फ़ोटो: पंतनगर विश्वविद्यालय की वेबसाइट से साभार
आज जब हम भारत को दुनिया के प्रमुख खाद्यान्न उत्पादक देशों में गिनते हैं, तो शायद ही कभी हमारे मन में यह सवाल आता है कि आखिर यह सफर शुरू कैसे हुआ होगा? वह कौन-से प्रयास थे, जिन्होंने भारतीय खेती को एक नई दिशा दी और देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की राह दिखाई?
इस बदलाव की कहानी में उत्तराखंड की तराई में बसे गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर का भी एक महत्वपूर्ण स्थान है. यह केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम था, जिसने खेती को परंपरागत तरीकों से आगे बढ़ाकर विज्ञान और तकनीक से जोड़ने का सपना देखा.
जब देश के सामने थी अन्न की सबसे बड़ी चुनौती
आजादी के बाद भारत कई चुनौतियों से जूझ रहा था. इनमें सबसे बड़ी चुनौती थी देश की बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराना. देश में किसान थे, खेत थे और खेती का अनुभव भी था, लेकिन पारंपरिक कृषि पद्धतियों से बढ़ती खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूरा करना आसान नहीं था.
अनाज की कमी और दूसरे देशों से खाद्यान्न आयात पर निर्भरता ने सरकार और कृषि विशेषज्ञों को इस बारे में गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया था.
धीरे-धीरे यह समझ आने लगा कि खेती को आगे बढ़ाने के लिए केवल मेहनत ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक ज्ञान, बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और किसानों को सही जानकारी देना भी जरूरी है. इसी सोच ने भारत में आधुनिक कृषि शिक्षा और अनुसंधान की आवश्यकता को जन्म दिया.
एक सपना, जिसने कृषि शिक्षा को नई दिशा दी
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उत्तराखंड की तराई में एक ऐसे संस्थान की कल्पना की गई, जहां खेती को केवल पढ़ाया ही न जाए, बल्कि उस पर प्रयोग हों, नई तकनीकें विकसित की जाएं और उनका लाभ सीधे किसानों तक पहुंचाया जाए.
इस सपने को साकार करते हुए 17 नवंबर 1960 को उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. यह देश का पहला कृषि विश्वविद्यालय बना. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया. बाद में उत्तराखंड राज्य के गठन के पश्चात इसका नाम गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय रखा गया.
इसकी स्थापना भारतीय कृषि के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम थी. यहां शिक्षा, अनुसंधान और किसानों के हितों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया गया. उद्देश्य साफ था—कृषि को मजबूत बनाना और देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर ले जाना.
जब प्रयोगशालाओं में तैयार होने लगी किसानों के लिए नई उम्मीद
समय के साथ भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई. कृषि वैज्ञानिक ऐसी फसल किस्मों और तकनीकों पर काम कर रहे थे, जिनसे कम समय और उपलब्ध संसाधनों में अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सके.
इस दौरान पंतनगर विश्वविद्यालय में भी कृषि अनुसंधान को विशेष महत्व दिया गया. गेहूं, धान, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी फसलों की उन्नत किस्मों को विकसित करने की दिशा में काम हुआ. विश्वविद्यालय के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग ने इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
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धीरे-धीरे विश्वविद्यालय के खेत केवल फसल उगाने की जगह नहीं रह गए, बल्कि वे नए प्रयोगों और संभावनाओं का केंद्र बन गए. यहां वैज्ञानिक बीजों की गुणवत्ता और फसल उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे.
इन प्रयासों का उद्देश्य केवल अनुसंधान पत्र प्रकाशित करना नहीं था, बल्कि ऐसी तकनीक और बीज तैयार करना था, जिनका वास्तविक लाभ किसान अपने खेतों में उठा सकें.
इसी क्रम में ‘पंतनगर बीज’ ने किसानों के बीच अपनी पहचान बनानी शुरू की. विश्वविद्यालय द्वारा विकसित उन्नत किस्मों और बीज उत्पादन के प्रयासों ने कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया.
एक ऐसा विश्वविद्यालय, जहां खेत ही बन गए प्रयोगशाला
पंतनगर विश्वविद्यालय की खासियत यह रही कि यहां शिक्षा को केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित नहीं रखा गया. विश्वविद्यालय ने शिक्षा, अनुसंधान और प्रसार (Extension) को एक-दूसरे से जोड़ने का प्रयास किया.
