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सागर से शिखर तक : स्वामी मन्मथन

पिछली कड़ी : बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

गढ़वाल में सामाजिक सुधार व चेतना जाग्रत करने में स्वामी मन्मथन का योगदान नवोत्थान के स्वरूप में याद किया जाता है. उन्होंने आम जन में परम्परा से चली आ रही जातिगत रूढ़ियों, संकीर्णताओं व अन्धविश्वास के कुचक्र को खंडित करने के प्रभावी प्रयास किए. सामाजिक व धार्मिक मंचों के माध्यम से जनजागरण किया व शिक्षा के प्रति अभिरूचि जगाई. उच्च स्तर के संकाय स्थापित करने में प्रबल योगदान दिया. सामाजिक आंदोलन, वैचारिक निर्माण और पहाड़ की अर्थव्यवस्था के अंर्तसंबंध पर गढ़वाल में उनका सामाजिक आधार उतना ही पुष्ट रहा जैसा कुमाऊं में बद्रीदत्त पांडे व इन्द्र सिंह नयाल के समय विकसित हुआ था.

राहुल संस्कृत्यायन ने हिमालयी समाज और संस्कृति व शिवप्रसाद डबराल ने गढ़वाल का विस्तृत इतिहास रच क्षेत्रीय अस्मिता का ऐतिहासिक आधार रच दिया था. वहीं पत्रकारिता ने स्थानीय मुद्दों को उठाया तथा पर्यावरण व विकास के असमंजस को दिशा दी. वन संरक्षण, स्थानीय अधिकार और विकास की विसंगतियों से गढ़वाल में पर्यावरण आंदोलन की नींव पड़ी. चिपको आंदोलन ने क्षेत्रीयता को पारिस्थितिकी आयाम दिया जो कुमाऊं में कम स्पष्ट था.गढ़वाल में जैव क्षेत्रवाद का दृष्टिकोण उभरा जो किसी राजनीतिक या प्रशासनिक सीमा के बजाय प्राकृतिक, सांस्कृतिक व पारिस्थितिकी तंत्र की सीमाओं पर आधारित रहा. गढ़वाल का विकास कुमाऊं से इस अर्थ में भिन्न था कि यहाँ भौगोलिक दुर्गमता अधिक थी, प्रशासनिक पहुँच सीमित थी व प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता अधिक थी जिससे यहाँ पर्यावरण केंद्रित समाज विकसित हुआ.पर्यावरणीय क्षेत्रवाद में चिपको आंदोलन इस कारण महत्वपूर्ण रहा कि उसने जंगल को जीवन का आधार माना व संसाधनों के शोषण पर चल रहे विकास प्रारूपों की विसंगतियाँ प्रकट कर स्थानीय अधिकारों की मांग की.

स्वामी मन्मथन को “सागर से शिखर तक” परिवर्तन की लहर फैलाने वाला चिंतक कहा जाता है. उनका जन्म 18 जून 1939 को केरल में हुआ. उनका पूरा नाम उदय मंगलमचंद्र शेखरन मन्मथन था. उनके पिता शिक्षक थे. अपने बचपन से ही उन्होंने अपने परिवेश में व्याप्त छुआछूत, असमानता, अन्धविश्वास व कमजोर वर्ग के अमानवीय शोषण की दशाओं को महसूस किया. उनके शिक्षित परिवार की भावना भी ऐसी समस्याओं व विसंगतियों से विचलित रही. इनके निराकरण के लिए किशोरावस्था तक आते आते वह समाधान की सोच व जागरण के विकल्प खोजने लगे. अपने लिए उन्होंने ऐसा पथ अनुकूल पाया जिसमें निरन्तर चलते उनके अनुभव समृद्ध हों. उन्हें यह बोध हो कि विषमता के स्तर को परिसीमित करने के लिए विचार और कर्म का कौन सा संतुलन.समाज से जुड़ी समस्याओं का समाधान देता है.उनके अंतर्मन की छटपटाहट समाज में व्याप्त असमानता से थी.

