दूधातोली की मुरलीकोठा चोटी (3000 मीटर) के चारों ओर के परिदृश्य को समझाते हुए कुलदीप ने पूरे रोमांच के साथ नरेन्द्र सिंह नेगी का यह गीत गाया. इस पद-यात्रा में नयार की मातृ धाराओं के प्रवाह के साथ-साथ शुरुआती दिनों में चलते हुए लगता था कि ये गीत भी हमारे साथ चलायमान है. लेकिन, दिन-प्रति-दिन यह भ्रम कम होता रहा और 8वें दिन जब हम इस यात्रा के विराम स्थल व्यासघाट पहुंचे तो यह पूर्णतया समझ में आ गया कि नयार नदी रुक भी गई है और थक भी गई है.
नयार का निरंतर प्रवाह बीते समय की बात है. समाज और सरकार का यही आचरण रहा तो कुछ ही दशकों बाद नयार नदी इस लोक से विदा ले लेगी. नयार नदी के उदगम से संगम तक के कई तटों पर विलुप्त जलधाराओं के सूखे निशानों ने ये चेतावनी दे भी दी है. सच ये है कि निर्जन और वीहड़ चोटियों, पहाड़ों, घाटियों के गाड-गधेरों के किनारे-किनारे लगातार रोज कई किमी. पैदल चलते हुए जनकवि गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’ की ये पक्तियां बार-बार याद आती रही और थकान मिटाने जगह-जगह बैठते हुए हम गाते रहे –
सारा पानी चूस रहे हो, नदी समन्दर लूट रहे हो.
गंगा-यमुना की छाती पर, कंकड़-पत्थर कूट रहे हो.
ऊफऽ ! तुम्हारी ये खुदगर्जी, चलेगी कब तक ये मनमर्जी…
बूंद-बूंद को तरसोगे जब-बोल व्योपारी तब क्या होगा?
दिल्ली-देहरादून में बैठे- योजनाकारी तब क्या होगा?
ज्ञातव्य है कि ‘पहाड़’ संस्था, नैनीताल द्वारा सन् 1974 से हर 10 साल में 25 मई से 8 जुलाई तक ‘अपने गाँवों को तुम जानो, अपने लोगों को पहचानो’ ध्येय वाक्य को आत्मसात किए ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ यात्रा का आयोजन किया जाता रहा है. विगत 2024 की यात्रा के दौरान यह विचार प्रबल हुआ कि ‘अस्कोट-आराकोट अभियान’ के समानान्तर स्थानीय नदियों के ‘स्त्रोत से संगम तक की अध्ययन यात्रायें’ भी आयोजित की जांऐगी. इसी क्रम में ‘नयार नदी-स्त्रोत से संगम अध्ययन यात्रा’ (21-28 अप्रैल, 2025) आयोजित की गई.
गढ़वाल हिमालय के दूधातोली रेंज के अन्तर्गत ढाईजूली पट्टी के घुलेख गांव (2000 मीटर) से 21 अप्रैल को आरम्भ यह पद यात्रा तूणखाल, सिंगौड़ाचौकी, श्रृंग ऋषि आश्रम, मुरलीकोठा टॉप, झिन और रात्रि विश्राम हेतु सिंगोड़ा चैकी पहुंची. अगले दिन, 22 अप्रैल को सिंगोड़ा चैकी से प्रस्थान करने से पूर्व यात्री दल दो भागों यथा – पूर्वी नयार और पश्चिमी नयार यात्रा दल में विभक्त हो गया. पूर्वी नयार अध्ययन यात्रा दल सिंगौड़ा चौकी, बगड्यूं, चाकखाल, ज्योलि गाड़, नौगांव, मरोड़ा, लदोली घाट, बंगला, डिन्याल्यू डांडा, मासों (चौथान), जगतपुरी, पीठसैण, थलीसैण, मजगांव, गंगाऊ, भीड़ा,गरसारी, गौणीछेड़ा, विरगण, जिवंई, सुखई, बैजरों, स्यूंसी, दुनाव, कठ्वाड़ा,मलेठी, खैरासैण से सतपुली पहुंचा. पश्चिमी नयार अध्ययन यात्रा दल सिंगौड़ा चौकी, बक्करकोट, रणधार, कुठउडियार, थाल, नानघाट, घौलखिन, मल्ला खण्ड, तल्ला खण्ड, पिनाकोट, पैठाणी, मासों (मवालस्यूं), सांसों,किर्खू, सन्तूधार, ज्वालपादेवी, पाटीसैण, बौसाल से सतपुली पहुंचा. दोनों दलों का पुर्नमिलन 27 अप्रैल की शाम को सतपुली में हुआ. सतपुली के निकट पूर्वी और पश्चिमी नयार नदी के संगम स्थल दुलै घाट से होते हुए व्यास घाट में 28 अप्रैल को ‘नयार नदी-स्त्रोत से संगम अध्ययन यात्रा का समापन हुआ.
