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बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल

इन्द्र सिंह नयाल ने क्षेत्रीय अस्मिता के आधार से पृथक पहाड़ी राज्य की अवधारणा रखी तथा सांस्कृतिक-भौगोलिक विशिष्टता पर जोर दिया. उनका वैचारिक योगदान यह रहा कि उन्होंने पहचान की राजनीति का वह स्वरूप सामने रखा जिससे “अलग पहाड़ी राज्य” की अवधारणा बनी. यह उत्तराखंड आंदोलन की बौद्धिक नींव रही. उनकी सोच वैचारिक राजनय की रही. आंदोलनों में अकेले उनकी सहभागिता कम रही. तर्क, लेखन और सैद्धांतिक धरातल से समृद्ध होने से उन्होंने क्षेत्रीय अस्मिता का वैचारिक आधार दिया. उनकी सोच ऐसे चार स्तम्भों पर टिकी है जिनका आधार उनकी समूची रचना प्रक्रिया पर दिखाई देता है. इसमें सबसे पहले वह सैद्धांतिक ढांचा है जो निम्न वर्गीय या उपआश्रित समाज के हाशिये पर पड़े वंचित, पिछड़े और शोषित वर्गो से संबंधित था. इसे पारम्परिक इतिहास में स्थान नहीं मिलता. यह दृष्टिकोण संभ्रात वादी इतिहास को चुनौती देता है. इसका उद्देश्य मुख्य धारा के राष्ट्रवादी या औपनिवेशिक विमर्श से हट कर दबे कुचले लोगों के संघर्ष व चेतना की पहचान है. दूसरा पक्ष है क्षेत्रवाद या प्रादेशिकता जो ऐसी भावना है जिसमें जनसमूह अपने विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र, भाषा, संस्कृति या आर्थिक हितों को उच्च अधिमान देते हैं. तीसरा पक्ष है राजनीतिक अर्थव्यवस्था जो राज्य, समाज और आर्थिकी के अंतरसम्बन्धों की परख करती है जिसमें औपनिवेशिक शोषण व संसाधन नियंत्रण मुख्य कार्यकारी शक्ति बनती हैं. चौथा राज्य निर्माण जिससे यह प्रस्तावना उभरती है कि राज्य और उसकी संस्थाऐं कैसे बनती और वैधता प्राप्त करती हैं.

इन्द्र सिंह नयाल ने अधीनस्थ समूहों या हाशिए पर रखे जन समूह की पहचान का प्रकटीकरण किया. नयाल ने पृथक पर्वतीय राज्य की अवधारणा रखी. उनका क्षेत्रीयवाद राजनीतिक लक्ष्य था. वह राजनीतिक आर्थिकी में असमानता पर ध्यान देने वाले, समाज के वंचित वर्गों के सहायक व राज्य निर्माण का वैचारिक आधार प्रस्तुत करने वाले थे. क्षेत्रीयता उनकी दृष्टि में केवल भौगोलिक पहचान नहीं बल्कि सांस्कृतिक विशिष्टता, आर्थिक असमानता व राजनीतिक वंचना का सम्मिलित परिणाम रही. इसका दायरा अस्मिता से राजनीति की ओर जाता है. इसके सैद्धांतिक तत्वों में अपनी पृथक पहचान, संसाधनों का जुटाव व राजनीतिक अभिव्यक्ति मुख्य थी. कुमाऊं-गढ़वाल में इन्द्र सिंह नयाल ने पहाड़ी समाज की विशिष्टता को परिभाषित किया तथा इसे पृथक राज्य की मांग में बदल डाला. यह सांस्कृतिक से राजनीतिक क्षेत्र वाद की ओर हुआ संक्रमण रहा.

बद्री दत्त पांडे ने जहाँ सामाजिक गतिशीलता बढ़ाई तो इंद्र सिंह नयाल ने विचारधारात्मक गठन किया. कुमाऊं गढ़वाल का राजनीतिक विकास केवल राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार नहीं वरन एक स्वतंत्र, बहु स्तरीय ऐतिहासिक प्रक्रिया बनी. इसमें बद्रीदत्त पांडे ने समाज को जाग्रत किया व इंद्र सिंह नयाल ने क्षेत्रीय अस्मिता का वैचारिक निर्माण किया जिससे पहाड़ी समाज की विशिष्टता को भौगोलिक अलगाव, आर्थिक पिछड़ापन व सांस्कृतिक भिन्नता से समझाया. क्षेत्रीय पहचान को राजनीतिक मांग में बदला.राजनीतिक अर्थव्यवस्था राज्य, समाज और संसाधनों के संबंध को समझने का उपाय है. औपनिवेशिक सन्दर्भ में वन कानून, संसाधन नियंत्रण, कर व्यवस्था, आर्थिक शोषण व कुली बेगार श्रम के दोहन को सूचित करती थीं. ऐसी संरचना एक निष्कर्षण अर्थव्यवस्था बनाती है जिसमें स्थानीय संसाधन क्षेत्र से बाहर जाते हैं और स्थानीय समाज गरीब रह जाता है. यह असंतोष सामाजिक आंदोलन को जन्म देता है.

1920 के दशक में कुमाऊं परिषद के मंच से पहाड़ की समस्याएं उठाई गईं जिसमें पांडे जी अध्यक्ष थे तो इंद्र सिंह नयाल युवा वकील के रूप में सक्रिय सदस्य रहे. उन्होंने 1926 में एलएलबी कर ली थी. पांडे व नयाल दोनों पहाड़ी समाज में आत्म सम्मान व अपने अधिकारों के प्रति सक्रिय रहने की चेतना का प्रसार कर रहे थे. बद्रीदत्त पांडे ने कुमाऊं का इतिहास रच क्षेत्रीय अस्मिता का निर्माण किया. उनकी क्षेत्रीय चेतना सामाजिक सुधार से जुड़ी हुईं थी वह सांस्कृतिक क्षेत्रवाद के पहरुए रहे.उन्होंने औपनिवेशक विरोध को आंदोलन द्वारा चुनौती दी. प्रतिरोध से राज्य का विचार उभरा जिसे संस्थागत राज्य की ओर ले जाने वाली दिशा तय हुईं. यह उनकी सामाजिक गतिशीलता थी जो जन जागरण, प्रतिरोध, आंदोलन और अस्मिता के साथ प्रबल राष्ट्रवाद से प्रभावित थी. 

