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28 साल के युवा से जब टिहरी रियासत डर गई

रात का वक्त था. जुलाई की बारिश पहाड़ों को भिगो रही थी, और भिलंगना नदी हमेशा की तरह अपने पूरे वेग में बह रही थी. लेकिन उस रात नदी सिर्फ पानी नहीं, एक सत्ता का डर भी बहा रही थी. टिहरी रियासत के कुछ सिपाही चुपचाप किनारे आए. हाथ में एक बोरा था, और बोरे में एक शव — बिना चिता, बिना संस्कार, बिना किसी परिजन की मौजूदगी के. टिहरी रियासत यही चाहती थी कि यह शरीर पानी में घुल जाए, और उसके साथ घुल जाए वह आवाज़ जो उसे हिला चुकी थी. लेकिन कुछ आवाज़ें बहती नहीं, ठहर जाती हैं. भिलंगना में बहाया गया वह शरीर श्रीदेव सुमन का था — 28 साल का एक युवक, जिसने एक रियासत के अहंकार के सामने झुकने से इनकार कर दिया था.

आज, 25 जुलाई को बलिदान दिवस पर यह सिर्फ एक तारीख याद करने की बात नहीं है. यह उस सवाल को फिर से पूछने की बात है, जो श्रीदेव सुमन ने अपने पूरे जीवन से पूछा था — क्या इंसान की गरिमा किसी राजा की मर्ज़ी की मोहताज होनी चाहिए?

आज का उत्तराखंड जिस लोकतांत्रिक हवा में सांस लेता है, उसकी कल्पना भी उस दौर में मुश्किल थी जब टिहरी रियासत की जनता राजा के इशारों पर जीती थी. बेगार प्रथा के तहत लोगों से बिना किसी मज़दूरी के काम लिया जाता था. जंगल, जो पहाड़ के लोगों की रोज़ी-रोटी की रीढ़ थे, उन पर जनता का कोई हक नहीं था. भारी टैक्स और हर विरोध का जवाब जेल की सलाखों में मिलता था.

इसी दमन की छाया में, टिहरी के जौल गांव में 25 मई 1916 को एक बच्चे ने जन्म लिया — श्रीदत्त बडोनी, जो आगे चलकर श्रीदेव सुमन के नाम से जाना गया. तीन साल की उम्र में पिता का साया सिर से उठ गया. मां तारा देवी ने अकेले उन्हें पाला. लेकिन गरीबी और संघर्ष के उस बचपन ने उनके भीतर कुछ और भी गढ़ दिया था — गांव के लोगों को झुकते देखने का दर्द, और उस झुकाव के खिलाफ उठ खड़े होने की ज़िद.

देहरादून पहुंचकर सुमन पहली बार राष्ट्रीय आंदोलन की गूंज से रूबरू हुए. गांधी का नाम हर गली तक पहुंच रहा था, और एक किशोर के भीतर भी वही आग सुलगने लगी थी. 1930 में जब पूरा देश नमक सत्याग्रह की लहर में डूबा था, श्रीदेव सुमन सिर्फ 14 साल के थे. लेकिन उम्र ने उन्हें आंदोलन से दूर नहीं रखा. देहरादून में गिरफ्तारी हुई, आगरा सेंट्रल जेल भेजे गए. आमतौर पर जेल की सलाखें एक बच्चे को डरा देती हैं. सुमन के साथ उल्टा हुआ — जेल ने उन्हें मांजा, तराशा, और मज़बूत किया. यहीं जेल की दीवारों के बीच उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कीं. एक पंक्ति में उन्होंने लिखा था कि उनकी धरती माता आग उगल रही है, और उनके वतन में आज़ादी की जंग छिड़ी है. ये सिर्फ शब्द नहीं थे. यह एक किशोर के भीतर का वह दर्द था, जो जल्दी ही एक अटल इरादे में बदलने वाला था. जेल से बाहर आने के बाद वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के ज़रिए उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई. यह मुलाकात उनके पूरे जीवन की दिशा तय कर गई. आगे का पूरा संघर्ष उन्होंने अहिंसा के रास्ते पर ही लड़ा — बिना एक भी पत्थर उठाए, बिना एक भी नारा हिंसा में डुबोए.

