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दिवाली के मौके पर गाँव में बिताए पुराने पलों की याद

छूट जाता है सब-कुछ

छूट जाता है सब-कुछ, पर घर छूटता नहीं… इस बात पर मुझे बेपनाह यकीन था. इस यकीन के कायम होने के पीछे कई कारण थे. हर त्योहार पर सब का हर हाल में घर पहुंच जाना इसे सब से ज्यादा खूबसूरत बनाता था. पिथौरागढ़ से देवलथल तक जीप में लटककर पहुंचना, जाजरदेवल तक पैदल चल कर भी घर पहुँचना. 22 किमी का सफ़र पूरा करने में ही पसीने छूट जाते थे. लेकिन यह किसी हवाई यात्रा से भी बहुत ज्यादा सुखद था. क्योंकि इसके बाद मैं, पापा, मम्मी और ददा कई दिनों बाद साथ खाना खाते थे. आज कितने परिवार रोज़ साथ खाना खाते होंगे, इस का मुझे बहुत अंदाज़ा तो नहीं, लेकिन ये बेहद सुखद लम्हा हर किसी के नसीब में नहीं होता. मैंने इसे जीया है, इस लिए चाहता हूं हर इंसान के हिस्से ये पल आए. (A memoir about Diwali in a village in Uttarakhand)

​आज त्योहारों पर धक्के खा रहे यात्रियों पर जब भी ख़बर बनाता हूँ, तब महसूस करता हूँ— अखबार के लिए ये धक्के हो सकते हैं लेकिन इस भीड़ को चीरते हुए, जीप में, रोडवेज बस में या किसी से लिफ्ट ले कर परिवार के पास पहुंच जाने की खुशी से बड़ी कोई लीड ख़बर नहीं हो सकती.

बहुत पुरानी बात तो नहीं, पर वह वक्त था जब ऋग्वेद का प्रसिद्ध वाक्य ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ केवल एक विचार नहीं, जीने का तरीका था. आज की तरह दिवाली के दिन आर्थिक रूप से विपन्न लोगों को देख कर दिल दुखी नहीं होता था, क्योंकि तब त्योहार बाज़ार के हाथों पूरी तरह बिके नहीं थे. इसलिए सब लगभग एक ही तरीके से दिवाली-होली मनाते थे. हालांकि इस के पीछे गाँव की पृष्ठभूमि की मुख्य भूमिका भी थी, लेकिन वहाँ की दिवाली हर घर के कोने तक कुछ-न-कुछ तो पहुंचाती ही थी. शहरों की तरह आकर्षक उपहार देने का वहां चलन नहीं था, लेकिन छोटे से कटोरे में खिले-बताशे और खिलौने हर पड़ोसी के यहां पहुंचाए जाते थे. कई बार शिकार और रायता भी इस में शामिल होता था. मिठाई के कुछ टुकड़े भी मुझे याद हैं.

शिकार को यहां मटन करी जैसे तमाम नामों से जाना जाता है. मैं आज तक शहर में मिलने वाले ‘शिकार’ के बदले हुए नामों को याद नहीं कर पाया और न ही देवलथल में पड़ोस से मिलने वाले झोल में तैरते टुकड़ों को ही भूल पाया हूँ. ​अब तरह-तरह की मिठाइयां आ गई हैं, लेकिन खिले-बताशों के साथ आने वाले खिलानों का स्वाद मुझे किसी मिठाई में नहीं मिला. अब शरीरों में भी वह दम नहीं कि हर मिठाई खाई जाए. आज मिठाई के डिब्बे से भी एक टुकड़ा चुन कर खाता हूं, जबकि डिब्बे में तमाम गारंटी के दावे लिखे होते हैं. देवलथल में बोरों और कट्टों में खिले-बताशे के बीच खिलौने खोजने की मिठास इन मिठाई के डिब्बों में नहीं है.

त्योहारों पर बड़ी-बड़ी दावतें वहाँ नहीं होती थीं. गेट-टू-गेदर के नाम पर कमेट (सफेद मिट्टी) और गेरू (लाल मिट्टी) खोदने के लिए जाते थे. यहीं किसी फौजी भाई की कृपा से पार्टी हो जाया करती थी. ‘ओल्ड मॉन्क’ से मेरी पहली मुलाकात ऐसी ही दावतों में हुई थी. ओल्ड मॉन्क तो अलविदा हो गई, लेकिन कमेट और गेरू की खुशबू आज भी मेरे नथुनों में अपनी जगह बनाए हुए है.

​एक खास चीज़ और थी— बाब्यौ उर्फ़ बाबिल (एक प्रकार की घास) का झाड़ू. मैं और मेरा भाई दिवाली से कई दिन पहले अपने घर को पोतने लगते थे. एक दिन पहले कमेट भिगोते थे, फिर दूसरे दिन बाब्यौ के झाड़ू से पूरा घर पोतते थे. दीवार पर इसकी छपाक से, क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम के तहत, कमेट के छींटों से पूरे कपड़े सफेद हो जाते थे. चेहरे तक पर कमेट की जो रौनक बिखरती, वह पूरी दिवाली चमकती थी. बाद में डिस्टेंपर ने यह रौनक लूट ली. सफेद की जगह मनचाहे अतरंगी रंगों ने ले ली, लेकिन मन कभी कमेट की तरह बेदाग नहीं हुआ. गेरू का इस्तेमाल माँ पूरा घर लीपने के लिए करती थी. दरवाज़े पर ऐपण बनते, भीतर मंदिर तक लक्ष्मी के ऐसे खूबसूरत पैर माँ बनाती कि लगता— अब तो लक्ष्मी को आना ही पड़ेगा.

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इस के बाद सीमेंट के घर आए और माँ के बनाए लक्ष्मी के पैरों की जगह स्टिकर आने लगे, जिन्हें चिपका कर दिवाली मनाई जाने लगी. लेकिन कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि ये स्टिकर लक्ष्मी को खींच ही लेंगे. इस ने दिवाली में माँ की भूमिका को भी सीमित कर दिया जो मुझे कभी अच्छा नहीं लगा.

​आतिशबाजी मेरे और मेरे पहाड़ के लिए शायद कभी दिवाली का बहुत बड़ा आकर्षण नहीं रही. इसकी एंट्री मुर्गाछाप सुतली बम, हथगोले टाइप पटाखों और कुछ कागज़ की मालाओं के रूप में हमारे मिट्टी के घरों में हुई. तब ये भी बेगाने लगते थे, लेकिन आज इनको देखते ही अपनापन सा लगता है. क्योंकि इन से मेरा तब का नाता है जब मैं अपने गाँव में रहता था. गाँव छूटने के बाद मैंने नया ठिकाना बनाने की कोशिश की लेकिन मैं वहां भी नहीं रुक पाया. आज मैं एक शहर में दिवाली मना रहा हूं. आज मुझे यकीन हो गया— छूट जाता है सबकुछ और रह जाती हैं केवल यादें… हैप्पी दिवाली. (A memoir about Diwali in a village in Uttarakhand)

राजीव पांडे की फेसबुक वाल से साभार. राजीव दैनिक हिन्दुस्तान, के उत्तराखण्ड सम्पादक  हैं.

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Sudhir Kumar

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