के क्षेत्रीय सर्वेक्षण पर आधारित रही. सामाजिक संरचनाओं के अध्ययन में विकास सिद्धांत के अनुप्रयोग पर कृष्णा भारद्वाज ने काम किया. पंत की पुस्तक से तीन शोध परंपराऐं विकसित हुईं :

1. हिमालयी सामाजिक अर्थव्यवस्था का अध्ययन.
2. सीमांत पर्वतीय अर्थव्यवस्था के अध्ययन.
3. ट्रांस हिमालय व्यापार और मौसमी प्रवास के अध्ययन.

कई विद्वानों ने हिमालय के समाज व अर्थतंत्र को इन सर्वेक्षणों के आधार पर समझने की परंम्परा विकसित की जिनमें क्रिस्टोफ वान फ्यूरर, हेमिनडोर्फ, जॉन वेल्पटन व टोनी हेगन मुख्य थे.

एस. डी. पंत ने विस्तार से हिमालय की भौतिक दशाऐं व प्राकृतिक क्षेत्र, उच्च हिमालय के भोटिया जनजाति क्षेत्रों में खेती, हिमालय की घुमंतू जातियों का जीवन व रहन सहन, हिमालय के लघु कुटीर धंधे क्रमवार प्रस्तुत किए. उप हिमालय क्षेत्र अल्मोड़ा का वर्णन व वहां के इलाके में की जा रही अंतर्वर्ती या मिश्रित खेती (जिसे कतिल तरीका कहा जाता था) ढालदार व सीढ़ीदार खेती, उपरांऊ जमीन पर सूखी खेती, तलाऊं जमीन पर गीली खेती, वाणिज्यिक फसल व उनमें पड़ने वाली खाद, कृषि का ऋतु चक्र, सिंचाई व मेढ़, फसल कटाई, अनाज को चूटना-फटकना-कूटना-पिसाई-सफाई व भकार में संग्रहण का वर्णन किया. अपनी पुस्तक के अगले अध्यायों में उन्होंने फसल में लगने वाले कीट, खेती को प्रभावित करने वाली प्राकृतिक बाधाओं, हिमालय के कृषि यँत्र व औजार, हिमालय के पालतू व जंगल के पशु के साथ जाड़े के मौसम में पहाड़ से होने वाला मौसमी प्रवास समझाया.

उन्होंने पहाड़ में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक दशा व स्त्री-पुरुष के मध्य श्रम विभाजन का विश्लेषण किया. पर्व-त्यौहार-संस्कार व अन्य अवसरों में लोक सांस्कृतिक दशाओं का वर्णन है. उनके अध्ययन में पहाड़ की यातायात व्यवस्था, व्यापार के तरीके व मेले व स्थानीय बाजार की गतिविधियों के साथ लोकगीत व नृत्य का रोचक विवेचन है. अपनी पुस्तक के परिशिष्ट में उन्होंने भोटिया जनजाति के प्रवास, जोहार, मल्ला दारमा, व्यांस, चौदांस का वर्णन किया तो तराई-भाबर में लगने वाली बाजार के दिन, सामान की मापतौल के बाँट व अन्य तरीकों को भी समझाया.

एस. डी. पंत की सोच रही कि हिमालय की अर्थव्यवस्था एक संतुलित पारिस्थितिक व्यवस्था थी जिसे औपनिवेशिक नीतियों ने असमायोजित कर दिया. अपनी पुस्तक के विस्तार में उन्होंने हिमालय की पारम्परिक दशा, रीति-रिवाज़, खेती पशुपालन व अवलम्बन इलाके के साथ जंगलों का सम्बन्ध स्पष्ट किया. इन पर औपनिवेशिक नीतियों का प्रभाव, सामुदायिक संसाधन प्रबंध के कमजोर पड़ने व पहाड़ से पलायन की शुरुवात का विवेचन किया.उन्होंने हिमालयी सामाजिक व्यवस्था का एकीकृत मॉडल वर्णित किया उसे मात्र कृषि व्यवस्था नहीं माना.बताया कि हिमालय की अर्थव्यवस्था के आधार आपस में समन्वित चार स्तम्भ हैं जिनमें पहला जीवन निर्वाह कृषि जो सीढ़ी दार खेती, वर्षा पर निर्भर अनाज-दलहन-मसाले का उत्पादन व कुटीर उद्योग है. दूसरा दुग्ध उत्पादन हेतु गाय-भैंस, ऊन उत्पादन हेतु भेड़ पालन के लिए जंगल व मौसमी चारागाह पर निर्भर हैं. तीसरा ट्रांस हिमालयी व्यापार जिसमें सीमांत जनजातियों द्वारा तिब्बत से किया जा रहा व्यापार व चौथा मौसमी प्रवजन जिसमें व्यापारिक यात्रा,श्रम प्रवास व सैनिक व कुलियों की भर्ती शामिल रही. इस प्रकार बहु पेशेगत अर्थव्यवस्था का आकार विकसित हुआ .

पंत का मानना रहा कि हिमालय की आर्थिकी को मैदान के हिसाब से नहीं समझा जा सकता. पहाड़ में जंगल, पशुपालन व खेती है और यह तीनों एक दूसरे पर निर्भर हैं. जंगलों पर नियंत्रण होने से पूरी ग्रामीण व्यवस्था प्रभावित होती है. उन्होंने पलायन के सिलसिले को सिर्फ निर्धनता से जोड़ कर नहीं देखा बल्कि स्थानीय संसाधनों के प्रयोग पर सरकार के द्वारा की जा रही रोकटोक, गांव व आसपास मजदूरी पर काम न मिलना व नियंत्रण की अन्य नीतियाँ भी इसकी जिम्मेदार मानीं.

अर्थव्यवस्था व पर्यावरण के संबंध से उन्होंने बताया कि भूगोल से सामाजिक संरचना बनती है जिससे आर्थिक व्यवस्था चलती है. अर्थात पहाड़ की भौगोलिक कठिनाइयां ही आर्थिक संरचना बनाती है. जैसे उच्च पहाड़ों में विविध फसलें नहीं होती. दुर्गम, ढालू भूमि में छोटे खेत होते हैं. बाजार दूर होने से इलाके विशेष में आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था बनती है. कठोर जलवायु से मौसमी प्रव्रजन होता है. यह दृष्टिकोण ही पर्वतीय आर्थिकी की नींव बना.