केरल से निकल वह बंगाल पहुंचे जो संस्कृति व दर्शन की दृष्टि से समृद्ध था. अपनी ज्ञान पिपासा व शोध के अनुकूल यहाँ के परिवेश में उन्होंने आत्म साक्षात्कार की सम्भावनाएं पाईं. वह रामकृष्ण मिशन पहुंचे और स्वामी विवेकानंद के दर्शन को आत्मसात किया. फिर पाँडिचेरी आ महर्षि अरविन्द के दर्शन से प्रभावित हुए. इसी क्रम में वह नागालैंड पहुंचे जहाँ कुरीतियों के विरोध में उनके स्वर उग्र हुए.पर उनकी बात स्थानीय समझे नहीं. 1964 से उनकी हिमालय यात्राएं आरम्भ हुईं जिनने अनुभव सिद्ध अवलोकन से लोक कल्याण का नवीन अध्याय रचना था. वह हरिद्वार पहुंचे और फिर बिजनौर की विदुर कुटी में रहते उन्होंने गरीब व छोटी जात के बच्चोँ को साफ सफाई से रहना और लिखाना पढ़ाना आरम्भ किया. उनके ये काम विदुर आश्रम के संचालकों को पसंद न आए.उन्होंने यह स्थान भी छोड़ा और गुरदीप बक्शी के फार्म में रह निराश्रित बच्चोँ व महिलाओं को अपने बूते जीवन यापन का हौसला देने लगे. तभी नूरपुर और चांदपुर के बीच उन्होंने एक प्राइमरी पाठशाला खोली. इसी बीच चीन के अचानक आक्रमण करने से लोगों के सामने कई समस्याएं आने लगीं. खाद्यान्न की चोर बाजारी बढ़ी. अनाज का अभाव पड़ गया. उन्होंने जरूरतमंद लोगों तक अन्न पहुँचाने की संगठन योग्यता दिखाई.

कुमाऊं में वह अल्मोड़ा भी आए. 1965 में उन्होंने बिजनौर छोड़ दिया और ऋषिकेश पहुँच गये. यहाँ से गढ़वाल के शिखरों तक जाने का क्रम बना. जब वह चंद्र बदनी गये तो वहां के पूजा स्थलों में पशु बलि से आहत हो गये. यह मंदिरों की परम्परा थी जो सदियों से चली आ रही थी.लोग भी अड़े रहे कि बलि का रिवाज़ तो वह छोडेंगे नहीं. तब स्वामी जी ने कहा कि पहले मुझे काटो फिर इन निरीह जानवरों की गर्दन पर खुकरी चलाना. उनकी अडिग रहने की भावना देख स्थानीय औरतें उनकी तरफ आने लगीं. चार साल तक हुए इस विरोध व महिलाओं के व्यापक जनसमर्थन से आखिरकार उन्हें सफलता मिली. 1969 में गाँधी शताब्दी के साल से चंद्रबदनी में बलि प्रथा पर रोक लगी. उसके बाद कड़ाकोट पट्टी के क्षेत्रपाल मंदिर में उन्होंने रोक लगाई व कुंजा पुरी में भी. सिद्धपीठ चंद्रबदनी से आरम्भ पशुबलि विरोध के पीछे निरीह जानवरों की हत्या के साथ उनका तर्क रहा कि गरीब पहाड़ के परिवारों पर चली आ रही यह परिपाटी आर्थिक बोझ डालती है तो अन्धविश्वास को बढ़ावा देती रही है. उनका यह धार्मिक -सामाजिक सुधार अभियान स्थानीय महिलाओं की एकजुटता व व्यापक समर्थन से सफल हुआ. टिहरी गढ़वाल से करीब पचास किलोमीटर दूर अंजनी सैण में टिकने का गांववासियों का अनुरोध उन्होंने मात्र इस वचन पर स्वीकार किया कि मंदिरों में खून नहीं बहेगा और इसके लिए ग्राम समूह एकमत हो आंदोलन चलाएगा. इसके बाद उन्होने सिलकोट चाय बागान आंदोलन व बंठा आंदोलन की भी अगुवाई की.

1970 के दशक के आरम्भ से गढ़वाल विश्वविद्यालय बनाने के लिए लोग प्रयास करने लगे थे. 1971 में स्वामी मन्मथन ने उत्तराखंड विश्वविद्यालय संघर्ष समिति का गठन किया जिससे आंदोलन उभरा. दो साल तक चला उनका अनशन धरना सफल रहा व 1972 में विश्वविद्यालय की स्थापना को सरकार सहमत हुई. 1975 तक स्वामी जी अपने सामाजिक कार्यों की रुपरेखा स्पष्ट कर चुके थे.आपातकाल में उनके विद्रोही तेवर देखते मीसा में उनको नजरबंद किया गया.. गढ़वाल विश्वविद्यालय स्थापना के बाद उनकी छवि सार्थक कार्यों के अग्रदूत की बनने लगी. लोग अपने इलाके के प्रति उनकी कर्त्तव्यनिष्ट भावना को समझ गये थे. सामाजिक परिवर्तन के उत्कर्ष की शुरुवात हो चुकी थी. 1977 में मेजर हरिशंकर जोशी ने उन्हें दस एकड़ जमीन अंजनी सैण में दी. 23 सितंबर 1978 को ” श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम अंजनी सैण, टिहरी गढ़वाल” के नाम से पंजीकृत संस्था बनी. तब यह भूमि पथरीली व झाड़ झंकाड़ से भरी कंटीली थी जिसे आश्रम के लायक बना सामाजिक सांस्कृतिक व शिक्षा के नव केंद्र के रूप में स्थापित करने की योजना बनी जहां पहाड़ में उभर रही समस्याओं व विसंगतियों के समाधान का मार्ग प्रशस्त हो. गोष्ठी संवाद व विचार – विमर्श का क्रम जारी रहे. महिलाओं का सशक्तीकरण, पर्वतीय जनजीवन में उनकी सबल व सार्थक भूमिका व गुणवत्तायुक्त कामकाज व शिक्षा के अवसर जुटें. 