विद्यार्थियों को खेतों में जाकर फसलों को समझने, कृषि संबंधी समस्याओं को जानने और किसानों के साथ बातचीत करने के अवसर दिए गए. दूसरी ओर, वैज्ञानिक नई तकनीकों पर काम करते और प्रसार कार्यक्रमों के माध्यम से उन तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता.
इस तरह विश्वविद्यालय में ज्ञान केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे खेतों और गांवों तक पहुंचने लगा.
यही वह विशेषता थी, जिसने पंतनगर को कृषि शिक्षा के क्षेत्र में एक अलग पहचान दिलाई.
हरित क्रांति के अग्रदूत के रूप में पहचान
हरित क्रांति का प्रभाव धीरे-धीरे देश के खेतों में दिखाई देने लगा. उन्नत बीजों, सिंचाई सुविधाओं, उर्वरकों और वैज्ञानिक कृषि पद्धतियों के उपयोग से खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि होने लगी.
इस बड़े परिवर्तन में पंतनगर विश्वविद्यालय का योगदान भी उल्लेखनीय रहा. नोबेल पुरस्कार विजेता कृषि वैज्ञानिक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग ने विश्वविद्यालय को ‘Harbinger of Green Revolution’ अर्थात ‘हरित क्रांति का अग्रदूत’ कहा था.
यह संबोधन केवल विश्वविद्यालय के लिए सम्मान नहीं था, बल्कि उन सभी वैज्ञानिकों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और किसानों के प्रयासों की पहचान भी था, जिन्होंने मिलकर भारतीय कृषि को आगे बढ़ाने में योगदान दिया.
बीज से आत्मनिर्भरता तक का सफर
विश्वविद्यालय की इस यात्रा में वर्ष 1969 एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर आया. इसी वर्ष बीज उत्पादन और वितरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तराई विकास निगम की स्थापना की गई. इसका लक्ष्य विश्वविद्यालय में विकसित उन्नत बीजों को अधिक से अधिक किसानों तक पहुंचाना था.
समय के साथ पंतनगर बीज ने कृषि क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई. विश्वविद्यालय के अनुसंधान और बीज उत्पादन कार्यक्रमों ने किसानों को नई किस्मों और वैज्ञानिक कृषि तकनीकों से जुड़ने में सहायता की.
आज जब हम पंतनगर विश्वविद्यालय के विशाल कृषि फार्म, अनुसंधान केंद्र और शैक्षणिक संस्थान देखते हैं, तो इनके पीछे केवल वर्षों का विकास नहीं, बल्कि एक लंबा संघर्ष, मेहनत और दूरदर्शिता दिखाई देती है.
यह उस सपने की कहानी है, जिसमें भारत को कृषि के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की कल्पना की गई थी.
जिस धरती पर कभी आधुनिक कृषि शिक्षा की नींव रखी गई थी, उसी धरती ने ऐसे वैज्ञानिक, कृषि विशेषज्ञ और तकनीकें तैयार करने में योगदान दिया, जिन्होंने भारतीय खेती को नई दिशा दी.
आज पंतनगर की पहचान केवल देश के पहले कृषि विश्वविद्यालय के रूप में नहीं है, बल्कि उस संस्थान के रूप में भी है, जिसने हरित क्रांति के महत्वपूर्ण अध्याय को आकार देने में अपनी भूमिका निभाई.
क्योंकि पंतनगर की कहानी केवल एक विश्वविद्यालय की कहानी नहीं है. यह उन बीजों की कहानी है, जिन्होंने खेतों में नई उम्मीद जगाई; उन किसानों की कहानी है, जिन्होंने बदलाव को अपनाया; और उन वैज्ञानिकों की कहानी है, जिन्होंने भारत को खाद्य आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाने का सपना देखा.
पंतनगर विश्वविद्यालय: शिक्षा के आठ स्तंभ और हजारों सपनों का केंद्र
एक शैक्षणिक यात्रा : विद्यार्थियों, शिक्षकों, महाविद्यालयों और प्रवेश प्रक्रिया की कहानी
किसी भी विश्वविद्यालय की पहचान केवल उसकी बड़ी इमारतों, विशाल परिसर या उपलब्धियों से नहीं होती. उसकी असली पहचान वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों, उन्हें दिशा देने वाले शिक्षकों और उन अवसरों से बनती है, जो युवाओं को अपने सपने पूरे करने का मौका देते हैं.
उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले में स्थित गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर भी ऐसी ही एक पहचान रखता है. वर्ष 1960 में कृषि शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू हुआ यह संस्थान आज शिक्षा के कई क्षेत्रों में अपनी पहचान बना चुका है.
कभी जहां कृषि शिक्षा इसकी मुख्य पहचान हुआ करती थी, वहीं आज यहां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, पशु चिकित्सा, मत्स्य विज्ञान, सामुदायिक विज्ञान और प्रबंधन जैसे विषयों में भी विद्यार्थी अपना भविष्य संवार रहे हैं.
हजारों विद्यार्थियों से बना एक बड़ा शैक्षणिक परिवार
किसी विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पूंजी उसके विद्यार्थी होते हैं. हर साल अलग-अलग शहरों और राज्यों से युवा यहां अपने सपनों को लेकर आते हैं. कोई कृषि वैज्ञानिक बनना चाहता है, कोई इंजीनियर, तो कोई विज्ञान, प्रबंधन या सामुदायिक विकास के क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहता है.
अप्रैल 2026 में आयोजित विश्वविद्यालय के 37वें दीक्षांत समारोह में कुलपति द्वारा प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, वर्तमान में विश्वविद्यालय में लगभग 4,882 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं. अब तक विश्वविद्यालय 46,643 विद्यार्थियों को डिग्रियां प्रदान कर चुका है.
यह आंकड़ा केवल विद्यार्थियों की संख्या नहीं बताता, बल्कि उन हजारों युवाओं की यात्रा को भी दर्शाता है, जिन्होंने इस परिसर में रहकर सीखा, अपने कौशल को विकसित किया और अपने भविष्य की दिशा तय की.
इन विद्यार्थियों को पढ़ाने और अनुसंधान के कार्यों को आगे बढ़ाने में शिक्षकों और वैज्ञानिकों की महत्वपूर्ण भूमिका है. उपलब्ध सार्वजनिक संस्थागत विवरण के अनुसार, विश्वविद्यालय में शिक्षकों एवं अधिकारियों की संयुक्त संख्या 763 दर्ज है.
आठ महाविद्यालय, जहां मिलते हैं अलग-अलग क्षेत्रों में आगे बढ़ने के अवसर
समय के साथ विश्वविद्यालय का दायरा बढ़ता गया. आज यहां आठ प्रमुख महाविद्यालयों के माध्यम से अलग-अलग विषयों में शिक्षा प्रदान की जाती है.
इनमें कृषि महाविद्यालय, पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान महाविद्यालय, प्रौद्योगिकी महाविद्यालय, मूलभूत विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय, सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय, मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय, कृषि व्यवसाय प्रबंधन महाविद्यालय और स्नातकोत्तर अध्ययन महाविद्यालय शामिल हैं.
हर महाविद्यालय का अपना अलग महत्व है और प्रत्येक विद्यार्थियों को एक विशेष क्षेत्र में ज्ञान और कौशल प्राप्त करने का अवसर देता है.
कृषि महाविद्यालय में विद्यार्थी फसल उत्पादन, मृदा विज्ञान, उद्यान विज्ञान, पादप प्रजनन और कृषि प्रसार जैसे विषयों का अध्ययन करते हैं. यहां पढ़ाई के साथ-साथ खेतों और अनुसंधान केंद्रों में व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के अवसर भी मिलते हैं.
प्रौद्योगिकी महाविद्यालय उन विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण है, जो इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहते हैं. यहां सिविल, मैकेनिकल, कंप्यूटर, इलेक्ट्रिकल और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विषयों की पढ़ाई होती है. इस महाविद्यालय में कुल 11 विभाग हैं.
मूलभूत विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय में रसायन विज्ञान, भौतिक विज्ञान, गणित, पर्यावरण विज्ञान, जैव विज्ञान और माइक्रोबायोलॉजी जैसे विषयों के माध्यम से विद्यार्थियों को विज्ञान की विभिन्न शाखाओं से परिचित कराया जाता है.
वहीं, सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय की भूमिका थोड़ी अलग और विशेष है. यहां खाद्य एवं पोषण, मानव विकास, वस्त्र एवं परिधान तथा संसाधन प्रबंधन जैसे विषयों का अध्ययन कराया जाता है. इन विषयों का उद्देश्य केवल अकादमिक ज्ञान देना नहीं, बल्कि परिवारों और समुदायों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक कौशल विकसित करना भी है.
इसके अलावा पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान, मत्स्य विज्ञान और कृषि व्यवसाय प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में भी विद्यार्थियों को शिक्षा और अनुसंधान के अवसर मिलते हैं.