पंत ने सामुदायिक संस्थाओं का महत्त्व बताया. उन्होंने स्पष्ट किया कि पहाड़ की क्रियाऐं केवल बाजार पर नहीं चलती. वह सामूहिक श्रम, वन साधनों के सामूहिक उपयोग व परंपरागत विनिमय प्रणाली पर टिकी है अर्थात बाजार के साथ सामाजिक पूंजी भी महत्वपूर्ण है. पंत ने हिमालय को सीमांत अर्थव्यवस्था कहा क्योंकि यह भारत, तिब्बत और मध्य एशिया को जोड़ता है. इसलिए इसमें व्यापार, संस्कृति व प्रव्रजन का मिश्रण है.

पंत ने “संतुलित जीवन रणनीति” का सिद्धांत दिया. उनका अवलोकन था कि पहाड़ का समाज जोखिमों को बाँट कर जीता है इसीलिए एक ही परिवार में कई गतिविधियां होती हैं जैसे खेती, पशुपालन, व्यापार व सैनिक सेवा जिसे आज “जोखिम विविधकरण रणनीति” कहा जाता है

पहाड़ की वास्तविक दशा को समझाने के लिए उन्होंने समूचे इलाके की गतिविधियों को ध्यान में रखा. अपनी स्पष्ट सोच को “सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय” में रचने के साथ ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामुदायिक संसाधन, लागू विकास की नीतियों व लोगों के गांव-परिवार छोड़ कर जाने की मजबूरी पर उनके सार गर्भित लेख व निबंध देश विदेश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए जिनका भावार्थ पहाड़ के लिए प्रथक नीति की प्रस्तावना रचता था.

पंत ने जंगल व ग्रामीण दिनचर्या, धीरे-धीरे गाँवों की उत्पादन से जुड़ी गतिविधियों के कमजोर होने की दशा और फिर काम में समर्थ जनसंख्या के पुरुष वर्ग का बाहर चले जाना जैसी समस्याओं को 1930 के दशक से ही अपने लेखन का आधार बनाया. उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र विभाग में विभागाध्यक्ष व प्रोफेसर डॉ राधा कमल मुख़र्जी एवम अपने गुरू डॉ एच एल डे के निरंतर मार्गदर्शन के साथ अल्मोड़ा के रायबहादुर पंडित लक्ष्मी दत्त पांडे वकील,पंडित कृष्णानंद शास्त्री माफीदार अल्मोड़ा व राजकीय उद्यान चौबटिया के श्री रामलाल साह द्वारा पहाड़ की लोकथात को समझाने का आभार व्यक्त किया. उनकी रचनाएं हिमालय के विकास को स्पष्ट दृष्टिकोण से समझने की आरंभिक सन्दर्भ रहीं. उन्होंने यह तर्क स्थापित किया कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था पारिस्थितिकी और सामुदायिक संसाधनों पर आधारित थी जिसे औपनिवेशिक नीतियों ने खोखला कर दिया.

एस डी पंत ने हिमालयी विकास का जो प्रारूप प्रस्तुत किया उसकी अनुकृति आज के “सतत विकास मॉडल” में दिखाई देती है. पंत ने यह स्थापित किया कि आर्थिक गतिविधि, सामाजिक माहौल और प्रकृति के दिए संसाधन ऐसे मूल तत्व हैं जिनसे निरंतर रूप से आजीविका की प्राप्ति होनी सम्भव है जबकि प्रकृति के साथ तालमेल बनाया रखा जाए व स्थान विशेष की प्रोद्योगिकी का बेहतर व कारगर उपयोग किया जाए.सतत विकास आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों को इस तरह पूरा करता है कि भविष्य में उन संसाधनों की कमी का अनुभव न हो. इस प्रकार यह प्रकृति दत्त संसाधनों की सुरक्षा, आर्थिक गतिविधियों व सामाजिक समरसता के बीच संतुलन बनाता है.

1972 में जॉर्ज पी मिशेल ने “सस्टेण्ड डेवलपमेंट” की जो अवधारणा प्रस्तुत की उसमें प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण व वनीकरण के साथ समावेशी विकास निहित है जो निर्धनता दूर करे व असमानता न बढ़ाए. मिशेल के इस विवेचन को स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानव सम्मेलन में मान्यता मिली . अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाऐं जैसे “फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाइजेशन” व “इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट” भी इस विचार पर आश्रित रही.

पंत ने पारिस्थितिकी आधारित अर्थव्यवस्था को अपने अध्ययन का आधार बनाया. पहाड़ की आर्थिक गतिविधियों का आधार खेती, जंगल और पशुपालन का संतुलन है जिनसे भोजन व जीवन, खेतोँ की खाद और पशुओं के लिए चारा-पत्ती मिलता है. जंगल पर प्रतिबन्ध लगने व उनके विनाश से पूरी ग्रामीण जीवन पद्धति कमजोर पड़ने लग जाती है सतत पर्वतीय विकास का सार भी यही है कि पर्वतीय विकास पर्यावरण के संतुलन के साथ होना चाहिये. यह केवल उस दशा में सम्भव है कि पहाड़ के संसाधनों का नियंत्रण स्थानीय समुदाय के पास सुरक्षित हो. वन, जलस्त्रोत व चारागाह जैसे संसाधन जब राज्य या बाहरी कंपनियों के स्वामित्व व नियंत्रण में आ जाते हैं तो स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ जाती है. यह विचार बाद में “समुदाय आधारित संसाधन प्रबंध” के रूप में वैश्विक रूप से उभरा.

पंत ने स्थानीय खाद्य प्रणाली में पहाड़ी खेती की विशेषता बताई कि मडुवा, झिगोरा, गहत, भट्ट, रेंस आदि जैसी फसलें कम पानी यानी उपरांऊ में उगती हैं, पोषक होती हैं और पहाड़ी पर्यावरण के अनुकूल होतीं हैं. यह जलवायु अनुकूल खेती है जो किसान के आय स्तर को स्थिर रखती है, इनमें जोखिम कम होता है, मौसम के उतार-चढ़ाव को सहन करने की शक्ति होती है तो मिट्टी को बांधे रखने की क्षमता व उसके पोषक तत्वों का समावेश संतुलित रूप में बना रहता है. यह खेती के विविधीकरण हेतु भी जरुरी है जहाँ किसान स्थानीय रूप से प्राप्त कई झाड़ियों व रामबाँस जैसी प्रजातियों से इन खेतोँ की मेड़ सुरक्षित रखते हैं.

