राजेसिंह का कहना है कि ‘‘मरोड़ा गांव से लदोली घाट तक का रास्ता उतार-चढ़ाव का न होकर सीधा-सादा है। खतरा यह है कि शाम को जंगली जानवरों का गाड़-गधेरों की ओर आना-जाना ज्यादा रहता है। इसलिए, हर एक के पास टेक्वा (लाठी) जरूरी है…
लदोली घाट पहुंचे तो पूर्वी नयार के दूसरी तरफ जाने के लिए लठ्ठों के ऊपर चलने के लिए हिम्मत जुटानी पड़ रही है। राजेसिंह और कुंदन सिंह के हौसला और सहारे ही पार हो पाये हैं। हमें बताया गया है कि यह जगह बहुत अस्थिर है। क्योंकि, कभी भी किसी भी तरफ से अचानक पानी बढ़ जाता है। लिहाजा, जल्दी से जल्दी वापस आना होगा।
लदोली घाट में दो गाड़-गधेरे झरने की तरह नीचे की ओर प्रवाहित हैं। उनका शोर, जोर और जोश पूरे यौवन पर है। इतना कि हम आपस में एक दूसरे की बात को भी स्पष्ट नहीं सुन पा रहे हैं। राजेसिंह बताते हैं कि ‘‘श्रृंग ऋषि आश्रम से सिंगोड़ा गाड़ में कई छोटे-छोटे रौले (जलधारायें) यथा- भाबरपानी रौला, कोदियाबगड़ रौला, पत्थरखाणी, कोठा रौला, खीर गाड़, रमक्वाली झरना, फुलवाड़ी रौला, मुश्कोर रौला आदि मिलते हैं। लदोली घाट में हमारे बायें ओर से सिंगोड़ा गाड़ और दायें ओर से उडियार गाड का संगम हो रहा है। सिंगोड़ा गाड़ और उडियार गाड़ के संगम स्थल लदोली घाट से आगे इसे पूर्वी नयार कहा जाता है।’’
लदोली घाट से पूर्वी नयार के बायें ओर के प्रवाह के साथ लगभग 1 किमी चलने के बाद हम डिन्यालू/बंगला स्थल पर पहुंचे हैं। यह वही प्रारम्भिक स्थल है जहां से 14 सितम्बर, 1951 को बादल फटने से सतपुली (95 किमी. दूर) तक बाढ़ के हालात हो गए थे। राजेसिंह बताते हैं कि ‘‘इस पहाड़ी का नाम डिन्याली डांडा/चोटी है। इसकी इस तलहटी को डिन्याल्यू कहा जाता है। अंग्रेज शासन काल में यहां एक डाकबंगला था। इसीलिए स्थानीय लोग इसको बंगला भी कहते थे। अग्रेंजों ने यहां देशी-विदेशी चाय, फल और फूलों के कई छोटे-छोटे बागान विकसित किए थे। डिन्याली पहाड़ी से सिंचाई के लिए एक नहर बनाई गई थी। डिन्याली चोटी के आस-पास 14 सितम्बर, 1951 की रात्रि को अचानक जोरों से बादल फटा। इससे तुरन्त ऊपरी चट्टानें, पेड़-पौधे और मिट्टी एक साथ टूटकर नीचे पूर्वी नयार की ओर आये। देखते ही देखते पूर्वी नयार में एक विशालकाय बांध बन गया। अत्यधिक पानी के दबाव के कारण जब वह टूटा तो मरोडा़ गांव के पास पूर्वी नयार नदी पर 10 मीटर ऊॅंचा पुल बह गया। सतपुली तक अनेकों पशु, भवन, गाडियां और मनुष्य पूर्वी नयार नदी में बह गए। इस घटना का एक लोकगीत हमारे गढ़वाली समाज में आज भी प्रचलित है।’’
और, मैं गुनगुनाते हुए ये गीत गाने लगता हूं – द्धी हजार आठ भादों का मास, सतपुली मोटर बोगीन खास…
‘‘आपको तो ये गीत याद भी है।’’ राजेसिंह हल्की मुस्कान लिए मेरी ओर आश्चर्य से देख भी रहा है।
