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कुमाऊं केसरी बद्रीदत्त पांडे का बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व : इतिहास से जनआंदोलन तक

पिछली कड़ी : हिमालय की सामाजिक-आर्थिक संरचना पर प्रोफेसर पूरन चंद्र जोशी

कुमाऊं को विशिष्ट संस्कृति युक्त राजनीतिक इकाई के रूप में रखते हुए राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के साथ इतिहास के गौरव और अस्मिता की प्रस्तुति के जनक रहे बद्रीदत्त पांडे. पत्रकारिता के साथ इतिहास लेखन, जमीन से जुड़े आंदोलन का सूत्र पात व राजनीतिक चेतना के प्रसार में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही. उत्तराखंड की क्षेत्रीय पहचान की नींव रखने वालों में वह अग्रणी रहे. कुमाऊं गढ़वाल का राजनय केवल राष्ट्रीय आंदोलन का विस्तार नहीं वरन एक स्वतंत्र बहु स्तरीय प्रक्रिया थी. इसमें बद्रीदत्त पांडे ने समाज को संवेदनशील बनाते हुए उत्प्रेरक की भूमिका का निर्वाह किया. कुमाऊं में औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की वैचारिक भूमि निर्मित करने में सन 1900 से 1930 के मध्य राजनीतिक जागरूकता और क्षेत्रीय पहचान बनाने में उनकी मुख्य भूमिका रही. 1930 से 1960 की अवधि में मुख्यतः इसका सामाजिक व राजनीतिक आधार इन्द्र सिंह नयाल ने खड़ा किया. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी में कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में ऐसे परिवर्तन हुए जिससे आर्थिक शोषण बढ़ता गया. वन कानून कठोर कर दिए गये. लगान व कर बढ़ाए गये. बंदोबस्त लागू हुए, कुली बेगार प्रथा चालू रही जिससे पारम्परिक अर्थव्यवस्था का विघटन हुआ. परिवार के भरण पोषण के लिए पलायन की शुरुवात हुईं. स्थानीय समाज में असंतोष और प्रतिरोध की भावना पनपी. सेना की भर्ती में युवा लिए जाते रहे. ऐसे असमंजस भरे वातावरण में बद्रीदत्त पांडे ने किशोरवय से ही सामाजिक चेतना व प्रतिरोध का पथ चुनते हुए जन आंदोलन व उपआश्रित राजनीति से कुली बेगार के विरुद्ध चेतना विकसित की जिसमें कृषक, मजदूर व आम लोगों की प्रबल भागीदारी रही. यह औपनिवेशिक राज्य के विरुद्ध प्रत्यक्ष चुनौती बनी.

भारत में क्षेत्रीय आंदोलनों के प्रसंग में उत्तराखंड निर्माण को विलंबित क्षेत्रीय आंदोलन की तरह देखा गया,इसकी ऐतिहासिक जड़ों पर कम ध्यान दिया गया. कुली बेगार जैसे उपआश्रित आंदोलन ने कुमाऊं के इतिहास को मात्र विशिष्ट या उच्च वर्ग का आख्यान नहीं बनने दिया. उपाश्रित अध्ययनों ने इतिहास को अभिजात्य अध्ययन से हटाया. जनता की भूमिका राज्य के दमन के विरोध में उभरती रही. यद्यपि हिमालय में सामाजिक आंदोलन, क्षेत्रीयता व राज्य निर्माण के अलग-अलग अध्ययन रहे जिनमें एकीकृत विश्लेषणात्मक मॉडल की कमी व उपाश्रित, क्षेत्रीयता राजनीतिक अर्थव्यवस्था व राज्य निर्माण के कारक किसी सटीक निष्कर्ष तक पहुँचने में सहायक न हो पाए. कुली बेगार आंदोलन समाज को आतंकित कर शोषण व लूट का जरिया बनाने वाली वर्चस्ववादी शक्तियों के विरोध हेतु एकजुट होने का सबल उदाहरण बना. यह मुख्य धारा की राजनीति से अलग उनके दमन व जोर जबरदस्ती के खिलाफ एकजुट होने का प्रबल प्रयास था. किसी भी क्षेत्र के राजनीतिक विकास को समझने के लिए एकल सिद्धांत पर्याप्त नहीं होता बल्कि बहु विषयक दृष्टिकोण जरुरी है जिसमें उपाश्रित योगदान, समाज के हर वर्ग की भागीदारी,आंचलिकता व प्रथक पहचान का संयोजन आवश्यक होता है. 