सीमांत के साथ उप हिमालय के गाँवों का अध्ययन कर प्रोफेसर पंत ने स्पष्ट किया कि पहाड़ में परंपरागत व कुटीर उद्योगों या छोटे व विकेंद्रित उद्योग की परंपरा विकसित हुई है जिनमें ऊन, जड़ी बूटी, हस्तशिल्प इत्यादि मुख्य हैं. आज “समेकित विकास” की नीति भी यही प्रस्तावित करती है कि पहाड़ में इन कला कौशल व विशिष्ट ज्ञान पर आधारित धंधों का संवर्धन व विकास होना जरुरी है.

पलायन रोकने के प्रयास में पंत ने खेती के सुधार, परंपरागत कारीगरी को बढ़ावा, स्थानीय संसाधनों के मूल्य संवर्धन की गतिविधियों को बढ़ाते हुए ग्राम स्तर पर काम धंधे बढ़ाने को जरुरी बताया. आज स्थानीय आजीविका को सबल करने वाले सतत पर्वतीय विकास का भी यही विचार है जो पर्वत जनों के निवासियों के बेहतर जीवन स्तर और इलाके के प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख व सुरक्षा के समायोजन को प्राथमिकता देती है. इस दिशा में हिमालयी राज्यों की चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने वाली संस्था “इंटिग्रेटेड माउंटेन इनीशिएटिव”, “गोविन्द बल्लभ पंत राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान” व “नीति आयोग” मुख्य हैं जो सतत पर्वतीय विकास के लिए कार्य समूह बना नीतियों को निर्दिष्ट करतीं हैं.

पंत ने चेतावनी दी थी कि पहाड़ में बिना सोचे समझे विकास योजनाएँ लागू की गईं तो पर्यावरण पर इसके घातक प्रभाव पड़ेंगे. भूमि की परतें कमजोर होंगीं, स्थानीय प्रजातियों की बढ़वार थम जाएगी. इन सबके साथ आर्थिक असमायोजन होगा व सामाजिक क्रिया कलापों पर इसका विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा. आज हिमालयी इलाके भूस्खलन, बादल फटने, बाढ़ व मौसम के आकस्मिक बदलाव को झेल रहे हैं. विकास परियोजनाओं के सापेक्ष राज्यों को आपदा से बचाव व पुर्नवास पर व्यय करना पड़ता है.

एस डी पंत की विकास दृष्टि अपने समय से आगे थी. वह ऐसे आर्थिक भविष्यदृष्टा थे जिन्होंने पारिस्थितिकी आधारित अर्थव्यवस्था, स्थानीय संसाधनों पर समुदाय के अधिकार, छोटे व विकेंद्रित उद्योग, स्थानीय खेती व भोजन पद्धति के साथ प्रकृति के साथ समायोजन बनाये रखने वाली स्पष्ट विचारधारा दी. पर्यावरण व विकास के ऐसे संतुलनकारी सिद्धांत आज दुनिया भर में सतत पर्वतीय विकास की नीति में दिखाई देते हैं.

उत्तराखंड की वर्तमान दशा को समझने में पंत का दृष्टिकोण कई समस्याओं के उभरने के कारण बताता है जैसे पारम्परिक बहुल काम धंधे आधारित प्रणाली खंडित हुई तो पलायन हुआ. उपज कम होने लगी क्योंकि खेती अकेली जीविका नहीं थी. ब्रिटिश वन नीति से पारस्परिक संसाधन प्रणाली टूट गई. 1962 के बाद सीमा व्यापार समाप्त हो गया. उन्होंने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि केवल सड़क,बांध व पर्यटन से हिमालय का विकास नहीं होगा इसके लिए तो स्थानीय कृषि सुधार, पशु पालन, स्थानीय उद्योग, पर्वतीय व्यापार व सामुदायिक संस्थाओं की पुर्नस्थापना करनी होगी.

1950 के बाद विकास एजेंसियों ने पहाड़ को जल विद्युत संसाधन, वन संसाधन व पर्यटन संभावना के रूप में देखा. इस सोच से स्थानीय समाज की आर्थिक संरचना खंडित हो गई. 1960व 1970 के दशक में अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्टों में जोर दिया गया कि हिमालय में पर्यावरण संकट का कारण स्थानीय जनसंख्या व उसकी परंपरागत खेती है. इसकी आलोचना जैक डी इविस ने अपनी पुस्तक “द हिमालयन डिलेमा” में की. साफ कहा कि हिमालय का संकट स्थानीय किसानों के कारण नहीं बल्कि अप्रासंगिक विकास नीतियों के कारण हुआ. यह दृष्टि पंत की मूल समझ से मेल रखती थी.

पंत सामाजिक-पर्यावरणीय मेल, स्थानीय संसाधनों के योग, बहुल क्रिया आधारित जीविका व पारम्परिक साधन प्रबंध पर आधारित रहे जबकि मुद्रा कोष व विश्व बैंक बाजार पर अधिकार, बाहरी पूंजी व तकनीक व परियोजना आधारित वृद्धि के मानकों पर आधारित हुई. पंत हिमालय को सामाजिक-पारिस्थितिक प्रणाली मानते थे जबकि विकास एजेंसियां उसे आर्थिक संसाधन दोहन से जोड़ गईं. पंत ने यह मूल विचार दिया था कि हिमालय को मात्र विकास परियोजनाओं से नहीं बल्कि उसकी सामाजिक संरचना, परंपरा, परिवेश व पारिवारिक पारम्परिक संस्थाओं को समझ कर ही उन्नत अवस्था में पहुँचाया जा सकता है. आज की कई समस्याएं इसलिए उत्पन्न हुईं क्योंकि नीति निर्माताओं ने इसकी उपेक्षा की.

1935 में ब्रिटेन से प्रकाशित पंत के इस क्षेत्रीय अध्ययन को ब्रिटिश सरकार ने गंभीरता से लिया. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक ब्रिटिश शासन को हिमालय में तीन बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था. उत्तराखंड तिब्बत व मध्य एशिया की सीमा पर था जिसे ब्रिटिश साम्राज्य अपनी रणनीतिक सीमा मानता था इसलिए सीमांत की सुरक्षा जरूरी थी. यहाँ सीमित खेती, गरीबी व पलायन दिख रहा था. ब्रिटिश सरकार के पास पहाड़ की अर्थ व्यवस्था को समझने का वैज्ञानिक अध्ययन अपर्याप्त था.