बद्री दत्त पांडे 1929 में गाँधी जी के कुमाऊं दौरे में साथ रहे व उनके साथ बागेश्वर भी गये.नयाल गाँधी की स्वागत समिति के कोषाध्यक्ष थे .पूरा प्रबंध दोनों ने मिल कर किया.गाँधीजी को कुमाऊं की समस्याएं, बेगार, फारेस्ट एक्ट, न्यायपालिकाओं व शिक्षा के बारे में बताया. इन्द्र सिंह नयाल के पास कार्यक्रम की आर्थिक जिम्मेदारियां थीं वह स्वागत समिति के कोषाध्यक्ष थे. चंदा जुटाने से ले कर गांधीजी के रहने खाने की पूरी व्यवस्था उन्होने संभाली. वह कुशल संगठनकर्ता थे. अल्मोड़ा में सभाऐं करना, स्वयंसेवक तैयार करना, पुलिस के टकराव से बचना और जमीनी स्तर के हर काम की योजना वह खुद बनाते थे.तभी से नए राज्य का वैधता निर्माण व वैचारिक नींव उनकी भावना में रच बस गई थी. उन्होंने पृथक राज्य के निर्णय को कानून, नियमों व जनता की सहमति के अनुसार ही स्वीकार्य व वैध बनाने की दिशा ली. उन्होंने वैचारिक अभिव्यक्ति, वैचारिक स्पस्टीकरण व वैचारिक सूत्र दिया जिससे उत्तराखंड राज्य की जरुरत, क्षेत्रीय मांग व उसका वैचारिक ढांचा स्पष्ट हुआ. 

उत्तराखंड की राजनीति केवल आंदोलन नहीं बल्कि सामाजिक विचारधारा व संस्थागत कारकों की बहुआयामी प्रक्रिया थी जिसमें अधीनस्थ उपाश्रित की भूमिका को अनदेखा नहीं किया गया. क्षेत्रीय वाद का विकास सांस्कृतिक, राजनीतिक व प्रशासनिक रूप से हुआ. गांधीजी जब अल्मोड़ा आए तब नयाल सताइस साल के नौजवान थे. उन्होंने अपने हम उम्र कई नौजवानों को गांधीजी से मिलाया. युवा शक्ति उनसे जुड़ती गई. गांधीजी के दौरे के बाद कुमाऊं में कांग्रेस का जनाधार तेजी से बढ़ा. नमक सत्याग्रह में अल्मोड़ा व नैनीताल जनपद की सहभागिता काफी अधिक रही. यह देख गांधीजी ने कहा कि, “कुमाऊं में मैंने भारत का भविष्य देखा है, इसका श्रेय पांडे-नयाल की जोड़ी को जाता है.” राजनीतिक अर्थव्यवस्था की दृष्टि से बद्री दत्त पांडे ने कुली बेगार, कर, वन कानून जैसे प्रसंगों को औपनिवेशिक शोषण बताया. नयाल ऐसी आर्थिकता व्यवस्था के पक्षधर रहे जो नैतिक मापदंडों, सामाजिक न्याय, निष्पक्षता व सामाजिक जिम्मेदारियों पर आधारित हो. यह केवल लाभ पर केंद्रित न हो कर आर्थिक गतिविधियों को नैतिकता से जोड़ती है. नयाल ने संसाधन की असमानता, पहाड़-मैदान के अंतर से विकास के असंतुलित होने के पक्ष को प्रभावी रूप से सामने रखा. 

1921 के कुली बेगार आंदोलन को “रक्त हीन क्रांति” कहा गया जिसमें पांडे व नयाल दोनों की विशिष्ट भूमिका रही. तब रिवाज था कि जब अंग्रेज अफसर या उनके मेहमान पहाड़ आते तो स्थानीय लोगों को उनका सामान बिना मजूरी के ढोना पड़ता. मना करने पर कोड़े लगते, जेल में ठूंस दिया जाता.इसका विरोध तब से हुआ जब बद्रीदत्त पांडे ने 1916 में कुमाऊं परिषद बनाई जिसका पहला प्रस्ताव ही कुली बेगार प्रथा समाप्त करने को ले कर था. 1920 में इन्द्र सिंह नयाल इलाहाबाद से लौट कर आए थे तब वह अठारह वर्ष के थे. विदेशी कपड़ों के बहिष्कार की शपथ ले कर आए थे. अल्मोड़ा आ वह पांडे जी से मिले व परिषद के सबसे युवा सदस्य बने.पहाड़ आ उन्होंने नौजवानों की टोली बनाई जिसने गांव-गांव जा लोगों को बागेश्वर आने का संदेश दिया. कानून के विद्यार्थी तो थे ही, लोगों को विश्वास दिलाया कि बेगार न करना अपराध नहीं है. 1920 में ही काशीपुर अधिवेशन में यह निर्णय हुआ कि मकर संक्रांति के अवसर पर बागेश्वर में बेगार का खात्मा करेंगे. उत्तरायणी के दिन गांव -गांव से चालीस हज़ार से अधिक ग्रामीण एकजुट हुए. पांडे जी ने नेतृत्व संभालते हुए उदघोष किया कि आज से कोई बेगार नहीं करेगा. हम पर जोर जुल्म हुआ तो जेल भर देंगे. जनता उत्साह से भर गई. कुलियों के रजिस्टर सरयू नदी में प्रवाहित कर दिए गये. युवा साथियों का नेतृत्व करने का अवसर इन्द्र सिंह नयाल को मिला. बद्रीदत्त पांडे को “कुमाऊं केसरी” कहा जाने लगा.

दोनों की जोड़ी मे भले ही उम्र का फासला था पर काम में एका था. 1921 में पांडे जी 39 वर्ष के थे तो नयाल 19 के. उन्होंने गुरू-शिष्य की भांति काम किया. दोनों की जोड़ी “कलम-कानून” का साथ थी. पांडे जी अल्मोड़ा में छापे अख़बार से जनमत बनाते तो नयाल जी वकील के रूप में लोगों को कानूनी ढाल देते. आजादी की लड़ाई में सरकार द्वारा लगाए गये आरोपों में दोनों जेल गये. पांडे जी को पांच बार जेल हुई तो नयाल जी को छह बार. आजादी के बाद एक सांसद बना तो दूसरा विधान परिषद का सदस्य. पांडे जी इस आंदोलन के दिमाग थे तो नयाल जी हाथ पैर. 1921 के कुली बेगार ने कुमाऊं को स्वाभिमान दिया. 1929 में गांधीजी के दौरे ने इन्हें राष्ट्रीय पहचान दी.

1930-32 में नमक सत्याग्रह व सविनय अवज्ञा आंदोलन में बद्री दत्त पांडे ने शक्ति अख़बार में रपट व समाचार प्रकाशित कर जनता तक खबरें पहुँचाई. नयाल ने युवाओं को संगठित किया. 1932 के कुमाऊं युवा सम्मेलन में पांडेजी के वैचारिक योगदान व नयाल जी की अध्यक्षता में आंदोलन की नई पीढ़ी तैयार हुई. दोनों पहाड़ बनाने में जुट गये. 1942 में जब अंग्रेजों ने युवाओं पर राजद्रोह के आरोप लगाए तो उनके वकील के तौर पर नयाल ने प्रभावी पैरवी की. बद्री दत्त पांडे ने अख़बार से गांव -गांव की जनता तक खबर पहुंचाई. जन जागरण हुआ व आंदोलन की लहर बनी. जगह-जगह अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे शोषण का प्रत्यक्ष विरोध हुआ.