उपआश्रित अध्ययन का मुख्य तर्क यह रहा कि पारम्परिक इतिहास लेखन शासक वर्ग व कुलीन वर्ग के दृष्टिकोण से रचा गया हो. वस्तुतः वास्तविक सामाजिक परिवर्तन कृषक, मजदूर, सीमांत में रहने वाले समूह या नीचे से आता है. इसलिए सैद्धांतिक आधार में उपनिवेशवाद के कलंक कुली बेगार प्रथा को खत्म किया जाना जरूरी था. पीड़ितों व हाशिये के लोगों की अपनी सोच व एकजुट रह संघर्ष करने की क्षमता व प्रबल विरोध पहाड़ में चल रहे दमन को तोड़ने का उदाहरण बना. उपआश्रित अध्ययन बहुधा खंडित प्रतिरोध पर टिके होते हैं व संस्थागत परिणाम को सीमित महत्त्व देते हैं पर कुली बेगार आंदोलन एकजुटता का सटीक उदाहरण बना. यह अंग्रेज अधिकारियों के लिए जोर जबरदस्ती से करवाए श्रम के साथ प्रकृति के उपादानों की लूट के साथ मनोवैज्ञानिक शोषण के उपायों के विरुद्ध जन जागृति पनपा गया. इसकी भावना विदेशी वस्तुओं के सामूहिक बहिष्कार, जनसंगठन की सुद्रढ़ व्यूहरचना और अहिंसात्मक प्रतिरोध की रही. 1921 में बाघनाथ के सम्मुख सरयू के तट पर कुलियों के रोजनामचों का विसर्जन औपनिवेशिक सत्ता को दी गई सीधी चुनौती थी. यह प्रतीकात्मक के साथ प्रतिरोध था.

बद्रीदत्त पांडे का कुमाऊं का इतिहास औपनिवेशिक नीति की आलोचना के साथ हिमालयी भू भाग के गौरव व अस्मिता के पक्ष को सामने रखता है.बद्री दत्त पांडे के पुरखे अल्मोड़ा के पाटिया ग्राम के थे, हालांकि उनका जन्म 15 फरवरी 1882 को कनखल हरिद्वार में हुआ था. उनके पिता पंडित विनायक दत्त पांडे वैद्य थे. सात वर्ष की आयु में ही माता-पिता के देहावसान के बाद वह अल्मोड़ा अपने ताऊ जी के पास  आ गये थे. बारहवीं तक उन्होंने हिन्दू स्कूल (जिसे बाद में राजकीय इंटर कॉलेज कहा गया) में शिक्षा ग्रहण की. आगे सरकारी नौकरी और साथ ही पढ़ाई-लिखाई का अवसर पाने के लिए वह नैनीताल चले गये. फिर देहरादून, इलाहाबाद कई जगह रहे. नौकरी के साथ पढ़ाई भी चलती रही. सरकारी नौकरी में अंग्रेजों द्वारा उत्पीड़न व अपमानित करना वह सहन नहीं कर पाए. अधिकारी अपने भारतीय मातहतों से दासों की तरह बर्ताव करते थे. भ्रष्टाचार भी बहुत था.बचपन से ही वह स्वाभिमानी रहे और अपने इलाके के लिए कुछ सार्थक करने की प्रबल इच्छा उनके मन में बसी थी. इससे ऐसा एक लक्ष्य बना कि सबसे पहले तो अंग्रेजी राज से मुक्ति पानी है. सो लगी लगाई सरकारी नौकरी छोड़ दी.

स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो अंग्रेजी राज का विरोध करने के लिए उन्होंने दो टूक बात करने वाले लेखन व पत्रकारिता का पथ चुना. देहरादून से “लीडर” में सहायक संपादक हुए. अब लीडर में सामयिक प्रसंग व समाचार के साथ भारतीय परंपराओं से संबंधित रचनाऐं भी छपने लगी. उनके आने से पत्र की प्रसार संख्या तीन महीने में ही साठ से बढ़ पंद्रह सौ हो गई. लीडर प्रेस से पत्रकारिता की शुरुवात कर 1910 में कोस्मोपोलिटन अख़बार में काम किया. 1913 में अल्मोड़ा में शक्ति अख़बार में आए व 1926 तक इसका संपादन किया जिसकी फबतियों-खबरों  से अंग्रेज अधिकारी तिलमिला उठते थे.