ऐटकिंसन का गजेटियर इतिहास-भूगोल-संस्कृति का पर्याप्त आधार देता था पर अर्थशास्त्र का नहीं. इस रिक्तता को पंत की पुस्तक ने भरा. 1935 में जॉर्ज एलन एंड अनविन से यह प्रकाशित हुई जिसने बाद में जे आर आर टोलकियन की बहुचर्चित पुस्तक “द हैबिट” भी प्रकाशित की. पंत के अध्ययन की कई प्रतिष्ठित शोध पत्रिकाओं व अखबारों में समीक्षा हुई जिसने यह सिद्ध किया कि यह कोई साधारण प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं बल्कि हिमालयी समाज का पहला व्यवस्थित आर्थिक अध्ययन है.

पंत ने प्रमाणित किया कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था केवल खेती नहीं, पशुपालन, व्यापार व प्रव्रजन भी महत्वपूर्ण है. ब्रिटिश शासन भाँप गया कि तिब्बत व्यापार सीमांत स्थिरता के लिए जरूरी है. पंत ने सैनिक भर्ती व श्रमिक प्रव्रजन को स्थानीय आर्थिकी का हिस्सा बताया जिससे ब्रिटिश शासन ने इसे “रिक्रूटिंग ग्राउंड” के रूप में बदल डाला.

ऐतिहासिक विडंबना यह रही कि पंत ने जिस संतुलित परिदृश्य को रचा वह तीन कारणों से टूट गया. पहला तो भारत-तिब्बत व्यापार का समाप्त होना. दूसरा वन नीति जिसने सामुदायिक संसाधनों को सीमित कर दिया व विकास परियोजनाएँ जिनसे स्थानीय आर्थिकी की उपेक्षा हुई.

हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय विकास प्रारूप में प्रोफेसर एस डी पंत के विश्लेषण के बहुल पक्ष दिखाई देते हैं. यह सोच ब्रिटिश भारत के पर्वतीय प्रदेश में सिर्फ प्रथक प्रशासन की अवधारणा के रूप में उभरी . उत्तर प्रदेश के पहाड़ी राज्य के रूप में भी उनका यह तर्क भुला दिया गया कि पहाड़ी राज्य की अर्थ व्यवस्था पारिस्थितिकी आधारित है. जंगल, पशु और खेती एक दूसरे से सम्बद्ध हैं. राज्य की मैदान आधारित नीति ने इस संतुलन को तोड़ दिया. यह सीख भुला दी गई कि पहाड़ का विकास मैदान के प्रारूप से नहीं हो सकता.

स्थानीय संसाधनों पर आधारित विकास को प्रोफेसर पंत टिकाऊ मानते थे और पहाड़ की आर्थिकी को सामुदायिक अर्थव्यवस्था. समुदाय के बिना विकास विनाश कारी होता है. ऐसा विकास जो लोगों को उनकी भूमि, आवाज और सहमति से वंचित रखता है राज्य का विकास नहीं करता बल्कि उसे खोखला कर देता है.

प्रकृति के नयनाभिराम सौंदर्य से भरे नाजुक व भंगुर के साथ आग्नेय चट्टानों पर बसे पहाड़ के खेतोँ पर बन गईं भव्य अट्टालिकाऐं, इनके गर्भ को चीर कर किया जा रहा खनन और आपा-धापी, देखा-देखी में तेजी से फैलता सीमेंट सरिया के जाल से बुना शहरीकरण अब गांव की पहचान भुला ऐसा दोगला ढांचा निर्मित कर गया जहाँ बुनियादी ढांचे की स्थापना ही आर्थिक लक्ष्य बन गया. दूरस्थ समुदायों में गरिमा और स्वायत्तता की दशाऐं विलुप्त हो कर रह गईं.

पंत जिस पहाड़ की भूमि की अस्मिता की सोच दे गये उसे हिमाचल में परमार ने एकनिष्ठ भावना से समझा. उनका हिमाचल स्पष्ट रूप से भूमि की गरिमा और वहां के लोगों की आवाज पर आधारित व्यवस्था बनी न कि दिखावे और दोहन पर. उन्होंने पहाड़ की भूमि को ऐसी व्यापारिक संपत्ति नहीं बनने दिया जो किसानों को बेदखल करे व सामुदायिक संबंधों को तोड़ दे. उन्होंने भूमि सुरक्षा, सहकारी समितियों व छोटे किसानों के कल्याण पर जोर दिया जिससे स्थानीय लोग अपने परिवेश व आजीविका के संरक्षक बने रह सकें.डॉ यशवंत सिंह परमार ने पहाड़ी रियासतों को एकजुट कर 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल की एक अलग प्रशासनिक इकाई का गठन किया. 1971 में हिमाचल एक पूर्ण राज्य के अस्तित्व में आया.उन्होंने हिमाचल के पंजाब में विलय के प्रयास का कड़ा विरोध किया और इसके पहाड़ीपन के अस्तित्व को बनाए-बचाए रखा. हिमाचल की भौगीलिक परिस्थितियों के अनुकूल पारम्परिक खेती के बेहतर व कारगर विकल्प के रूप में बागवानी को प्रोत्साहन दिया जिसके लिए वैज्ञानिक आधार पर पहले से गंभीर तैयारी की और किसानों को सेव व अन्य फलों की खेती के हर पक्ष से अवगत कराया. आज भी हिमाचल का आधे से अधिक कार्यबल बागवानी और सुधरी खेती से संबंधित गतिविधियों में लगा है, वह सारे लोग जिनकी पहचान, भोजन, रीति परम्परा, मौसम पहाड़ और नदियों से जुड़ा है. प्रकृति की आराध्य देवियों से आसन्न है हिमाचल. परमार ने सड़क ही “विकास की भाग्य रेखा” का मंत्र दिया और सड़कों का ऐसा जाल बिछाया जिससे दुर्गम क्षेत्र भी मुख्य धारा से जुड़ गये. ग्रामीण विकास के साथ स्वास्थ्य व शिक्षा उनकी प्राथमिकता रहीं जिससे सामाजिक व प्रशासन के ढांचे को सबल आधार मिला. उन्होंने पहाड़ी भाषा, संस्कृति व लोक परंपराओं के संरक्षण के लिए समर्थ प्रयास किए जिससे हिमाचली शैली की अनूठी पहचान बनी.