इन्द्र सिंह नयाल ने 1948 से 1952 तक नैनीताल जिला परिषद के अध्यक्ष रहते शिक्षा की बुनियाद को सुदृढ किया. उनके रहते जूनियर हाई स्कूल चार से बढ़ कर बयालिस हो गये. उनका मंतव्य था कि पहाड़ के गाँव- गांव में बुनियादी शिक्षा के लिए स्कूल खुले. तराई भाबर के आदिवासी इलाके खटीमा में उन्होंने 1955 में थारू हाईस्कूल की स्थापना की. नैनीताल जिला भ्रष्टाचार विरोधी समिति के अध्यक्ष रहते उन्होंने विकास के लिए आवंटित धनराशि के सही सुदुपयोग के लिए जनता की निगरानी पर बल दिया.नयाल 1952 से 1962 तक उत्तरप्रदेश विधान परिषद के सदस्य रहे. उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में रह उन्होंने कुमाऊं के पुल, सड़क, स्कूल के लिए बजट पारित करवाया. वहीं भृष्टाचार विरोधी समिति के अध्यक्ष बन सुनिश्चित किया कि धन पहाड़ तक पहुंचे. पांडे जी 1955 में सांसद बने. दिल्ली में पहाड़ की समस्याएं उठाईं. दोनों ने शिक्षा को प्रभावी अस्त्र बनाया. नयाल ने स्कूल खोले तो पांडे ने पहाड़ का इतिहास रचा. दोनों का लक्ष्य एक ही था कि पहाड़ी बच्चा पढ़े तो पिछड़ापन दूर हो. दोनों गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे इसलिए पहाड़ के लिए इनका विकास प्रारूप छोटे विद्यालय, परिवार संचालित धंधे, लघु और कुटीर उद्योग, स्थानीय स्वशासन रहा. 1962 के बाद नयाल जी राजनीति छोड़ समाज में व्याप्त बुराईयों के उन्मूलन में जुट गये. पांडे जी ने भारत-चीन युद्ध में अपना सब कुछ सरकार को भेंट कर दिया. दोनों का विचार था कि पहाड़ का विकास पहाड़ की भौगोलिक दशा को ध्यान में रख संवेदनशीलता के साथ हो. दोनों ही कुमाऊं के स्वाधीनता संग्राम व नवनिर्माण के सहयात्री थे. एक ने कलम से तो दूसरे ने कानून व प्रशासन से पहाड़ को स्वयं स्फूर्त विकास की सोच दी. उन्हें कुमाऊं के स्वतंत्रता संग्राम का जुड़वाँ स्तम्भ कहा जाता है.

बद्री दत्त पांडे 1921 में कुली बेगार उन्मूलन में सक्रिय रहे जिसे महात्मा गाँधी ने “रक्त हीन क्रांति” कहा. चालीस हज़ार जन समुदाय बागेश्वर पहुँच गये और सरयू नदी के तट पर खाते व रजिस्टर नदी में प्रवाहित कर बेगार प्रथा समाप्त की. युवा वकील के रूप में नयाल ने इस आंदोलन को बुनियादी व कानूनी समर्थन दिया. बेगार खतम होने पर जनता को महसूस हुआ कि पहाड़ी अब अपनी मेहनत का मालिक है. यह शोषण के खिलाफ जनता का आंदोलन था. पहाड़ की समस्याओं को सुलझाने के लिए 1916 में कुमाऊं परिषद बनी जिसमें कुमाऊं की आर्थिक सामाजिक व प्रशासन सम्बन्धी समस्याओं पर खुल कर चर्चा होती थी. बरोनी जेल में बंदी रहते हुए बद्री दत्त पांडे ने अपनी पुस्तक “कुमाऊं का इतिहास” पूरी की जिसने पहाड़ की स्पष्ट पहचान बनाई व हिमालयी समाज की विशेषताएं स्पष्ट की. उन्होंने स्थापित किया कि कुमाऊं एक विशिष्ट सांस्कृतिक ऐतिहासिक इकाई रही है. कुमाऊं की ऐतिहासिक पहचान देने के साथ उन्होंने औपनिवेशिक शोषण का विरोध किया व क्षेत्रीय स्वाभिमान जगाया. उनका कृतित्व पहचान निर्माण की प्रक्रिया को स्पष्ट करता था. पत्रकारिता और फिर कुमाऊं परिषद के गठन से उन्होंने पहाड़ के विकास की कार्ययोजना निर्मित करने का आधार दिया.बद्री दत्त पांडे ने कुली बेगार प्रथा का विरोध व जनता की राजनीतिक चेतना जगा कर तत्काल अलग राज्य की मांग नहीं की बल्कि पहले जनता को संगठित करना और औपनिवेशिक उत्पीड़न समाप्त करना जरुरी समझा .समाज सुधार व जन आंदोलन उनके प्रभावी लक्ष्य थे और पत्रकारिता सशक्त हथियार.

कुली बेगार खत्म होने के बाद अंग्रेज बौखला गये पहाड़ियों का मनोबल तोड़ने के लिए दमन के नये तरीके अपनाने लगे. 14 जनवरी 1921 को बेगार तोड़ने की शपथ ली गई. कुमाऊं कमिशनर ने पांडे जी को गिरफ्तार कर लिए. एक साल की जेल हुई. अल्मोड़ा अख़बार पर हमला हुआ, वह आंदोलन की खबरें छाप रहा था. अधिकारियों ने प्रेस की जमानत राशि जब्त कर दी. अख़बार बंद करने की धमकी दी. पुलिस गांव -गांव पहुँच गई. बेगार पर दबाव बनाने लगी जिसने मना किया उस पर जुर्माना लगा, पिटाई हुई.सरकारी अधिकारियों का सोचना था कि लोग डर कर झुक जाएंगे. इस दमनकारी वातावरण में उन्नीस वर्षीय इन्द्र सिंह नयाल की भूमिका प्रभावपूर्ण रही. पांडे जी को जेल होते ही उन्होंने मोर्चा संभाला. तब वह एल एल बी के छात्र थे. छुट्टियों में अल्मोड़ा आ युवाओं को संगठित किया. जन-जन के मन में यह हौसला जगाया कि पांडे जी जेल गये अब लड़ाई और तेज होगी, जारी रहेगी. अंग्रेजों ने अल्मोड़ा अख़बार बंद करवा दिया. मुकदमा चला. अंग्रेजों ने सोचा था कि पांडे जी को जेल में डाल वह आंदोलन को कुचल देंगे पर नयाल जी जैसे सैकड़ो युवा उनके साथ तैयार खड़े थे. पहाड़ के लिए कुछ करने का ऐसा मनोबल था कि एक जेल जाए तो दूसरा झंडा संभाल ले. इस जोड़ी ने यह सिद्ध किया कि पहाड़ का असली विकास डर खत्म होने से शुरू होता है. कुली बेगार का अंत पहाड़ वासियों को अपने हक की लड़ाई का सकारात्मक संदेश दे गया.