अंग्रेज अधिकारियों के साथ उनके जी हजूरियों-चमचों-राय बहादुरों पर भी उनके पैने व्यंग बाण चलते थे. रायबहादुरों पर तंज कर 1921 में उन्होंने शक्ति में लेख छापा कि “गेहूं और धान की फसलें बिन पानी सूखतीं हैं पर राय बहादुरी की फसलें हर साल तरक्की करतीं हैं. तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर लॉमस के खिलाफ खबर छापी जो अल्मोड़ा के स्याही देवी जंगल में सुरा-सुंदरी के राग-रंग में डूबा रहता था. एक दिन उनके मातहत एक कुली ने शराब में मिलाने के लिए सोडा की बोतल लाने में देर कर दी. गुस्सैल लॉमस ने छर्रे के कारतूस से बंदूक चला दी. कुली घायल हो गया. अल्मोड़ा अख़बार में खबर छपी. लॉमस फंस गया. उसने सफाई दी कि वह मुर्गी का शिकार कर रहा था जिसके छर्रे कुली को लग गये तभी वह घायल हो गया. तब अप्रैल के महीने में मुर्गी के शिकार पर पाबन्दी थी. बद्री दत्त पांडे ने अख़बार में प्रश्न उठाया कि यदि छर्रे मुर्गी मारने में लगे तो कानून के रक्षक ने अप्रैल में मुर्गी का शिकार कैसे किया? अंग्रेज अधिकारी ने नाराजगी में अख़बार ही बंद करवा दिया 

1918 में कुमाऊं परिषद का पहला अधिवेशन हुआ जिसमें स्थानीय समाज को अपनी संस्कृति व परंपरा से जोड़ना, अंग्रेजों के दमन के विरोध में सामाजिक जागरण और कुली प्रथा का अंत जैसे तीन विशिष्ट कामों पर केंद्रित रह जन जागरण अभियान चलाना मुख्य रहा. जिसमें कुली बेगार प्रथा के विरुद्ध प्रस्ताव रखा गया जिसमें अंग्रेज अधिकारियों की देखा-देखी अन्य शासकीय अधिकारियों को भी बेगार का शौक व मुफ्त माल की चसक लग गई. देशी सिपाही और चपरासी भी धौंस दिखा बेगार लेते थे.

10 जनवरी 1921 को बद्री दत्त पांडे, हरगोविंद पंत, चिरंजीवी लाल, इंद्र सिंह नयाल समेत पचास आंदोलनकारी बागेश्वर कूच कर गये. 12 जनवरी की रात पचास हज़ार ग्रामीण जन बागनाथ की धरती पर उमड़ पड़े. डायबिल डिप्टी कमिश्ननर था जिसके साथ पचास पुलिस कर्मी व पांच सौ से अधिक गोलियां थीं. पर गोलियां चलाने का साहस न हुआ. बद्री दत्त पांडे को दिसंबर 1921 से नवंबर 1922 ,जून 1929 से मार्च 1931, जनवरी 1932 से अगस्त 1932 तक जेल होती रही. इसी बीच उनके पुत्र तारक व पुत्री जयंती की मृत्यु हो गई.जनवरी 1942 से 9 अगस्त 1943 तक उन्हें फिर कारावास हुआ. 1938 से 1945 के बीच उन्होंने नायक कुप्रथा के समूल नाश हेतु आंदोलन चलाया. नायक प्रथा में इस जाति के पुरुषों का भूमि पर कोई अधिकार नहीं होता था. कन्याओं से वैश्यावृति कराई जाती थी.

बद्री दत्त पांडे ने इलाहाबाद से प्रकाशित लीडर में सहायक संपादक प्रबंधक के रूप में पत्रकारिता आरम्भ की. 1910 से 1913 तक देहरादून से प्रकाशित “कोस्मोपोलीटन’ के संपादक रहे. 1913 में वह “अल्मोड़ा अख़बार” के संपादक रहे और इसे राष्ट्रीय चेतना का मुख पत्र बनाया. 1918 में अल्मोड़ा अख़बार के बंद होने से “शक्ति” साप्ताहिक का प्रकाशन व संपादन किया. दृष्टिकोण परिवर्तन से सामाजिक सुधार करने की दिशा में उन्होंने जाति भेद, छुवाछूत, अन्धविश्वास व कुरीतियों को अपने लेखन का मुख्य विषय बनाया. शिक्षा के प्रसार व आम जन की सोच के बदलने से जन जागरण पर जोर दिया. इससे पहाड़ी समाज में आत्मसम्मान व अधिकार चेतना विकसित हुई.

