कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है, बल्कि यह लोकजीवन, धार्मिक आस्था और पर्वतीय चित्रकला के अद्भुत समन्वय का अवसर भी रही है. भाद्रपद मास में बिरूड़ा पंचमी, अमुक्ताभरण सप्तमी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर कुमाऊँ के अनेक क्षेत्रों में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ चित्रांकन की परम्परा भी प्रचलित थी. विशेषकर दुग, नाकुरी, गंगोली, सोर, काली कुमाऊँ तथा उत्तराखण्ड व नेपाल सीमा से लगे गांवों के घरों की चाख (बैठक) और पूजा-कक्षों की कमेट से पुती दीवारों पर कृष्ण जन्म और उनकी बाल-लीलाओं से जुड़े विविध प्रसंग स्थानीय प्राकृतिक तथा अन्य रंगों से बनाए जाते थे.
यह भित्ति-चित्र परम्परा केवल घर की सजावट भर नहीं थी. यह स्थानीय लोकस्मृति, धार्मिक विश्वास और कथा-परम्परा को अगली पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक जीवंत माध्यम थी. 1970-80 के दशक तक ऐसी स्मृतियां अनेक गांवों में दिखाई देती थीं. बागेश्वर जनपद में स्थित मेरे मालाकोट, खोलीगांव में मामाजी के घर की चाख की दीवार पर सातूं-आंठू और श्री कृष्ण जन्माष्टमी से संबन्धित सुंदर भित्ति-चित्र बने रहते थे. गांव की महिलाएं और लड़कियां अपने हाथों से इन चित्रों का निर्माण करती थीं. हरे, लाल, गुलाबी और पीले रंगों से कृष्ण जन्म, वसुदेव द्वारा कृष्ण को यमुना पार ले जाना, कालिया नाग दमन, गोपियों के साथ कृष्ण की लीलाएं, राधा-कृष्ण, नंद-यशोदा तथा कृष्ण की बाल-छवियां अंकित की जाती थीं. साथ ही गणेश, शिव-पार्वती, विष्णु, लक्ष्मी, राम-सीता और हनुमान जैसे देवी-देवताओं को भी स्थान मिलता था.
इन चित्रों का संबंध कथा-वाचन की लोक परम्परा से भी सम्बद्ध रहता था. सातूं-आंठू और जन्माष्टमी के अवसर पर ग्रामीण महिलाएं तथा बच्चे एकत्र होते और स्थानीय बोली में गौरा-महेश्वर तथा कृष्ण की कथाएं सुनाई जाती थीं. कथा सुनते समय श्रोता लोग बीच-बीच में ‘हूं’, ‘हां’, ‘हो’ और ‘होय’ जैसे शब्दों से ‘हुंगरा’ देते थे. यह केवल सहमति की ध्वनि नहीं रहती थी, बल्कि कथा और श्रोता के बीच जीवंत संवाद का माध्यम बन जाती थी. कथा प्रसंगों के अनुसार हुंगरे की लय और तीव्रता भी बदलती रहती थी. इस प्रकार चित्र, कथा और सामूहिक सहभागिता मिलकर एक विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करते थे.
कुमाऊँ की इस परम्परा को व्यापक लोकचित्र परम्परा के संदर्भ में देखा जाना आवश्यक है. ऐपण, जीवमातृका पट्ट, नवदुर्गा पट्ट, शिव की चौकी, लक्ष्मी की चौकी, सरस्वती की चौकी, दशहरा द्वारपत्र और रंगवाली पिछौड़ा इसी अनुष्ठानिक चित्र संस्कृति के विभिन्न रूप हैं. इन सभी में रेखा, रंग और प्रतीक केवल सजावटी तत्व नहीं हैं, बल्कि धार्मिक अर्थों से जुड़े हैं. जन्माष्टमी के पट्टों में खोरिया-चौकी, ज्योंति, जीव-मातृका, नौला, बिरूड़ा, काकुड़ी-माकुड़ी के फूल, पशु पक्षी आदि स्थानीय प्रतीकों का समावेश इस बात को स्पष्ट करते हैं कि कृष्णकथा को कुमाऊँ के स्थानीय धार्मिक संसार से पृथक करके नहीं देखा जाता था.