स्वामी मन्मथन नारी शक्ति के विराट स्वरूप को जानते थे और यह भी कि उनकी अपार क्षमताएं किस तनाव-दबाव व कसाव से जूझ रहीं हैं. सबसे पहले तो उन्होंने अनाथ बच्चों व निराश्रित महिलाओं की समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्हें आश्रय दिया. फिर उनके जीविका अर्जन के लिए रोजगार परक अध्यवसाय का प्रशिक्षण दिया जिससे उन्हें आमदनी हो. इसी क्रम में महिला मंगल दल बने और बच्चों के लिए बालवाड़ी. स्थानीय खेती व पशुपालन को प्राथमिकता मिली. श्री भुवनेश्वरी आश्रम का स्वैच्छिक व गैर राजनीतिक संस्था के रूप में निरंतर विस्तार हुआ. श्रीनगर में उफल्टा, पौड़ी में खाड़यो सैंण, रुद्रप्रयाग में गुप्त काशी, चमोली में घाट व गैर सैण व टिहरी में चंद्रबदनी में संस्था के उपकेंद्र खुले.

महिलाओं की भागीदारी से पहाड़ के खुशहाल जीवन का सपना साकार करते उन्होंने बच्चों व सामाजिक समुदायों को श्रृंखला बद्ध किया और ऐसे समाज का सृजन करना चाहा जहाँ हर बच्चा भावी प्रगति के अवसर पा सके. खुश बच्चे ही परिवार को खुश रखेंगे जिससे समुदाय को कल्याण की भावना से जोड़ा जा सकेगा. इस प्राथमिकता पर चल उन्होंने अनाथ बच्चों व निराश्रित महिलाओं को अपने आश्रम में आश्रय दिया. गांव की औरतों को एकजुट कर उनमें सामाजिक नेतृत्व की भावना का अंकुरण किया. उनके स्वास्थ्य, शिक्षा व प्रशिक्षण के प्रबंध किए. ग्रामीण विकास व स्वावलम्बन की सीख दी. जन कल्याण का व्यावहारिक उदाहरण बनते उनके प्रयासों व लोगों के सहयोग समन्वय से यह संस्था सक्रिय सामाजिक संगठन में रूपांतरित होने लगी.

स्थानीय समुदाय के साथ काम करते उन्होंने पारिस्थितिकी व पर्यावरण से संबंधित कई समस्यायों के समाधान के लिए आंदोलन जारी रखे. जंगलों में अवैध कटान और वन भूमि के अधिग्रहण के विरुद्ध अभियान चलाया. जल जंगल व प्राकृतिक सम्पदा को बनाए बचाए रखने के लिए स्थानीय ग्रामवासियों को संगठित किया. उनकी आवाज चिपको आंदोलन की पर्यावरण चेतना में मुखर रही.सामाजिक अन्याय व भृष्ट प्रशासन के विरुद्ध वह हमेशा रहे. आपात काल में उन्होंने कारावास भी भुगता. उन्होंने सामाजिक कुरीतियों व अन्धविश्वास की परिपाटी खंडित करने के लिए आस्था और अनासक्ति की राह प्रशस्त की. भुवनेश्वरी महिला आश्रम के माध्यम से उन्होंने नारी सशक्तिकरण व समुदाय आधारित विकास पर आधारित पहाड़ी इलाकों के विकास का वैकल्पिक प्रारूप प्रस्तुत किया. वह ऐसे समाज सुधारक के रूप में उभरे जिन्होंने धर्म,समाज संस्कृति व आर्थिक संवृद्धि के संयोजन से ग्रामीण समुदाय में विकास की दूसरी लहर उत्पन्न कर दी.ठीक इसी समय पश्चिम में सूचना क्रांति के साथ तीव्र सामाजिक बदलावों पर एलविन टोफलर की पुस्तक “फ्यूचर शॉक (1970)व थर्ड वेव (1980) धूम मचा रहीं थी. वहीँ हिमालय में स्वामी मन्मथन ने धर्म, समाज और आर्थिक संवृद्धि को श्रृंखला बद्ध करते आंचलिक विकास का एक नया सोपान रख दिया जो जन सहयोग पर आधारित था. इसकी लहर स्वावलम्बन थी. पर्यावरण के प्रति संवेदन शील रहते पहाड़ी समाज को जल, जमीन और जंगल की लूट के प्रति सावधान करती संसाधनों के संरक्षण का पाठ पढ़ाती थी. जंगलों की कटाई व सरकार व ठेकेदार की मिलीभगत के विरोध में लोग संगठित हुए. प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदाय का हक- हकूक पाने की ललक जगी और पारिस्थितिकी विकास की शर्त बनी. उनकी यह दृष्टि उत्तराखंड के पर्यावरण आंदोलनों की प्रेरणा बनी.

