फोटो: आशुतोष उपाध्याय
‘‘…हिमालय के दूर-दराज गाँव के अत्यंत विपन्न परिवार में जन्मा एक छात्र नोबेल विजेता भौतिकशास्त्री सर सी. वी. रमन की प्रयोगशाला (रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट, बैंगलोर) में अपना शोधकार्य समेट रहा था. रमन साहब ने उसे भारतीय मौसम विभाग की शानदार नौकरी का प्रस्ताव दिया. गाँधी को अपना आदर्श मानने वाले इस छात्र को गुरु का यह प्रस्ताव जंचा नहीं, ‘‘मैं आपकी तरह शिक्षक बनना चाहता हूँ.’’ रमन साहब हँस पड़े, बोले, ‘‘तुम जीवन भर गरीब और उपेक्षित ही रहोगे.’’(पृष्ठ-60)
रमन साहब की बात सच साबित हुई. देश-दुनिया में वैज्ञानिक चेतना का लोकप्रिय संवाहक बना वह शोध छात्र अपने समकालीन समाज में उपेक्षित ही रहा. इस पर भी उसे कमत्तर साबित करने की सहयोगियों और समाज ने कोई कसर नहीं छोड़ी. परन्तु, इन सब बातों की परवाह न करते हुए वह महान व्यक्तित्व जीवन के विरामकाल में भी वर्षों पहले स्वयं के प्रयासों से द्वितीय विश्व युद्ध के कबाड़ से तैयार (जिसकी दुनियाभर में चर्चा हुई थी) फोटो फिजिक्स प्रयोगशाला में मामूली फैलोशिप की मदद से अपने शोधकार्य में लीन रहता था.
मैं जिक्र कर रहा हूँ, वैज्ञानिक, शिक्षाविद और विचारक प्रो. देवी दत्त पंत (14 अगस्त, 1919-11 जून, 2008) का. चलिए, आज उनके जन्मदिन पर विनम्रता से आत्मलोचन करते हुए उत्तराखण्ड की उस महान विभूति को ‘डॉ. देवी दत्त पंत: जन्म शताब्दी स्मारिका-2019’ के माध्यम से याद करते हैं. ‘डॉ. देवी दत्त पंत: जन्म शताब्दी स्मारिका-2019’ पहाड़, नैनीताल द्वारा स्पैक्स, यूकॉस्ट और डॉ. डी.डी. पंत स्मारक बाल विज्ञान खोजशाला, बेरीनाग, पिथौरागढ़ के सहयोग से आशुतोष उपाध्याय के संपादन में प्रकाशित हुई. इस स्मारिका का आवरण भास्कर भौरियाल ने तैयार किया और संपादकीय सहयोग हरीश पंत, एस.पी. सिंह, हरीश पाठक, रूप सिंह भाकुनी, प्रयाग जोशी, चन्दन डांगी आदि ने प्रदान किया.
दो खण्डों का फैलाव लिए इस स्मारिका की भूमिका प्रो. शेखर पाठक ने लिखी है. पहले खण्ड में प्रो. पंत के आठ संस्मरणात्मक आलेख हैं. दूसरे खण्ड में स्मृति स्वरूप प्रेम बल्लभ बिष्ट, आशुतोष उपाध्याय, प्रयाग जोशी, हीराबल्लभ त्रिपाठी, एस. पी. सिंह, एस. एन. ठाकुर, रामचद्रा गुहा, हरीश पन्त, ताराचन्द्र त्रिपाठी, रूप सिंह भाकुनी, लक्ष्मण सिंह बिष्ट, ‘बटरोही’, राजीव लोचन साह, नीरज तिवारी, जहूर आलम, अजय एस. रावत के आलेख हैं.