कुली बेगार के समाप्त होने के बाद अंग्रेजों ने जंगलात कानून और वन बंदोबस्त को और अधिक कठोर कर पहाड़ी जनता को दबाने का प्रयास किया. बेगार के जरिये मुफ्त मजदूरी व लोगों पर नियंत्रण करने का दबदबा बना रहता था, बेगार न करने के जनता के निर्णय से वह हाथ से गया. इससे तिलमिला कर अंग्रेजों ने जंगल और जमीन के कानून और कड़े किए जिससे पहाड़ियों की कमर तोड़ी जा सके.

1824 में विलियम ट्रेल ने खच्चर सेना बनाई थी ताकि राशन रसद, माल-असबाब की ढुलाई हो सके.बेगार खतम होने पर अंग्रेज फिर खच्चरों की शरण में गए. बोझा ढुलान खच्चरों से किया जाने लगा. अब बेगार के जरिये मुफ्त मजूरी व श्रम पर नियंत्रण मिलता था वह हाथ से गया.पहाड़ियों को सबक सिखाने को उन्होंने जंगल और जमीन के पुराने कानून और सख्त कर दिए. बंदोबस्त और वन अधिनियम को हथियार बनाया. वन अधिनियम 1865 व 1878 बेगार खतम होने के बाद और सख़्ती से लागू किए गये. गांव के समीपवर्ती जंगल आरक्षित वन घोषित कर दिए गये. पटवारी और पतरोल को नियमों के पालन में कड़क रहने के आदेश मिले. अब जंगल से सूखी लकड़ी बीनना, घास काटना, वन उपज लेना अपराध घोषित कर दिया गया. गांव वालों की ईंधन की जरूरतों के साथ कई छोटे बड़े काम धंधों से रोजी रोटी कमाने का जरिया छिना. बद्री दत्त पांडे शक्ति अख़बार में वन कानूनों के विरुद्ध निरन्तर लिख जनता को आगाह करते रहे. इन्द्र सिंह नयाल ने जंगल के मुक़दमों में ग्रामीणों की पैरवी की.

जंगलात बंदोबस्त 1861, विकेट बंदोबस्त 1863-73 हेनरी रेमजे के समय लाया गया था जिससे हर गांव का चारागाह, जंगल की जमीन नाप कर सरकार के नाम की गई. गांव वालों को जता दिया कि पहले जंगल तुम्हारा था अब कागज पर हमारा है. नयाल जब 1948 से 1952 में नैनीताल जिला परिषद अध्यक्ष बने तो उन्होंने वन पंचायतों को मजबूत करने के प्रयास किए जिससे जंगल पर गांववालों का हक वापस मिले. हेनरी रेमजे ने 1874 में ही गाँवों में राजस्व पुलिस व्यवस्था आरम्भ कर दी थी जिसमें पटवारी को पुलिस सी शक्ति दी गई. लगान वसूली , जंगल के केस, आपसी झगडे, छोटी मोटी चोरी सब पटवारी निबटाता. पटवारी-पतरोल के हुकुम चलते, गांव वाले इनसे परेशान रहते. पांडे जी ने कुमाऊं के इतिहास में लिखा, “पहले पहाड़ में न वकील, न अपील, न दलील थी अब पटवारी राज ने शोषण का नया रास्ता खोल जनता को और जकड़ लिया”.

अंग्रेजों की यह नई चाल रही जो उन्होंने पुराने नियम कड़े किए. बेगार खतम हुई तो जंगल बंद किए गये. यह साफ प्रतिशोध था कि अब गोठ के जानवर कहां हकाओगे? चूल्हे के लिए और घर की जरूरतों के लिए लकड़ी कहाँ से लाओगे.यदि घास काटी, लकड़ी बीनी तो वन अधिनियम का हवाला दे जुर्माना,केस,हवालात की धमकी. फिर अंग्रेज अफसर का हुक्म होता चलो जंगल से लकड़ी लाने देंगे, जानवर चराने देंगे बदले में सड़क बनाने में बेगार दो. यानी कुली बेगार तो हट गया अब कानूनी बेगार शुरू हो गया.

इन्द्र सिंह नयाल ने जंगलात के मुक़दमों में ग्रामीणों की मुफ्त पैरवी की. भारत छोड़ो आंदोलन के समय राजद्रोह के साथ साथ वन कानून तोड़ने वाले मुक़दमे लड़े. बद्रीदत्त पांडे ने शक्ति अख़बार में लिखा कि, “जंगल हमारा है, कानून तुम्हारा नहीं चलेगा.” कुली बेगार 1921 में बंद हुआ. इसे रक्त हीन क्रांति कहा गया पर जंगल के कानून व बंदोबस्त को कठोरता से लागू करना अंग्रेजों का प्रतिशोध था. ये दूसरी गुलामी व शोषण था. पांडे-नयाल की जोड़ी ने इसके खिलाफ लड़ा-लिखा.

1865 में पहला वन अधिनियम जिसे 1878 में संशोधित किया गया में गांव के समीपवर्ती वनों को आरक्षित वन घोषित किया गया था जिसमें लकड़ी काटना, घास काटना,पत्ते तोडना, जानवर चराने को अपराध घोषित कर दिया गया.यह धारा 26 के अधीन अपराध घोषित किया गया जिसके लिए 6 माह की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकते थे.

हेनरी रैम्जे ने 1861 से 1873 तक “विकेट बन्दोबस्त कराया जिसमें हर गांव की सीमा नापी गई. गांव के चारागाह, पंचायती जंगल सबको सरकारी जंगल लिखा गया. गाँव वालों के पास सिर्फ नाप की खेती बची बाकी सब पर वन विभाग का कब्ज़ा. बेगार खतम होने के बाद अंग्रेज अफसर कहता, “तुम्हारे जानवर हमारे जंगल में चर रहे हैं, अब जुर्माना भरो या बेगार करो”.