इस यात्रा के केन्द्र में गढ़वाल हिमालय का दूधातोली, राठ और नयार क्षेत्र थे. स्वाभाविक है कि यात्रियों को इन तीनों शब्दों के मायने और महत्व की समझ का जीवंत और सार्थक विस्तार इस यात्रा ने दिया है. साथ ही, इनके प्रति नीति नियंताओं और समाज के असंवेदनशील और अदूरदर्शी व्यवहारों की हकीकत से भी अध्ययन यात्रियों को रू-ब-रू करवाया है. यह यात्रा इन स्थलों एवं समाजों के निरंतर कमजोर होते हालातों को समझने और समाधानों की ओर जाने की भी रही है.
दूधातोली का अर्थ दूध की तोली/बर्तन है. दूधातोली क्षेत्र को उत्तराखण्ड हिमालय का हरा समुद्र/पानी की मीनार/पामीर और जलवायु नियंत्रक भी कहा जाता है. दूधातोली जलागम लगभग 4000 वर्ग किमी. में पौड़ी, चमोली और अल्मोड़ा जनपद का एक संयुक्त क्षेत्र है. इसका उत्तरी हिस्सा चमोली, पूर्वी क्षेत्र अल्मोड़ा और दक्षिण-पश्चिम भाग पौड़ी (गढ़वाल) जनपद में शामिल है. दूधातोली के उत्तरी दिशा में अधिक घना जंगल होने से उसे ‘हरियाली डांडा’ कहा जाता है. इस इलाके की इष्ट देवी/कुल देवी ‘हरियाली देवी’ है. वन, जल, खनिज, धन-धान्य से भरपूर इस इलाके में कई हिम शिखर श्वेत मुकटों की तरह शोभायमान हैं. कभी यहां लोहा और तांबे के लिए बहुत प्रसिद्ध था.
उत्तराखण्ड के जननायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ने दूधातोली को स्वीजरलैंड से भी खूबसूरत मानते हुए भारत की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव भारत सरकार को सन् 1960 में दिया था. उनकी इस मांग पर सर्वे भी हुआ था.
मुख्यतया दूधातोली जलागम क्षेत्र से पांच गैर हिमानी नदियां यथा – पश्चिमी रामगंगा, पूर्वी नयार, पश्चिमी नयार, आटागाड और वीनू जन्म लेती हैं. पश्चिमी रामगंगा उत्तराखण्ड हिमालय की सबसे बड़ी गैर हिमानी नदी है. इन नदियों की मछलियां देश-दुनिया में बहुत प्रसिद्व हैं. यह उल्लेखनीय है कि उत्तराखण्ड के 40 प्रतिशत भूभाग और बसासत की जीवंतता भूमिगत नदियों पर निर्भर है.
इस संदर्भ में दूधातोली के संवेदनशील पारिस्थिकीय तंत्र के गहन जानकार हेम गैरोला के अभिमत का जिक्र किया जाना आवश्यक है कि ‘‘पानी को केन्द्र में रखकर दूधातोली का प्रबन्धन आवश्यक है. जिस पर अपेक्षित ध्यान न दिया जाना चिन्ताजनक है. चारागाह आधारित लैण्डस्केप में यहां सशक्त डेयरी उद्योग स्थापित होने चाहिए थे, जो नहीं हुए. दूधातोली का प्रबन्धन अलग-अलग वन प्रभागों के बजाय एकीकृत स्वरूप में होना चाहिए. नीति-नियंताओं को दूधातोली के व्यापक संरक्षण, प्रबन्धन एवं स्थानीय समुदाय के रोजगार हेतु विशेष परियोजना तैयार करनी चाहिए.’’
दूधातोली को सामाजिक दृष्टि से राठ बहुल क्षेत्र कहा जाता है. राठ क्षेत्र में पूर्वी और पश्चिमी नयार नदी का अधिकांश जलागम है. नयार नदी को नादगंगा, नारदगंगा, रथवाहिनी, नवालिका आदि नामों से भी पुकारा जाता है. राठ शब्द की उत्पति पर विभिन्न मत हैं. राठ क्षेत्र के जागरों के विराम में अक्सर जागरी यह गाता है ‘चलि जान्दु मि अपणि कालि धौलि राठ’ अर्थात अब मैं अपनी काली और धौली राठ को चला जाता/जाती हूं. (काली और धौली दूधातोली की ही स्थानीय जल-धाराओं का नाम है.) कहा जाता है कि पैठीनश गोत्र के राठी राजा (राहू) जिसकी राजधानी पैठाणी थी के नाम पर इस क्षेत्र का नाम राठ पड़ा. देश एक मात्र आठवीं शताब्दी में निर्मित राहू मन्दिर इसी पैठाणी में है.
