उत्तराखण्ड के पहाड़ों में मेले केवल मनोरंजन के अवसर नहीं रहे हैं. वे लोकजीवन की धड़कन, सामाजिक मेल-मिलाप, व्यापार, लोककला, आस्था और सामुदायिक उल्लास के जीवंत केन्द्र रहे हैं. इन्हीं मेलों में नंदादेवी का कौतिक अपनी विशिष्ट पहचान रखता है. अल्मोड़ा और नैनीताल में लगने वाला नंदादेवी मेला कभी पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए वर्ष भर प्रतीक्षित रहने वाला बड़ा आयोजन हुआ करता था. दूर-दूर के गांवों से लोग अपने परिवार के साथ इस मेले में पहुंचते थे. किसी के लिए यह देवी के दर्शन और पूजा का अवसर था, तो किसी के लिए रिश्तेदारों से मिलने का, किसी के लिए खरीदारी का और किसी के लिए लोकगीत, नृत्य और संगीत में डूब जाने का. आज जब नंदादेवी मेले का स्वरूप बदल रहा है, तब पुरानी स्मृतियों में लौटकर सहज ही मन कह उठता है – अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक.
पुराने समय का नंदादेवी मेला केवल मंदिर के आसपास लगने वाली दुकानों का समूह नहीं था. पंचमी के दिन से ही मेले का वातावरण बनना शुरू हो जाता था. अल्मोड़ा की गलियों और नंदादेवी मंदिर के आसपास लोगों की आवाजाही बढ़ जाती. गांवों से आए स्त्री-पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग अपने पारम्परिक पहनावे में मेले की ओर आते. रास्तों में ही मेलार्थियों की टोलियां दिखाई देने लगतीं. कहीं दूर से हुड़के की थाप सुनाई देती, कहीं बांसुरी की मीठी तान कानों में पड़ती और कहीं लोकगायक अपने स्वर से लोगों को रोक लेते. बाजार की चहल-पहल और लोकधुनों का यह मेल मेले को एक अलग ही रंग देता था. उस समय मेले की सबसे बड़ी विशेषता उसका आत्मीय लोकस्वरूप था. लोग केवल देखने नहीं आते थे, वे मेले का हिस्सा बन जाते थे. गांव-गांव से आने वाले लोग अपने साथ अपनी बोली, अपने गीत, अपनी धुन और अपनी जीवन-परम्पराएं भी लेकर आते.
लोकगायक जहां बैठ जाते, वहीं लोगों का घेरा बन जाता. हुड़के की थाप के साथ गीत शुरू होता और कुछ ही देर में सुनने वालों के चेहरे पर भी वही उत्साह उतर आता. चांचरी, झोड़ा और अन्य लोकधुनों की लय वातावरण में घुल जाती. कहीं छोलिया नृत्य की उमंग होती, कहीं लोकगीतों की स्वर-लहरियां और कहीं बांसुरी की सरल, मधुर ध्वनि. उस समय मनोरंजन के साधन सीमित थे, इसलिए लोककला ही लोगों के जीवन का बड़ा उत्सव थी.
नंदादेवी का कौतिक बच्चों के लिए तो जैसे सपनों की दुनिया था. मेले में पहुंचते ही उनकी नजर खिलौनों की दुकानों पर टिक जाती. लकड़ी के रंग-बिरंगे खिलौने, छोटी-छोटी वस्तुएं और स्थानीय कारीगरों की बनाई चीजें बच्चों को अपनी ओर खींचतीं. माता-पिता भी बच्चों की खुशी के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार खिलौने खरीदते. बच्चे हाथ में खिलौना लेकर पूरे मेले में घूमते और उनकी आंखों की चमक मेले की रौनक बढ़ा देती. आज बाजार में खिलौनों की भरमार है, लेकिन उस समय मेले से खरीदा गया छोटा-सा लकड़ी का खिलौना भी बच्चे के लिए लंबे समय तक याद रहने वाली वस्तु होता था.
