Featured

गलगोटिया वाला कॉपी नहीं, असली नवाचार है अल्मोड़ा के रवि टम्टा का ड्रोन

अल्मोड़ा के काफलीखान गांव के रवि टम्टा ने जब अपने बनाए फ्लाइंग व्हीकल “हापिडा स्काईनेक्स” की पहली उड़ान का वीडियो सार्वजनिक किया, तो कुछ ही घंटों में यह पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बन गया. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लेकर स्थानीय प्रशासन तक, हर स्तर पर रवि की सराहना हुई. लेकिन जैसा कि हर बड़ी उपलब्धि के साथ होता है, तारीफ के साथ-साथ आलोचना भी शुरू हो गई. कुछ लोगों ने सवाल उठाए कि यह तकनीक नई नहीं है, चीन और दूसरे देशों में पहले से ऐसे प्रोटोटाइप बन चुके हैं. और तो और, उत्तर प्रदेश के एक नेता ने तंज कसते हुए इसे “गलगोटिया यूनिवर्सिटी स्टाइल इनोवेशन” तक कह डाला, यानी सीधे-सीधे यह कहने की कोशिश कि यह सिर्फ चीनी मॉडल की नकल है, कोई मौलिक उपलब्धि नहीं.

इस बहस में जितने लोग समर्थन में खड़े हैं, उतने ही आलोचना करने वालों की संख्या भी कम नहीं. पर सच यह है कि इस पूरी बहस का केंद्र-बिंदु गलत जगह पर टिका दिया गया है. सवाल यह नहीं होना चाहिए कि तकनीक कहां से प्रेरित है. सवाल यह होना चाहिए कि यह तकनीक किसने, किन हालात में, और किस मकसद से बनाई. और इसी नजरिए से देखा जाए तो साफ है, गलगोटिया यूनिवर्सिटी वाला कॉपी नहीं, असली नवाचार है अल्मोड़ा के रवि टम्टा का जहाज़.

रवि टम्टा की उपलब्धि को सिर्फ एक “फ्लाइंग व्हीकल के उड़ने” की खबर के तौर पर देखना, इस पूरी कहानी के साथ नाइंसाफी होगी. ऐसी बहुत सी बातें हैं जिनकी तारीफ करनी ही पड़ेगी. पहली बात, उसने यह सब कुछ अल्मोड़ा में रहकर किया. किसी बेंगलुरु, गुरुग्राम या हैदराबाद की टेक कंपनी में नहीं, बल्कि उस पहाड़ी ज़िले में, जहां न वेंचर कैपिटल का माहौल है, न इंजीनियरिंग कॉलेजों की भरमार, न वो इकोसिस्टम जो आमतौर पर स्टार्टअप्स को चाहिए होता है.

दूसरी बात, रवि चाहता तो फंडिंग और वैल्यूएशन की उसी धंधेबाज़ी में पड़ सकता था, जिसमें आजकल ज्यादातर स्टार्टअप्स फंसे नज़र आते हैं. पिचडेक्स बनाना, निवेशकों को लुभाना, मीडिया में “अगला यूनिकॉर्न” बनने का शोर मचाना,  यह रास्ता आसान भी है और चमकदार भी. लेकिन रवि ने वह रास्ता नहीं चुना. वह सीधे-सीधे जनता के सामने, आपके और हमारे सामने, अपना काम करके दिखा रहा है. उसका काम, उसका कार्यक्षेत्र, सब कुछ पारदर्शी है, कोई छिपाव नहीं, कोई बड़ी-बड़ी बातें नहीं.

तीसरी और सबसे अहम बात, उसके दिमाग में पहाड़ की समस्या हल करने का जुनून था. पहाड़ी इलाकों में आवागमन आज भी सबसे बड़ी चुनौतियों में एक है. सड़कें टूटी हैं, दूरियां लंबी हैं, आपदाओं में रास्ते घंटों-दिनों के लिए बंद हो जाते हैं. ऐसे में अगर कोई पहाड़ का ही युवा, पहाड़ में बैठकर, पहाड़ की समस्या का हल खोजने की कोशिश करता है, तो यह स्पष्ट तौर पर उस युवा के साफ़ ह्रदय और साफ़ नीयत का सवाल है.

रवि टम्टा

अब बात करते हैं उस आरोप की, जो सबसे ज्यादा उछाला जा रहा है, कि यह तकनीक चीन से “कॉपी” की गई है. हां, यह सच है कि रवि ने डिज़ाइन इंस्पिरेशन ली है. लेकिन क्या इंस्पिरेशन लेना कोई गुनाह है? स्टीव जॉब्स ने भी ज़ेरॉक्स की ग्राफिकल यूज़र इंटरफेस तकनीक से प्रेरणा लेकर एप्पल का मैकिंटोश बनाया था. यह बात खुद जॉब्स ने कई इंटरव्यू में मानी है. क्या इस वजह से एप्पल की उपलब्धि कम हो जाती है? नहीं.