थलीसैण विकासखण्ड की पट्टी चौपड़ाकोट, चौथान, ढाईज्यूली, कण्डारस्यूं और पाबौ विकासखण्ड की वाली कण्डारस्यूं पट्टी को मिला कर राठ बना है. इसे पंचपट्टी राठ कहा जाता है. इस प्रकार मुख्यतया थलीसैण और पाबौ विकासखण्ड की वाली कण्डारस्यूं पट्टी का संयुक्त भू-भाग राठ क्षेत्र माना जाता है. वैसे, दूधातोली क्षेत्र का नाम राष्ट्रकूट से राठ भी है. विशेष जलवायु और भौगोलिक स्थिति के कारण यहां उत्तम किस्म के भेड़-बकरियों की ऊन और भांग की पैदावार होती है. ऊन और भांग के रेशों को कातने/बुनने में प्रयुक्त रहट/चर्खा की अधिकता के कारण इसे राठ कहा गया. वर्तमान में, सम्पूर्ण राठ क्षेत्र को ओबीसी का दर्जा हासिल है. जिसका श्रेय राजनेता गणेश गोदियाल को है.
दूधातोली पर्वत श्रृखंला के मुरलीकोठा चोटी (ऊंचाई समुद्रतल से 3000 मीटर) के दो अग्र पनढ़ालों यथा – दक्षिण-पश्चिम पनढाल से पूर्वी नयार और उत्तर-पश्चिम पनढाल से पश्चिमी नयार नदियों की मातृ धारायें जन्म लेती हैं. ये जल धारायें अपनी-अपनी दिशाओं में आगे चलकर अन्य कई जल धाराओं को समेटते हुए प्रवाहित होती हैं. मरोड़ा गांव के निकट सिंगोडा गाड़ और उडियार गाड के संगम स्थल लदोली घाट (2000 मीटर) पहुंचने वाली संयुक्त जल धारा को यहां से पूर्वी नयार कहा जाता है. इसी प्रकार स्योलीगाड और ढाईज्यूली गाड के संगम स्थल पैठाणी (1272 मीटर) पहुंचने पर इस संयुक्त जल धारा को पश्चिमी नयार कहा जाता है. पूर्वी और पश्चिमी नयार अपने-अपने उदगम क्षेत्र से लगभग 100 किलोमीटर की दूरी तय करके सतपुली से 2 किलोमीटर आगे नौगांव और कमंद गांव के निकट दुनै घाट नामक स्थल पर आपस में मिल कर नयार नदी नाम से जानी जाती है. इससे आगे लगभग 20 किलोमीटर की यात्रा तय करके नयार नदी व्यासघाट के फूल/व्यास चट्टी (ऊंचाई समुद्रतल से 435 मीटर) स्थल पर गंगा नदी में समाहित हो जाती है. पूर्वी नयार 18 और पश्चिम नयार 21 जलागम क्षेत्रों को अपने समाहित करती हैं. नयार नदी का कुल जलागम क्षेत्र 1960 वर्ग किमी. है. संपूर्ण नयार घाटी की तकरीबन 3 लाख आबादी में 1700 गांव बसे हैं.
‘नयार नदी-स्त्रोत से संगम अध्ययन यात्रा’ से वापस अपने गांव चामी आते हुए मन-मस्तिष्क में उक्त आशंकाओं के साथ यह कुलबुलाहट भी थी कि आखिर इस यात्रा से हासिल क्या हुआ? इस द्वंद्व का कारण पिछली पद यात्राओं के दोहराव से उपजी उकताहट भी रही होगी. परन्तु इस सबसे अहम् यह बात मन में जरूर पुख्ता हुई कि नयार नदी यात्रा मेरे लिए आत्म-मुग्धता की नहीं आत्म-विवेचन की यात्रा साबित हुई है.
