उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु इस पर्वतीय प्रदेश के प्राकृतिक भू-दृश्य को पूर्णता प्रदान करने में सरोवरों और झीलों की भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका है. महान हिमालय से लेकर लघु हिमालय और शिवालिक तक अनेक प्रकार के प्राकृतिक जलाशय मिलते हैं. इनका निर्माण केवल प्राकृतिक सौन्दर्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इनके पीछे हिमालय की जटिल भूगर्भीय संरचना, हिमानी क्रियाएँ, नदी अपरदन, भूस्खलन तथा धरातलीय हलचलों जैसी दीर्घकालिक प्राकृतिक प्रक्रियाएँ कार्य करती रही हैं.
उत्तराखण्ड के महान व लघु हिमालय में वर्तमान में जो सरोवर अथवा ताल मौजूद हैं, उनका उल्लेख उनकी स्थलाकृति, उत्पत्ति और भौगोलिक स्थिति के संदर्भ में किया जाना आवश्यक है. हिमालय में झीलों की उत्पत्ति को समझने के लिए यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि यह पर्वत-प्रदेश आज भी भूगर्भीय दृष्टि से सक्रिय और अपेक्षाकृत युवा पर्वत-तंत्र है. यहाँ धरातल का उत्थान, भ्रंशन, अपरदन, भूस्खलन तथा नदी-प्रणालियों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है. यही कारण है कि उत्तराखण्ड की अनेक झीलों के निर्माण के पीछे एक से अधिक प्राकृतिक प्रक्रियाओं की भूमिका दिखाई देती है.
डबराल के मतानुसार कुछ सरोवरों का निर्माण हिमानियों द्वारा बहाए गए मोरेन (हिमोढ़) से अथवा नदी-मार्ग में शिलाओं के खिसक जाने के उपरान्त हुआ है, जबकि कुछ सरोवरों की उत्पत्ति धरातल के नीचे खिसक जाने से बनी अवसादी अथवा अवनत भूमि में हुई है. हिमनदों के हिमोढ़ से जब प्राकृतिक अवरोध निर्मित होता है तो उसके पीछे हिमनदों का द्रवित जल धीरे-धीरे एकत्रित होने लगता है. शनैः-शनैः एकत्रित जलराशि झील का आकार ग्रहण कर लेती है. इस प्रकार की झीलों को हिमानी अथवा हिमानी-अवरोधित झीलों की श्रेणी में रखा जा सकता है.
हिमालयी क्षेत्रों में झील निर्माण की दूसरी महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया भूस्खलन है. मध्य हिमालय में कभी-कभी बड़े पैमाने पर भू-स्खलन होने पर उसके वृहत् भूखंड और शिलाखंड नदी के प्रवाह-पथ में अवरोध पैदा कर देते हैं. परिणामस्वरूप नदी का बहता हुआ जल पीछे रुकने लगता है और कुछ समय में वहाँ अस्थायी झील का निर्माण हो जाता है. भागीरथी, अलकनन्दा तथा अन्य हिमालयी नदियों की घाटियों में इस प्रकार की घटनाओं की सम्भावना बनी रहती है. ऐसी झीलें प्राकृतिक रूप से अस्थायी भी हो सकती हैं और दीर्घकाल में नदी द्वारा अवरोध काट दिए जाने पर समाप्त भी हो सकती हैं.
इसी प्रकार नदी-मार्ग में चट्टानों अथवा शिलाखंडों के खिसकने से बने अवरोध भी जल को रोक सकते हैं. हिमालय की तीव्र ढाल, कमजोर एवं भंगुर शैल-संरचनाएँ तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भूस्खलन की सक्रियता इस प्रक्रिया को और महत्त्वपूर्ण बनाती है. आधुनिक समय में जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनदों के पीछे हटने और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में नई अथवा विस्तारित झीलों के निर्माण ने इस विषय को और अधिक प्रासंगिक बना दिया है.
उत्तराखण्ड की कुछ छोटी झीलें नदी-घाटियों की स्थानीय स्थलाकृति तथा जल निकासी की परिस्थितियों से भी विकसित हुई हैं. मैदानी भाग की नदियों में विसर्पी प्रवाह, पुरानी नदी-धाराओं का कटकर अलग हो जाना और जल के निम्न स्थानों में एकत्रित होना छोटे जलाशयों के निर्माण का कारण बन सकता है. हरिद्वार जनपद में गंगा नदी के आसपास कुछ स्थानों पर इसी प्रकार की आंशिक स्थलाकृतियाँ देखी जा सकती हैं.
चूना-पत्थर वाले क्षेत्रों में जल की भूगर्भीय क्रियाशीलता भी उल्लेखनीय है. जहाँ जल शैलों की दरारों और कमजोर भागों में प्रवेश कर उन्हें धीरे-धीरे प्रभावित करता है, वहाँ धरातल पर छोटे अवसाद या गड्ढे विकसित हो सकते हैं. इनमें वर्षा और भूमिगत जल के संचय से स्थानीय जलाशय बनना सम्भव है. इस प्रकार उत्तराखण्ड की झीलों को केवल एक ही भू-प्रक्रिया से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा; इनके निर्माण में हिमानी, भूस्खलन, नदीय, भूगर्भीय तथा स्थानीय स्थलाकृतिक प्रक्रियाओं का अलग-अलग अथवा संयुक्त योगदान हो सकता है.
