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पहाड़ो में भूस्खलन

उत्तराखण्ड का अधिकांश भूभाग हिमालय की पर्वतीय श्रृंखलाओं में स्थित है, जहाँ तीव्र ढाल, गहरी नदी घाटियाँ, युवा भूगर्भीय संरचना तथा सक्रिय विवर्तनिक प्रक्रियाएँ प्राकृतिक रूप से विद्यमान हैं. यही कारण है कि यह क्षेत्र भूस्खलन की दृष्टि से देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है. सामान्यतः भूस्खलन वह प्रक्रिया है जिसमें मिट्टी, शैलखंड, चट्टानें अथवा मलबा गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में ढाल के सहारे नीचे की ओर खिसकने लगता है. पर्वतीय क्षेत्रों में यह एक स्वाभाविक भू-आकृतिक प्रक्रिया है, किन्तु जब यह तीव्र गति और बड़े क्षेत्रफल में घटित होती है तो प्राकृतिक आपदा का स्वरूप धारण कर लेती है.

हिमालय विश्व का सबसे युवा पर्वत तंत्र माना जाता है. इसकी चट्टानें अभी भी स्थायित्व प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं और इनमें अनेक भ्रंश, दरारें तथा कमजोर शैल संरचनाएँ विद्यमान हैं. उत्तराखण्ड के पर्वतीय भागों में शेल, स्लेट, फिलाइट, शिस्ट तथा अन्य रूपान्तरित चट्टानों की व्यापकता पाई जाती है, जिनकी परतदार संरचना तथा अपक्षय के प्रति संवेदनशीलता उन्हें भूस्खलन के लिए अधिक अनुकूल बनाती है. जब इन चट्टानों के टूटने से उत्पन्न मलबे तथा शैलखंडों के बीच वर्षा का जल प्रवेश करता है तो उनका भार बढ़ जाता है और उनके मध्य विद्यमान घर्षण शक्ति कम हो जाती है. परिणामस्वरूप ढालों की स्थिरता समाप्त होने लगती है और भूभाग नीचे की ओर खिसकने लगता है.

भूस्खलन की पृष्ठभूमि में अनेक प्राकृतिक तथा मानवीय कारक एक साथ कार्य करते हैं. भूगर्भीय भ्रंश एवं दरारें, अत्यधिक वर्षा, बादल फटना, भूकम्पीय गतिविधियाँ, जलस्तर में परिवर्तन तथा तीव्र हिमपिघलन इसके प्रमुख प्राकृतिक कारण हैं. उत्तराखण्ड में मानसून के दौरान अल्प अवधि में होने वाली अत्यधिक वर्षा पर्वतीय ढालों के लिए सबसे बड़ा खतरा सिद्ध होती है. वर्षा का पानी मिट्टी और चट्टानों के भीतर समाकर उनके भार को बढ़ा देता है और ढालों की वहन क्षमता कम होने लगती है. अनेक अवसरों पर बादल फटने की घटनाएँ अत्यधिक मात्रा में मलबा, बोल्डर तथा जल प्रवाह को नीचे की ओर ले आती हैं, जिससे व्यापक स्तर पर भूस्खलन और मलबा प्रवाह उत्पन्न होता है.

उत्तराखण्ड का अधिकांश क्षेत्र भूकम्पीय जोन-IV तथा V में स्थित है. भूकम्प के कारण चट्टानों में नई दरारें उत्पन्न होती हैं तथा पहले से विद्यमान कमजोरियाँ और अधिक सक्रिय हो जाती हैं. इसके बाद जब वर्षा का पानी इन दरारों में प्रवेश करता है तो भूस्खलन की संभावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं. इसी प्रकार जलवायु परिवर्तन के कारण उच्च हिमालयी क्षेत्रों में हिमनदों के तीव्र पिघलने और पीछे हटने से भी पर्वतीय ढालों का प्राकृतिक संतुलन प्रभावित हो रहा है.