डॉ. देवी दत्त पंत का जन्म 14 अगस्त, 1919 को तत्कालीन अल्मोड़ा जनपद के गणाई गंगोली क्षेत्र के दूरस्थ द्योराड़ी पंत गाँव में हुआ था, जो अब पिथौरागढ़ जिले में है. पिता लक्ष्मी दत्त पंत और माता भगवती देवी के दो पुत्र देवी दत्त और मथुरा दत्त थे. पिता की वैद्यकी और खेती-किसानी के बाद भी विकट आर्थिक अभावों से तस्त्र जीवन था. प्रो. पंत ने प्राथमिक विद्यालय द्योराड़ी पंत गाँव से कक्षा 4 (1929) और मिड़िल स्कूल काँड़ा से कक्षा 7 (1933) उत्तीर्ण किया. काँडा स्कूल के छात्रावास में रहते हुए सभी शिक्षक उनके संरक्षक और रसोइये की भूमिका में भी होते थे. गाँव से 15 किमी. दूर काँडा गाँव उनका आना-जाना अक्सर पिता के कंधों और अग्रज मित्र बचीराम के साथ होता था. उन्होने राजकीय इण्टर काॅलेज, अल्मोड़ा से हाईस्कूल (1936) और इण्टमीडिएट (1938) की परीक्षा पास की थी. इण्टर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के तुरन्त बाद ही देवी दत्त के पिता ने उनकी शादी नेपाल के बेतड़ी जिले में स्थित एक गाँव में भट्ट परिवार की सुकन्या पुष्पा से तय कर दी. उनकी बारात गाँव से ससुराल पैदल तीन दिन में पहुँची और तीन दिन में ही वापस आई थी.
‘‘शादी को लेकर मैं उत्सुक था, पहला कारण यह था कि ससुराल से आगे पढ़ाई के लिए आर्थिक मदद मिल जायेगी. दूसरा कारण मेरी वह उम्र थी, जब शादी के प्रति आकर्षण होता है.’’(पृष्ठ-9)
उच्च शिक्षा के लिए देवी दत्त का 1938 में बनारस आना हुआ. उन्होने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. (1940) और एम.एस.सी, भौतिक विज्ञान (1942) की उपाधि प्रथम श्रेणी में हासिल की. उनको प्रो. आर. के. आसुन्दी जैसे पारिवारिक शुभचिन्तक गुरु ने आगे की राह दिखाई. प्रो. आसुन्दी ने अपने शोध छात्र देवी दत्त को नॉवल सम्मानित चन्द्रशेखर वेंकट रमन के पास इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ़ सांइस, बैंगलौर में हीरे की प्रकाश चालकता और यूरेनियम लवणों पर शोध कार्य हेतु भेजा. इसी दौरान, देवी दत्त पंत आगरा कॉलेज में 1944-49 प्रवक्ता भौतिक विज्ञान रहे.
आर. के. आसुन्दी के मार्गदर्शन में Photoconductivity of Diamond and the Luminescence Spectra of Uranyl Salts शोध कार्य पर उन्होने 1949 में डी. एस. सी. की उपाधि धारण की. प्रो. रमन उन्हें सरकारी अधिकारी और विदेश भेजना चाहते थे. परन्तु पंत ने शिक्षक बनना कबूल किया. बलवन्त राजपूत कॉलेज, आगरा 1949 में पंत भौतिक विज्ञान के प्रोफसर बन गए. उसके बाद नैनीताल में देब सिंह बिष्ट कॉलेज के आरम्भ होते ही 1952 में भौतिकी के विभागाध्यक्ष के पद पर सुशोभित हुए. उन्होने डीएसबी, कॉलेज में फोटो फिजिक्स प्रयोगशाला की स्थापना कर स्पैक्ट्रोस्कोपी में शोध कार्य की नींव रखी. उन्होने इसके लिए 1964 में राजस्थान विश्वविद्यालय में भौतिकी विभाग की प्रोफेसरी और विभागाध्यक्ष का पद छोड़ दिया, ताकि ये शोध कार्य बाधित न हो.