लघु हिमालय में स्थित नैनीताल झील-समूह उत्तराखण्ड के सरोवरों का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण है. नैनीताल, भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, मालवाताल तथा खुर्पाताल आदि झीलें कुमाऊँ हिमालय की विशिष्ट जल-स्थलाकृति प्रस्तुत करती हैं. इनमें नैनीताल और भीमताल जैसी झीलें न केवल प्राकृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, बल्कि इनके किनारे विकसित बस्तियों और पर्यटन गतिविधियों ने इन्हें सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से भी विशिष्ट बना दिया है.
नैनीताल क्षेत्र की झीलों की उत्पत्ति को लेकर भूवैज्ञानिकों के बीच विभिन्न मत रहे हैं. कुछ अध्ययनों में इनके निर्माण में भू-स्खलन, भ्रंशन तथा धरातलीय हलचलों की भूमिका पर विचार किया गया है. अतः इन झीलों को समझने के लिए हिमालय की भूगर्भीय संरचना और स्थानीय स्थलाकृति को साथ-साथ देखना आवश्यक है. झीलों के चारों ओर पर्वतीय ढालों की स्थिति, जलग्रहण क्षेत्र, वर्षा, सतही अपवाह तथा भूजल इनकी जल-व्यवस्था को प्रभावित करते हैं.
उत्तराखण्ड के उच्च हिमालय में अनेक छोटे-बड़े हिमानी सरोवर पाए जाते हैं. केदारताल, वासुकीताल,रूपकुंड, हेमकुंड तथा अन्य उच्च हिमालयी जलाशय हिमानी और हिमनदीय भू-दृश्य के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. इन झीलों का जल मुख्यतः हिम-पिघलन, हिमनदों, वर्षा तथा आसपास की ढालों से आने वाले सतही अपवाह से प्राप्त होता है. ऊँचाई अधिक होने के कारण यहाँ तापमान, हिमपात और हिम-पिघलन की मौसमी प्रकृति झीलों के जलस्तर को प्रभावित करती है.
इन उच्च हिमालयी झीलों का अध्ययन आज केवल भौगोलिक जिज्ञासा का विषय नहीं रह गया है. हिमनदों के सिकुड़ने, तापमान में वृद्धि और वर्षा के स्वरूप में परिवर्तन के कारण हिमानी झीलों के आकार और जलराशि में बदलाव हो सकता है. यदि किसी झील के प्राकृतिक अवरोध की संरचना कमजोर हो और अचानक जलराशि बढ़ जाए, तो हिमानी झील विस्फोट बाढ़ (GLOF) जैसी घटनाएँ निचली घाटियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं. इसलिए उच्च हिमालयी सरोवरों की निगरानी आपदा-प्रबंधन की दृष्टि से भी आवश्यक है.
उत्तराखण्ड के सरोवर जैव-विविधता के महत्त्वपूर्ण केन्द्र हैं. ये स्थानीय वनस्पतियों, जलीय जीवों और पक्षियों के लिए आवास उपलब्ध कराते हैं. साथ ही ये वर्षाजल और हिम-पिघलन से प्राप्त जल को कुछ समय के लिए संचित करके स्थानीय जल-चक्र को संतुलित करने में सहायता करते हैं. पर्वतीय बस्तियों में झीलों और तालों का सांस्कृतिक महत्त्व भी कम नहीं है. अनेक ताल धार्मिक आस्था, लोकविश्वास, मेलों और स्थानीय परम्पराओं से जुड़े हुए हैं.
दूसरी ओर बढ़ता पर्यटन, अनियोजित निर्माण, सीवेज, ठोस कचरा, जलग्रहण क्षेत्रों में अतिक्रमण और वनों का क्षरण झीलों के अस्तित्व के लिए चुनौती बन रहे हैं. झीलों में गाद का जमाव, जल की गुणवत्ता में गिरावट और प्राकृतिक जलागम क्षेत्रों में परिवर्तन इनके दीर्घकालीन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. इसलिए संरक्षण का दृष्टिकोण केवल झील के जल तक सीमित न होकर उसके सम्पूर्ण जलग्रहण क्षेत्र पर केन्द्रित होना चाहिए.
उत्तराखण्ड के सरोवर हिमालय की भूगर्भीय सक्रियता, हिमानी प्रक्रियाओं और नदी-प्रणालियों के विकास की जीवंत अभिव्यक्ति हैं. कुछ झीलें हिमानी अवरोध से, कुछ भूस्खलन अथवा नदी-मार्ग में अवरोध से और कुछ धरातलीय एवं भूगर्भीय प्रक्रियाओं से निर्मित हुई हैं. नैनीताल झील-समूह से लेकर उच्च हिमालय के हिमानी तालों तक प्रत्येक सरोवर अपने निर्माण की एक विशिष्ट भूगर्भीय कहानी कहता है.
आज आवश्यकता है कि इन सरोवरों का अध्ययन केवल पर्यटन की दृष्टि से न किया जाए, बल्कि भूविज्ञान, जलविज्ञान, पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन और आपदा-जोखिम को एक साथ जोड़कर किया जाए. इनके जलग्रहण क्षेत्रों का संरक्षण, वैज्ञानिक निगरानी, प्रदूषण नियंत्रण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ही इन प्राकृतिक जलाशयों को भविष्य के लिए सुरक्षित रख सकती है. इस दृष्टि से उत्तराखण्ड के सरोवर हिमालय की प्राकृतिक विरासत होने के साथ-साथ उसके पर्यावरणीय संतुलन के संवेदनशील संकेतक भी हैं.
पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड, देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.
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