कई दिनों से राजधानी में एक कुर्सी, एक टेबल, घिस चुकी कंघी, बिना ब्रांड के पाउडर और लाल तेल के भरोसे शानदार सैलूनों के सामने टिका हुआ एक सख्त चेहरा देख रहा था. पेड़ के नीचे कुर्सी लगाकर परिवार चलाने वाले ऐसे लोगों से मेरा पुराना दोस्ताना रहा है. (Memoir by Rajiv Pandey)
खुले में बाल कटवाए भी कई साल हो गए थे. इसलिए आज मैंने भी उसी पेड़ के नीचे बाल कटवाने का सोचा. एक सज्जन पहले से सिर देकर बैठे थे, इसलिए मुझे इंतजार करना पड़ा. इंतजार करते-करते गोविंदा, रघु, रामकली, चंदा, कृष्णा दा, सूर्या और जिबू सब याद आ गए. सोचा इंतजार करते-करते सबका हाल ले लिया जाए. लेकिन हाल सुनकर उदासी छा गई. गोविंदा अब इस दुनिया में नहीं है, यह तो पहले से पता था. जब मैं उनके यहाँ बाल कटवाने जाता था तो वह गर्व से बताते थे कि उनका बेटा पढ़ने में बहुत होशियार है. गोविंदा खुद ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन शिक्षा का महत्व अच्छी तरह पता था. आरक्षण से भी उसे बड़ी उम्मीद थी. शायद इसीलिए पंद्रह रुपये में बाल काटने वाले गोविंदा ने हिम्मत जुटाकर बेटे को देहरादून के निजी संस्थान में पढ़ने भेजा था. आज जब उनके बेटे के बारे में पूछा तो पता चला कि वह भी गांव से दूर, संघर्ष ही कर रहा है. रोजगार और आरक्षण दोनों ही उसके हाथ नहीं आए. गोविंदा की मेहनत को मुकाम नहीं मिला इस बात का रंज हमेशा रहेगा.
रघु आठवीं तक मेरा सहपाठी था. भारी आवाज वाला रघु कद-काठी से छोटा था. उसके पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक थे, लेकिन रघु का मन पढ़ाई में नहीं लगता था. हमारे समाज में आज भी बच्चों की इच्छाओं का विशेष सम्मान नहीं है तब तो कौन ही पूछे. बाद में रघु ने स्कूल छोड़ दिया और चाचा के साथ बाल काटने का काम शुरू कर दिया. जल्दी ही वह इलाके का नामी हेयर ड्रेसर बन गया. लोग उस से बाल कटवाने के लिए इंतजार करते थे. बाद में उसने चाचा से अलग होकर अपना काम शुरू किया. छह साल पहले जब मिला था, तब भी उसकी दुकान में भीड़ थी. उसे खुश देख कर मन खुश हो गया था. आज जब हालचाल लिया तो पता चला कि उसने खुद ही इस दुनिया को अलविदा कह दिया. नशे ने उसे पूरी तरह जकड़ लिया था. सनकी तो वे थे ही. रघु, तुम्हारी जैसी भारी आवाज जब-जब सुनाई देगी, तुम्हारा जिक्र जरूर करूंगा दोस्त.
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जब हम जवान हो रहे थे, तब तक रामकली जमाने से थोड़े बाहर हो चुके थे. फिर भी एक-दो बार उनसे बाल कटवाने का मौका मिला था. हर बात में अश्लीलता खोज लेना रामकली की फितरत थी. हमेशा हँसते रहने वाले रामकली की उम्र अब सत्तर के करीब होगी. ता-उम्र मेरे गांव में स्वरोजगार करने वाले इस शख्स को कुछ महीने पहले एक दोस्त ने पिथौरागढ़ के होटल में काम करते देखा. उसने ही बताया कई दिनों से नहीं दिखा यार. रामकली जहाँ भी हों, सलामत और स्वस्थ रहें.
चंदा भी हमारे दौर में थोड़े पुराने हो चुके थे. उनकी पाँच से ज्यादा बेटियाँ थीं. बाल काटने के साथ-साथ वे दर्जी का काम भी करते थे. बेटा न होने का दुख उन्हें हमेशा सताता रहता था. लेकिन उनके बारे में सुनकर मैं बहुत खुश हुआ. वे अच्छी जिंदगी जी रहे हैं. उनकी बेटियों ने उनके लिए कोई कमी नहीं रखी. शायद अब चंदा भी गर्व से कहते होंगे “मेरी इतनी बेटियाँ हैं.”
कृष्णा दा पहले ही नौकरी की तलाश में निकल गए थे. मूल रूप से हमारे गांव के न होने की वजह से उनसे ज्यादा गहरा नाता नहीं बन पाया. सूर्या हमसे काफी छोटा था. पिता के निधन के बाद उसकी माँ बड़े संघर्ष से उसे पाल रही थी, इस उम्मीद के साथ कि एक दिन वह परिवार की किस्मत बदलेगा. लेकिन तमाम बाल काटने वालों की तरह उसकी माँ के सपने भी अधूरे रह गए. परिवार बढ़ने के बाद स्वरोजगार से गुजारा नहीं चला. अब वह परिवार से दूर पंजाब में संघर्ष कर रहा है. क्या करता होगा, जिन से मैंने पता किया वह नहीं बता पाए. कुछ ने कहा होटल में ही होगा और क्या करेगा. उम्मीद करता हूं जहां भी हो अच्छा कर रहा हो. जब मिले तो बहुत खुश मिले.
जिबू दा का कारोबार अब भी देवलथल में जमा है. दुकान में आज भी लोगों की लाइन लगी रहती है लोग बताते हैं. घर जा कर जल्द इस लाइन का हिस्सा बनूंगा. फिर बाल कटाते-कटाते जिबू दा से खूब बातें करूंगा. हालांकि वह कान नहीं सुनता है. मुझे लगता है शायद इसी लिए अब तक टिका भी है. क्यों कि आरक्षण, रोजगार, सब्सिडी और तमाम योजनाओं के बारे में सुन लेता तो सपने देखने लगता लेकिन यहां सपने सबका अधिकार नहीं हैं. (Memoir by Rajiv Pandey)
राजीव पांडे की फेसबुक वाल से साभार. राजीव दैनिक हिन्दुस्तान, के उत्तराखण्ड सम्पादक हैं.
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