महत्वपूर्ण यह है कि इस प्रयोगशाला में अधिकाँश उपकरणों को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बेकार पड़ी सामाग्री से निर्मित किया गया था. देश-दुनिया में इस प्रयास की चर्चा और सराहना हुई थी. इस प्रयोगशाला ने यूरेनियम लवणों से होने वाले प्रकाश विकिरण को फोटो मल्टीपलायर ट्यूब एवं गैल्वानोमीटर की साहयता से मापने की विधि खोजी. (फोटो फिजिक्स किसी पदार्थ की परमाणाविक या आणविक दुनिया को जानने का विज्ञान है.)
प्रो. डी. डी. पंत के ‘स्पैक्ट्रोस्कोपी एण्ड फोटोकैमिस्ट्री ऑफ यूरेनल कम्पाउडस’ शोध कार्य को विश्वभर में विशेष स्थान मिला. दूसरी ओर विडम्बना यह भी है कि उनकी प्राणप्यारी इस फोटो फिजिक्स लैब पीकोसेकेंड (एक सेकेंड का एक खरबवां हिस्सा) रहस्यमयी परिस्थितियों में आग की भेंट भी हुई थी. यह हमारे समाज के छुपे विद्रुप स्वरूप का एक संकेत भर है.
प्रो. पंत को 1960 में अन्तरराष्ट्रीय फुलब्राइट फैलोशिप मिली. जिससे, दुनिया के वैज्ञानिकों के साथ काम करने का उन्हें मौका मिला. उनके मित्र ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक फ्रैडरिक हर्जबर्ग और माइकेल काशा चाहते थे कि पंत अमेरिका आकर अपना शोध करें, लेकिन अपने देश में रह शिक्षण और शोध करने की प्रबल इच्छा पंत में जीवन प्रर्यन्त रही.
‘‘डॉ. देवी दत्त पंत की ख्याति गरीबी-गर्दिश से निकल एक प्रतिभा बनने की और मुख्यतः एक भौतिकविज्ञानी की रही है, पर शिक्षक उनके व्यक्तित्व की धुरी रही है.’’(शेखर पाठक, पृष्ठ-7)
प्रो. पंत 1962 में डी.एस. बी. के प्रधानाचार्य, 1972 में शिक्षा (प्राथमिक, विद्यालयी और उच्च) निदेशक, और 1973 में पंतनगर विश्वविद्यालय में विज्ञान संकाय के डीन बनाए गए. कुमाऊँ विश्वविद्यालय के स्थापना वर्ष- 1973 में वे प्रथम कुलपति बनाए गए. प्रो. पंत के कुलपति रहते हुए कुमाऊँ विश्वविद्यालय ने चहुँमुखी कामयाबी पाई. वे इस विश्वविद्यालय को हिमालय और विशेषकर उत्तराखण्ड की पारिस्थिकीय के अनुकूल शैक्षिक विषयों का अध्ययन केन्द्र बनाना चाहते थे. उनका मानना था कि गढ़वाल और कुमाऊँ विश्वविद्यालय हमारे ‘प्रेस्टीजियस इंस्टीटयूशन्स’ हैं. इनका यहाँ के क्षेत्रीय विकास से सीधा सम्बन्ध रहना ही चाहिए. वे कहते कि हिमालयी भूमि की ऊपरी परत और उच्च शिक्षित व्यक्ति हमेशा खिसकने के लिए तैयार रहते है, अतः सर्वप्रथम इन दोनों संसाधनों को रोकने के प्रयास होने चाहिए. स्थानीय टॉप सॉयल और उच्च शिक्षित व्यक्तियों के अभाव में यहाँ अनु-उपजाऊपन और वीरनगी ही हाथ आयेगी. वे जोर देकर कहते कि, ये समझना जरूरी है कि हिमालय केवल सुरक्षा और पवित्रता का प्रतीक नहीं है, वरन यह जीवधारियों की भी रहने की भूमि है और उसे इसके लायक बने रहना जरूरी है.
