फ़ोटो : सोशल मीडिया से साभार
बचपन में हमें होली-दिवाली और राखी के अलावा मकर संक्रांति, घी त्यार और फूलदेई जैसे उत्सवों का बड़ा इंतज़ार रहता. तब सामान्य खाने से अलग कुछ बढ़िया खाने को मिलता. आज हमारे आसपास इतने पर्व-त्योहार और संस्कृतियां हैं कि गर्व से कहा जा सकता है कि हम बहुलताओं वाले देश में रहते हैं. लेकिन यह बात इतनी सरल नहीं है.
इटली में जन्मे दार्शनिक-विचारक अंतोन्यो ग्राम्शी का मानना था कि कोई प्रभावशाली संस्कृति अपना दबदबा केवल ताक़त के दम पर क़ायम नहीं करती. वह धीरे-धीरे लोगों की सहमति भी हासिल करती है. कई बार हमें लगता है कि हम अपनी पसंद से कुछ कर रहे हैं, जबकि हमारी पसंद बनाने में समाज और उसके प्रभावशाली सांस्कृतिक माध्यमों की भी भूमिका होती है.
स्कूली किताबें, अख़बार, पत्रिकाएं, फ़िल्में, धारावाहिक और दूसरे संचार माध्यम हमारे आसपास की दुनिया की एक ख़ास तस्वीर बनाते हैं. हम जिस चीज़ को बार-बार देखते हैं, उससे परिचित होते जाते हैं. फिर उसकी नक़ल करने लगते हैं. कुछ समय बाद वही चीज़ हमें अपनी लगने लगती है. यह प्रक्रिया खाने, पहनने और त्योहार मनाने जैसी कई चीज़ों में दिखाई देती है.
जहां तक मुझे याद आता है, उत्तर भारत में रहते हुए गणपति के बारे में पहली बार बंबई में बनने वाली फ़िल्मों के ज़रिए जाना. थोड़े समय बाद पता चला कि बाल गंगाधर तिलक ने 1890 के दशक में महाराष्ट्र में गणपति उत्सव को सार्वजनिक और लोकप्रिय बनाया. तब इसके पीछे राजनीतिक और सामाजिक लक्ष्य थे. पिछले कुछ दशकों में यह त्योहार उत्तर भारत में भी तेज़ी से लोकप्रिय हुआ. ऐसे ही, करवा चौथ के बारे में भी हम लोगों को काफ़ी बाद में पता चला. ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, ‘बीवी नंबर-1’, ‘कभी ख़ुशी- कभी ग़म’ और ‘बागबान’ जैसी फ़िल्मों ने इसे देश के अलग-अलग हिस्सों में पहचान दिलाई. आज अगर कोई कहे कि उसे करवा चौथ के बारे में नहीं पता, तो लोग यक़ीन नहीं करेंगे. उत्तराखंड के दुर्गम पहाड़ों तक भी इसकी पहुंच दिखाई देती है.
इसी तरह, उत्तराखंड में नवरात्रि लंबे समय से शक्ति और स्थानीय देवी-देवताओं की आराधना का पर्व रहा है. कई जगहों पर देवी को मांस-मदिरा अर्पित करने की परंपराएं भी रही हैं. अब यहां नवरात्रि का एक नया सार्वजनिक रूप गरबा और डांडिया नाइट्स के रूप में भी दिखाई देता है. पिछले कुछ वर्षों में फ़िल्मी सितारों के घर गणपति की स्थापना, आरती और फिर विसर्जन के फ़ोटो और वीडियो हमने ख़ूब देखे तो फ़िल्मों और धारावाहिकों में गुजराती शैली में नवरात्रि और करवा चौथ भी लगातार दिखाई दिए. ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘काय पो चे’, ‘गोलियों की रासलीला राम-लीला’ और‘लवयात्री’ जैसी फिल्मों ने भी गरबा और डांडिया को व्यापक लोकप्रियता दिलाई. इन सभी त्योहारों और संस्कृतियों के इतनी तेज़ी से फैलने में 1990 के दशक के आर्थिक उदारीकरण और टेलीविजन का बड़ा हाथ रहा. बाद में इंटरनेट और डिजिटल माध्यमों ने इसे और व्यापक बनाया है.
टेलीविजन के सामने बैठकर यह धारणा आज भी मज़बूत होती है कि जैसा दुनिया के दूसरे हिस्सों में दिखता है, वैसा करना हमें अपने से आगे की दुनिया से जोड़ता है. और कौन ऐसा होगा जो आगे की ओर नहीं बढ़ना चाहेगा? दो हजार के दशक में हमने एक चर्चित विज्ञापन देखा. गर्म जगह से एक सैलानी जोड़ा ठंडे पहाड़ी प्रदेश में घूमने आया है. यह जोड़ा जब नेपाली मूल के कुली को बेवकूफ़ बनाने की कोशिश करता है तो कुली उनकी चालाकी पकड़कर कहता है, “ठंडा मतलब कोका कोला.” ऐसे संदेश सिर्फ एक उत्पाद नहीं बेचते. ये हमारे भीतर एक ख़ास क़िस्म की जीवनशैली और उससे जुड़ी आकांक्षा के लिए भी चाह पैदा करते हैं.