हिमाचल प्रदेश के विकास क्रियान्वयन में एस डी पंत के हिमालयी विकास के बहुल पक्ष दिखाई देते हैं. यह दृष्टि उत्तराखंड राज्य बनने की राजनीतिक आपा धापी में उभरी ही नहीं. हिमाचल ने पहाड़ी समाज की जमीन को बाहरी खरीद से बचाये रखने को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जिसके लिए “हिमाचल प्रदेश टेनेंसी एंड लैंड रिफार्म एक्ट 1972” बना. इससे ग्रामीण आबादी गाँव से जुड़ी रही. बागवानी व अन्य खेती सब्जी मसाले के कारबार जारी रहे. उत्तराखंड में भूमि संरक्षण नीति इसके उलट बहुत ढुलमुल व लगातार विवादों से घिरी रही. ग्रामीणों में भी पुश्तैनी जमीन बेच तत्काल आय कमाने की लालसा बढ़ी.हिमाचल में विकास का केंद्र ग्रामीण स्तर पर रहा. विकेंद्रित ग्रामीण विकास की नीतिगत प्राथमिकताओं में हर गांव तक सड़क, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र व स्कूलों का विस्तार हुआ जिससे ग्रामीण जीवन अपेक्षाकृत स्थिर रहा.

हिमाचल में पर्यटन विकसित हुआ जो मुख्यतः स्थानीय अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहा. छोटे होटल व होमस्टे के मॉडल को बढ़ावा मिला जिससे स्थानीय समुदाय को आर्थिक लाभ मिला इससे सेवा क्षेत्र व पर्यटन का संतुलित विकास हुआ. हिमाचल ने जल विद्युत योजनाओं से राजस्व प्राप्त किया. राज्य की नीति के अनुसार परियोजनाओं से बिजली का हिस्सा राज्य को प्राप्त होता है जो आगम का बेहतर स्त्रोत बना.

हिमाचल ने उन वैधानिक उपायों को स्थापित किया जो खेती की जमीन को उस पर काम करने वाले खेतिहर से जोड़े रखती है साथ ही परियोजनाओं को क्रियान्वित करने की दशा में क्षति पूर्ति और सहभागी परिवर्तन के तंत्र में सुधार करती है. एस डी पंत का विचार था कि सड़कें और संचार तंत्र स्थानीय अर्थ व्यवस्था और सेवाओं को बढ़ावा दें न कि केवल अचल संपत्ति की अटकलों को जन्म दें. इसी तरह पारिस्थितिकी सीमाओं को आयोजना के केंद्र में रखना मुख्य है न कि बाद में सोचे गये विचार के रूप में उनको आरोपित करना. पर्वतीय पर्यावरण को प्रभावित करने वाली किसी भी परियोजना के लिए विकास की पूर्व शर्त पर्यावरण संवेदना के स्तरों की जाँच होनी ही चाहिये.

एस डी पंत के हिमालयी विकास के सिद्धांत स्थानीय संसाधनों पर आधारित अर्थव्यवस्था, छोटे पैमाने की कृषि उद्योग व्यवस्था व ग्रामीण समाज की भूमि सुरक्षा के साथ सामाजिक लोकाचार व सांस्कृतिक मूल्यों को उच्च अधिमान देते रहे. इसी प्रतिमान को हिमाचल की अर्थव्यवस्था के आरंभिक दौर में परमार ने बनाये रखा इसलिए गांव आत्मनिर्भर इकाई के रूप में विकसित हुए. पर उत्तराखंड के राज्य बनने की अंर्तकथा बिल्कुल भिन्न रही.

जब जमीन एक वस्तु बन जाती है तब निर्णय लेने की शक्ति गाँवों से दूर चली जाती है. इसके नैतिक व लोग बागों की सोच पर पड़े परिणाम बहुत गंभीर होते हैं. नकद धन के मोह में देखा देखी गांव वाले अपनी खेती की जमीन बेच तुरंत हो रहे फायदों के कुचक्र में घिर जाते हैं. स्थानीय मुखिया,प्रधान, पटवारी इस प्रवृति का लाभ उठाते हैं. ठेकेदार और भू माफिया का गठजोड़ पनपता है. जमीन से मोह रखने वाले किसान इस माहौल में अपने को गांव से कटा व बेबस समझते हैं क्योंकि पहाड़ में जमीन परिवार में साझी भी होती है व गोल भी जिसकी स्पष्ट पैमाइश नहीं होती. ऐसे राज्य में हर सुरम्य स्थल को सैरगाह और विलास स्थल के रूप में बदलने की भेड़चाल जारी रहती है. सामुदायिक आवाज का कोई मूल्य नहीं रह जाता.सवाल बना रहता है कि जब पहाड़ की जमीन का स्वामित्व किसान से छिन जाता है तो इसका लाभ किसे होता है. यदि इसका उत्तर बाहरी लोग व विकास कर्ता हैं तो इसकी कीमत अंततः पहाड़ को ही चुकानी पड़ती है. यह कैसा विकास है जो पहाड़ के लोगों, जानवरों और मिट्टी के जीवंत सम्बन्ध के ताने बाने को नष्ट कर देता है. भूमि गई, प्रकृति का कोप बरसा, आजीविका का बदलाव हुआ. पहाड़ी जमीन ऐसी व्यावसायिक संपत्ति बन गई जो खेतिहरों को बेदखल कर दे व सामुदायिक संबंधों को खंडित कर दे.

ब्रिटिश शासन ने पहाड़ की अर्थ व्यवस्था को जानबूझ कर आत्मनिर्भर नहीं बनने दिया बल्कि इस क्षेत्र को संसाधन आपूर्ति व भर्ती क्षेत्र के रूप में ढाल दिया. प्रशासन की प्राथमिकता साम्राज्य हित की थी इसलिए साधनों पर नियंत्रण, वन रिज़र्व फारेस्ट व ग्रामीणों के पारम्परिक अधिकार सीमित कर दिए गये. इससे कृषि -पशुपालन अर्थव्यवस्था दुर्बल पड़ गई. यह ऐतिहासिक रचना आज भी उत्तराखंड से हो रहे पलायन व आर्थिक चुनौतियों की जड़ मानी जाती है.