प्रो. पंत ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर गाँधी विचार को पाठयक्रम में शामिल किया था. उन्होने मुक्त महाविद्यालयों, जो बाद में मुक्त विश्वविद्यालयों के रूप में सामने आया की पहल की थी. वे प्राथमिक शिक्षा से विश्वविद्यालयी शिक्षा तक ग्रामीण विकास, पर्यावरण और रोजगारपरख शिक्षा के परम हिमायती थे. समानान्तर शिक्षण संस्थाओं के वे सख्त खिलाफ थे. वे स्वीकारते कि आधारभूत विज्ञान,तकनीकी, प्रौद्योगिकी और सामाजिक विज्ञान की शिक्षा रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़ी बहुत सामान्य बातें हैं, उसमें किसी तरह का ग्लैमर नहीं होता है. अतः इन सब शैक्षिक पाठ्क्रमों का प्रयास ऐसा हो कि आम आदमी का जीवन इनसे सरल हो और उसमें इन्हें जानने-समझने क्षमता निरन्तर विकसित होती रहे.
प्रो. पंत स्पष्ट वक्ता के साथ किसी प्रकार के दबाव में कभी भी नहीं आते थे. उनके कार्यकाल में राज्यपाल उप्र. और कुलाधिपति एम. चेन्ना रेड्डी किसी तथाकथित ज्योतिषी को जबरदस्ती मानद उपाधि दिलवाना चाहते थे. प्रो. पंत ने कुलपति पद से इस्तीफा दे दिया, परन्तु उनकी नाजायज बात नहीं मानी. बाद में भले ही जन दबाव में उन्होने अपना इस्तीफा वापस लिया. वे 1977 में कुलपति पद से मुक्त हुए और तुरंत एक भौतिक विज्ञान के शोधार्थी के रूप में पुनः अपनी लैब में सक्रिय हो गए.
प्रो. पंत को स्पैक्ट्रोस्कोपी के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य के लिए राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय सम्मान मिले. यह उनकी पहचान बनी. उनकी पहल पर ‘लेजर एण्ड स्पैक्ट्रोस्कोपी सोसायटी’ और इंडियन फिजिक्स टीचर्स ऐसोसिएशन की स्थापना हुई थी. उनके निर्देशन में 30 शोधार्थियों ने शोध कार्य और 250 से अधिक शोधपत्रों का प्रकाशन हुआ. वे सिग्मा-साई फैलोशिप, इंडियन अकेडमी ऑफ साइंसेज फैलाशिप, सी.वी. रमन और आसुन्दी सेन्टेनरी और सारस्वत सम्मान, शांतिस्वरूप भटनागर पुरस्कार से विभूषित हुए. वे कई राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय शिक्षण, प्रशिक्षण और शोध संस्थाओं के बतौर प्रोफेसर एमेरिटस, सदस्य और सलाहकार ता-उम्र सक्रिय रहे.
प्रो. पंत ने हिमालयी अध्ययन पर केन्द्रित शोध पत्रिकाओं ‘द स्टडीज’ और ‘उत्तराखण्ड भारती’ के प्रकाशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बटरोही एवं पंत की ‘एबाउट गाँधी’ संपादित पुस्तक चर्चित रही है. प्रो. डी. डी. पंत संयोग से 25 मई, 1979 को उत्तराखण्ड क्रान्ति दल के संस्थापक अध्यक्ष बने. राजनीति में जाने का उनका पूर्व में कोई इरादा नहीं था. उन्हीं के प्रयासों से इन्द्रमणि बड़ोनी, काशीसिंह ऐड़ी और विपिन त्रिपाठी ने उत्तराखण्ड क्रान्ति दल से नाता जोड़ा. अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ लोकसभा चुनाव-1980 का चुनाव वे लड़े और जनता ने उनकी जमानत जब्त कराई. राजनीति न उनको रास आई और न जनता ने उन्हें राजनेता के रूप में स्वीकार किया.