रैम्जे ने ही पटवारी को पुलिस की शक्ति प्रदान की थी. अब जंगल का मामला हो या जमीन का सबका फैसला पटवारी करता. इससे दमन और आसान हो गया. कोई भी अगर बेगार से मना करता तो उसका वन अधिनियम में चालान कट जाता. पांडे व नयाल ने इसका तोड़ निकाला. फारेस्ट एक्ट 1878 के सन्दर्भ में पांडे ने लिखा कि जंगल पर पहला हक गांव का है. नयाल ने ऐसे कई मामले अदालत में लड़ कर सुलझाए. जिला परिषद अध्यक्ष बनने पर 1948 से 1952 की अवधि में वन पंचायतों को मजबूत करने पर जोर दिया जिससे जंगल का नियंत्रण फिर गाँव वालों को मिले. अंग्रेजों की चाल यह रही कि कुली बेगार गई तो क्या हुआ, जंगल तो हमारा है. जंगल के बूते फिर बेगार कराएंगे. पांडे व नयाल ने समझ लिया कि अब लड़ाई जंगल की है. 

स्वतंत्रता मिलने के बाद दोनों ने वन अधिकार और पंचायत को लेकर सवाल उठाया. वर्तमान का वन पंचायत आंदोलन इन्हीं की देन है. 1921 में कुली बेगार खतम होने के बाद अंग्रेजों ने फारेस्ट एक्ट 1878 से जंगल के हक छीन लिए. गांव वालों की घासपात लकड़ी काटने पर मुकदमा जुर्माना जेल. जनता के आक्रोश को देख 1931 में वन पंचायत नियमावली बनी. अंग्रेजों ने चालाकी कर निर्णय लिया कि कुछ जंगल गांव वालों को दे देते हैं वरना विद्रोह हो जाएगा. वह चाहते थे कि गाँव वाले नाराज भी न हों और जंगल पर सरकारी कब्ज़ा बने रहे.पांडे और नयाल ने इसे जंगल पर हक वापसी की पहली सीढ़ी माना. पहले जंगल आरक्षित थे अर्थात वन विभाग के कब्जे में थे. वन पंचायत बनने के बाद कुछ हिस्सा सिविल सोयम वन गाँव की पंचायत को सँभालने के लिए दिया. लकड़ी-घास काटने पर वन दरोगा-पतरोल की मर्जी नहीं बल्कि पंचायत का निर्णय मान्य बना कि कौन कब घास कटेगा, सूखी लकड़ी बीनेगा. पहले जुर्माना सीधे वन विभाग लेता अब नियमों के उल्लंघन पर नियत कर की वसूली पंचायत वसूल कर गाँवों के काम पर खर्च करे. 

1947 तक वन पंचायतों के पास न धन था और न ही प्रबंधन की शक्ति., वन विभाग मनमर्जी से जब चाहे रोक लगा देता. 1947 के बाद प्रशासन में आने के बाद नयाल वन पंचायत को कागजी कार्यवाही से जमीनी काम पर लाए. 1948 से 1952 में नैनीताल जिला परिषद अध्यक्ष रहते उन्होंने हर स्कूल के पास वन पंचायत बनाने पर जोर दिया, कहा, “बच्चे पढ़ेंगे जंगल बचेंगे” जिला परिषद से पौधारोपण, चारदिवारी के लिए धन दिलाया. फारेस्ट एक्ट की गहरी समझ होने से ग्रामीणों को वन मुक़दमों से बचाया. लकड़ी चोरी रोकने के लिए वन पंचायत को निगरानी का हक दिया. 1962 जंगल कटान से होने वाले नुकसान के बारे में लोगों को समझाया. कहा कि वन पंचायत तुम्हारी है. पेड़ बचाओगे, लगाओगे तो धरती हरी भरी रहेगी पानी जमा होगा. बद्रीदत्त पांडे ने लिखा कि चंद राजाओं के समय भी जंगल पर गांव वालों का हक था.

उत्तराखंड में अब 12000 से अधिक वन पंचायतें हैं. इन्द्र सिंह नयाल ने 1950 में जिस कानून के बदलने की बात की थी वह वन अधिकार कानून 2006 में लाया गया. नयाल जिला परिषद की बैठकों में वन अधिकारियो को बुला कर यह स्पस्टीकरण मांगते कि वह वन पंचायत के मामले में दखल क्यों देता है. वन विभाग की मनमानी पर रोक लगाते. नयाल ने पंचायत को वन विभाग के बराबर बैठाया. उन्होंने लखनऊ में तीन मुद्दे उठाए जिनमें पहला था आर्थिक अधिकार, अर्थात वन पंचायत को अपने जंगल की घास, सूखी लकड़ी, लीसा बेचने का हक मिले. उनका मानना था कि जंगल से कमाई होगी तो ग्रामीण खुद जंगल की सुरक्षा करेंगे. यदि मात्र जंगल के संरक्षण की बात हो और ग्रामीणों का उस पर कोई हक न हो तो चोरी होगी ही. नैनीताल भ्रष्टाचार विरोधी जन समिति में स्पष्ट कहा कि यदि वन विभाग से लकड़ी की चोरी रोकनी है तो वन पंचायत को निगरानी का कानूनी हक मिले. अंग्रेजों ने गांव को पंचायत के नाम पर सीमित जंगल दिए थे. नयाल ने इस रकबे को बढ़ाने के लिए बहुत प्रयास किए. स्पष्ट कहा कि आरक्षित वन को कम कर वन पंचायत को सौंपा जाए.वह 1962 में इसका कानून तो नहीं बदलवा पाए पर सरकार की फाइलों में वन पंचायत सशक्तीकरण शब्द इन्हीं के प्रयासों से आया. असली कानून 2006 में “वन अधिकार अधिनियम” से बदला. 

इन्द्र सिंह नयाल 1962 से समाजसेवा में गहरे जुटे तो वन पंचायतों के प्रसार के लिए जन जागरण किया. गांव -गांव जा कर कहते कि कुली बेगार 1921 में खतम किया अब जंगल की बेगार खत्म करो. वन पंचायत तुम्हारी है इसे अफसर के भरोसे न छोड़ो.. कुछ वन पंचायतों को गोद ले कर मॉडल बनाया. यह दिखाया कि अगर पंचायत ईमानदार हो तो जंगल से स्कूल का खर्चा निकल सकता है. अपने अभियान में महिलाओं और किशोर वय को जोड़ा व कहा कि मर्द तो रोजी रोटी के लिए शहर चले जाते हैं अब जंगल औरतें बचाएंगी. चूल्हे की लकड़ी और जानवरों की घास जंगल ही देता है इसे कैसे फलना फूलना है महिलाऐं जानती हैं.