इस प्रकार आठों महाविद्यालय मिलकर विश्वविद्यालय को एक ऐसा शैक्षणिक केंद्र बनाते हैं, जहां अलग-अलग रुचियों और क्षमताओं वाले विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है.
आखिर कैसे बन सकते हैं पंतनगर विश्वविद्यालय का हिस्सा?
कई विद्यार्थियों के मन में यह सपना होता है कि वे पंतनगर विश्वविद्यालय में पढ़ाई करें. लेकिन इस सपने को पूरा करने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि यहां प्रवेश कैसे मिलता है और इसके लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनानी होती है.
विश्वविद्यालय में स्नातक (UG), स्नातकोत्तर (PG), एमसीए, एमबीए और पीएचडी जैसे विभिन्न पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं. हर पाठ्यक्रम के लिए शैक्षणिक योग्यता और प्रवेश प्रक्रिया अलग हो सकती है.
प्रवेश प्रक्रिया की शुरुआत विश्वविद्यालय द्वारा जारी प्रवेश सूचना और विवरणिका (Prospectus) से होती है. इच्छुक विद्यार्थियों को सबसे पहले अपनी पसंद के पाठ्यक्रम की पात्रता देखनी होती है. इसके बाद विश्वविद्यालय के आधिकारिक प्रवेश पोर्टल पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करना होता है.
अधिकांश स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के आधार पर चयन किया जाता है. वहीं, बीटेक के अधिकांश पाठ्यक्रमों में JEE Main के अंकों के आधार पर उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय द्वारा काउंसलिंग कराई जाती है.
पशु चिकित्सा पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए NEET और Veterinary Council of India की निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है.
एमबीए और एमबीए (एग्रीबिजनेस) में प्रवेश के लिए CAT, CMAT अथवा विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा के अंकों के साथ समूह चर्चा और साक्षात्कार के आधार पर चयन किया जाता है.
कुछ विशेष स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में GATE, GAT-B और ICAR की प्रवेश प्रक्रिया भी लागू होती है.
इसलिए आवेदन करने से पहले विद्यार्थियों के लिए संबंधित पाठ्यक्रम की नवीनतम प्रवेश विवरणिका पढ़ना जरूरी है, ताकि उन्हें पात्रता, परीक्षा और चयन प्रक्रिया की सही जानकारी मिल सके.
दूसरे राज्यों के विद्यार्थियों के लिए भी खुले हैं अवसर
पंतनगर विश्वविद्यालय की एक खास बात यह है कि यहां केवल उत्तराखंड के विद्यार्थी ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले विद्यार्थी भी प्रवेश के अवसर प्राप्त कर सकते हैं.
हालांकि, प्रवेश नियमों के अंतर्गत उत्तराखंड के मूल निवासी और अन्य राज्यों के विद्यार्थियों के लिए सीटों की अलग-अलग व्यवस्था की गई है.
विश्वविद्यालय की 2026–27 की प्रवेश नियमावली के अनुसार, उत्तराखंड के मूल निवासी विद्यार्थियों के लिए निर्धारित सीटों के साथ-साथ अन्य राज्यों के विद्यार्थियों के लिए स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर पेमेंट सीटों का प्रावधान है.
इसके अतिरिक्त, अन्य राज्यों के विद्यार्थी अपनी पात्रता के अनुसार ICAR की अखिल भारतीय प्रवेश प्रक्रिया के माध्यम से भी प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं. पशु चिकित्सा पाठ्यक्रम के लिए VCI की निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है.
इस तरह पंतनगर विश्वविद्यालय देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है.
आवेदन से प्रवेश तक: एक विद्यार्थी का सफर
विश्वविद्यालय में प्रवेश की प्रक्रिया को समझें तो इसकी शुरुआत विद्यार्थी की रुचि और सही पाठ्यक्रम के चुनाव से होती है.
सबसे पहले विद्यार्थी अपनी पसंद के पाठ्यक्रम की जानकारी प्राप्त करते हैं और उसकी शैक्षणिक पात्रता जांचते हैं. इसके बाद ऑनलाइन आवेदन किया जाता है, जिसमें आवश्यक दस्तावेज और निर्धारित आवेदन शुल्क जमा करना होता है.
आवेदन प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाती है. परीक्षा में प्राप्त अंकों और निर्धारित नियमों के आधार पर मेरिट सूची तैयार होती है.