बद्रीदत्त पांडे की सबसे प्रसिद्ध कृति “कुमाऊं का इतिहास” है. यह औपनिवेशिक काल में लिखा ग्रन्थ है जिसने स्थानीय समाज को अपनी एतिहासिक अस्मिता से परिचित कराया. उनका उद्देश्य केवल इतिहास लिखना न था बल्कि कुमाऊं की गौरवपूर्ण परम्परा स्थापित करना रहा. औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध वैचारिक आधार बनाया.समाज व राजनीति में परिवर्तन के लिए सुधार व आंदोलनों की जमीन तैयार करी. कुमाऊं को एक “एकीकृत ऐतिहासिक इकाई” के रूप में प्रस्तुत किया गया. जिसमें इतिहास के साथ राजनीतिक हस्तक्षेप भी है.उन्होंने प्राचीन से आधुनिक कुमाऊं का इतिहास लिखा जिसमें कत्यूरी, चंद और गोरखा शासन का वर्णन व ब्रिटिश शासन के प्रभाव की कथा का निरंतर प्रवाह है. इसमें जाति व्यवस्था, कुरीतियाँ, धार्मिक प्रथाऐं जैसी सामाजिक संरचना का वर्णन है तो सुधारवादी दृष्टिकोण से इन संकीर्णताओं से निकलने का आह्वान भी बना रहा.उन्होंने कर व्यवस्था, कुली बेगार व वन कानून द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण के उदाहरण दे औपनिवेशिक शासन की आलोचना की. उनकी पद्धति सकारात्मक थी जिसमें लोक स्मृतियों, वंशावलियों व पुरालेखों का उपयोग किया गया, साथ ही क्षेत्रीय स्त्रोतों का व्यवस्थित संकलन भी साथ रहा. उनका दृष्टिकोण राष्ट्रवादी था.उन्होंने इतिहास को गौरव एवम अस्मिता के निर्माण के साधन के रूप में उपयोग किया. इससे औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की वैचारिक भूमि तैयार हो सकी.उन्होंने कुमाऊं को एक विशिष्ट सांस्कृतिक राजनीतिक इकाई के रूप में प्रस्तुत किया जिससे आगे चल कर उत्तराखंड आंदोलन की वैचारिक पृष्ठ भूमि तैयार हुई. आलोचना इस आधार पर की जाती रही कि ठुल धोती होने से उनकी उच्चवर्णीय दृष्टि अभिजात वर्ग के प्रति केंद्रित रही जिसमें ब्राह्मण-क्षत्रिय केंद्रित विवरण अधिक है तो निम्न जातियों-जनजातियों, आम जनता, महिलाओं, श्रमिक वर्ग का सीमित प्रतिनिधित्व दिखता है. ऐसे पूर्वाग्रहों से कुली बेगार जैसे आंदोलनों में सक्रिय सहभागिता का पक्ष कमतर कर आँका गया. पर्यावरण का राग अलापने वाले यह लिखते हैं कि अपने ग्रन्थ में उन्होंने वन, भूमि व संसाधनों का उल्लेख किया पर पर्यावरणीय इतिहास के रूप में गहन विश्लेषण नहीं किया. 

बद्रीदत्त पांडे ने अपने क्षेत्र के इतिहास लेखन से पहाड़ी अस्मिता का स्वरूप निखारा. लोग जागरूक रहें.उनका लेखन राष्ट्रवादी-सुधारवादी क्षेत्रीय इतिहास के रूप में उभरा. जनचेतना विकसित हुई. इसी सोच के साथ उन्होंने सजग व स्पस्ट पत्रकार की भूमिका का निर्वाह किया. इससे सामाजिक व राजनीतिक परिवर्तन उत्प्रेरित करने के लिए आंदोलन व नए सुधार करने का मंत्र फूका. कुमाऊं का इतिहास उपनिवेश काल में लिखी गई जब स्थानीय समाज अपनी पहचान के प्रति सजग बन रहे थे और इसका कारण शिक्षा व देश काल के विकास का संक्रमण था. ऐसे समय में बद्रीदत्त पांडे ने कुमाऊं की गौरवपूर्ण परंपरा के साथ औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध वैचारिक आधार बनाया. इससे समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति सुधार का दृष्टिकोण पनपा और जनजागरण का वातावरण बना. इस प्रकार यह इतिहास के साथ राजनीतिक हस्तक्षेप की अंतरधारा का उदाहरण रहा.

उन्होंने प्राचीन से आधुनिक कुमाऊं का इतिहास लिखा जिसमें कत्यूरी, चंद और गोरखा शासन का वर्णन था. ब्रिटिश शासन के प्रभाव के विश्लेषण से निरंतरता कथा एक एकीकृत ऐतिहासिक वृतांत के रूप में रच दी. इसमें सामाजिक संरचना और सुधार के पक्ष तो थे ही जाति व्यवस्था,धार्मिक प्रथाऐं व कुरीतियाँ भी थीं, आलोचना की दृष्टि सुधारवादी रही. ऐसे में बद्रीदत्त पांडे की रचना प्रक्रिया सुधारक इतिहासकार की रही. उन्होंने औपनिवेशिक शासन के दुर्बल पक्ष साफ साफ सामने रखे. कर व्यवस्था, कुली बेगार, वन कानून और संसाधनों का शोषण पर जनता को चेताया भी और प्रतिरोध भी किया.