वन पंचायत में इन्द्र सिंह नयाल ने जिस पक्ष को सबसे महत्वपूर्ण माना उनमें स्कूल प्राथमिक रहा. स्कूल से बच्चे पढ़ लिख निकलेंगे. हिसाब किताब में होशियार बनेंगे. अपने जंगल की रखवाली की सोच बनेगी. फिर आती है पंचायत जो वनों की सुरक्षा का जिम्मा संभाले. उसे पर्याप्त धन मिले ताकि संरक्षण का काम चलता रहे. पंचायत के स्पष्ट कानून बनें ताकि वन विभाग दादागिरी न करे. जंगल की रखवाली में महिलाओं को प्राथमिकता मिले ताकि मर्दों के पलायन के बाद वह जंगल बचाने की सुध लें. पंचायत से जंगल की सहभागिता की सोच उन्होंने 1950 के दशक से ही उभार दी थी. सामाजिक सुधार, ग्रामीण विकास और स्थानीय शासन से पहाड़ के विकास की संभावनाओं पर वह निरन्तर लगे रहे. नयाल के लिए अलग राज्य लक्ष्य नहीं बल्कि साधन था. उनका वास्तविक लक्ष्य तो गांधीवादी आदर्शो पर आधारित एक न्याय पूर्ण, स्वावलम्बी व कुरीतियों से मुक्त समाज रहा. उनकी सोच में राज्य समाज का साधन था. उन्होंने कहा कि पहले समाज बदले, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा जबकि बाद के आंदोलनों में राज्य ही लक्ष्य बन गया.

उत्तराखंड का राजनीतिक और सामाजिक विकास केवल राष्ट्रीय आंदोलन का परिशिष्ट नहीं रहा बल्कि एक स्वायत्त ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में उभरा. जिसमें स्थानीय समाज व औपनिवेशिक व्यवस्था व क्षेत्रीय पहचान के जटिल सम्बन्ध सम्मिलित रहे. स्वाभाविक रूप से यह जानना जरुरी हो जाता है कि क्षेत्रीय अस्मिता कैसे निर्मित व राजनीतिक रूप से विकसित हुईं. राज्य निर्माण की प्रक्रिया में स्थानीय व राष्ट्रीय शक्तियों का संयोजन क्या था? उपाश्रित अध्ययन के अनुसार इतिहास को कुलीन वृतांत से हट कर जन सामान्य के दृष्टिकोण से देखना जरुरी है क्षेत्रीयता अंचल की पहचान और संसाधनों के आधार पर राजनीतिक दावों को समझने का ढांचा देता है. 

इंद्र सिंह नयाल ने कुमाऊं गढ़वाल के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था व पृथक पहाड़ी राज्य की अवधारणा को वैचारिक आधार दिया. उनका योगदान कानूनी प्रशासनिक तर्क, कुमाऊं परिषद के मंच और औपनिवेशिक शासन से संवाद के माध्यम से आया. नयाल की भूमिका तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण रही. पहला तो कानूनी दृष्टि से पहाड़ की समस्याओं को प्रस्तुत करना जिसके लिए उन्होंने ब्रिटिश शासन के सामने यह तर्क रखा कि पहाड़ की भूमि व्यवस्था, खसरा-खतौनी, बंदोबस्त अलग है. वन कानून ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को दुर्बल बना चुके हैं. प्रशासनिक दूरी व सीमित परिवहन से शासन के निर्देश प्रभावी नहीं हो पाते. दूसरा पक्ष एक अलग प्रशासनिक इकाई का विचार है. कुमाऊं-गढ़वाल को संयुक्त प्रान्त से अलग प्रशासनिक ढांचे में रखा जाय. स्थानीय अधिकारियों को समस्या के समाधान के अधिकार दिए जाएँ. पहाड़ी इलाके के लिए अलग नीति बने. उनकी यही सोच आगे पृथक राज्य की वैचारिक नीति बनी.

तीसरी बात यह कि अपने वकालत व सार्वजनिक जीवन के माध्यम से नयाल ने शिक्षित वर्ग, स्थानीय नेताओं व समाज सुधारकों को यह समझाया कि पहाड़ की समस्याएं केवल प्रशासनिक उपेक्षा नहीं संरचनात्मक हैं. पहाड़ी राज्य की वैचारिक नींव पहाड़ की भौगोलिक विशिष्टता, संसाधन बनाम व्यक्तिगत हित और प्रशासनिक विकेंद्रीयकरण से पड़ी. नयाल ने माना कि स्थानीय समस्याओं का समाधान केवल स्थानीय प्रशासनिक ढांचे के द्वारा किया जाना सम्भव है. नयाल का योगदान प्रत्यक्ष आंदोलन से अधिक वैचारिक व बौद्धिक आधार के रूप में महत्वपूर्ण है. प्रशासनिक व संरचनात्मक आधार पर उन्होंने क्षेत्रीय स्वशासन को महत्त्व दिया. दूसरी ओर बद्रीदत्त पांडे ने औपनिवेशिक नीतियों का विरोध व जनता की राजनीतिक चेतना जाग्रत कर तत्काल अलग राज्य की मांग नहीं की. अपने लेखन व अख़बार के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पहले औपनिवेशिक अत्याचार का विरोध हो व जनता आंदोलन के लिए संगठित हो.

बद्री दत्त पांडे व इन्द्र सिंह नयाल दोनों ने सामाजिक कुप्रथा दूर कर आर्थिक रूप से सबल होने पर जोर दिया जिससे जीवन स्तर बेहतर हो. 1921 में पांडे जी 39 वर्ष के थे तो नयाल 19 वर्ष के.दोनों की जोड़ी में भले ही उम्र का फासला था पर काम में एका था. दोनों की जोड़ी “कलम-कानून” का साथ थी. पांडे जी अल्मोड़ा में छपे अख़बार से जनमत बनाते तो नयाल उन्हें अंग्रेजों के दमन के विरुद्ध कानूनी ढाल देते. दोनों ने जेल भी भुगती. पांडे जी पांच बार तो नयाल जी छह बार.देश स्वतंत्र हुआ तो पांडे जी सांसद बने और नयाल विधान परिषद के सदस्य. दोनों अपनी सोच का पहाड़ बनाने में जुट गये. पांडे जी इस आंदोलन के दिमाग थे तो नयाल जी हाथ -पैर.1921 के कुली बेगार ने कुमाऊं को स्वाभिमान दिया तो 1929 में गांधीजी के दौरे ने राष्ट्रीय पहचान बनाई.