‘‘मेरा चामी गांव सतपुली के पास ही है। सतपुली हमारा बाजार है। इस गीत को बचपन से सुनते आयें हैं इसलिए हमारे मन-मस्तिष्क में यह रचा-बसा है। हमारे आस-पास उस डाकबंगले और नहर के अवशेष बिखरे हुए हैं। उस समय के फल, फूल और चाय के बागानों के निशान आसानी पहचाने जा रहे हैं। निश्चित रूप में यह स्थान उस दौर में बहुत व्यवस्थित और आकर्षक रहा होगा।
राजेसिंह जानकारी देते हैं कि ‘‘इस स्थल पर अतीस का घना जंगल पनप गया है। जबकि, इस ओर कहीं अतीस के पेड़ नहीं हैं। उनका मानना है कि जहां बादल फटता है, वहां अतीस की पौधें तुरंत उग आते हैं।’’सांझ गहरी हो गई है। पूर्वी नयार को लम्बे लठ्ठों से पार करना पहले से अब और दुष्कर हो गया है। वापसी के रास्ते में जंगली जानवर तो नहीं पर लपलपाता सांप जरूर दिख गया है। कुंदन जैसे ही उसे पकडने झुका कि वो तेजी से नीचे की ओर चला गया है। पता लगा कि कुंदनसिंह को सांप पकड़ने में निपुणता हासिल है…
28 अप्रैल, 2025
…हम सतपुली (617 मी.) के ठीक सामने मलेठी धार में स्थानीय उद्योगपति सुन्दरसिंह चौहान (अब दिवंगत) द्वारा निर्मित एवं संचालित आश्रम में हैं। यहाँ से सतपुली का विहंगम दृश्य दिखाई दे रहा है। मलेठी आश्रम से सतपुली की ओर आते हुए बिजली दफ्तर परिसर में हम सभी साथी पहुंचे हैं। यहां स्थापित स्मारक पर लिखी इन पंक्तियों पर सबकी नज़र है – ‘‘सतपुली नयार बाढ़ दुर्घटना-गढ़माता के ये निरपराध वीर पुत्र मोटर मजदूर जन यातायात की सेवार्थ 14 सितम्बर, 1951 ई. को अपनी गाड़ियों सहित सतपुली नयार नदी की प्रचन्ड बाढ़ में सदैव के लिए विलीन हो गये। यह स्मारक उन बिछड़े हुए साथियों की यादगार के लिए यातायात के मजदूरों के पारस्परिक सहयोग एवं उत्साह से गढ़वाल मोटर मजदूर यूनियन द्वारा स्थापित किया गया है- गढ़वाल मोटर ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन द्वारा निर्मित।’’
तकरीबन 74 साल पहले लिखे उक्त शब्दों की बनावट और लिखावट का अब फीका और टूटा होना स्वाभाविक है। बिजली से संबधित मोटे तारों, खम्बों और भीमकाय बेकार मशीनों, कटींली झाड़ियों आदि के बीच वीराने में खड़ा यह स्मारक अतीत के प्रति हमारे सम्मान के स्तर को बताता है। साथ ही हमारी सामाजिक संवेदनहीनता को जग-जाहिर करता है। हो सकता है कि 14 सितम्बर के दिन इस स्थल को साफ-सुथरा करके कुछ लोग फूलों के साथ श्रृद्धा सुमन अर्पित करने यहां स्थानीय लोग आते होंगे?
यात्रा साथी देवकृष्ण थपलियाल का कहना है कि ‘‘क्या ही अच्छा होता कि सतपुली का हर निवासी इस स्थल की पवित्रता एवं महत्वा को समझता। यह वो जगह हैं जहाँ पर वे सतपुली के इतिहास, भूगोल और सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक विरासत को महसूस कर उसे आज के संदर्भों में सतपुली की बेहतरी के लिए चिन्तन-मनन कर सकते हैं।’’ पर हरदम सरपट भागती सतपुलीय जीवन को इतनी फुरसत और समझ कहाँ?