भारत में ही देख लीजिए, ओला ने उबर से प्रेरणा ली, ओयो ने एयरबीएनबी के मॉडल से प्रेरणा ली. फ्लिपकार्ट की शुरुआती प्रेरणा अमेज़न से आई थी. यह पूरी दुनिया की टेक इंडस्ट्री की कार्यशैली है, कोई एक जगह कोई आइडिया लाता है, बाकी दुनिया उसे अपने संदर्भ, अपनी ज़रूरत और अपने बाज़ार के हिसाब से ढालती है. खुद चीन का पूरा मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पश्चिमी देशों की तकनीक इस्तेमाल करते हुए ही आज दुनिया की फैक्ट्री बना है. जिन कंपनियों को आज “मौलिक” कहा जाता है, उनमें से ज्यादातर ने भी कहीं न कहीं से शुरुआती प्रेरणा ली ही है.

तो सवाल यह नहीं होना चाहिए कि प्रेरणा कहां से आई. सवाल यह होना चाहिए कि उस प्रेरणा को ज़मीन पर उतारने का साहस, संसाधन और मेहनत किसने जुटाई. और इस पैमाने पर रवि टम्टा का काम कहीं ज्यादा असली है, क्योंकि उसके पीछे न कोई बड़ी फंडिंग थी, न कोई बड़ी टीम, न कोई इंस्टीट्यूशनल सपोर्ट. सिर्फ एक व्यक्ति का जुनून और मेहनत थी.

रवि टम्टा

जो लोग इसे “गलगोटिया स्टाइल इनोवेशन” कहकर मज़ाक उड़ा रहे हैं, वे शायद यह भूल रहे हैं कि तंज कसना आसान है, कुछ बनाना मुश्किल. बैठे-बैठे किसी की मेहनत पर सवाल खड़ा करना कोई कला नहीं है. असली सवाल यह होना चाहिए, क्या यह प्रोटोटाइप सुरक्षित है? क्या इसकी इंजीनियरिंग को और बेहतर किया जा सकता है? क्या इसे नियामक मंज़ूरी मिल पाएगी? यह सवाल जायज़ हैं, और इन पर बहस होनी चाहिए. लेकिन रवि की नीयत, उसकी पृष्ठभूमि और उसकी मेहनत पर सवाल उठाना, यह अन्याय है.

एक छोटे से पहाड़ी गांव से निकलकर, बिना किसी बड़े संसाधन के, एक ऐसा विचार लेकर आगे बढ़ना जो असंभव जैसा लगता है, यही असली उपलब्धि है. यह मशीन कल कामयाब हो या न हो, यह अलग बात है. लेकिन जिस हिम्मत से रवि टम्टा ने यह सोचा और कहा कि “मैं कोशिश करूंगा” वही उत्तराखंड के लिए, और पूरे देश के लिए, असली प्रेरणा है.

-डॉ. लता जोशी

मूलतः गंगोलीहाट की रहने वाली डॉ. लता जोशी, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. फ़िलहाल हल्द्वानी शहर में रह ही, डॉ. लता जोशी, काफल ट्री की नियमित सहयोगी रही हैं. 

इसे भी पढ़ें : गांधीजी ने दुनिया के सबसे बड़े अहिंसक आंदोलन का संचालन कैसे किया?

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

गौरा को किसी से शिकायत नहीं थी

गाँव में सब उसे जानते थे. कोई उस के पास सब्जी लेने आता तो वह…

2 days ago

देवदार या देव दारु

देवदार या देव दारुः देवों के वृक्ष मुख्य रूप से हिमालय मे लगभग डेढ़ हज़ार…

6 days ago

कसारदेवी : जहां स्वर्ग के सबसे करीब होने का अहसास होता है

“कसारदेवी या अल्मोड़ा जैसी छोटी सी जगह में ऐसा क्या है जो दुनियाभर से लोगों…

6 days ago

दुर्गम पहाड़ों तक कैसे पहुंचे महाराष्ट्र-गुजरात के पर्व

बचपन में हमें होली-दिवाली और राखी के अलावा मकर संक्रांति, घी त्यार और फूलदेई जैसे उत्सवों…

2 weeks ago

पिथौरागढ़ में स्विट्ज़रलैंड बनने की है पूरी क्षमता

इस बार करीब 9 साल बाद पिथौरागढ़ जाकर एक बात साफ दिखी कि यहां कुछ…

2 weeks ago

अलमोड़े में नंदादेवी मेले की ताज़ा तस्वीरें

आस्था और विश्वास की प्रतीक श्री नंदा देवी की भक्ति में इन दिनों पूरा उत्तराखंड…

3 weeks ago