मानवजनित गतिविधियों ने भी इस समस्या को गंभीर बनाया है. पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क निर्माण के लिए पर्वतों की बड़े पैमाने पर कटाई की जाती है. अनेक स्थानों पर वैज्ञानिक भू-तकनीकी परीक्षणों के अभाव में लगभग सीधी ढालों का निर्माण कर दिया जाता है, जिससे उनकी स्थिरता कम हो जाती है. यदि कटे हुए ढालों पर रिटेनिंग वाल, बोल्डर नेटिंग, पैरापिट तथा जल निकासी की समुचित व्यवस्था न हो तो मानसून के दौरान ये ढालें आसानी से खिसकने लगती हैं. नदियों और गधेरों के प्राकृतिक मार्गों में हस्तक्षेप, अनियोजित भू-उपयोग परिवर्तन तथा बड़े भवनों और होटलों का बढ़ता दबाव भी पर्वतीय ढालों की वहन क्षमता को प्रभावित करता है.

वनस्पति आवरण का क्षरण भी भूस्खलन की समस्या को बढ़ाने वाला महत्वपूर्ण कारण है. पर्वतीय ढालों पर स्थित चौड़ी पत्ती वाले वृक्ष और झाड़ियाँ मिट्टी को जड़ों के माध्यम से बाँधकर रखती हैं तथा वर्षा के जल को भूमि में अवशोषित होने में सहायता प्रदान करती हैं. किन्तु जब वनों का क्षरण होता है तो वर्षा का जल सतह पर तीव्र गति से बहने लगता है, जिससे ऊपरी उपजाऊ मिट्टी का अपरदन बढ़ जाता है. यही प्रक्रिया धीरे-धीरे ढालों को कमजोर बनाकर भूस्खलन का कारण बनती है.

उत्तराखण्ड में अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जो भूस्खलन की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील माने जाते हैं. चमोली जनपद का जोशीमठ क्षेत्र, जो प्राचीन भूस्खलन मलबे पर विकसित माना जाता है, हाल के वर्षों में भूमि धंसाव और भवनों में दरारों के कारण राष्ट्रीय चर्चा का विषय रहा है. बद्रीनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित लामबगड़ क्षेत्र लगभग प्रत्येक वर्ष मानसून में प्रभावित होता है और यातायात व्यवस्था बाधित हो जाती है. उत्तरकाशी का वरुणावत पर्वत, नैनीताल का बलियानाला क्षेत्र, हेलंग-मारवाड़ी क्षेत्र, चमोली के नारायणबगड़, रुद्रप्रयाग के कलियासौड़, कालीमठ-सोनप्रयाग, टिहरी के तोता घाटी तथा पिथौरागढ़, धारचूला, अल्मोडा के खैरना व क्वारब क्षेत्र के अनेक भाग भी निरंतर भूस्खलन की घटनाओं से प्रभावित होते रहे हैं.

भूस्खलन के परिणाम केवल भौतिक क्षति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इनका सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी व्यापक होता है. सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, कृषि और बागवानी की भूमि मलबे में दब जाती है, पेयजल स्रोत नष्ट हो जाते हैं तथा अनेक बार पूरे गाँवों के विस्थापन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. पर्यटन और तीर्थाटन आधारित स्थानीय अर्थव्यवस्था भी इससे प्रभावित होती है.

भूस्खलन को पूर्णतः रोकना संभव नहीं है, किन्तु वैज्ञानिक उपायों द्वारा इसके प्रभावों को कम किया जा सकता है. पर्वतीय क्षेत्रों में किसी भी निर्माण कार्य से पूर्व विस्तृत भूगर्भीय एवं भू-तकनीकी अध्ययन अनिवार्य किया जाना चाहिए. सड़क निर्माण में ढाल स्थिरीकरण, रिटेनिंग संरचनाओं, जल निकासी तंत्र तथा जैव-इंजीनियरिंग उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. स्थानीय प्रजातियों के वृक्षों का व्यापक रोपण, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों का जीआईएस आधारित मानचित्रण तथा पूर्व चेतावनी प्रणालियों का विकास भविष्य की आवश्यकता है.

हिमालय की संवेदनशीलता को समझते हुए विकास और पर्यावरण संरक्षण के मध्य संतुलन स्थापित करना आज उत्तराखण्ड के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. यदि विकास योजनाओं में भूगर्भीय सुरक्षा, पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय अनुभवों को समान महत्व दिया जाए, तो भूस्खलन से होने वाली क्षति को काफी सीमा तक कम किया जा सकता है और पर्वतीय समाज के लिए सुरक्षित तथा सतत विकास का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है.

चंद्रशेखर तिवारी. 

पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड, देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.

इसे भी पढ़ें: रिंगाल आधारित शिल्प : उत्तराखण्ड का एक परम्परागत कुटीर उद्योग

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