उत्तराखंड में राज्य गठन होने के बाद आर्थिक नीति का केंद्र मैदानी क्षेत्र के उद्योग का विकास रहा. स्थानीय कृषि, परंपरागत व लघु -कुटीर उद्योग के साथ बागवानी को प्राथमिकता न मिली. पलायन की समस्या पहले ही गहरा चुकी थी.एस डी पंत ने स्पष्ट कहा था कि औपनिवेशिक आर्थिक नीतियों ने पहाड़ के पारम्परिक संतुलन को तोड़ कर रख दिया. उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि पर्वतीय अर्थ व्यवस्था को स्थानीय संसाधनों से जोड़ा नहीं गया तो ग्रामीण समाज कमजोर होता जाएगा व लोग गांव छोड़ने पर बाध्य होंगे.

एस डी पंत की पुस्तक “सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय “से ऐसी बौद्धिक प्रेरणा मिलती है जो उत्तराखंड के पर्वतीय विकास के प्रारूप को स्पष्ट दिशा दे सकने में समर्थ है जिसमें उनके द्वारा वर्णित स्थानीय संसाधनों के उपयोग,पारिस्थितिकी संतुलन की पूर्व शर्त व सामुदायिक चेतना का आधार स्थापित किया जाना आवश्यक होगा.

पर्वतीय अर्थव्यवस्था के प्रारूप में उनकी विकास नीति का मुख्य दर्शन स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग, विकेंद्रित ग्रामीण उद्योग व पारिस्थितिकी संतुलन में निहित है जिससे गाँव के लोगों को आर्थिक आधार मिलेगा, इससे पहाड़ी जिलों में आय व क्रय शक्ति बढ़ेगी.

किसानों की जमीन सुरक्षित रखने और भूमि की सट्टेबाजी पर रोक के लिए प्राकृतिक संसाधनों को बनाये बचाए रखने की नीति को पंत ने जरुरी माना था. इसका विस्तार कृषि भूमि की अंधाधुंध खरीद पर नियंत्रण, कृषि भूमि को गैर कृषि भूमि में बदलने की सख्त शर्त व गाँवों में सामुदायिक भूमि बैंक बनाने से किया जाना संभव है. कृषि परिवर्तन कार्यक्रमों में पारम्परिक फसलों के उत्पादन को बढ़ाया जाना इन्हें हिमालय का जैविक श्रेष्ठ उत्पाद बनाता है. इस दिशा में “श्री अन्न योजना” भी लागू की गई है.तब फल आधारित सघन बागवानी को विकास की प्राथमिकताओं में रखते हुए पंत ने इनकी स्थानीय व हिमालय की अन्य प्रजातियों के रोपण को बेहतर प्रतिफल व पहाड़ के खास उत्पादन के रूप में देखा था. चौबटिया गार्डन रानीखेत के श्री राम लाल साह जी से उनके घनिष्ट संपर्क रहे.जिनसे पहाड़ के विविध फलों की उपज की लागत- लाभ संरचना पर उन्होंने ध्यान दिया. चौबटिया उद्यान अंग्रेजों के समय से ही अपने खास उत्पादन के लिए देश भर में विख्यात था पर उत्तराखंड बनने के बाद इसके भी दुर्दिन शुरू हुए.

पहाड़ के हर जिले में पर्वतीय उद्योग क्लस्टर के अधीन जड़ी बूटी, स्थानीय फल व इनके प्रसंस्करण की इकाईयां, ऊन उद्योग, हस्तशिल्प, मौनपालन, पहाड़ के पारम्परिक परिधान, आलेख, अल्पना, ऐपण, काष्ट शिल्प के पारिवारिक उद्योग लगें व स्थानीय उद्यमियों को पूंजी सहायता मिले का विचार जो उत्तराखंड में लागू किया गया वह स्वावलम्बी गांव वाली पंत की संकल्पना में निहित रहा. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जंगल को केवल संरक्षण नहीं बल्कि ग्रामवासियों के लिए आर्थिक संसाधन का जरिया भी बनाना होगा. वन आधारित लघु उद्योग, जंगलों व बुज्ञालों में जड़ी बूटी दोहन व इनका नर्सरियों में उत्पादन, चीड़ के पिरुल का ऊर्जा आवश्यकताओं में प्रयोग, रामबाँस व भाँग जैसी प्रजातियों के रेशे से बने वस्त्र व अन्य सामान स्थानीय समुदाय के सहयोग के बिना संचालित नहीं हो सकते. पंत लिखते हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों के लिए अलग कौशल व शिक्षा हो जिसमें परंपरागत ज्ञान का समावेश होना जरुरी हो. उन्होने स्पष्ट किया था कि पर्वतीय क्षेत्रों में विकास का स्वरूप स्थानिक विशेषताओं के आधार पर निर्मित किया जाना चाहिये जिसके आधार पर अवसरचना बने.

आज संकट यह है कि परंपरागत शिल्प व पुरातन विधियां अपनी प्रसंगिकता खो चुके हैं. लोक गीत संगीत व परंपरागत वाद्य बस धरोहर के रूप में सिमट गये हैं. मुख्य पेशों के कारीगर व शिल्पी मैदान जा कर मजदूरी कर रहे हैं.पंत ने पहाड़ी समाज में बढ़ रही पलायन प्रवृति को पहाड़ की निम्न उत्पादकता व सीमित रोजगार की बढ़ती दशा से जोड़ा.

स्थानीय संसाधनों पर आधारित उनकी नीति जिसमें ग्राम स्तर पर किए जा रहे समस्त वस्तुओं का उत्पादन व सेवाऐं सम्मिलित हैं का संवर्धन व विस्तार जरुरी है. उनकी नीति को विकास खंड स्तर पर लागू किया जा सकता है जो काम धंधे के विशेष छोटे उपक्रम स्थानीय औद्योगिक आधार हेतु बनाएँ. इसमें स्थान विशेष की उपज के प्रसंस्करण व पैकिंग की भी व्यवस्था बने. नीतियों के समन्वय, खोजबीन व अनुसन्धान व निगरानी को विशेषज्ञ जनों के साथ हर क्षेत्र में कार्यरत कुशल स्थानीय जनों की भागीदारी से संचालित किया जाए जिनके व्यावहारिक ज्ञान का उपयोग संभव बने व लुप्त होती विधाओं के संरक्षण पर केंद्रित रहा जा सके. एस डी पंत की हिमालय नीति व उत्तराखंड सरकार द्वारा अब तक अपनायी गई नीति के बीच कई मौलिक अंर्तद्वन्द दिखाई देते हैं:

पंत का दृष्टिकोण यह था कि पर्वतीय अर्थ व्यवस्था का केंद्र गांव और स्थानीय संसाधन होने चाहिये पर आज भी उत्तराखंड में विकास मुख्यतः मैदानी क्षेत्रों में ही केंद्रित रहा जिससे पहाड़ में रोजगार न मिला. लोगों के लिए गाँव से निकल आजीवका कमाने के अलावा कोई विकल्प न रहा.