ऐतिहासिक पुनरावलोकन की उनकी पद्धति लोक-स्मृतियों. वंशावली व पुरालेखों के उपयोग पर आधारित रही. क्षेत्रीय स्त्रोतों का व्यवस्थित संकलन उनके समय का महत्वपूर्ण कार्य बना. अपने राजनीतिक जीवन में भी वह पत्रकार आंदोलनकारी व विचारक के रूप में रहे. राजनीतिक चेतना से प्रभावित होने का उनका संयोग 1905 से 1915 के बंगभंग आंदोलन से हुआ. राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभाव से इलाहाबाद में रहते वह कांग्रेस के विचारों से जुड़े. लीडर अख़बार में रहते राजनय की बारीकीयां समझीं. 

कुमाऊं में उनका सक्रिय हस्तक्षेप 1915 से 1920 के मध्य हुआ जब वह अल्मोड़ा आकर अल्मोड़ा अख़बार के संपादक बने. तब से ब्रिटिश नीतियों, कर व लगान के साथ सामाजिक कुरीतियों पर उनकी लेखनी धार पकड़ती रही और अपने साथियों व चेलों के साथ एकजुट हो उन्होंने राजनीतिक चेतना की जमीन तैयार कर डाली. यहाँ से उनके व्यक्तित्व में सार्वजनिक बुद्धिजीवी से राजनीतिक एकजुटता व लामबंदी करने वाले की भूमिका आरम्भ होता है.

पहाड़ में 1929 से 1930 की समय अवधि जन आंदोलन व प्रतिरोध की रही. 1921 में बागेश्वर में उनके नेतृत्व में ऐतिहासिक जन आंदोलन मुखर हुआ. जबरन श्रम के विरुद्ध जनता जागी और सरकार को यह प्रथा समाप्त करनी पड़ी.. फिर असहयोग आंदोलन में सक्रिय रह उन्होंने कांग्रेस संगठन को कुमाऊं में मजबूत बनाया. गिरफ्तार हुए जेल हुईं. यह समय उनके जननायक बनने का रहा. उन्होंने 1930 से 1947 तक सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय भूमिका का निर्वाह किया. कांग्रेस के स्थानीय व प्रांतीय ढांचे के साथ शिक्षा, समाज सुधार व संगठन निर्माण को सबल किया. जिससे संस्थागत ढांचा प्रभावशाली बना. 1947 से 1965 में वह राज्य स्तर पर सक्रिय रहे. उत्तरप्रदेश विधान परिषद के सदस्य नमित हुए. उनकी विचारधारा राष्ट्रवाद के साथ क्षेत्रीय समस्याओं, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार व जनता की मूलभूत परेशानियों के समाधान पर अवलंबित रही. राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय रहने के साथ उन्होंने कुमाऊं की विशिष्ट पहचान पर जोर दिया. जाति भेद व सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए शिक्षा व जागरूकता को राजनीतिक साधन बनाया. अभिजात्य व संभ्रान्त चोले से हट जन साधारण के मुद्दों के समाधान चाहे. जिसकी शुरुवात कुली बेगार से हो चली थी. बाद में भी औपचारिक सत्ता राजनीति में उनकी भूमिका सीमित रही. उनका प्रभाव क्षेत्र कुमाऊं तक केंद्रित रहा. 

पहाड़ की राजनीति व समाज को चेतना युक्त बना उत्तराखंड की क्षेत्रीय पहचान की नींव रखने में वह अग्रणी रहे. उनका कार्यक्षेत्र मुख्यत : कुमाऊं था. कुली बेगार के जन आंदोलन व पत्रकारिता के माध्यम से उन्होंने प्रभाव क्षेत्र बनाया जिसमें उनके साथी व चेले जुड़ते गए. उनकी सोच जमीनी स्तर की राजनीति थी. जन आंदोलन और प्रतिरोध के लिए उनका हथियार पत्रकारिता व इतिहास लेखन रहा. उनने राष्ट्रवाद को सबसे उच्च प्रतिमान दिया तो जन जागरण के लिए वह क्षेत्रीयता के संतुलन पर चले. राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर उनका प्रभाव सीमित रहा.कुमाऊं में उनके नेतृत्व में कुली बेगार आंदोलन जन आधारित प्रतिरोध था जिसमें जनता की सक्रिय भागीदारी रही. साथ ही औपनिवेशिक उत्पीड़न की आलोचना कर उन्होंने निष्पक्षता, सामाजिक न्याय व जनहित जैसे नैतिक मूल्यों की स्थापना की. पांडे का सामाजिक आधार मजबूत व वैचारिक योगदान मध्यम, राजनीतिक प्रभाव क्षेत्रीय व राज्य निर्माण प्रतिरोध युक्त था. मुख्यत:सामाजिक गतिशीलता लाने वालों में वह अग्रणी रहे.