स्वामी मन्मथन ने पाया कि समर्थ होने के बावजूद पहाड़ इसलिए पीछे रह जाता है क्योंकि यहाँ लिखाई -पढ़ाई व स्थानीय रोजगार की कमी है. बावजूद इसके पहाड़ी जहाँ गया उसने अपनी निष्ठा और अध्यवसाय से इलाके का नाम रोशन किया. इस बात को ध्यान में रखते उन्होंने युवा शक्ति को सामाजिक कार्य से जोड़ा, स्थानीय नेतृत्व तैयार किया. ग्रामीण शिक्षा व प्रशिक्षण कार्यों का अनवरत सिलसिला बनाया. जन भागीदारी पर आधारित इस सोच से पुष्पित-पल्लवित जन आंदोलनों से यह धारणा संपुष्ट हुई कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान केवल सरकार नहीं बल्कि संगठित हो कर जनता कर सकती है.

1970 के दशक से उत्तराखंड में अपनी जमीन, जल व जंगल को बनाए-बचाए रखने कर सिलसिला शुरू हुआ उसमें पहाड़ की औरतों के साहस और एकनिष्ठ हो कर जंगल बचाने की सौगंध से यह परंपरागत विचार सपुष्ट हुआ कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं है वह तो पहाड़ के जीवन, जल और जीवन का आधार है. स्वामी मन्मथन कहते थे कि जंगल और प्राकृतिक संसाधन स्थानीय समाज की संपत्ति हैं. इसलिए इन पर आधारित विकास की जो भी परियोजनाएं चलें उनमें स्थानीय समुदाय की प्रबल भागीदारी रहे. प्रकृति का संरक्षण ही सामाजिक न्याय है. इस आधार पर उनके विचार चिपको आंदोलन की सामुदायिक पर्यावरण रणनीति से मिलते हैं. चिपको आंदोलन का विचार महिलाओं के दृढ़ संकल्प, गांव गांव से जुट गये लोगों के जत्थे और अपनी थात को बनाए बचाए रखने से फला फूला था. गौरा देवी के साथ चंडी प्रसाद भट्ट, सुन्दर लाल बहुगुणा, धूम सिंह राणा व गढ़वाल की हर पट्टी हर तोक से उभर आई ऊर्जा का प्रवाह तरंगित हुआ जिसने यह सिद्ध कर दिया कि समुदाय व समाज जब अपनी विरासत को बचाने के लिए संगठित हो जाता है तो अकल्पनीय कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं. स्वामी मन्मथन की धारणा भी यही थी जिसके द्वारा उन्होंने सदियों से चली आ रही सामाजिक कुरीतियों व अंध विश्वास को खंडित किया. पशु बलि का अंततः समापन हो गया.

स्वामी जी मानते थे कि पहाड़ के पिछड़ेपन का कारक उसकी विकट भौगोलिक संरचना नहीं बल्कि सरकार द्वारा की गई नीतिगत उपेक्षा है.इसलिए उन्होंने पहाड़ में उच्च शिक्षा के उन्नयन, स्थानीय विद्यार्थियों की सुविधा व अवसर व क्षेत्रीय नेतृत्व के विकास के लिए विश्वविद्यालय की स्थापना को सर्वाधिक महत्व दिया. उनकी यह सोच तदन्तर उत्तराखंड राज्य की मांग का वैचारिक आधार बनी.उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से राज्य आंदोलन का नेतृत्व नहीं किया पर उनका प्रयास अंचल की उस चेतना को प्रवाहमय बनाने में उभरा जो स्थानीय संसाधनों पर ग्रामवासियों के अधिकार, शिक्षा, सामाजिक प्रगति व जन सहयोगी आधारित शासन पर अवलंबित था.