पंत स्थानीय समुदाय आधारित पर्यटन को महत्त्व देते थे पर उत्तराखंड की पर्यटन नीति पहले तो अंग्रेजी राज में बसे पर्यटन स्थलों की अवसंरचना पर केंद्रित रही व उसके बाद तीर्थ, बड़े होटल व बड़े पैमाने पर किए अनियंत्रित बसाव पर. अब होम स्टे व इको पर्यटन को वरीयता दी जा रही जिसमें भी पर्यटन की आय स्थानीय समाज तक जा नहीं पा रही. गाँव से हट कुछ ही स्थानों में केंद्रित पर्यटन ने उन क्षेत्रों की धारक क्षमता पर भारी बोझ डाल दिया है. दैनिक प्रयोग की वस्तुओं के दाम बढ़ने से स्थानीय जनों की क्रय शक्ति सीमित रह गई है वहीँ जमीन की कीमतें आसमान छू गईं हैं.

पंत की औद्योगिक नीति छोटे विकेंद्रित काम धंधों व स्थानीय संसाधन आधारित उद्योग पर अवलंबित थी. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यहाँ की औद्योगिक नीति बड़े औद्योगिक आस्थानों-पार्क आदि पर टिकाई गई जिसमें सिडकुल व मैदानी जिले मुख्य थे. पर्वतीय क्षेत्रों में उद्योग लगने की प्राथमिकता बनी नहीं और उत्तरप्रदेश राज्य के अधीन रह जो प्रयास हुए भी तो वह टिक न पाए. बाजार संरचना की अपूर्णता से भीमताल का औद्योगिक शेड कुछ ही समय में ठप हो गया.

कृषि नीति में पंत का सुझाव था कि पारम्परिक फसलों, पहाड़ी खेती व स्थानीय खाद्य प्रणाली को प्राथमिकता दी जाए. प्रमुख खाद्यान्न जो उस समय बोये जाते थे अब हाल यह है कि उनके बीज तक सुरक्षित नहीं हैं. उनकी खासियत को ध्यान में ही न रखा गया और उत्तर प्रदेश के समय से ही उत्तराखंड की कृषि नीति मैदानी ढांचे के अनुरूप रही. ऐसा नहीं कि स्थानीय प्रजातियों के आधार को मजबूत करने वाले लोग और संस्थाऐं न थीं. अल्मोड़ा में बोसी सेन प्रयोगशाला बाद में विवेकानंद कृषि अनुसन्धान शाला बनी. स्वामी माधवाशीष ने ग्राम स्तर पर खेती के बदलाव के प्रयोग कर दिखाए. वीरसिंह जैसे वैज्ञानिक व रानीचौरी जैसा केंद्र लगातार सार्थक प्रयास करता रहा पर हरित क्रांति के लाभ पहाड़ की खेती और पशुपालन को स्वयं स्फूर्ति दशा न दे पाया. पहाड़ की पारम्परिक फसलों के उत्पादन पर जोर देने का प्रचार हाल के वर्षों में जोरों पर है पर खाद्य आपूर्ति के लिए अभी भी मैदान की निर्भरता बनी हुई है.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जंगल के एक दूसरे से निर्भर संयोजन को पंत ने पहाड़ के विकास का मुख्य आधार माना था. आज वन प्रबंधन मुख्यतः संरक्षण आधारित व नौकरशाही के नियंत्रण में है जिससे ग्रामीण समुदाय का वन संसाधनों से भावनात्मक संपर्क विखंडित होता दिख रहा है. यही कारण है कि जंगल धधकने में भी ग्रामवासी यह सोच कर उपेक्षा का भाव जताते हैं कि यह वन विभाग का काम है. ग्रामीण समुदाय का वन संसाधनों पर नियंत्रण सीमित होने से इनके अवैध कटान, लकड़ी व लीसे की चोरी की प्रवृतियाँ बढ़ती जा रही हैं.

पंत का मानना था कि पहाड़ी समाज की भूमि संरचना सुरक्षित रहनी चाहिये. कठोर भूमि नीति के अनुपालन का दावा करने के बाद भी आज के उत्तराखंड में यह विवाद का विषय बनी रही है. संस्थागत कमियां इतनी गहरी हैं कि तमाम संस्थाऐं, एन जी ओ व सरकार के समर्थन से चलने वाले अध्ययन केंद्र पर्वतीय विकास की रणनीतियों में गुणात्मक सुधार लाने में असफल हुए हैं. पीस मील एप्रोच व अपना एजेंडा ले कर चलने वाली इन तथाकथित संस्थाओं ने पहाड़ की रही बची अस्मिता को भी दांव में लगा दिया है.

पंत ने पहाड़ी समाज में बढ़ रही पलायन की प्रवृति को यहाँ की निम्न उत्पादकता व जीवन यापन के अवसरों की कमी से जोड़ा था. पलायन स्थायी सामाजिक संकट बनता है जिसे आर्थिक रूप से “संचयी प्रवास प्रक्रिया” के रूप में देखा जा सकता है. 1960 के दशक से ही आर्थिक चिंतकों ने यही चेतावनी दी थी कि यदि हिमालय की अर्थव्यवस्था को देश की मैक्रो नीति व ऊपर से किए जा रहे आयोजनागत ढांचे में शामिल किया गया तो पलायन की प्रवृति अस्थायी नहीं रहेगी बल्कि स्थाई सामाजिक संकट के रूप में दिखाई देगी. पंत ने इसका कारण पहाड़ की आत्मनिर्भर व्यवस्था से छेड़छाड़ बताया था. तदन्तर यह इतनी गंभीर हो गई कि गांव खाली होते गये, आबादी कम होती गई .गैर आबाद गाँवों व जनसंख्या के इस असंतुलन के प्रसंग में पंत की भविष्यवाणी सच साबित हुई.