इन्द्र सिंह नयाल की सोच थी कि केवल पहचान ही पर्याप्त नहीं बल्कि संस्थागत व सामाजिक सुधार किए जाने आवश्यक हैं. विकास उन्मुख नीति-योजना व दृष्टिकोण से उन्होंने ग्राम आधारित विकास, शिक्षा व समाज सुधार व प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार करने का रास्ता चुना. उन्होंने हिमालय में जन चेतना का स्फुरण किया.दोनों समकालीन थे और कुमाऊं के स्वतंत्रता संग्राम के दो सबसे बड़े गांधीवादी विचारक रहे. बद्री दत्त पांडे अग्रज रहे, इन्द्र सिंह नयाल से बीस वर्ष बड़े. बद्रीदत्त पांडे को कुमाऊं केसरी कहा गया तो इन्द्र सिंह नयाल को युवा पीढ़ी का गांधीवादी जननायक. इस जोड़ी ने लगभग तीस वर्षों तक कुमाऊं को जनचेतना हेतु दिशा दी. दोनों की शिक्षा पहले अल्मोड़ा और फिर उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई. दोनों ने संघर्ष से निर्माण का आधार दिया. इसका मंत्र था, “पहले अंग्रेजों से लड़ो, फिर पहाड़ को खुद बनाओ”. दोनों ने अपने हक की लड़ाई की वैचारिक संरचना निर्मित की. उनका हथियार अख़बार था – नियम कानून की समझ थी. दोनों का कार्यक्षेत्र आरम्भ में अल्मोड़ा रहा. उन्होंने हिमालय में जन चेतना का स्फुरण किया. दोनों समकालीन थे और कुमाऊं के स्वतंत्रता संग्राम के दो सबसे बड़े गांधीवादी विचारक रहे. 

बद्री दत्त पांडे अग्रज रहे, इन्द्र सिंह नयाल से बीस वर्ष बड़े. बद्रीदत्त पांडे को कुमाऊं केसरी कहा गया तो इन्द्र सिंह नयाल को युवा पीढ़ी का गांधीवादी जननायक. इस जोड़ी ने लगभग तीस वर्षों तक कुमाऊं को जनचेतना हेतु दिशा दी. दोनों की शिक्षा पहले अल्मोड़ा और फिर उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई.दोनों ने संघर्ष से निर्माण का आधार दिया. इसका मंत्र था, “पहले अंग्रेजों से लड़ो, फिर पहाड़ को खुद बनाओ”. दोनों ने अपने हक की लड़ाई की वैचारिक संरचना निर्मित की. उनका हथियार अख़बार था -नियम कानून की समझ था. दोनों का कार्यक्षेत्र आरम्भ में अल्मोड़ा रहा. उन्होंने हिमालय में जन चेतना का स्फुरण किया. दोनों समकालीन थे व कुमाऊं के स्वतंत्रता संग्राम के दो सबसे बड़े गांधीवादी विचारक रहे. बद्री दत्त पांडे अग्रज रहे, इन्द्र सिंह नयाल से बीस वर्ष बड़े. बद्रीदत्त पांडे को कुमाऊं केसरी कहा गया तो इन्द्र सिंह नयाल को युवा पीढ़ी का गांधीवादी जननायक. इस जोड़ी ने लगभग तीस वर्षों तक कुमाऊं को जनचेतना हेतु दिशा दी. दोनों की शिक्षा पहले अल्मोड़ा और फिर उच्च शिक्षा इलाहाबाद में हुई.दोनों ने संघर्ष से निर्माण का आधार दिया. इसका मंत्र था, “पहले अंग्रेजों से लड़ो, फिर पहाड़ को खुद बनाओ”. दोनों ने अपने हक की लड़ाई की वैचारिक संरचना निर्मित की. उनका हथियार अख़बार था -नियम कानून की समझ थी .दोनों का कार्यक्षेत्र आरम्भ में अल्मोड़ा रहा. पांडे ने पृथक राज्य की स्पष्ट मांग न रखी.उन्होंने प्रशासनिक स्वायत्तता व राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर जोर दिया. उन्होंने उत्तराखंड के वैचारिक पक्ष को चुनावी व राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में रखने की दृढ़ता दिखाई. उनका दृष्टिकोण राजनीतिक अभिव्यक्ति का रहा. उन्होंने पहाड़ के हित हेतु राज्य सरकार से अलग अलग समस्याओं के निदान की लगातार मांग की. भाषण दिए.सरकार को चेताया जिससे नागरिकों की आवाज बन सरकार कार्यवाही पर जोर दे. इस वैचारिक पक्ष को उन्होंने चुनावी व राजनीतिक मुद्दा बनाया.

नैनीताल के वकील दया किशन पांडे का दृष्टिकोण व्यावहारिक प्रशासनिक सुधार से संबंधित रहा. पर्वतीय क्षेत्र की उपेक्षा को ध्यान में रख उन्होंने विशेष प्रांतीय ढांचे का तर्क दिया. पहाड़ के विकास की नीतियाँ बनाने में उन्होंने स्थानीय प्रतिनिधित्व व निर्णय निर्माण में उनकी सशक्त भूमिका को महत्वपूर्ण समझा. दयाकिशन पांडे केवल बौद्धिक स्तर पर ही नहीं बल्कि व्यवहारिक राजनीति में भी सक्रिय रहे. उन्होंने हर संभव कोशिश की कि पहाड़ की समस्याओं को विधान परिषद /विधान सभा में उठाया जाए. उनके समय पृथक राज्य की मांग व्यापक आंदोलन नहीं बनी थी पर उन्होंने पहाड़ के प्रश्नों को राजनीतिक विमर्श में शामिल किया. बुद्धिजीवी यह मानते थे कि पहले प्रशासनिक स्वायत्तता मिले तो आगे राजनीतिक ढांचा विकसित हो सकता है.यह अनुभव हो गया था कि पहाड़ की समस्याएं केवल स्थानीय शिकायतें नहीं बल्कि प्रशासनिक संरचना की समस्या है. पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भिन्न व्यवस्था होनी चाहिये. इस कारण पर्वतीय प्रश्न को एक अलग नीतिगत समस्या माना जाने लगा था. वर्ष 1920 के बाद से ही यह अनुभव हो चला था कि पहाड़ की समस्याएं संरचनात्मक हैं इसलिए अलग प्रशासनिक ढांचा आवश्यक है. अदालतों में काम करते अधिवक्ताओं को पहाड़ की कई समस्याओं का अनुभव हुआ जिनमें आम आदमी व खास तौर पर ग्रामीण जनता असहाय रहता है. ऐसी स्थितियाँ भूमि बंदोबस्त व रिकॉर्ड की जटिलता, वन कानूनों के कारण ग्रामीणों के अधिकारों में कमी, प्रशासन से दूरी व मैदानी इलाकों से पंहुचे अधिकारियों की पहाड़ की परिस्थितियों से अनभिज्ञता से उत्पन्न होतीं हैं.

बद्री दत्त पांडे ने पत्रकारिता व लेखन से जनसामान्य को जागरूक बनाते हुए बौद्धिक स्तर पर पृथक राज्य का औचित्य सिद्ध किया. वहीं इन्द्र सिंह नयाल ने कानून व समाज सेवा से जनता को उसके वाजिब हक के प्रति जागरूक किया व इसे संस्थागत स्वरूप दिया. दया किशन पांडे ने राजनीति व चुनाव के माध्यम से राज्य निर्माण का लक्ष्य तय किया.