स्वामी मन्मथन धार्मिक -सामाजिक कुरीतियों को खंडित करते हुए ग्राम के विकास का आधार बनाना चाहते थे. उनका अनुभव सिद्ध अवलोकन रहा कि पहाड़ की समस्याओं की जड़ सामाजिक कुरीतियाँ,अलगाव और ज्ञान की कमी है. इसीलिए उन्होंने सामाजिक सुधार, महिला संगठन और नैतिक मूल्यों को प्राथमिकता दी.सूक्ष्म स्तर पर सामुदायिक चेतना और जनसंगठन की परम्परा को सुद्रढ़ करते हुए उन्होंने व्यापक स्तर पर बड़े आंदोलन का समर्थन किया.

स्वामी मन्मथन सामाजिक सुधार आंदोलन के सूत्रधार रहे. उन्होंने महिला संगठन बनाए व गाँव – गांव नैतिक मूल्यों व सांस्कृतिक परिवर्तनों के अनवरत सिलसिले को स्थापित करते चले. समाज के सुधार व गांव वालों की गाँव व इलाके की संवृद्धि की आकांक्षा से चेतना उत्पन्न करना उनका इष्ट बना. इसी समय सुन्दरलाल बहुगुणा पदयात्रा करते हुए राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहाड़ के पर्यावरण के मुद्दों को उठा रहे थे. वह विकास की पश्चिमी विचारधारा का विरोध करते हुए नैतिकता व गांधीवादी दर्शन से प्रभावित थे.उन्होंने विकास नीति को प्राकृतिक संसाधनों के विनिष्ट होने का कारक बताते हुए कहा कि पहाड़ का विकास तो केवल तब सम्भव होगा जब प्रकृति के संतुलन को बनाए बचाये रखने पर ध्यान दिया जाए. चंडी प्रसाद भट्ट संगठन निर्माण व ग्राम विकास, सहकारी संस्थाओं व स्थानीय साधनों पर आधारित रोजगार को महत्त्व देते थे. उनकी मान्यता थी कि वनों का संरक्षण केवल तब संभव है जब उससे स्थानीय रोजगार व ग्राम उद्योग विकसित हों अर्थात वन आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था बने.वह स्थानीय संसाधनों पर आधारित आर्थिक गतिविधियों के पक्षधर रहे.स्वामी मन्मथन ने सामाजिक संगठन व नैतिक चेतना से पहाड़ की उन्नति चाही. उत्तराखंड के इतिहास में उन्होंने सामाजिक सुधार का अनूठा अध्याय लिख दिया जो सुन्दर लाल बहुगुणा के पर्यावरण आंदोलन व चंडी प्रसाद भट्ट की स्थानीय आर्थिकी व ग्राम विकास की धारा से पुष्ट हो गौरा देवी के पेड़ों से चिपक ठेकेदारों की हेकड़ी व शासन की उदासीनता से परे जा उनकी रक्षा करने के अटूट साहस का सन्देश बनी.यह ऐसी भाव भूमि थी जिसने भविष्य के आंदोलनों व प्रथक राज्य की मांग को उत्प्रेरित किया.

उत्तराखंड के सामाजिक व पर्यावरण आंदोलनों की निशानियां वस्तुतः ब्रिटिश राज में हुए बंदोबस्त व लागू कठोर वन नीतियों में निहित हैं जिसने हक – हकूक की बलि चढ़ा पहाड़ की स्वनिर्भर अर्थ व्यवस्था को छिन्न भिन्न करने में कोई कसर न छोड़ी. ब्रिटिश राज ने वनों को मुख्यतः राजस्व व युवा शक्ति को सामरिक संसाधन के रूप में देखा.सन 1865,1878व 1927 के वन अधिनियमों ने स्थानीय गाँव वासियों के पारम्परिक हक – हुकूक सीमित कर दिए.ब्रिटिश काल में ही वन नीतियों के विरुद्ध जन आंदोलन हुए जिनमें 1930 का सत्याग्रह मुख्य था. गांव वासी जंगलों में घुस गये. उन पर लगी रोक -टोक की रोक -थाम के साथ चूल्हे के लिए ईंधन व पशुओं के लिए चारा उपलब्ध होने के अधिकार की लड़ाई शुरू की. यह वन नीति के खिलाफ पहला संगठित जन प्रतिरोध था.

