बड़ी पुरानी बात है. पांडु राजा के पाँच पुत्र थे, पांडव और धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे, कौरव. राज्य आधा-आधा बँटा था, पर कौरवों में सबसे बड़ा दुर्योधन बड़ा कपटी और हठी था. उसने छल से पांडवों को बारह बरस का बनवास दे दिया, वह भी अज्ञातवास के साथ.
पांडव जंगल-जंगल भटके. कभी इस जंगल में रहे, कभी उस घाटी में. पहचान छुपाकर जीना पड़ता. विराट राजा की गायें चराईं, अपमान सहे. कीचक जैसे दुष्ट ने द्रौपदी का अपमान किया, पर धर्म की मर्यादा में बँधे पांडव सब सहते रहे.
समय पूरा हुआ तो पांडव अपने राज्य को लौटे और बोले, “हमें हमारा हक दे दो.”
दुर्योधन हँस पड़ा और बोला, “सुई की नोक जितनी ज़मीन भी न दूँगा.”
अब क्या होना था! अर्जुन का धनुष और भीम की गदा चुप कैसे रहती! युद्ध तय हो गया. दोनों ओर की सेनाएँ सजने लगीं. कौरवों के पास राज-पाट था, धन-दौलत थी. पर पांडव तो बनवास से लौटे थे, खाली हाथ. युद्ध बिना धन कैसे लड़ा जाए? यह चिंता सबको खाए जा रही थी.
तब धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा, “देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर हैं. उनसे सहायता माँगनी होगी.”
सबसे पहले सहदेव को कुबेर के पास भेजा गया. कुबेर ने पूछा, “ऋण लेंगे तो खुशी होगी, और लौटाएँगे तो भी उतनी ही खुशी होगी क्या?”
सहदेव बोले, “ऋण तो लौटा देंगे, पर आपका उपकार नहीं भूलेंगे.”
कुबेर ने सिर हिलाया, “नहीं, यह उत्तर सही नहीं.”
नकुल गए, भीम गए, अर्जुन गए, सबसे वही सवाल और सभी खाली हाथ लौट आए. तब धर्मराज युधिष्ठिर स्वयं चले. कुबेर ने युधिष्ठिर को आदर से बिठाया और आने का कारण पूछा. युधिष्ठिर बोले, “युद्ध सिर पर है, धन चाहिए.”
कुबेर ने फिर वही प्रश्न दोहराया, “ऋण लेते और लौटाते समय, क्या तुम्हारी खुशी समान रहेगी?”
धर्मराज मुस्कराए और बोले, “नहीं देवता. ऋण का सुख से क्या नाता? ऋण लेते समय मन खुश होता है, पर लौटाते समय आँख भर आती है. काशी जाने से भी ऋण से मुक्ति नहीं मिलती.”
यह सुनकर कुबेर बड़े खुश हो गए और बोले, “अब समझा. जो ऋण का भार जानता है, वही उसे चुका सकता है.” और कुबेर ने धर्मराज को जितना धन चाहिए था, सब दे दिया. इसलिये लोक कहा जाता है जो ऋण चुकाना नहीं जानता, वह स्वयं भी खो देता है और अपना मान भी.
गोविन्द चातक किताब उत्तराखंड की लोककथाएं के आधार पर
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