श्रीदेव सुमन सिर्फ एक आंदोलनकारी नहीं थे. वे एक लेखक थे, एक कवि थे, एक पत्रकार थे. पंजाब यूनिवर्सिटी से हिंदी साहित्य की पढ़ाई की, ‘विशारद’, ‘प्रभाकर’ और ‘साहित्य रत्न’ जैसी उपाधियां हासिल कीं. 1937 में उनका कविता संग्रह ‘सुमन सौरभ’ छपा — यह केवल साहित्यिक रचना नहीं थी, यह युवाओं की चेतना को झकझोरने की एक कोशिश थी. ‘हिंदू धर्मराज’, ‘राष्ट्रमत’ और ‘कर्मभूमि’ जैसे अखबारों के ज़रिए उन्होंने टिहरी रियासत की दमनकारी नीतियों पर लगातार लिखा. उस दौर में कलम चलाना भी राजद्रोह माना जाता था. लेकिन सुमन जानते थे कि सच्चाई लिखने का जोखिम, चुप रहने की कीमत से कम है.

1938 में दिल्ली में ‘गढ़देश सेवा संघ’ की स्थापना हुई, जो आगे चलकर ‘हिमालय सेवा संघ’ बना. मकसद साफ था — प्रवासी उत्तराखंडियों को जोड़ना, और टिहरी की दबी हुई आवाज़ को मंच देना. फिर आया 23 जनवरी 1939 का दिन. देहरादून में ‘टिहरी राज्य प्रजा मंडल’ की नींव पड़ी. श्रीदेव सुमन इसके सचिव बने. यह सिर्फ एक संगठन नहीं था — यह टिहरी की राजशाही के खिलाफ खुली चुनौती थी. मांगें बेहद सीधी थीं: बेगार खत्म हो, जनता को बोलने का हक मिले, जवाबदेह सरकार बने, टैक्स का अत्याचार रुके. आज ये मांगें साधारण लगती हैं. उस दौर में इन्हें ज़ुबान पर लाना भी अपराध था.

1939 में लुधियाना में हुए ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कॉन्फ्रेंस में, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में, श्रीदेव सुमन ने पहली बार राष्ट्रीय मंच पर टिहरी की असली तस्वीर रखी. नेहरू और विजयलक्ष्मी पंडित इस युवा की बातों से गहरे प्रभावित हुए. टिहरी का मुद्दा अब सिर्फ पहाड़ का नहीं, राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बन चुका था. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान सुमन वर्धा पहुंचे, गांधी से मिले, और टिहरी आंदोलन को पूरी तरह अहिंसक रास्ते पर आगे बढ़ाने का आशीर्वाद लिया. लेकिन अब रियासत उन्हें अपने अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा मानने लगी थी. उनकी निगरानी शुरू हुई, उनके प्रवेश पर पाबंदी लगी. फिर भी सुमन पीछे नहीं हटे.

3 मई 1944, श्रीदेव सुमन ने आमरण अनशन शुरू किया. उनकी मांगें किसी व्यक्तिगत सुविधा की नहीं थीं. वे चाहते थे कि प्रजामंडल कार्यकर्ताओं को अपने परिवार से पत्र-व्यवहार की इजाज़त मिले, राजा खुद उनके मुकदमे की सुनवाई करें और फर्जी गवाहों की जांच हो, और टिहरी प्रजामंडल को गैरकानूनी नहीं, बल्कि मान्यता प्राप्त संगठन माना जाए. ये मांगें जेल की दीवारों से कहीं आगे की थीं — यह लोकतंत्र की मांग थी, एक-एक शब्द में. सोचिए, 84 दिन तक एक इंसान ने अन्न का एक दाना भी अपने भीतर नहीं जाने दिया. शरीर टूटता गया. जेल प्रशासन ने ज़बरदस्ती खाना खिलाने की कोशिश की, जिसमें उनके फेफड़ों को भी नुकसान पहुंचा. रियासत की तरफ से समझौते का प्रस्ताव भी आया — आंदोलन छोड़ो, रिहा हो जाओगे. सुमन ने मना कर दिया. साफ कहा कि वे झुकेंगे नहीं.