 ब्रिटिश राज समाप्त होने के बाद भी सरकार लकड़ी के दोहन, विकास परियोजनाओं व स्थानीय समाज से बाहर के ठेकेदारों को लकड़ी का ठेका देने की नीति पर चलती रही ग्राम वासियों के हक -हुकूक की उपेक्षा होती रही. ग्रामीण समाज को संगठित करने के क्रम में महिला संगठनों के निर्माण सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध जन जागरूकता व पर्यावरण व समाज के अंतरसम्बन्ध की भावना को स्वामी मन्मथन ने अपने आंदोलन का आधार बनाया.

स्वामी मन्मथन ने अनुभव किया कि हिमालय को मात्र साधुओं की तपोभूमि कह इसकी संवृद्धि नहीं होगी इसे तो सामाजिक पुर्ननिर्माण की कर्मभूमि बनाना होगा. केरल से शुरू हिमालय तक की अपनी यात्रा में गढ़वाल पहुँच अंजनीसैण में भुवनेश्वरी महिला आश्रम की स्थापना से महिला शिक्षा केंद्र, ग्रामीण विकास का प्रशिक्षण केंद्र व जन आंदोलनों का संवाद केंद्र स्थापित हुआ. उनके व्यक्तित्व में केरल का प्रभाव था जो भारत के सबसे सक्रिय समाज सुधार आंदोलनों की भूमि रही थी. वहां श्री नारायण गुरु ने जाति विरोधी आंदोलन चलाया था. केरल में शिक्षा सामाजिक समानता, महिलाओं की सबल भूमिका के साथ सांस्कृतिक विविधता की सुद्रढ़ परंपरा थी जिसके बीच उन्होंने अपनी किशोरावस्था का जीवन बिताया था.अपने जीवन को निरन्तर भ्रमण व आध्यात्मिक ऊर्जा से सम्पुटित करते हिमालय प्रवास के बाद गढ़वाल को कार्यस्थल बनाते यहाँ के ग्रामीण समाज व प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को उन्होंने परिस्थितिकीय न्याय का संबल बना डाला. अपने सादगी भरे जीवन के साथ स्वावलम्बन के साथ उन्होंने ग्राम स्वराज्य का आधार बनाया. सामाजिक कुरीतियों व अन्धविश्वास की रूढ़ परम्परा को खंडित करने के लिए महिला संगठन बनाए, स्थानीय नेतृत्व को सबल किया. युवा वर्ग की सुविधा व अवसर प्राप्ति के लिए उच्च स्तर की व्यावहारिक शिक्षा व ज्ञान हेतु विश्वविद्यालय की स्थापना में अपनी ऊर्जा लगाई. गढ़वाल को उनकी उपस्थिति व अनवरत दिशा निर्देश से नैतिक अर्थतंत्र, पारिस्थितिकी व क्षेत्रीय न्याय प्राप्त करने का आधार मिला. उत्तराखंड में नैतिक राजनीति व ग्राम स्वराज्य की लहर चली जिसके भीतर यह विश्वास पनपा कि गाँव विकास की मूल इकाई है. यहाँ प्रकृति से छेड़छाड़ व बेहिसाब दोहन इसे अपूर्णताओं के दंश देगा. इसकी संवृद्धि तो महिलाओं के सम्मान, बच्चों की पढ़ाई, युवा वर्ग को आय व रोजगार की सुविधा प्रदान कर ही आएगा.

प्रश्न उभरते रहे कि पहाड़ का आर्थिक शोषण क्यों हुआ? किसने किया? विकास के लाभ मैदान तक क्यों सीमित रहे? शिक्षा स्वास्थ्य व रोजगार में क्षेत्रीय असमानता क्यों पनपी? जंगलों पर, पहाड़ के संसाधनों से स्थानीय समुदाय को विमुख क्यों रखा गया? इस क्रम में ठेकेदारी और संसाधनों के बाहरी व्यक्तियों द्वारा किए जा रहे दोहन का विरोध कर मजदूर व किसानों के अधिकार, जनता के हक -हकूक की आवाज सशक्त होते गई. यह विकास के लाभ के न्याय पूर्ण वितरण की बात थी जिसने आम जन के भीतर यह भावना भर दी कि पहाड़ का विकास पहाड़ के निवासियों की भागीदारी, प्रकृति के संरक्षण व सामाजिक न्याय के बिना सम्भव नहीं. इसी सोच पर चलते गढ़वाल के आंदोलन नैतिक अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी न्याय व क्षेत्रीय संतुलन की दिशा दिखा गये.