पलायन जब स्थायी सामाजिक संकट का रूप ले लेता है तो आर्थिक रूप से इसे “संचयी प्रवास प्रक्रिया” कहा जाता है. पंत लिखते हैं कि कामधंधे की कमी और पढ़ने लिखने की चाह के साथ रोजी रोटी व परिवार के लालन पालन के लिए जवान होते किशोर गांव से बाहर जाने को मजबूर होते हैं. युवा श्रम के योगदान के अभाव में खेत बंजर होते दिखते हैं. घर के काम काज के साथ जानवर और उनका चारा, चूल्हे के लिए ईंधन सहित सभी काम परिवार की औरतों बच्चियों को संभालना पड़ता है. इसका असर कम होती उपज व दूध दन्याली पर पड़ता है. धीरे-धीरे कुनबे का जीवन निर्वाह बाहर काम पर गये पुरुषों के भेजे धन पर टिक जाता है और मनीआर्डर आर्थिकी पनपती है. पलायन बढ़ते जाने से सामाजिक व सांस्कृतिक संरचना में दरार पड़ती है. गांव में बुजुर्ग, बच्चे व महिलाऐं रह जाती हैं. अब गाँव उपभोग आधारित होने लगता है. स्थानीय उत्पादन के कमजोर पड़ने से बाजार की अपूर्णता पैदा हो जातीं हैं. पहाड़ श्रम आपूर्ति का क्षेत्र बन कर रह जाते हैं. पलायन सामाजिक रूप से स्वीकार्य हो जाता है. कुमाऊं-गढ़वाल इसी तरह श्रम निर्यातक प्रदेश बन गये.

उत्तराखंड में एस डी पंत की परम्परा की आगे बढ़ाने में धूम सिंह राणा मुख्य रहे उन्होंने 1960 के दशक से विकास एजेंसियों की शोषण नीति का विरोध किया और तर्क दिया कि अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाऐं हिमालय को संसाधन अवशोषण का केंद्र बना रहीं हैं जबकि यह सामाजिक पर्यावरण अर्थतंत्र है. निर्धनता के दुश्चक्र की मनमानी व्याख्या की गई. ये संस्थाऐं मानती हैं कि हिमालयी समाज गरीब है क्योंकि उसकी उत्पादन प्रणाली पिछड़ी है. राणा ने अनुभव सिद्ध अवलोकन से तर्क दिया कि गरीबी का कारण स्थानीय समाज नहीं बल्कि संरचनात्मक बाधाऐं हैं जैसे दूरस्थ बाजार, परिवहन की कठिनाई, सीमित भूमि और औपनिवेशिक वन नीति. इसी कारण यहाँ बाजार पिछड़े रह जाते हैं और संरचनात्मक अलगाव पनप जाता है.

1970 के दशक में कई अन्तर्राष्ट्रीय रपट यह भ्रम फैलाती रहीं कि हिमालय में पारिस्थितिकी असंतुलन का कारक स्थानीय किसान है जो जंगल काटता है, झूम खेती करता है. राणा ने इसका विरोध किया और वह असली कारक बताए जिनमें अधिक मुनाफे के लालच में वाणिज्यिक वानिकी की जाती है, स्थानीय प्रजातियों का अति विदोहन प्रोत्साहित होता है. बड़े ठेकेदार पनपते हैं जिनका नेताओं व अधिकारियों से गठजोड़ होता है. ग्रामवासी के हक-हकूक छीने जाते हैं. इसी तरह जल विद्युत योजनाओं को पर्यावरण संवेदना की लीपापोती से जबरन ऐसे स्थानों में बनाने का क्रम शुरू होता है जो भंगुर हैं. ऐसे ही सड़क निर्माण में विस्फोटक का प्रयोग आम बना दिया गया है. इन सबके साथ पहाड़ों में बाहरी बाजार का दबाव बना रहता है. अनियंत्रित अवसंरचना व कुछ ही स्थानों में पर्यटन के दबाव से धारक क्षमता पर बोझ बढ़ता जाता है.

राणा ने स्थानीय समाज की उपेक्षा से विकास नीतियों के अप्रभावी रहने के कारण स्पष्ट किये कि हिमालय के विकास की योजना मैदानों में बैठ कर बनाई जाती है वह भी शासन के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हो कर जिससे स्थानीय ज्ञान व धरोहर की उपेक्षा होती है. पारम्परिक संस्थाऐं कमजोर पड़ जाती हैं और पहाड़ के साधनों पर वाहय नियंत्रण मजबूत होता जाता है. जैक इविस ने इसी विचार को अपनी पुस्तक “हिमालयन डिलेमा” में विस्तार देते हुए निष्कर्ष दिया कि हिमालय की समस्याएं स्थानीय किसानों के कारण नहीं बल्कि अप्रासंगिक विकास नीतियों से उपजतीं हैं. धूम सिंह राणा ने कहा था कि हिमालय को समझने के लिए इसकी आर्थिकी के मूल को जानना पड़ता है.जहाँ वन और चारागाह सामूहिक जीवन का हिस्सा है. यहाँ बहुल गतिविधियों का ऐसा जीविका स्वरूप विद्यमान है.जिसमें परिवार -कुनबे के सदस्य खेती, पशुपालन, गाँव से बाहर मजदूरी, नौकरी, फौज की सेवा में संलग्न रहते हैं. यह एक जोखिम साझाकरण वाली व्यवस्था है.

एस डी पंत से प्रेरणा ले धूम सिंह राणा व जैक इविस की ऐसी बौद्धिक परम्परा बनती है जिसके तीन मुख्य विचार हैं. पहला यह कि हिमालय की अर्थव्यवस्था विशिष्ट है. स्थानीय समाज समस्या नहीं बल्कि समाधान है. बाहरी विकास मॉडल का थोपा जाना असमायोजन करता है, असंतुलन पैदा करता है. दूसरा हिमालय की समस्याओं को समझने के लिए स्थानीय सामाजिक-आर्थिक संरचना को केंद्र में रखना होगा. व तीसरा पक्ष यह कि हिमालय की विशिष्ट लोक थात को समझे बिना वृद्धि व विकास के साथ प्रशासन की संतुलित नीति नहीं बन सकती.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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