औपनिवेशिक भारत में हिमालयी क्षेत्र विशेषत: कुमाऊं-गढ़वाल को एक सीमांत क्षेत्र के रूप में देखा जाता रहा. यह दृष्टिकोण इस क्षेत्र की जटिल सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं को कमतर आंकता रहा. उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से ब्रिटिश शासन ने भू-राजस्व प्रणाली के पुनर्गठन, वन संसाधनों के केंद्रीयकृत नियंत्रण व कुली बेगार जैसी श्रम प्रणालियों के संस्थानीकरण के द्वारा स्थानीय अर्थव्यवस्था को परिवर्तित किया. अभी तक जो इतिहास लिखा गया वह उत्तराखंड को राष्ट्रीय आंदोलन का परिशिष्ट मानता है या केवल क्षेत्रीय आंदोलन के रूप में देखता है. यहाँ प्रश्न यह उभरते हैं कि उत्तराखंड का राजनीतिक विकास एक स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रक्रिया था? क्या सामाजिक आंदोलन, क्षेत्रीय विचार और राज्य निर्माण एक ही प्रक्रिया के हिस्से रहे? प्रश्न यह है कि कुमाऊं-गढ़वाल में सामाजिक चेतना का विकास किन कारकों से हुआ. क्षेत्रीय अस्मिता किस प्रकार राजनीतिक रूप से परिवर्तित हुईं तथा राज्य निर्माण की प्रक्रिया में स्थानीय नेतृत्व व राष्ट्रीय राजनीति का क्या संबंध था? यहाँ यह परिकल्पना ली जा सकती है कि कुमाऊं-गढ़वाल का राजनीतिक विकास एक बहुस्तरीय ऐतिहासिक प्रक्रिया रही जिसमें सामाजिक आंदोलन, वैचारिक निर्माण और संस्थागत रूपान्तरण परस्पर अंतर्संबधित रहे. इसका महत्त्व यह है कि यह क्षेत्रीय इतिहास को राष्ट्रीय विमर्श में पुर्नस्थापित करता है. उपआश्रित चेतना व राज्य निर्माण से जोड़ता है.

औपनिवेशिक इतिहास लेखन में हिमालय को पिछड़ा व प्रथकीकृत क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया गया था. यह दृष्टिकोण औपनिवेशिक शासन को सभ्यता प्रसार के रूप में वैधता देता रहा. किसी भी सामाजिक राजनीतिक प्रक्रिया को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक सन्दर्भ को समझना आवश्यक है. कुमाऊं-गढ़वाल का इतिहास औपनिवेशिक हस्तक्षेप व स्थानीय प्रक्रियाओं के मध्य निरंतर अंत:क्रिया  का परिणाम रहा. प्राक औपनिवेशिक संरचना में स्थानीय राजशाही थी. कत्यूरी, चंद, गढ़वाल व टिहरी की अर्थव्यवस्था कृषि बहुल रहीं जिसमें सामुदायिक संसाधन प्रबंधन रहा. समाज अपेक्षाकृत संतुलित लेकिन स्तरीकृत रहा. औपनिवेशिक हस्तक्षेप में प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ा. कठोर वन कानून लगे, जंगलों पर राज्य का नियंत्रण बढ़ा. स्थानीय समुदायों के अधिकार सीमित हुए. बंदोबस्त से कर व्यवस्था बदली. भूमि राजस्व बढ़ा. सामान्य जनता पर आर्थिक दबाव बढ़े.सामाजिक असंतोष का सबसे बड़ा कारण बलात श्रम रहा. आरंभिक प्रतिरोध छोटे स्तर पर उपजे. संगठित आंदोलनों में कुली बेगार व फिर राष्ट्रीय आंदोलनों से जुड़ाव हुआ. राष्ट्रीय आंदोलनों में कांग्रेस का प्रभाव व असहयोग आंदोलनों में भागीदारी बनी रही. भौगोलिक अलगाव, आर्थिक पिछड़ापन और सांस्कृतिक भिन्नता से क्षेत्रीय अस्मिता का उदय हुआ. समग्र रूप से कुमाऊं-गढ़वाल का सामाजिक राजनीतिक विकास,औपनिवेशिक शोषण, सामाजिक परिवर्तन व राजनीतिक चेतना के संयुक्त प्रभाव से हुआ. बद्रीदत्त पांडे जन आंदोलन, पत्रकारिता और प्रतिरोध की राजनीति से सामाजिक चेतना के विस्तार में संघर्षरत रहे. वह केवल इतिहासकार और पत्रकार ही नहीं थे बल्कि सामाजिक प्रेरक, राजनीतिक मध्यस्थ व वैचारिक उत्प्रेरक थे. उन्होंने तत्कालीन परिवेश को ध्यान में रखते हुए समाज के हर वर्ग में परिवर्तन की गति तीव्र की. इससे औपनिवेशिक शोषण के विरोध में समाज संगठित हुआ. अल्मोड़ा और इलाहाबाद रहते शैक्षिक अभिरुचियों के उन्नयन के साथ राष्ट्रीय आंदोलन व राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरणा प्राप्त कर उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया. स्थानीय समस्याओं को राजनीतिक भाषा दी. यहाँ पांडे सार्वजनिक बुद्धिजीवी से आम जनता के भीतर गहरी पैठ वाले जन प्रतिनिधि बनते हैं. लीडर, अल्मोड़ा अख़बार और शक्ति जैसे मुख्य पत्रों में औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार व जनता को जागरूक करती लेखनी यहाँ विवेचनात्मक शक्ति बन जाती है.