इसके बाद काउंसलिंग की प्रक्रिया शुरू होती है. इसमें विद्यार्थियों को उनकी रैंक, श्रेणी, पात्रता और उपलब्ध सीटों के अनुसार महाविद्यालय एवं पाठ्यक्रम आवंटित किए जाते हैं.
दस्तावेजों का सत्यापन और प्रवेश शुल्क जमा करने के बाद विद्यार्थी आधिकारिक रूप से विश्वविद्यालय का हिस्सा बन जाते हैं. यहीं से उनकी एक नई शैक्षणिक यात्रा शुरू होती है.
वर्ष 2026–27 के लिए विश्वविद्यालय ने ऑनलाइन आवेदन 23 मार्च से 30 अप्रैल 2026 तक आमंत्रित किए थे. स्नातकोत्तर एवं पीएचडी की प्रवेश परीक्षा 6 जून तथा स्नातक एवं एमसीए की प्रवेश परीक्षा 7 जून 2026 को आयोजित की गई थी.
यहां पढ़ाई केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रहती
पंतनगर विश्वविद्यालय की शिक्षा व्यवस्था की एक विशेष बात यह है कि यहां विद्यार्थियों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने पर भी जोर दिया जाता है.
कृषि के विद्यार्थी खेतों और अनुसंधान केंद्रों में काम करते हैं, इंजीनियरिंग के विद्यार्थी तकनीकी प्रयोगों से जुड़ते हैं और सामुदायिक विज्ञान के विद्यार्थी परिवारों तथा ग्रामीण समुदायों के बीच जाकर उनकी वास्तविक आवश्यकताओं को समझने का अवसर प्राप्त करते हैं.
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प्रयोगशालाएं, कृषि फार्म, अनुसंधान केंद्र और ग्रामीण क्षेत्र विद्यार्थियों के लिए सीखने के महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं.
इस अनुभव से विद्यार्थियों को यह समझने में मदद मिलती है कि कक्षा में सीखा गया ज्ञान वास्तविक जीवन में किस तरह उपयोगी हो सकता है.
यही अनुभव उन्हें केवल परीक्षा पास करने तक सीमित नहीं रखता, बल्कि भविष्य में अपने कार्यक्षेत्र की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी तैयार करता है.
एक विश्वविद्यालय, जहां हर साल नई कहानियां लिखी जाती हैं
आज लगभग 4,882 विद्यार्थियों, आठ प्रमुख महाविद्यालयों और अनेक विभागों के साथ पंतनगर विश्वविद्यालय शिक्षा, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में अपनी यात्रा आगे बढ़ा रहा है.
वर्षों पहले जिस संस्थान की स्थापना कृषि शिक्षा और अनुसंधान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी, वह आज शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में विद्यार्थियों को आगे बढ़ने का अवसर दे रहा है.
इस परिसर में आने वाला हर विद्यार्थी अपने साथ एक सपना लेकर आता है. कोई अपने गांव और किसानों के लिए कुछ करना चाहता है, कोई नई तकनीक विकसित करना चाहता है, तो कोई समाज और समुदाय के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की इच्छा रखता है.
शायद यही किसी भी विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है— केवल डिग्रियां देना नहीं, बल्कि युवाओं को सोचने, सीखने और कुछ नया करने का अवसर देना.
पंतनगर विश्वविद्यालय की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. यह उन हजारों विद्यार्थियों की कहानी है, जो यहां अपने सपनों को दिशा देने आते हैं; उन शिक्षकों की कहानी है, जो उन्हें आगे बढ़ने का रास्ता दिखाते हैं; और उन आठ महाविद्यालयों की कहानी है, जो ज्ञान के अलग-अलग क्षेत्रों को एक ही परिसर में जोड़ते हैं.
क्योंकि पंतनगर में केवल शिक्षा नहीं दी जाती, यहां हर साल हजारों विद्यार्थी अपने भविष्य की एक नई कहानी लिखना शुरू करते हैं. (Pantnagar University Green Revolution)
मूल रूप से बिहार की रहने वाली अन्नु कुमारी जी. बी. पंत विश्वद्यालय, पंतनगर में कॉलेज ऑफ कम्युनिटी साइंस, डिपार्टमेंट ऑफ एक्सटेंशन एजुकेशन एंड कम्युनिकेशन की छात्रा है. फ़िलहाल अन्नु अपनी शिक्षा-दीक्षा के सिलसिले में ‘काफल ट्री’ के लिए इंटर्नशिप कर रही है.
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