जन्माष्टमी पट्ट-चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी कथात्मकता है. एक ही पट्टे अथवा दीवार पर अलग-अलग खानों और पट्टियों में कृष्ण के जीवन-प्रसंगों को क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया जाता था. इस कारण पूरी दीवार एक प्रकार की दृश्य-पुस्तक बन जाती थी. जिन लोगों को कृष्णकथा का मौखिक ज्ञान था, उनके लिए ये चित्र कथा को देखने और समझने का माध्यम थे. इस दृष्टि से रंग, रेखा और प्रतीक चिन्ह लोकसमाज की स्मृति को सुरक्षित रखने के प्रभावी माध्यम बने रहते थे.
कृष्ण जन्माष्टमी का पट्टा
बाद में बदलते समय-समाज के साथ दीवार पर सीधे चित्र बनाने की परम्परा के समानांतर कागज पर तैयार जन्माष्टमी के चित्रपटों का चलन बढ़ा. इससे यह धार्मिक चित्र अधिक सहजता से घर-घर पहुंचने लगे और लोगों को हर वर्ष दीवारों पर चित्र बनाने के उस श्रम से भी मुक्ति मिली. लेकिन परम्परागत भित्ति चित्रकला वह विरासत विलुप्ति की तरफ भी बढ़ने लगी. इस तरह छापाखानों से प्रकाशित इन पट्टों में कृष्ण जन्म और उनकी लीलाओं के साथ अनेक देवी-देवताओं, दशावतार, स्थानीय धार्मिक प्रतीकों और पर्व-संबंधी दृश्यों को एक ही रचना में समाहित किया जाने लगे.
1960 के दशक में लोक संस्कृति के जानकार एन. आर. उप्रेती के विवरणों से ज्ञात होने वाले एक पारंपरिक पट्ट में कृष्ण की विभिन्न लीलाओं के साथ शिव, गणेश, पार्वती, महालक्ष्मी, विष्णु, ब्रह्मा, सप्तऋषि, दशावतार, राम-सीता, हनुमान, रुक्मणी, राधिका, नाग-कन्या, कालिया नाग, नंद-यशोदा और वसुदेव जैसे पात्रों का चित्रांकन दिखाई देते हैं.
एन. आर. उप्रेती के संदर्भ से प्राप्त मूल श्वेत-श्याम चित्र के एआई तकनीक से परिवर्धित रूप के पट्ट में कृष्ण जन्म, देवकी और यशोदा, नंद, छठी पूजा, ज्योंति और जीव-मातृकाएं, वसुदेव द्वारा कृष्ण को यमुना पार ले जाना, कालिया नाग दमन, राधिका, विष्णु, लक्ष्मी, ब्रह्मा और सप्तऋषियों के साथ स्थानीय धार्मिक प्रतीकों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है. इससे स्पष्ट होता है कि कुमाऊँ की लोकचित्र परम्परा में विभिन्न धार्मिक धाराएं एक-दूसरे के साथ सहज रूप से जुड़ी हुई थीं.
कृष्ण लीला
दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण अनुमानित तौर पर 80 साल पूर्व छापाखाने से प्रकाशित जन्माष्टमी पट्ट का है,जिसकी मूल प्रति दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के जुगल किशोर पेटशाली संग्रहालय में सुरक्षित है. इसके नीचे ‘चित्रशाला प्रेस पुणे नं.-2’ अंकित है. पट्टे का स्वरूप मंदिराकार सप्त-सोपान जैसा दृष्टव्य है. इसमें नागपंचमी, दूर्वाष्टमी और अमुक्ताभरण सप्तमी का नाम उल्लेख मिलता है. नीचे से ऊपर की ओर कृष्ण जन्म, वसुदेव द्वारा कृष्ण को यमुना पार ले जाना, शेषनाग, कालिया नाग दमन, चीरहरण, दशावतार, गोवर्धन पूजा, कंस, पूतना वध, यशोदा, बालकृष्ण, ग्वाल-बाल, द्वारका और बैकुंठ जैसे प्रसंग अंकित किये गये हैं. सबसे ऊपर सिद्धि दायक गणपति, राधा-कृष्ण, महादेव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण को स्थान दिया गया है.