धीरे-धीरे शरीर ने साथ देना बंद कर दिया. चलना मुश्किल हुआ, बोलना मुश्किल हुआ. लेकिन इरादा वहीं का वहीं खड़ा रहा — अडिग, अटूट. 20 जुलाई 1944 के आसपास वे कोमा में चले गए. जेल प्रशासन को डर सताने लगा कि अगर सुमन की मौत हुई, तो टिहरी में विद्रोह की आग भड़क सकती है. और फिर वही हुआ, जिससे रियासत डर रही थी. सुमन ने दम तोड़ दिया — बिना झुके, बिना टूटे. उनके अपने शब्दों में: तुम मुझे तोड़ सकते हो, लेकिन मोड़ नहीं सकते.

श्रीदेव सुमन की मौत के बाद प्रजा मंडल आंदोलन और तेज़ हुआ. 1 अगस्त 1949 को टिहरी रियासत का भारत में विलय हो गया. बेगार जैसी क्रूर प्रथाओं के खात्मे की शुरुआत हुई. कई इतिहासकार मानते हैं कि अगर सुमन का बलिदान न होता, तो टिहरी आंदोलन इतनी तेज़ी से मंज़िल तक नहीं पहुंच पाता. उनकी विचारधारा सिर्फ उनके साथ नहीं मरी. चिपको आंदोलन के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा खुले तौर पर कहते रहे कि सुमन ने ही पहाड़ को गांधीवादी अहिंसक संघर्ष का रास्ता दिखाया. 

श्रीदेव सुमन का जीवन

टिहरी बांध का जलाशय आज ‘श्रीदेव सुमन सागर’ कहलाता है. उनके नाम पर विश्वविद्यालय है. हर साल 25 जुलाई को बलिदान दिवस मनाया जाता है. ये सब स्मृति के औपचारिक चिन्ह हैं, और ज़रूरी भी हैं. लेकिन अगर हम ईमानदार हों, तो श्रीदेव सुमन की सबसे बड़ी विरासत किसी इमारत या जलाशय के नाम में नहीं है. उनकी सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने पहाड़ के लोगों को यह सिखाया कि डर से भी लड़ा जा सकता है — बिना हथियार उठाए, बिना एक बूंद खून बहाए. उन्होंने अपने ही शरीर को प्रतिरोध का औज़ार बना दिया, और यह साबित किया कि एक इंसान की अडिगता किसी रियासत के पूरे तंत्र से भारी पड़ सकती है.

आज जब हम उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासन और नीतियों पर सवाल उठाते हैं — चाहे वह किसी घोटाले का मामला हो या किसी नीति की नाकामी — तो कहीं न कहीं हम उसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे होते हैं, जिसकी नींव श्रीदेव सुमन ने रखी थी. सवाल पूछना, झुकने से इनकार करना, और सच के लिए कीमत चुकाने को तैयार रहना — यही वह विरासत है जो भिलंगना की लहरों ने बहाने की कोशिश की थी, और जो आज भी हर उस आवाज़ में ज़िंदा है जो अन्याय के सामने चुप नहीं रहती. भिलंगना बहती रही. लेकिन श्रीदेव सुमन का नाम बहा नहीं — वह ठहर गया, उत्तराखंड की स्मृति में, हमेशा के लिए.

नोट : यह लेख एआई जनरेटेड है.

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