इसी दशक में गांवों और क़स्बों से निकलकर जब हम पहली बार कॉलेज पहुंचे तो कुर्ते-कुर्ती के साथ जींस का चलन आम हो चुका था. भारत जैसे गर्म देश में जींस कुछ महीनों के लिए तो सुविधाजनक पोशाक हो सकती थी. लेकिन आज वह लगभग हर मौसम का परिधान है. मुंबई जैसे गर्म और उमस वाले शहर में भी. थोड़े समय बाद हॉलीवुड फ़िल्मों के ज़रिए अमेरिका की किसी सड़क किनारे बने रेस्तरां में बिकने वाले बर्गर, फ्रेंच फ्राइज़ या हॉटडॉग जैसे खाद्य पदार्थों से भी हमारा परिचय हुआ. हमने न केवल अपने कल्पनालोक में बल्कि, असल में भी उनका ख़ूब स्वाद लिया.
हॉलीवुड की फ़िल्मों ने अमेरिकी जीवनशैली को हमारे सपनों में बसाया. यही काम बॉलीवुड की फ़िल्मों ने पंजाबी संस्कृति को लेकर किया. देसी खाद्य पदार्थों में हमने दाल मखनी, छोले-भटूरे, छोले-कुल्चे, पराठे, बटर चिकन और पनीर के व्यंजनों को भी हाथोंहाथ लिया. शादी, पार्टी या आउटिंग के मेन्यू में इनमें से कुछ न कुछ ज़रूर रहता. समय के साथ हमारी प्लेट में विविधताएं बढ़ीं. थाई, चाइनीज और कॉन्टिनेंटल फूड से लेकर इटैलियन कुज़ीन तक आना भी इसी बदलती पसंद का हिस्सा रहे हैं. धीरे-धीरे अलग भौगोलिक स्थितियों में रहने वाले लोगों के परिधान और खानपान में ही समानता नहीं आई. सांस्कृतिक और धार्मिक आचार-व्यवहार में भी ऐसी प्रक्रियाएं दिखाई देती हैं. उत्तराखंड को ही देखें तो यहां के जाति समुदायों के जीवन-संस्कारों में ब्राह्मणवादी परंपराओं का प्रभाव कम-ज़्यादा दिखाई देता है. जन्म और नामकरण से लेकर पूजा, विवाह और अंतिम संस्कार तक इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं.
लेकिन समाज हमेशा एक ही दिशा और गति में नहीं बदलता. भारतीय समाजशास्त्रियों रंजीत गुहा और पार्थ चटर्जी ने हमें समझाया कि जिन संस्कृतियों को अधिक ताक़त, संसाधन और विजिबिलिटी मिलती है, उनका प्रभाव ज़रूर बढ़ सकता है. लेकिन सभी समुदाय प्रभावशाली संस्कृति को चुपचाप नहीं अपनाते. कम प्रभवशाली समुदाय भी अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाते, बदलते, व्यक्त करते हैं. बल्कि कई बार प्रभावशाली संस्कृति को चुनौती भी देते हैं. इसे काउंटर-हेजेमनी यानी वर्चस्व के मुक़ाबले खड़ी संस्कृति के रूप में समझा जा सकता है.
आज कई राज्यों में छठ पूजा, लिट्टी-चोखा और भोजपुरी संगीत प्रचुर मात्रा में दर्शनीय है. कभी इन्हें निम्न आय वर्ग वाले क्षेत्रों की संस्कृति समझा जाता था. ऐसे सांस्कृतिक रूप भी आज कहीं व्यापक दिखाई देते हैं. डिजिटल दौर में वॉट्सऐप और दूसरे माध्यमों ने उत्तराखंड के हरेला, घुघुतिया और घी त्यार जैसे स्थानीय पर्व-त्योहारों को भी गुम होती पहचान वापिस दिलाई है. हाालंकि, स्थानीयता की वजह से ही लोक संस्कृति को प्रतिरोध की संस्कृति मान लेना उचित नहीं होगा. उस सांस्कृतिक कर्म में अपने समय के जातिगत और सामाजिक पदानुक्रम भी मौजूद हो सकते हैं. हां, नई तकनीक और नए सामाजिक संदर्भ उसके पुराने अर्थों को कुछ हद तक बदल भी सकते हैं.