1970 के दशक तक गढ़वाल में सामाजिक-राजनीतिक चेतना तेजी से उभरी. जन आंदोलन हुआ और क्षेत्रीय न्याय पाने की आवाज के गंभीर स्वरों में विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग उभरी. अभी तक यहाँ की युवा शक्ति उच्च शिक्षा के लिए बड़े महानगरों में संघर्ष कर अपनी राह बना रही थी. स्वामी मन्मथन ने विश्वविद्यालय की मांग को केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहने दिया. उन्होंने महिला समूहों, किसानों,ग्राम प्रधान, ब्लॉक प्रमुखों, व्यापारी वर्ग व अध्यापकों सहित हर समूह को आंदोलन से जोड़ा और यह विचार स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली संस्था नहीं इसे तो आंचलिक विकास का ऐसा केंद्र बनाना है जहाँ से खेती, वन, पानी और पलायन के मुद्दों का समाधान हो. उन्होंने विश्व विद्यालय की स्थापना के लिए जुलूस, अनशन, धरना, घेराव व बंद जैसे लोकतान्त्रिक साधनों का आश्रय लेते हुए आंदोलन की प्रकृति को किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रखा. समाज के हर वर्ग से उन्हें सहयोग मिला. वह कहते थे कि बद्रीनाथ और केदारनाथ की धार्मिक यात्रा करने वाले तीर्थ यात्रियों तक उनकी बात पहुंचे जिससे देश भर में इसका प्रचार -प्रसार हो और व्यापक जन समर्थन मिल सके. आंदोलन मात्र श्रीनगर का नहीं पूरे गढ़वाल का बने. 

विश्व विद्यालय की स्थापना श्रीनगर में किए जाने का स्वामी जी का पक्ष रहा कि यह एक ऐतिहासिक नगर है जो भौगोलिक रूप से भी गढ़वाल के लिए अपेक्षाकृत सुगम स्थान है तो विस्तार की सम्भावनाएं यहां सापेक्षिक रूप से अधिक हैं. भविष्य में यह पूरे क्षेत्र के अकादमिक केंद्र के रूप में स्थापित हो जायेगा. फिर यहाँ बिरला राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय जैसी आधारशिला विद्यमान है. उनकी सोच में विश्वविद्यालय ऐसा बनना था जो हिमालय की आर्थिकी, पहाड़ की कृषि, ग्रामीण,उद्योग धंधे, पर्यटन. वन व खनिज सम्पदा, औरतों व बच्चों की दशा जैसे अनगिनत पक्षोँ से जुड़े असमंजस का निवारण करे व यहाँ के पुरातन मूल्यों, लोक संस्कृति व लोकथात के आयामों पर निरन्तर शोध करने में समर्थ हो. 

स्वामी मन्मथन विश्वविद्यालय को जन आकांक्षाओं का प्रतीक मानते थे. सरकार द्वारा विश्वविद्यालय की स्थापना स्वीकार करने के साथ कुलपति व कुलसचिव की नियुक्ति कर कार्यालय खोल दिया गया था हालांकि 1976 के बाद तक बिड़ला महाविद्यालय श्रीनगर में उच्च शिक्षा निदेशालय द्वारा नियुक्त प्राचार्य व प्राघ्यापक ही दायित्व संभाले थे और नई भरतियों का दौर शुरू होने लगा था. स्वामी मन्मथन ने विश्व विद्यालय की स्थापना को केवल शिक्षकों व विद्यार्थियों की मांग नहीं रहने दिया उन्होंने कहा कि यह संस्था गढ़वाल के विकास की गुणात्मक संवृद्धि की सूचक बने क्योंकि ज्ञान व प्रयोग के बिना पहाड़ का विकास सम्भव नहीं. वह अक्सर यह दोहराते कि पहाड़ का विकास पहाड़ के लोगों की भागीदारी, प्रकृति के संरक्षण व सामाजिक न्याय के बिना संभव नहीं. विश्व विद्यालय स्थापना पर सरकार की स्वीकृति, विभागों के गठन,महाविद्यालयों की सम्बद्धता, संरचना के निर्माण जैसे कार्य आरंभ हुए जो मात्र प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं थी बल्कि जन आंदोलन के ज्वार से उपजे प्रतिफल थे एक ऐसे समय में जब देश इमरजेंसी भोग रहा था.

गढ़वाल में प्रस्फुटित सामाजिक परिवर्तन और आंचलिक विकास के प्रति लोगों की सोच व भावना को तब गहरा आघात लगा जब 6 अप्रैल 1990 को रात्रि के करीब 9 बजे उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी गई. हत्या का एक आरोपी गिरफ्तार भी हुआ. स्वामी जी के सहयोगियों और आश्रम से जुड़े लोगों के संस्मरणों से पता चलता है कि राजनीतिक संरक्षण के कारण उसे जमानत भी मिल गई. ऐसा कोई विश्वसनीय अभिलेख जुट नहीं पाया जिससे यह ज्ञात हो सके कि यह मामला कैसे रफा-दफा कर दिया गया व अंतिम दोष सिद्धि क्या रही. 