मेले की दुकानों में केवल खिलौने ही नहीं मिलते थे. पहाड़ के पारम्परिक जीवन की जरूरतों से जुड़ी अनेक वस्तुएं यहां उपलब्ध होती थीं. लकड़ी के सामान, लोहे के बरतन, घरेलू उपयोग की वस्तुएं, खेती-किसानी से जुड़ी चीजें, श्रृंगार सामग्री और तरह-तरह की छोटी-बड़ी वस्तुओं की दुकानें सजती थीं. गांव की महिलाएं अपने लिए चूड़ियां, बिंदी, आभूषण और अन्य श्रृंगार सामग्री खरीदतीं. पुरुष अपनी जरूरत का सामान देखते और बच्चे खिलौनों के लिए मचलते. इस तरह मेला एक साथ बाजार भी था और उत्सव भी. और फिर होती थी जलेबी. मेले की स्मृति में जलेबी का स्वाद अलग ही जगह रखता था. गर्म तेल में छनती जलेबी की खुशबू दूर से ही लोगों को अपनी ओर खींचती. बच्चे जलेबी के लिए उत्साहित रहते और बड़े भी मेले की मिठास को जलेबी के स्वाद से जोड़ते. मेले में घूमते हुए हाथ में गर्म जलेबी की पुड़िया और सामने लोकगीत की आवाज—यह दृश्य उस दौर के कौतिक की सहज पहचान था. आज खाने-पीने की चीजें हर जगह उपलब्ध हैं, लेकिन मेले में मिलने वाली जलेबी का आनंद उस सामूहिक उत्सव का हिस्सा था.
पुराने नंदादेवी मेले का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप था. मेले में दूर-दूर के गांवों के लोग आते थे. रिश्तेदारों से मुलाकात होती, पुराने परिचित मिलते और नए संबंध बनते. जिन लोगों से वर्ष भर मिलना संभव नहीं होता था, उनसे मिलने का अवसर मेले में मिलता. कई परिवार मेले को सामाजिक मिलन के वार्षिक अवसर की तरह देखते थे. पहाड़ के कठिन जीवन में ऐसे आयोजन लोगों को एक-दूसरे के निकट लाते थे. इसलिए मेले की भीड़ केवल भीड़ नहीं थी; उसमें रिश्तों की गर्माहट और सामुदायिक जीवन की ऊर्जा शामिल थी.
नैनीताल का नंदादेवी मेला भी इसी लोकपरम्परा की एक महत्वपूर्ण कड़ी रहा है. वहां भी मेला धार्मिक आस्था के साथ लोकजीवन और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का अवसर बनता था. पुराने समय में जब यातायात और संचार के साधन आज जैसे सहज नहीं थे, तब मेले का महत्व और अधिक था. लोग तैयारी करके आते, कई बार दूर के गांवों से पैदल या कठिन यात्रा करते हुए पहुंचते. इसलिए मेले में पहुंचना अपने आप में एक उत्सव था. वहां होने वाला गीत-संगीत, बाजार और सामूहिक मिलन उस यात्रा की थकान को भुला देता था.
समय के साथ नंदादेवी मेले का स्वरूप भी बदला है. मेले में लोगों की संख्या और बाजार का विस्तार हुआ है, दुकानों के प्रकार बदले हैं और आधुनिक वस्तुओं ने पारम्परिक सामानों की जगह काफी हद तक ले ली है. पहले जहां लकड़ी के खिलौने, लोहे के बरतन और स्थानीय कारीगरी की वस्तुएं प्रमुख आकर्षण थीं, वहीं अब बाजार में आधुनिक निर्मित वस्तुओं की उपस्थिति अधिक दिखाई देती है. श्रृंगार सामग्री और खिलौनों का स्वरूप भी बदल गया है. मनोरंजन के साधन बढ़े हैं और मोबाइल फोन तथा डिजिटल माध्यमों ने लोकमनोरंजन की दुनिया को भी प्रभावित किया है.