आज झोड़ा, चांचरी या जागर डिजिटल माध्यमों और लोकप्रिय संगीत की शैलियों में नए दर्शकों तक पहुंच रहे हैं. इनके प्रसार के साथ यह भी अध्यययन का विषय है कि इनके पुराने सामाजिक अर्थों में क्या बदलाव आ रहा है.
भाषा, संस्कृति, आचार-व्यवहार और जीवन मूल्य किसी बहती नदी की तरह गतिमान होते हैं. उनमें लगातार कुछ जुड़ता और छूटता जाता है. लेकिन यह देखने, परखने और समझने की भी ज़रूरत है कि इस नदी में कहां से आकर क्या मिल रहा है. यह बदलाव अपने-आप में बुरा या अच्छा नहीं होता. सवाल यह है कि हमारी पसंद और सांस्कृतिक दुनिया को बदलने वाली इन प्रक्रियाओं में किसकी कितनी भूमिका है.
आज जब हम उत्तराखंड के प्रमुख पर्यटन स्थलों की ओर देखते हैं तो उनमें दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई बनने की चाहत दिखाई देती है. स्थानीय संस्कृति और जीवनशैली के साथ बाहर से आए सांस्कृतिक रूपों का मेल अब सामान्य बात है. पिछले तीन दशकों में ये बदलाव तेज़ी से आए हैं. इसलिए इनके पीछे केवल सांस्कृतिक वर्चस्व को देखना पर्याप्त नहीं होगा. इस दौरान हमारे जीवन को संचालित करने वाली अर्थनीति और राजनीति में भी लगातार बदलाव आए हैं. इन सभी बदलावों को एक साथ देखने पर ही तस्वीर कुछ अधिक साफ़ होती है.
नवउदारवादी दौर में बाज़ार ने यह भी समझा कि लोगों में केवल उपभोग की ज़रूरत पैदा करना पर्याप्त नहीं है. सांस्कृतिक ज़रूरतों को भी बाज़ार से जोड़कर मुनाफ़ा कमाया जा सकता है. और बाज़ार उन सांस्कृतिक रूपों में ज़्यादा रुचि लेता है जिनमें मांग और मुनाफ़े की संभावना दिखाई देती है.
अगर किसी त्योहार के साथ कपड़े, गहने, भोजन, सजावट, यात्रा, संगीत या आयोजन जैसी कई चीज़ें जुड़ सकती हों, तो उसके लिए बड़ा बाज़ार बनने की संभावना अधिक रहेगी. गरबा-डांडिया और करवा चौथ में ये संभावनाएं हरेला, फूलदेई या घी त्यार के मुक़ाबले अधिक हैं, इसलिए उन्हें बाज़ार का सहारा मिला है. हमें नहीं भूलना चाहिए कि जर्मन चिंतक अडोर्नो और होर्खाइमर ने भी आधुनिक पूंजीवादी व्यवस्था में संस्कृति के बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोग की वस्तु बनने की ओर ध्यान दिलाया था.
बाज़ार केवल लोगों की पसंद के पीछे नहीं चलता. विज्ञापन, फ़िल्में, सेलिब्रिटी और आयोजन किसी भी चीज़ को पसंद और फिर उसे आकांक्षा में बदल सकते हैं. इस तरह मांग और बाज़ार एक-दूसरे के सहयोग से बढ़ते चलते हैं. आज अगर करवा चौथ पूरे हिंदीभाषी क्षेत्र में व्यापक रूप से मनाया जाता है तो इसके साथ मेहंदी, सेल्फ़ केयर, ब्यूटी प्रोडक्ट्स, गारमेंट और जूलरी जैसे बाज़ार भी जुड़े नज़र आते हैं. गरबा और डांडिया नाइट्स बड़े इवेंट मैनेजमेंट, डीजे और म्यूजिक सिस्टम का हिस्सा बन चुकी हैं. गणेश महोत्सव के साथ भी छोटे-बड़े आयोजनों में कई उपभोक्तावादी तत्व जुड़े हैं. दूसरी ओर, बाज़ार ने इन आयोजनों को लकदक और चमकीला बनाया है. उन्हें प्रभावशाली संस्कृति के रूप में स्थापित किया है. इन सबसे पीछे रहना सांस्कृतिक पिछड़ेपन की निशानी जैसा लगने लगा.
इसी दौर में उत्तराखंड समेत उत्तर भारत में एक और अहम सांस्कृतिक बदलाव देखने को मिला. यहां धार्मिक पहचान से जुड़ी राजनीति का काफ़ी विस्तार हुआ है. उत्तराखंड के भूभाग में शुरुआत से ही शैव-शाक्त-वैष्णव परंपराओं की मज़बूत उपस्थिति रही. लेकिन बीते तीन-चार दशक के दौरान यहां कांवड़ यात्रा जैसी धार्मिक यात्राओं का विस्तार और अधिक सार्वजनिक रूप दिखाई दिया है.