इस अध्ययन यात्रा ने नयार नदी के परिपेक्ष्य में कई महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर किया है. यथा – पूर्वी और पश्चिमी नयार नदी के संपूर्ण प्रवाह क्षेत्र और उनमें शामिल होने वाली जलधाराओं का चिन्ह्नीकरण, पूर्वी नयार नदी से सतपूली में 14 सितम्बर, 1951 को आई भीषण बाढ़ के प्रारम्भिक स्थल डिन्यालू डांडा से तथ्यों का एकत्रीकरण, दूधातोली के उच्च क्षेत्रों में नये पेड़-पौधे और वनस्पतियों के उपजने एवं नयार के जल प्रवाह तंत्र में निरंतर कमी के कारणों (विशेषकर, मानव एवं पशु हस्तक्षेप, अनियोजित निमार्ण एवं खनन कार्य, जंगलों की आग, चीड़ का विस्तार, पारिस्थिकीय परिवर्तन) का आकलन, किसानों, पशुचारकों और वनकर्मियों की मनःस्थिति और कार्य दशाओं में हो रहे बहुआयामी बदलावों को समझना, क्षेत्र के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा आर्थिक स्तर, स्थिति एवं संभावनाओं का विश्लेषण, सकारात्मक उद्यमीय प्रयासों की जानकारी, क्षेत्र की कुछ प्रमुख विभूतियों वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली, तीलू रौतेली, जसवन्त सिंह, टिचंरी माई, शिवानन्द नौटियाल आदि के पैतृक गांवों की यथा स्थिति को इस यात्रा के द्वारा जाना और समझा गया है.
उक्त सभी तथ्यों पर विस्तृत और गहन रिपोर्ट का लेखन कार्य गतिमान है. यह रिपोर्ट दूधातोली, राठ और नयार नदी क्षेत्र के संरक्षण और संवर्द्धन की दृष्टि से आम जन से लेकर नीति-नियन्ताओं के संदर्भ हेतु महत्वपूर्ण होगी.
संपूर्ण अध्ययन यात्रा के यात्रीगण – अरुण कुकसाल, बीरेन्द्र चन्द, देवकृष्ण थपलियाल, जयदीप रावत, कुलदीप सिंह, प्रेम बहुखण्ड़ी, सागर बिष्ट, सुमेर चंद, यश तिवारी.
नोट- ‘दूधातोली, राठ और नयार’ यात्रा-किताब, समय-साक्ष्य प्रकाशन, देहरादून (7579243444) से शीघ्र प्रकाशित का एक अंश.
1. राठ क्षेत्र में परंपरागत चिकित्सा पद्धति का मानवशास्त्रीय अध्ययन – हर्षमणि, वर्ष- 2006, निर्देशन- प्रो. एच. बी. एस. चौहान, मानव विज्ञान विभाग हे. न. ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगर (गढ़वाल).
2. गैरसैण से पुरुषोत्तम असनोड़ा, वर्ष – 2023, श्री कम्यूनिकेशन, श्रीनगर (गढ़वाल) -246174, उत्तराखण्ड एवं समय साक्ष्य, देहरादून.
3. नैनीताल समाचार – पच्चीस साल का सफर, वर्ष- 2003, नैनीताल समाचार टीम.
4. जिन्दा रहेंगी यात्राएं- वर्ष- 1999, नन्दा देवी महिला लोक विकास समिति, गोपेश्वर एवं पहाड़, नैनीताल.
5. स्मारिका वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली, सम्पत्ति नेगी, वर्ष- 1984, जयभारत संगठन, श्रीनगर (गढ़वाल), उत्तराखण्ड.
6. रीजनल रिपोर्टर-दशाब्द यात्रा, वर्ष-2018, श्री कम्यूनिकेशन, श्रीनगर (गढ़वाल) -246174, उत्तराखण्ड.
7. गढ़वाल का एक गांव-मासों, डाॅ. यशवन्त सिंह कठौच, वर्ष- 2012.
8. हिमालयन गजेटियर- एडविन टी. एटकिंसन, अनुवाद- प्रकाश थपलियाल,वर्ष- 1998, ग्रंथ- तीन, भाग एक एवं दो, उत्तराखण्ड प्रकाशन, आदिबदरी, चमोली (गढ़वाल), उत्तराखण्ड.
9. स्पर्श गंगा- गंगा से सुर-ताल मिलाती पावन नदियां, रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ वर्ष- 2010, विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून.
10. भारतीय मध्य हिमालय में जलः संस्कृति एवं आर्थिकी, पहल उत्तराखण्ड एवं शब्द संस्कृति प्रकाशन, देहरादून, उत्तराखण्ड.
11. जैंता एक दिन तो आलो, गिरीश तिवाड़ी ‘गिर्दा’, वर्ष-2011 ‘पहाड़’ पोथी, नैनीताल.
12. उत्तराखण्ड समग्र ज्ञानकोश, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बलोदी, वर्ष-2010,विनसर पब्लिशिंग कम्पनी, देहरादून.
वरिष्ठ पत्रकार व संस्कृतिकर्मी अरुण कुकसाल का यह लेख उनकी अनुमति से उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.
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