स्वामी मन्मथन की हत्या के बाद जनता में व्यापक असंतोष व गहरी निराशा छा गई. उनके सहयोगी सिरिल राफेल ने फिर संस्था का नेतृत्व संभाला व ग्रामीण स्वावलम्बन के कार्यक्रमों को गति दी. उनकी हत्या गढ़वाल में उभर रहे सामाजिक परिवर्तन और जनसंगठन की प्रबल लहर को समाज के प्रभावशाली गुट व राजनेताओं द्वारा ध्वस्त करने की बड़ी साजिश रही. हत्या की जाँच, अभियुक्त का उद्देश्य व न्यायिक परिणाम के सम्बन्ध में प्रमाणित सार्वजनिक सूचनाएं सीमित रहीं. अभियुक्त की गिरफ़्तारी, उसके विरुद्ध लगी धाराएं, दाखिल आरोप पत्र, न्यायालय में चले मुकदमे, अभियुक्त के दोषी सिद्ध होने, बरी होने या मुकदमे की समाप्ति के अंतिम परिणाम की दस्तावेजी पुष्टि नहीं हो पाई.

स्वामी मन्मथन ने गढ़वाल में सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध दीर्घकालिक संघर्ष किया था. छुआछूत, अन्धविश्वास और परंपरागत रूढ़ियों को चुनौती दी. नशे व शराब के विरोध में जनता को जगाया. मंदिरों में सदियों से चली आ रही पशु बलि की प्रथा पर रोक लगाई. श्री भुवनेश्वरी महिला आश्रम के द्वारा स्थानीय ग्रामवासी महिलाओं को जोड़ते हुए आजीविका हेतु प्रशिक्षित किया, महिला मंगल दल बनाए. जनता को स्थानीय नेतृत्व से जोड़ा, युवा वर्ग को विश्व विद्यालय की स्थापना से संलग्न किया. निश्चय ही समाज कल्याण के इस उद्देश्य की पूर्ति में कई प्रभावशाली समूहों के हित प्रभावित हुए होंगे. स्वामी मन्मथन ने सिलकोट चाय बागान व बंठा आंदोलन सहित भूमि, श्रम, वन, स्थानीय संसाधनों व जनता के अधिकारों का समाधान चाहा था. नशे व शराब का प्रबल विरोध किया था जिससे प्रभावित हित समूहों के साथ उनका विरोध स्वाभाविक था. लोक स्मृति में उन पर हुआ आघात और संगठित षड़यंत्र दोनों रहेंगे पर ऐसे प्रमाण नहीं जिससे उनकी बलि देने वाले पात्र की जानकारी हो. इतिहास न्यायालय के निर्णय से नहीं समाज की स्मृति से रचा जाता है. उन्होंने कहा था कि मातृशक्ति सामाजिक मूल्यों में होने वाले परिवर्तन की धुरी है. जंगल केवल पेड़ नहीं बल्कि पहाड़ की आर्थिकी है. उच्च शिक्षा संस्थान केवल उपाधि देने वाली संस्था नहीं बल्कि हिमालय के पुर्ननिर्माण का केंद्र है. 

स्वामी मन्मथन की हत्या हुई पर उनका सपना नहीं मरा.वह आज भी गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रांगणों, भुवनेश्वरी महिला आश्रम की गतिविधियों और उत्तराखंड के गाँवों की सामुदायिक चेतना में जीवित है. स्वामी जी सामाजिक पुर्नजागरण, महिला सशत्तीकरण और शिक्षा से उपजी गुणात्मक लहर को आंचलिक विकास का आवश्यक न्यूनतम प्रयास करते रहे. उन्होंने सत्ता नहीं मांगी, उन्हें पद की चाह न थी, उन्होंने संपत्ति नहीं बनाई. उन्होंने तो यह सिद्ध कर दिखाया कि समाज परिवर्तन राजनीति से आता है पर उससे पहले चरित्र, ज्ञान का प्रसार और सोच का सकारात्मक होना आवश्यक शर्त है. उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं माँगा पर पहाड़ को अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया अपने प्राण भी. प्रश्न यह है कि क्या पहाड़ ने नये पथ खोजने वाले साहसी को पर्याप्त सम्मान और संरक्षण दिया जिन्होंने जीवन भर यहाँ के कंटक निकाल राह बनाई. यह स्वामी मन्मथन से जुड़ा प्रश्न नहीं है यह उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास का प्रश्न है.

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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