कुली बेगार आंदोलन में ब्रिटिश अधिकारियों के लिए जबरन श्रम, आर्थिक और सामाजिक शोषण के खिलाफ आंदोलन की प्रकृति, सामूहिक बहिष्कार, जन संगठन और अहिंसात्मक प्रतिरोध की रही जब बागेश्वर में जनता ने कुली रजिस्टर नदी में प्रवाहित कर औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती दी. यह प्रतीकात्मक और प्रतिरोधक दोनों ही पक्ष समाहित करता था. अधीनस्थ अध्ययन के प्रसंग में देखें तो आम जनता सक्रिय रूप से भागीदार रही. इसमें स्वायतत्ता थी. आंदोलन स्थानीय मुद्दों पर आधारित था जबकि इसका नेतृत्व कुलीन वर्ग कर रहा था. बद्रीदत्त पांडे ने न्याय आधारित समाज की स्थापना के उद्देश्य से नैतिक आर्थिक व्यवस्था को बनाये रखने पर जोर दिया और स्पष्ट किया कि पहाड़ की अस्मिता को बनाए-बचाए रखने के लिए किया जाने वाला प्रतिरोध केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक संघर्ष भी है. पांडे जी ने ब्रिटिश शासन का विरोध ही नहीं किया बल्कि जाति व्यवस्था की आलोचना, शिक्षा का प्रसार व सामाजिक कुरीतियों का बहिष्कार किया. यह आतंरिक सुधार के साथ वाहय प्रतिरोध का संयोजन बना. पांडे के लेखन में भारतीय राष्ट्रवाद और कुमाऊं की क्षेत्रीय अस्मिता दोनों की उपस्थिति साथ साथ दिखती है. यह राष्ट्रीय व क्षेत्रीय की दोहरी चेतना बनी. इसकी वैचारिक सीमा यह रही कि आंदोलन का व्यापक सैद्धांतिक विकास नहीं हुआ अर्थात इसका संस्थागत रूप बनने में कसर रह गई.इसमें असंबद्धता दिखने के बावजूद बद्रीदत्त पांडे ने पहाड़ में नई राजनीतिक चेतना की नींव रखी. उनका योगदान जनसंगठन, वैचारिक हस्तक्षेप व सामाजिक सुधार से संबंधित रहा. इसीलिए उन्हें पहाड़ के राजनीतिक विकास के पहले चरण का प्रतिनिधि माना जाता है.