बद्रीदत्त पांडे ने पृथक राज्य के विचार से पहाड़ की क्षेत्रीय पहचान बनाई तो अपने विस्तृत लेखन से कुमाऊं को ऐतिहासिक इकाई के रूप में स्थापित किया. इन्द्र सिंह नयाल ने संरचना का निर्माण किया जिसमें ग्राम आधारित विकास का प्रारूप, विद्यालयों की स्थापना से शिक्षा के स्तर के सुधार व प्रशासन को जनता की समस्या सुलझाने में संवेदनशील रहने की सोच शामिल थी. पृथक राज्य को राजनीतिक मुद्दा बनाने वाले तथा जनप्रतिनिधित्व के माध्यम से इसे आगे प्रसारित करने वालों में दया किशन पांडे थे. उन्होंने पृथक राज्य की मांग का राजनीतिक रूपान्तरण किया.

बद्रीदत्त पांडे ने राज्य की स्पष्ट मांग नहीं रखी. उनकी राजनीतिक अभिरूचि व कार्यक्रम भी सीमित थे. इन्द्र सिंह नयाल का वैचारिक प्रभाव पुष्ट था पर उनका लेखन कम रहा और जन आंदोलन भी सीमित थे. दयाकिशन पांडे का जनाधार भी सीमित था. वह पृथक राज्य के आंदोलन का पूर्ण विस्तार नहीं कर पाए. इस प्रक्रिया में बद्रीदत्त पांडे ने पहचान दी, इन्द्र सिंह नयाल ने विकास व दयाकिशन पांडे ने राजनीति के स्तर दिए. उत्तराखंड आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं वरन तीन स्तरों के ऐतिहासिक विकास का परिणाम था. यह मात्र भावनात्मक नहीं था बल्कि सामाजिक आर्थिक राजनीतिक प्रक्रिया थी. बद्रीदत्त पांडे ने “कौन हैं हम”बताया तो इन्द्र सिंह नयाल ने “कैसे विकसित हों “की रुपरेखा रखी. दया किशन पांडे ने “कैसे राज्य बने” का पथ दिया.

इस प्रकार कुमाऊं में बौद्धिक व कानूनी ढांचा तथा सार्वजनिक वाद विवाद की परम्परा विकसित हुई तो गढ़वाल में सामाजिक व पर्यावरण आंदोलनों से पृथक राज्य की मांग को गति मिली. ब्रिटिश काल में कुमाऊं प्रशासनिक रूप से जल्दी संगठित हुआ. इसका दस्तावेजी आधार एटकिंसन के द्वारा लिखित विवरणोँ में है. कोर्ट-कलेक्टरेट- में जानकारी, दस्तावेज, फाइल व्यवस्थित रूप से लिखे गये, संकलित हुए व सुरक्षित रूप से सहेजे गये. बुद्धिजीवीयों व वकीलों का सार्वजनिक नेतृत्व उभरा. कुमाऊं में उन्नीसवीं सदी के आरम्भ से ही स्कूल-विद्यालय खुले. स्थानीय अख़बार निकले, छपाई की मशीने लगीं. लेखन और बहस से स्वतंत्रता आंदोलन ने गति पकड़ ली. जहां शिक्षित व्यक्ति, छापाखाना और न्यायालय साथ होते हैं वहां नेतृत्व उभरता है. कुमाऊं में वकीलों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही.

1916 में गठित “कुमाऊं परिषद” से संस्थागत राजनीति का उदय हुआ. इससे क्षेत्रीय समस्याओं के निराकरण की सम्भावना बनी. सरकार को ज्ञापन देना, प्रस्ताव पारित कर वैधानिक रूप से अपनी आवाज उठा समस्याओं का समाधान करने का सिलसिला जारी रहा. अधिवक्ता होने से शासन से संवाद करने की भाषा इन्द्र सिंह नयाल जानते थे. दूसरी ओर गढ़वाल में आंदोलनों का क्रम व पथ कुछ भिन्न रहा. टिहरी रियासत में राजा का शासन था तो गढ़वाल में प्रशासनिक संस्थाऐं कुमाऊं के सापेक्ष कम थीं इसलिए वहां बौद्धिक वातावरण व कानूनी ढांचा पनपने में विलम्ब हुआ.इससे जनता में असंतोष का रूप संस्थागत व कानूनी कम रहा बल्कि सामाजिक आंदोलनकारी अधिक रहा. गढ़वाल में वन आधारित संघर्ष अधिक हुए जिससे कालांतर में चिपको आंदोलन उभरा. गढ़वाल में शिक्षक, पत्रकार,सामाजिक व पर्यावरण कार्यकर्त्ताओं के साथ महिलाओं की आंदोलन में सशक्त भूमिका रही.

कुमाऊं में शिक्षा के प्रसार से मध्यवर्गीय पेशेवर, शिक्षक, वकील, व सामान्य जन आगे आए जिन्होंने आंदोलन को वैचारिक धरातल पर ठोस बनाया व कानूनी स्वरूप से सुद्रढ़ किया. गढ़वाल की अर्थव्यवस्था का स्वरूप अधिक ग्रामीण आबादी वाला व स्थानीय संसाधनों पर निर्भर था जिसमें पेशेगत विविधता कम थी. गढ़वाल में जल -जमीन -जंगल को ले कर जन आंदोलन व प्रतिरोध के स्वर उभरे जिनके पीछे ग्रामीण समूह था, सामाजिक व पर्यावरण कार्यकर्त्ता थे. कुमाऊं में ज्ञापन, बहस और याचिका से आम जनता के साथ शिक्षक, वकील व पत्रकारों ने प्रशासन तक अपनी समस्याएं पंहुचाने का क्रम जारी रखा. इसीलिए कुमाऊं में आंदोलन की भाषा कानूनी, संवैधानिक व अख़बार के माध्यम से प्रकट हुईं तो गढ़वाल में जन आंदोलन व पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता से इनका प्रसार हुआ.1990 के दशक में जब उत्तराखंड आंदोलन अपने उत्कर्ष पर आया तो कुमाऊं की कानूनी राजनीतिक परम्परा व गढ़वाल की जन आंदोलन परम्परा का संगम दिखा.

बद्री दत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल की जोड़ी का सबसे बड़ा योगदान यह था कि कुमाऊं परिषद के मंच से उत्तराखंड राज्य की संकल्पना का वैचारिक आधार निर्मित हुआ. स्वतंत्र होने के बाद उन्होंने स्पष्ट कहा कि पहाड़ दिल्ली या लखनऊ की राजधानी से नहीं वरन अल्मोड़ा से चलेगा. एक ने कलम से लड़ाई लड़ी तो दूसरे ने कानून से दोनों ने मिल कर पहाड़ को जगाया, पढ़ाया और बनाया.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

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