मैं साथियों से जानकारी साझा करता हूं कि सतपुली मोटर सड़क मार्ग से 1944 में जुड़ा। सड़क से जुड़ने के 7 साल बाद ही 14 सितम्बर, 1951 को पूर्वी नयार में आयी भयंकर बाढ़ में संपूर्ण सतपुली बाजार, 30 लोग और 31 बसें कालग्रसित हो गए थे। जहाँ पुराना सतपुली बाजार था आज वहां पूर्वी नयार बहती है। उसके बाद नया सतपुली मल्ली गाँव के कृर्षि क्षेत्र में बसना शुरू हुआ था। सतपुली में 14 सितम्बर, 1951 को पूर्वी नयार नदी में आयी बाढ़ से हुयी त्रासदी की भयानकता को बताता गढ़वाली लोकगीत आज भी घर-गाँवों में भावविभोर होकर गाया जाता है।
प्रसंगवश मैं गुनगुनाते हुए ये गीत गाने लगता हूँ – (इससे पूर्व लदोली घाट के निकट डिन्याली स्थल पर भी मैंने यह गीत गाया था।)
द्वी हजार आठ भादों का मास,
सतपुली मोटर बोगीन खास।
औड़र आई गये कि जांच होली,
पुर्जा देखणक इंजन खोली।
अपणी मोटर साथ मां लावा,
भोल होली जांच अब सेई जावा।
सेई जोला भै-बन्धों बरखा ऐगे,
गिड़गिड़ थर-थर सुणेण लेगे।
भादों का मैना रुण-झुण पांणी,
हे पापी नयार क्या बात ठाणीं।
सुबेर उठीक जब आयां भैर,
बगीक आईन सांदन-खैर।
गाड़ी का भीतर अब ढुंगा भरा,
होई जाली सांगुड़ी धीरज धरा।
गाड़ी की छत मां अब पाणी ऐगे,
जिकुड़ी डमडम कांपण लेगे।
अपणा बचण पीपल पकड़े,
सो पापी पीपल स्यूं जड़ा उखड़े।
भग्यानूं की मोटर छाला लैगी,
अभाग्यों की मोटर डूबण लेगी।
शिवानन्दी कु छयो गोवरधन दास,
द्वी हजार रुप्या छै जैका पास।
डाकखानों छोड़ीक तैन गाड़ी लीने,
तै पापी गाड़ीन कनो घोका दीने।
गाड़ी बगदी जब तेन देखी,
रुप्यों की गड़ोली नयार स्य फैंकी।
हे पापी नयार कमायें त्वैकू,
मंगसीरा मैना ब्यो छायो मैकू।
काखड़ी-मुंगरी बूति छाई ब्वै न,
राली लगी होली नी खाई गैंन।
दगड़ा का भैबन्धों तुम घर जाला,
सतपुली हालत मेरी मां मा लगाला।
मेरी मां मा बोल्यान तू मांजी मेरी,
नी रयों मांजी गोदी को तेरी।
मेरी मां मा बोल्यान नी रयीं आस,
सतपुली मोटर बोगीन खास।
हिंदी भावार्थ –
दो हजार आठ भादों के महीने,
खास सतपुली में मोटरें बह गई।
यह आदेश आया कि मोटरों की जांच होगी,
पुर्जा देखने के लिए इंजन खोलना है।
अपनी मोटर साथ लाओ,
कल जांच होगी अभी सभी सो जाओ।
सो तो जायेंगे पर भाई बन्धों, बारिश आ गई है,
उसकी गिड़गिड़ाहट अब सुनाई देने लगी है।
भादों के महीने का लगातार बरसता पानी,
हे पापी नयार नदी आज तूने क्या बात ठानी है।
सुबह उठकर जब बाहर आये,
तो सागण-खैर के पेड़ नयार नदी में बह के आ रहे हैं।
गाड़ी के भीतर अब पत्थर भरो,
नदी जल्दी कम हो जायेगी, धीरज रखो।
गाड़ी की छत पर भी अब पानी पहुंच चुका है,
सभी का दिल अब कांपने लगा है।
अपने बचने हेतु पीपल का पेड़ पकड़ा,
पर पापी पीपल भी जड़ से उखड़ गया।
भाग्यवानों की मोटर नदी किनारे लग गई है,
भाग्यहीनों की मोटर नदी में डूबने लगी है।
शिवानंदी गांव का था गोवरधनदास,
दो हजार रुपए थे उसके पास।
पोस्टआफिस में जमा करने के बजाय उसने गाड़ी खरीदी,
उस पापी गाड़ी ने आज उसे कैसा धोखा दिया।
गाड़ी नदी में बहती जब उसने देखी,
रुपयों की गड्डी उसने नयार नदी से फैंकी।
हे पापी नयार मैंने तेरे लिए ही कमाया,
मंगसीर के महीने मेरी शादी थी।
मां ने घर पर ककड़ी-मकई बोई है,
अब वह यही कहती रहेगी कि हम नहीं खा पाये।
मेरे साथियों तुम घर जाओगे,
सतपुली की हालत मेरी मां को बताओगे।
मेरी मां को बोलना कि,
मैं तेरी गोदी का नहीं रह पाया।
मेरी मां को यह भी बोलना मेरी आस न करना,
क्योंकि खास सतपुली में मोटर बह गई हैं।
नोट- ‘दूधातोली, राठ और नयार’ यात्रा-किताब, समय-साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून (7579243444) से प्रकाशित किताब का एक अंश.
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