यह पट्ट धार्मिक चित्र होने के साथ -साथ तत्कालीन बाजार संस्कृति का भी दस्तावेज है. इसके नीचे अल्मोड़ा के लाला बाजार स्थित चिरंजीलाल ओम प्रकाश साह की दुकान का विज्ञापन भी छपा है, जिसमें मुकुट तथा विवाह, व्रतबन्ध और श्रृंगार के सामान के साथ आटा, चावल, दाल, मसाले, पहाड़ी घी, तेल,शहद, मेवे आदि उपलब्ध होने की जानकारी दी गई है. इससे पता चलता है कि धार्मिक चित्रपट उस समय धर्म, घरेलू उपयोग और व्यापारिक प्रचार—तीनों के बीच एक प्रभावी माध्यम बनते थे.
चित्रशाला प्रेस पुणे की ऐतिहासिक भूमिका भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है. उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में स्थापित इस प्रकार के छापाखानों ने देव-चित्रों, धार्मिक सामग्री और ललित कला के मुद्रित रूपों को व्यापक समाज तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. लिथो प्रिंट, मोटी काली रेखाएं, चटख गुलाबी-नारंगी रंग और लोक-देवनागरी में लिखे कैप्शन इस पट्ट की विशिष्ट पहचान हैं.
आज यह परम्परा लगभग विलुप्त हो चुकी है. इसके पीछे पारंपरिक पहाड़ी मकानों की स्थापत्य शैली में बदलाव, चाख और बैठक के स्थान पर आधुनिक कमरों का आना, कमेट से दीवारों की पुताई का कम होना, संयुक्त परिवारों का विघटन, लोककलाओं के ज्ञान का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण रुकना तथा बाजार में रंगीन पोस्टर, कैलेंडर और डिजिटल प्रिंट का बढ़ता प्रभाव प्रमुख कारण माने जाते हैं.
आज आवश्यकता इस बात की है कि बचे हुए जन्माष्टमी पट्टों और भित्ति-चित्रों का व्यवस्थित सर्वेक्षण किया जाए. उनका उच्च-रिजॉल्यूशन डिजिटलीकरण, कलाकारों और बुजुर्गों की मौखिक स्मृतियों का दस्तावेजीकरण तथा रंग, प्रतीक, चित्र-विन्यास और मुद्रण तकनीक का अध्ययन किया जाना चाहिए. इसके अलावा अल्मोड़ा और नैनीताल के पुराने छापाखानों, पुस्तक-विक्रेताओं, निजी संग्रहों, पुस्तकालयों और संग्रहालयों में भी इस परम्परा से जुड़े अवशेषों की खोज की जानी आवश्यक बात समझी जानी चाहिए.
कुमाऊँ के जन्माष्टमी पट्टों को केवल पुराने धार्मिक चित्र मानना उनके महत्व को सीमित करना होगा. ये लोकस्मृति, धार्मिक विश्वास, घरेलू स्थापत्य, पारंपरिक रंगज्ञान, कथा-वाचन, मुद्रण इतिहास और बाजार संस्कृति—सभी को एक साथ समेटे हुए दुर्लभ दृश्य दस्तावेज हैं. कभी जिन घरों की चाख की उजली दीवारों पर सातूं-आंठू और जन्माष्टमी के अवसर पर गौरा-महेश्वर तथा कृष्ण की कथाएं रंगों में जीवित हो उठती थीं, उनका संरक्षण वास्तव में कुमाऊँ की उस सांस्कृतिक स्मृति को बचाना है जिसमें धर्म, लोककला और ग्राम्य जीवन एक ही जीवंत परिदृश्य में एकाकार रहा करते थे. चंद्रशेखर तिवारी.
पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड, देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.
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