प्रो. पंत पुनः अपनी लैब में आकर शोधार्थी बन गए, अपने जीवन के अन्तिम काल तक न चल पाने की स्थिति में भी वे लैब में नियमित आते रहे. वे ‘नैनीताल बचाओ समिति’’ के अध्यक्ष और युगमंच, नैनीताल के संरक्षक बने.
जीवन के सांध्य काल में अपने बचपन को याद करते हुए स्कूली शिक्षकों यथा- अम्बादत्त जोशी, नैनसिंह,उमाकांत पन्त, परमानन्द चन्दोला आदि को अपनी सामाजिक चेतना का सूत्रधार माना. वे अपने बचपन के अग्रज मित्र बचीराम और भूपाल सिंह को कभी नहीं भूले. उनका मानना था कि जनकल्याण के कार्यों की शुरुआत घर से ही होती है. अतः उन्होने अपने गाँव-इलाके के वचिंत वर्ग के विद्यार्थियों के सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए ‘बचीराम छात्रवृत्ति कोष’ बनाया.
प्रो. पंत जीवनीय सार को उल्लेखित करते हुए लिखते हैं कि ‘‘सुबह उठते ही कोलाहल, चिन्ता, अव्यवस्था 70 वर्ष के जीवन का यह पड़ाव बहुत कठिन है! विज्ञान, तकनीक, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र- सब धरे रह गये हैं, धर्म, मानवता, करुणा, प्रगति, शांति व्यवस्था सब आधारहीन, अर्थहीन जान पड़ते हैं, आरक्षण, राम, रोटी, सरकारों का गिरना-बनना, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, मूल्यों की राजनीति आदि बातें सब चमत्कार और भुलावे के लिए की जा रही हैं, इनसे बचने के लिए अपने अतीत में भागना सुखद लगता है.’’ (पृष्ठ-21)
ख्यातिप्राप्त शिक्षक, वैज्ञानिक और चिंतक प्रो. डी. डी. पंत की अमूल्य जीवनीय पूंजी उनकी ईमानदारी, लगन और संतोष रही. उनका दृढ़ मत था कि जिस काम में आनंद मिले, उसी में जीवन लगा दो. यही उन्होने जीवन-भर किया भी.
संदर्भ साहित्य-
1. उत्तराखण्ड की वैज्ञानिक विभूतियाँ, ललित कुमार वर्मा, वर्ष-1998, श्री अल्मोड़ा बुक डिपो, माल रोड़, अल्मोड़ा.
2. पहाड़-8, संपादक- शेखर पाठक, वर्ष- 1995, पहाड़, परिक्रमा, तल्लाडाँडा, नैनीताल.
3. मित्र चारू तिवारी की 14 अगस्त, 2026, फेसबुक पोस्ट.
वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी अरुण कुकसाल का यह लेख उनकी अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.
इसे भी पढ़ें : ‘चले साथ पहाड़’ अरुण कुकसाल की नई किताब
जर्मन की लड़ाई और रुद्रनाथ की चढाई
न रुकदि छै, न थकदि छै, नयार जन बगदि छै : संकट में है नयार
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
अल्मोड़ा के काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने जब अपने बनाए फ्लाइंग व्हीकल "हापिडा स्काईनेक्स"…
उत्तराखंड के पहाड़ों में लोकगीत और लोकनृत्य केवल मनोरंजन के साधन नहीं, बल्कि यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक…
पिछली कड़ी : हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी कुमाऊं को विशिष्ट…
10 मार्च 2026 को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड के वन मंत्री ने विधानसभा…
गोविंदा, रघु, रामकली, चंदा, कृष्णा दा, सूर्या... नाम नहीं जीवन हैं कई दिनों से राजधानी…
विश्व क्रिकेट के दिग्गज विराट कोहली भी अब टिहरी गढ़वाल के देवप्रयाग निवासी आयुष बड़ौनी…