Featured

आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”

पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, “टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी” वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित कृति है. यह सृजन पाठकों को “अब कहानी में आगे क्या होगा?”, के मोहपाश में बांधे रखता है. लेखक एक लब्ध प्रतिष्ठ वनस्पति विज्ञानी होने के बाद भी इतना सुंदर साहित्य सृजन कर लेते हैं तो इसमें उनके बालपन के संस्कारों और परिवेश का अक्स देखा जा सकता है. लेखक ने पुस्तक के आमुख अपनी बात में इसका साफगोई से जिक्र भी किया है कि कैसे उन्हें तत्कालीन पुस्तकों को पढ़ने की लत लग उठी थी, जो उनके सुपुष्ट लेखन में “टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी” का सृजन बन जाती है. बचपन के संस्कार और वातावरण भविष्य की रचनात्मकता को निर्धारित करते हैं ऐसा “टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी” को आद्योपांत पढ़ने के बाद लेखक की दक्षता में महसूस किया जा सकता है.

साहित्य का उद्देश्य समाज को आईना दिखाना है. डॉ. निर्मल सुधीर कुमार ‘हर्ष’ की सद्य प्रकाशित पुस्तक “टुकड़ा-टुकड़ा ज़िन्दगी” इस दायित्व को बखूबी निभाती है. शीर्षक आवरण पर बना पहाड़ी-पथरीला रास्ता ही संकेत दे देता है कि यह सरल और सपाट जीवन की कथा नहीं, बल्कि संघर्ष से गुजरती जिंदगी के बिखरे हुए अनुभवों का संकलन है. कुल 118 पृष्ठों की इस किताब में दो सर्ग हैं. पुस्तक में खुशबू, भिलमा,फोटोग्राफर, गायक, कुक, अप्रत्याशित, वेटर, गुरुजी और लघु-उपन्यास “वापसी” संकलित हैं. लेखक ने जानबूझकर उन पात्रों को चुना है जिन्हें हम रोज देखते हैं पर गौर नहीं करते – एक वेटर, एक कुक, एक फोटोग्राफर, एक गायक. 

ख़ुशबू और भिलमा शीर्षक की कहानियां ग्रामीण और कस्बाई जीवन की गंध लेकर आती हैं. भिलमा शब्द ही आंचलिक नाम की ओर इशारा करता है. फोटोग्राफर, गायक, कुक, वेटर – ये चारों कहानियां शहरी जीवन के उन स्तंभों पर केंद्रित हैं जिन पर समाज की दिनचर्या अवलम्बित होती है. डॉ. हर्ष ने इन पेशों के पीछे छिपे आत्म-सम्मान, आर्थिक तंगी और सपनों को बड़े सलीके से उकेरा है. अप्रत्याशित, शीर्षक से ही लगता है कि यह जीवन में अचानक आने वाले मोड़ों की कहानी है. वहीं गुरु जी कहानी पारंपरिक भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा को विशिष्ट परिप्रेक्ष्य में देखती है.       

इन सभी कहानियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें कोई विशिष्ट नायक नहीं है. नायक है – जीवन स्वयं. कहानियां पाठक को अपना जीवन प्रतीति देती हैं. लेखक ने उपदेश नहीं दिए, बल्कि पात्रों को ही खुद बोलने दिया है. भाषा सरल, मुहावरेदार और प्रवाहमयी है. कहीं भी कृत्रिमता नहीं लगती. जीवन का यथार्थ दर्शन रचनाओं में प्रस्तुत होता है.

किताब का दूसरा महत्वपूर्ण सर्ग है लघु-उपन्यास वापसी. शीर्षक से ही स्पष्ट है कि यह विस्थापन, पलायन और जीवन की उलझनों से यथार्थ के जड़ों की ओर लौटने की कथा है. रोजमर्रा की चकाचौंध में खोया हुआ इंसान जब अपने अतीत, अपने पुराने रिश्तों की ओर लौटता है तो किन द्वंद्वों से गुजरता है – यही इस संग्रह रचना का मूल स्वर प्रतीत होता है. वापसी लघु उपन्यास पूरे संग्रह को एक सूत्र में पिरोता है. अगर 8 कहानियां जिंदगी के अलग-अलग टुकड़े हैं, तो वापसी उन टुकड़ों को जोड़कर एक सम्पूर्ण चित्र बनाने का प्रयास करने में सफलता का आभास देती है.

डॉ. हर्ष की भाषा में अकादमिक भारीपन नहीं है.  संवाद सहज हैं और वर्णन चित्रात्मक. प्रतीकों का प्रयोग सीमित पर सार्थक है. आवरण का पहाड़ी रास्ता और अंदर की कहानियां – दोनों में एक सामंजस्य है. इस पुस्तक का सबसे बड़ा संदेश यह है कि सम्मान किसी पद से नहीं, कर्म से तय होता है. एक “कुक” के हाथ में भी कला होती है और एक “वेटर” की भी कहानी. 

सामान्य पाठक जो साहित्य में सुकून और अपनापन ढूंढते हैं. युवा और विद्यार्थी जो जीवन और करियर के दबाव में हैं, उन्हें “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी” संग्रह की ये रचनाएं धरातल से जोड़ेंगी. कुछ पाठकों को लग सकता है कि सभी कहानियों का अंत थोड़ा आदर्शवादी है. पर शायद लेखक का उद्देश्य यथार्थ के साथ उम्मीद भी देना भी रहा है. टुकड़ा-टुकड़ा ज़िन्दगी, हिंदी कथा साहित्य सृजन यात्रा में एक महत्वपूर्ण सोपान साबित होगा. यह किताब  याद दिलाती है कि महान साहित्य और उसका कथानक महलों में नहीं, बल्कि उन रसोईयों में, उन होटलों में और उन स्टूडियो में होता है जहां आम आदमी अपनी रोटी कमाता है.

डॉ. निर्मल सुधीर कुमार हर्ष ने अपने लेखन से यह साबित किया है कि जिंदगी चाहे कितनी भी टुकड़ों में बंटी हो, संवेदना के सूत्रों से उसे फिर से संजोया जा सकता है. कुल मिलाकर टंकण की किंचित स्वाभाविक त्रुटियों को नजर अंदाज किया जा सके तो आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी” एक कालजयी सृजन बनकर हिन्दी साहित्य संसार में अपना स्थान बनाएगी. और पुस्तक की कहानियां और सामग्री रूपहले पर्दे और चलचित्र के लिए भी एक खजाना साबित होगी ऐसा विश्वास किया जा सकता है.

बागेश्वर, गरुड़ के निवासी हरीश जोशी का लम्बा पत्रकारिता अनुभव है. अपने इस सफ़र उन्होंने अनेक किताबों और पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया. उनसे उनकी ईमेल आईडी harishjoshi1969@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.

इसे भी पढ़ें : ‘हेमवंती’ जहां मोहब्बत मजबूरी नहीं ताकत बन जाती है

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

29 minutes ago

भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्

ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…

2 hours ago

उत्तराखण्ड के सरोवर

उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…

3 hours ago

दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध

पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…

4 hours ago

सिंधुजा की कविता : स्मृति यात्रा

दुनिया बड़ी तेजी से बदल रही है. (Smriti Yatra Poem by Sindhuja) शायद हर पीढ़ी,…

5 days ago

पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल

पिछली कड़ी : कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से…

2 weeks ago