मानव और प्रकृति का संबंध अत्यंत प्राचीन, गहरा और अविभाज्य है. प्रकृति तथा वायुमंडल से मिलकर बने पर्यावरण के विभिन्न तत्व—जैसे जल, वायु, मिट्टी, वनस्पति, खनिज और जीव-जंतु—मानव जीवन को निरंतर प्रभावित करते हैं. वहीं मानव भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इन प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करता आया है. आदिकाल से ही मनुष्य पर्यावरण के प्रभावों को अनुभव करता रहा है और अपनी बुद्धि तथा विवेक के बल पर उनसे सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास करता रहा है.
मानव और पर्यावरण के संबंधों को लेकर समय-समय पर विभिन्न विचारधाराएँ विकसित हुई हैं. इनमें सबसे पुरानी विचारधारा नियतिवाद है. इसके अनुसार पर्यावरण ही मानव जीवन का निर्धारण करता है और मनुष्य उसके प्रभावों के अधीन रहता है. प्राचीन विद्वान हिप्पोक्रेटस और अरस्तू इस विचार के समर्थक थे. उनका मानना था कि किसी क्षेत्र की जलवायु, भू-आकृति और प्राकृतिक परिस्थितियाँ वहाँ के लोगों के स्वभाव, रहन-सहन और जीवन-शैली को आकार देती हैं. उदाहरण के लिए, टुंड्रा क्षेत्रों के निवासी कठोर जलवायु के अनुरूप जीवन जीते हैं, जबकि मध्य एशिया के चरवाहों की घुमंतू जीवन-शैली वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों का परिणाम है. इसी प्रकार राजस्थान, बुंदेलखंड और पर्वतीय क्षेत्रों के लोगों में साहस, संघर्षशीलता और धैर्य जैसी विशेषताओं के विकास में भी स्थानीय पर्यावरण की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है.
विज्ञान और तकनीक के विकास के साथ मानव की क्षमताएँ बढ़ीं और उसने प्राकृतिक संसाधनों का व्यापक उपयोग करना शुरू किया. इससे यह धारणा विकसित हुई कि मनुष्य केवल प्रकृति का अनुयायी नहीं, बल्कि उसका उपयोग और नियंत्रण करने में भी सक्षम है. इसी सोच से सम्भववाद नामक विचारधारा का जन्म हुआ. इसके समर्थकों का मानना था कि प्रकृति अनेक संभावनाएँ प्रदान करती है और मनुष्य अपनी बुद्धि, ज्ञान तथा तकनीक के माध्यम से उनका लाभ उठा सकता है. प्रसिद्ध विद्वान फैब्बरे ने कहा कि “प्रकृति में हर ओर संभावनाएँ हैं और मानव उनका उपयोग करने का अधिकारी है.”
समय के साथ यह अनुभव हुआ कि न तो मानव पूरी तरह पर्यावरण का दास है और न ही उसका पूर्ण स्वामी. इसी समझ से समन्वयवाद की अवधारणा विकसित हुई. यह विचारधारा मानव और पर्यावरण के बीच संतुलन, सहयोग और सामंजस्य पर बल देती है. इसके अनुसार मनुष्य को प्रकृति की सीमाओं और विशेषताओं को समझते हुए उसका विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए. पर्यावरण के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय ही मानव विकास का सही मार्ग है.
प्रसिद्ध विद्वान ग्रिफिथ टेलर ने समन्वयवाद को स्पष्ट करते हुए कहा कि मानव विकास की गति को प्रभावित कर सकता है, लेकिन प्रकृति द्वारा निर्धारित दिशा को पूरी तरह बदल नहीं सकता. उन्होंने मनुष्य की तुलना चौराहे पर खड़े यातायात नियंत्रक से की, जो वाहनों की गति को नियंत्रित कर सकता है, पर उनके मार्ग की मूल दिशा नहीं बदल सकता.
आज के पर्यावरणीय संकटों और जलवायु परिवर्तन के दौर में समन्वयवाद की यह अवधारणा अत्यंत प्रासंगिक है. मानव और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध ही सतत विकास, पर्यावरण संरक्षण और भविष्य की सुरक्षा का आधार बन सकता है.
पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड, देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.
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