फोटो: ऋचा मेवाड़ी
पानी बरस रहा है. जब भी पानी बरसता है, देखता हूं पेड़-पौधे बहुत खुश हो जाते हैं. बरामदे की ओर निकला तो अचानक एक मोहक, सम्मोहक सुगंध ने मन मोह लिया. देखा, गमले में अपने श्वेत फूलों की बहार के साथ कामिनी मुस्करा रही है. उसे सहलाया. तभी मन की घाटियों में कामिनी नाम गूंजने लगा. कामिनी? कब सुना था यह नाम मैंने? याद आया- 40-45 वर्ष पहले जब रीतिकाल के कवियों की कविताएं पढ़ रहा था तो कवि आलम की लिखी वह पंक्ति कभी भूल नहीं पाया –
कनक छरी सी कामिनी काहे को कटि छीन!
यानी, हे सोने की छड़ी जैसी सुंदरी, तुम्हारी कमर इतनी पतली क्यों है? इसका उत्तर मिलने का एक मशहूर किस्सा है. सुनाऊं? चलिए, सुनाता हूं.
कहते हैं, कवि आलम ने कविता की यह प्रश्नवाचक पंक्ति तो लिख ली लेकिन इसका उत्तर तत्काल नहीं सूझा. उन्होंने इस पंक्ति को कागज पर लिखा और उसे अपनी पगड़ी के एक कोने में गांठ बांध कर संभाल लिया ताकि उत्तर सूझ जाने पर वह पंक्ति भी इस कागज पर लिख लेंगे. पगड़ी धुलवानी और रंगवानी थी. सो, उसे वैसे ही रंगरेजिन को भेज दिया. सुंदर, चपल रंगरेजिन का नाम था – शेख.
शेख ने जब पगड़ी धोने के लिए फैलाई तो गांठ हाथ में आ गई. उसने गांठ खोली तो देखा कागज है और उस पर लिखा है- कनक छरी सी कामिनी काहे को कटि छीन! रंगरेजिन शेख भी कवि-मना थी. उसने तुरंत समस्या पूर्ति कर दी –
कटि को कंचन काटि विधि कुचन मध्य धरि दीन!
यानी, विधाता ने कमर का सोना काट कर कुचों में सहेज दिया है! पगड़ी धो और रंग कर सुखाई. उसकी गांठ में मिले कागज पर उत्तर की यह पंक्ति लिख कर वह कागज फिर उसी तरह गांठ बांध कर कवि आलम को भेज दी.
आलम ने पगड़ी पहनते समय गांठ देखी तो उसे खोला. अपनी लिखी पहली पंक्ति का उत्तर पाकर बाग-बाग हो गया. प्रेम का अंकुर फूट पड़ा और बाद में उसने शेख से प्रेम विवाह कर लिया. तो, हमें तो केवल कविता की उस कामिनी का ही पता था. लेकिन, आज हमारे घर पर लगी हरी-भरी कामिनी में फूलों की बहार और मादक सुगंध से हमारे मन में प्रश्न उठा- हे, कामिनी तुम कौन?
उत्तर मिला – यह कामिनी तो नींबू परिवार की है. इसके फूल देखिए, नींबू के फूलों की तरह ही दिखाई देते हैं. अंग्रेजी भाषा में यह आरेंज जैस्मीन है और वैज्ञानिकों की भाषा में मोराया पैनीकुलेटा. वैज्ञानिकों की भाषा का भी कुछ खास मतलब होता है. यह नहीं कि यों ही कुछ भी नाम रख दिया. अब इस कामिनी के ही नाम को लीजिए.
दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन, श्रीलंका, इंडोनेशिया से लेकर आस्ट्रेलिया तक की मूल निवासी कामिनी को सबसे पहले वैज्ञानिक नज़र से सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध में एक जर्मन वनस्पति विज्ञानी जार्ज एबरहार्ड रम्फियस ने इंडोनेशिया के पूर्वी भाग में देखा था. वह इलाका तब डच ईस्ट इंडीज कहलाता था. वे ईस्ट इंडिया के लिए काम कर रहे थे. रम्फियस ने इस पौधे के चित्र बनाए और इसका वर्णन किया. चित्र और वर्णन उनके निधन के बाद 1747में छपा. तब तक पेड़-पौधों का वैज्ञानिक नाम रखने की कोई मुकम्मल पद्धति नहीं थी.
मुकम्मल द्विनाम पद्धति ईजाद की स्वीडन के प्रसिद्ध वनस्पति विज्ञानी कार्ल लिनीयस ने. नामकरण की इस सर्वमान्य पद्धति के कारण उन्हें हम पौधों का पुरोहित कह सकते हैं. इन्हीं कार्ल लिनीयस ने 1767 में कामिनी पौधे का नामकरण कर दिया- काल्कास पैनीकुलेटस. काल्कास ग्रीक मिथकों में एक संत या पैगंबर का नाम है. लिनीयस ने उसके नाम पर इस पौधे के वंश का नाम काल्कास रख दिया. कामिनी के फूल गुच्छे में निकलते हैं तो लैटिन भाषा का शब्द लेकर इस पौधे की जाति का नाम रख दिया- पनीकुलेटा. मतलब जिसके फूल गुच्छे में निकलते हैं. उसके बाद स्काटलैंडके वनस्पति विज्ञानी विलियम जैक ने इसका नाम बदल कर रख दिया – मुराया पनीकुलेटा.
अब मुराया क्यों? इसलिए कि कार्ल लिनीयस ने अपने प्रिय शिष्य और मित्र स्वीडिश-जर्मन वनस्पति विज्ञानी जोहान एंड्रियास मुरे के सम्मान में इस पौधे के वंश का नाम मुराया रख दिया.
अब बताइए, शैक्सपियर कह गए हैं- नाम में क्या रखा है? आपने देखा, जनाब पेड़-पौधों के नामों में तो बहुत-कुछ रखा है. है ना?
वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.
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