कांवड़ यात्रा समेत इन सांस्कृतिक बदलावों को केवल धर्म के चश्मे से देखने के बजाए बाज़ार, राजनीति और प्रभावशाली संस्कृति के आपसी संबंधों के साथ भी देखने की ज़रूरत है. कांवड़ यात्रा, गणेश पूजा, करवा चौथ और डांडिया-गरबा नाइट्स जैसे आयोजनों ने हमारे त्योहार मनाने के तरीक़ों को ही नहीं बदला है. इनका असर दिवाली, दशहरा और रामलीला जैसे पुराने पर्वों के स्थानीय स्वरूपों पर भी पड़ा है.
आज इन सभी आयोजनों में धार्मिक पहचान के आधार पर दूरी बनाने की घटनाएं सामने आती हैं. मेलों में शामिल होने के लिए नाम व पहचान पूछना, पंजीकरण करना, खानपान की सीमा तय करना और फिर दूसरे धर्म के लोगों को इसमें शामिल न करने के उदाहरण सामने आए हैं.
इसी कालखंड में उत्तराखंड समेत उत्तर भारत में हिंदुत्ववादी राजनीति का भी उभार हुआ. ऐसे में त्योहार और धार्मिक आयोजन आसानी से ऐसे सार्वजनिक स्थल बन सकते हैं, जहां धार्मिक पहचान धीरे-धीरे राजनीतिक पहचान में बदलती है. इसे एक और तरीक़े से समझा जा सकता है. समाज में अलग-अलग स्थानीय और सामाजिक पहचानों को छोड़कर जब एक व्यापक साझा पहचान को सबसे महत्वपूर्ण मान लिया जाता है तो इसका असर भी बदल जाता है.
राजनीतिक विचारक बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को एक ‘काल्पनिक समुदाय’ इसलिए कहा था. उनके अनुसार, किसी बड़े समुदाय के सदस्य एक-दूसरे को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते, फिर भी वे अपने को उस पहचान से जुड़ा महसूस करते हैं.
जैसे- विदेश में किसी भारतीय मूल के व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव हो, तो हम उससे द्रवित हो उठते हैं या कश्मीर में किसी विशेष धर्म के व्यक्ति के साथ हिंसा हो तो उसका रोष कन्याकुमारी तक महसूस किया जा सकता है. जबकि हम व्यक्तिगत रूप से न तो विदेश में रहने वाले व्यक्ति को जानते हैं और न ही कश्मीर और कन्याकुमारी वाले दो लोग असल ज़िंदगी में एक-दूसरे के सुख-दुख के भागीदार होते हैं.
ऐसे में हमारे आसपास के इन बदलावों को केवल आधुनिकता, बाज़ार या धार्मिक पुनरुत्थान के रूप में अलग-अलग देखना पर्याप्त नहीं होगा. मीडिया लोगों की पसंद और कल्पना को प्रभावित करता है. प्रवास और सामाजिक नेटवर्क संस्कृतियों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं. बाज़ार उन्हें नए उत्पाद से लैस कर नए उत्सवों में बदलता है. और राजनीति उन्हें एक साझा पहचान और लामबंदी से जोड़ती है.
दूसरी ओर, स्थानीय समाज कभी भी पूरी तरह इन प्रभावों को स्वीकार नहीं करता. वह अपनी भाषा, भोजन, लोकगीत, पर्व और परंपराओं के जरिए अपनी छिटपुट जगह बनाए रखता है. नई तकनीक कमज़ोर संस्कृतियों को भी नए दर्शक और नई पहचान दे सकती है. ऐसे में यह गतिरोध साथ-साथ चलता है.
इसलिए सवाल संस्कृति के बदलने का नहीं है. वह हमेशा से बदलती आई है. बहुलताओं वाले समाज में सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी स्वाभाविक है. सवाल है कि इस बदलाव में किसकी आवाज़ ज़्यादा सुनाई दे रही है? किस संस्कृति को बाज़ार, मीडिया और राजनीति ज़्यादा जगह देकर प्रभावशाली बना रहे हैं? और कौन-सी स्थानीय संस्कृतियां इस प्रक्रिया में पीछे छूट रही हैं? इसलिए यह देखना ज़रूरी है कि हमारी बहुलता कहीं व्यापक एकरूपता में तो नहीं बदल रही.
भारत सिंह
भारत सिंह पिछले दो दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हैं. उनका लेखन सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों के साथ पर्यावरण, लोकतंत्र, राष्ट्र और राष्ट्रवाद से जुड़े सवालों पर केंद्रित रहा है. वह स्थानीय समाज और उसके बदलते रिश्तों को व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में देखने की कोशिश करते हैं.
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