सबसे बड़ा परिवर्तन शायद मेले के लोकस्वर में आया है. पहले लोकगायक, बांसुरी, हुड़का, चांचरी, झोड़ा और छोलिया नृत्य मेले की आत्मा जैसे होते थे. आज भी इन परम्पराओं को मेले में स्थान मिलता है, लेकिन उनका स्वरूप और प्रस्तुति बदल गई है. मंचीय कार्यक्रम बढ़े हैं, ध्वनि-विस्तारक यंत्रों का उपयोग बढ़ा है और आधुनिक मनोरंजन भी मेले का हिस्सा बन गया है. पुरानी सहजता और स्वतःस्फूर्त लोकभागीदारी कहीं-कहीं कम दिखाई देती है. फिर भी नंदादेवी मेला अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृति के कारण आज भी लोगों को जोड़ने की क्षमता रखता है.
नंदादेवी कौतिक की पुरानी यादों में सबसे मूल्यवान बात उसका सामूहिक जीवन है. वह पहाड़ के सामाजिक जीवन का ऐसा अवसर था, जहां लोग अपनी संस्कृति को जीते थे. जलेबी की मिठास, बांसुरी की तान, हुड़के की थाप, लोकगायक का स्वर, छोलिया की उमंग, लकड़ी के खिलौनों की चमक, लोहे के बरतनों की खनक और श्रृंगार सामग्री की दुकानों के बीच घूमते लोग – इन सबने मिलकर नंदादेवी के कौतिक को एक जीवंत लोकसंसार बनाया था.
आज आवश्यकता केवल मेले को क वृहत बनाने की नहीं, बल्कि उसकी उस पुरानी आत्मा को बचाए रखने की समझी जानी चाहिए . स्थानीय कारीगरों, लोकगायकों, पारम्परिक वाद्ययंत्रों, लोकनृत्यों, स्थानीय उत्पादों और पहाड़ी बाजार की पुरानी स्मृतियों को मेले में अधिक जगह मिले तो नई पीढ़ी अपने अतीत को केवल किताबों में नहीं, बल्कि जीवित अनुभव के रूप में देख सकेगी. आखिर मेला तभी मेला है, जब उसमें बाजार के साथ समाज हो, आयोजन के साथ आत्मीयता हो और भीड़ के साथ लोकजीवन की धड़कन सुनाई दे. इसीलिए पुरानी पीढ़ी जब नंदादेवी के कौतिक को याद करती है तो उसकी आंखों के सामने केवल मंदिर या बाजार नहीं आता. उसे दिखाई देती हैं लोगों से भरी गलियां, दूर से आती हुड़के की आवाज,बांसुरी की तान, लोकगीतों की लय, छोलिया की थिरकन, जलेबी की खुशबू और बच्चों के हाथों में झूलते लकड़ी के खिलौने. वह समय भले लौटकर न आए, लेकिन उसकी स्मृति आज भी हमारे सांस्कृतिक मन में जीवित है. सचमुच – अहा! कैसा होता था नंदादेवी कौतिक.
पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड, देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.
इसे भी पढ़ें: कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
आस्था और विश्वास की प्रतीक श्री नंदा देवी की भक्ति में इन दिनों पूरा उत्तराखंड…
पिछली कड़ी : बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की…
1970 के दशक का उत्तराखण्ड का ‘चिपको आंदोलन’ विश्वविख्यात है. यह तथ्य भी कमोबेश ज्ञात है कि…
पानी बरस रहा है. जब भी पानी बरसता है, देखता हूं पेड़-पौधे बहुत खुश हो जाते…
राजेसिंह का कहना है कि ‘‘मरोड़ा गांव से लदोली घाट तक का रास्ता उतार-चढ़ाव का न…
कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…