सरफ़रोशी की तमन्ना किताब से साभार

ब्रिटिश काल से ही कुमाऊं-गढ़वाल को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में देखने का सिलसिला आरम्भ हो चुका था. पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक और प्रशासनिक विशिष्टता को पहचाना गया था पर यह राज्य की मांग नहीं थी बल्कि प्रशासनिक सुविधा का विचार था. ऐतिहासिक आधार पर इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि औपनिवेशिक शोषण रही तो साथ ही सम्माजिक चेतना जिसका सूत्रपात अख़बार के माध्यम से बद्रीदत्त पांडे ने किया.सामाजिक चेतना, वैचारिक निर्माण और राज्य संस्थानीकरण का समेकित प्रारूप जिसमें उपाश्रित व आम जन की भूमिका, क्षेत्रीय अस्मिता, इलाके में संसाधन स्थिति व संस्थागत विकास की दशाओं को पांडे जी ने अपने लेखों में अभिव्यक्त किया तो राजनीतिक अर्थव्यवस्था में शासन की आलोचना की जिससे जनजागरण व प्रतिरोध के द्वारा सामाजिक गतिशीलता का निर्वाह होते रहा.उनके लेखन से पहाड़ का विकास रेखीय न हो चक्रीय व अंतक्रियात्मक स्वरूप ले गया जिसने राजनीतिक विकास को बहुस्तरीय अंर्तसंबधित व गतिशील सिलसिले के रूप में समझाया. 

बद्रीदत्त पांडे के साथ अन्य बुद्धिजीवीयों ने वैचारिक निर्माण और संस्थानीकरण पर लगातार वैचारिक विमर्श जारी रखा. ओपनिवेशिक व उत्तर औपनिवेशिक दोनों समय अवधियों में संसाधनों का आसमान वितरण व आर्थिक पिछड़ापन क्षेत्रीय असंतुलन का मूल कारण बना रहा. यहाँ क्षेत्रीयता का एक लोक तांत्रिक प्रतिक्रिया के रूप में उभार देखा गया न कि अलगाव के रूप में. बद्रीदत्त पांडे के समय से ही कुमाऊं-गढ़वाल कमिश्नरी की द्वैत भूमिका भी दिखनी आरम्भ हो चुकी थी जहाँ इसे एक ओर संसाधनों के शोषण से कर व राजस्व की वृद्धि व बलात श्रम से आर्थिक रूप से सबल करने की नीति जारी रही तो दूसरी ओर परंपरागत अर्थव्यवस्था के टूटने बिखरने से पलयन व प्रवास की प्रवृति बढ़ती रही. इन्हीं जैसे कारकों से राजनीतिक अर्थव्यवस्था में बहुसैद्धांतिक संश्लेषण की प्रक्रिया बनी जिसमें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक पदानुक्रम, क्षेत्रीयता व राज्य निर्माण की सम्भावना भरी सोच दिखाई दी. साथ ही यह हिमालय को निष्क्रिय नहीं बल्कि सक्रिय सांस्कृतिक मंच के रूप में स्थापित कर गया. इनके उदाहरण स्थानीय प्रतिरोध व जन आंदोलनों के ऐतिहासिक सन्दर्भ में देखा जा सकता है. कुमाऊं और गढ़वाल में क्षेत्रीय नेतृत्व का योगदान आखिरकार विकास के गुणात्मक पक्ष रेखांकित करता रहा. प्राय: यह आरोप लगाया जाता है कि उपाश्रित प्रतिरोध में जनता की बहुल भागीदारी व प्रतिनिधित्व नहीं दिखता. विचार और नीति कुलीन वर्ग के द्वारा संचालित रहते हैं और यदि सुधार के कुछ संकेत दिखते हैं तो असमानताऐं विद्यमान रहतीं हैं. बद्रीदत्त पांडे ने इस बहु स्तरीय, ऐतिहासिक रूप से विकसित और सैद्धांतिक रूप से जटिल प्रक्रिया को सामाजिक आंदोलन, वैचारिक निर्माण और संस्थानीकरण के परस्पर संयोग से समाज को जागरूक कर व जगाते हुए संभव बनाने में अपना योगदान दिया.उन्होंने राज्य के विरुद्ध प्रतिरोध या औपनिवेशिक प्रतिरोध को आंदोलन द्वारा चुनौती दी. इससे संस्थागत राज्य की ओर जाने वाली दिशा तय हुई. ऐसे क्षेत्रीय वाद का विकास सांस्कृतिक राजनीतिक व प्रशासनिक रूप से हुआ. अधीनस्थ परिप्रेक्ष्य में बद्रीदत्त पांडे ने कुली बेगार आंदोलन को जनता द्वारा संगठित कर गतिशील किया जबकि अपने लेखन में उन पर आरोप लगता है कि वह ब्राह्मण-क्षेत्रीय केंद्रित थे व उपाश्रित या अधीनस्थ अभिव्यक्ति आंशिक रूप से ही प्रकट होती है. उनसे प्रभावित इन्द्र सिंह नयाल ने अधीनस्थ समूहों या हाशिये पर रखे समूह व व्यक्तियों की पहचान का प्रकटीकरण किया.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

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