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दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है

हमारे इलाक़े में लंगड़ा आम अमूमन इन्हीं दिनों यानी जून के तीसरे-चौथे हफ़्ते में सलीके से पकना शुरू होता है. पके हुए इस दिव्य आम का स्वाद जीभ पर नहीं पेट के सबसे चोर हिस्से पर कब्ज़ा जमाता है. इस चोर हिस्से का तार दिमाग की उस ग्रन्थि से जुड़ा होता है जो आनन्द का चरम आने पर ही सक्रिय होती है.

हर जगह के अपने फेवरेट लंगड़े होते हैं. मेरी तरफ़ सबसे बेहतरीन लंगड़ा कालाढूंगी के उस बग़ीचे में उगता है जिसके पड़ोस में किसी ज़माने में जिम कॉर्बेट रहा करते थे. मुझे पक्का यकीन है कि बाबा जिम अपनी गर्मियां कालाढूंगी में इसी आम के लालच की वजह से बिताया करते होंगे वरना नैनीताल में जिसकी अपनी कोठी हो, वह तराई की सड़ी गर्मी क्यों खाएगा!

हमारे देश में पाए जाने वाले आमों के एक से एक नाम हैं – खानम पसंद, मधुदूत, मल्लिका, नाज़ुक बदन, कामांग, कामवल्लभा, अली बख्श, काला पहाड़, तोतापरी, कोकिलवास और ज़रदालू. इसके बावजूद यहाँ के शायरों को द्विअर्थी नाम होने के कारण लंगड़ा ही पसंद आया.

साग़र ख़य्यामी लिख गए –

आम तेरी ये ख़ुश-नसीबी है
वर्ना लंगड़ों पे कौन मरता है

भारतीय इतिहास में तैमूर ने बजाय युद्ध कौशल के अपने पैरों के दोष के कारण ज्यादा नाम हासिल किया. बताते हैं नाम के चलते बिचारे ने इस स्वादिष्टतम आम का अपने महल में प्रवेश बंद करवा रखा था. शायरी ने इस ऐतिहासिक तथ्य को इस तरह रेकॉर्ड किया –

तैमूर ने कस्दन कभी लंगड़ा न मंगाया
लंगड़े के कभी सामने लंगड़ा नहीं आया

आम के साथ सामूहिकता और यारी-दोस्ती हमेशा जोड़ कर देखी जाती रही. जिनके घर आम होते थे वे दूसरों के घर आम भेजते थे. फिर ये दूसरे वाले पहले के घर वापस आम भिजवाते. पहले के यहाँ दशहरी का बाग़ तो दूसरों के यहाँ चौसे का. शहरों के बीच की दूरियां मायने नहीं रखती थीं. किस्सा है अकबर इलाहाबादी ने अल्लामा इकबाल के लिए आम भिजवाये. वह भी अपने नगर से साढ़े नौ सौ किलोमीटर दूर लाहौर. उस जमाने में सड़क के रास्ते थे और आने-जाने के साधन बहुत कम. आम सलामत पहुंचे तो चचा ने शेर लिखा –

असर ये तेरे अन्फ़ासे मसीहाई का है अकबर,
इलाहाबाद से लंगड़ा चला लाहौर तक पहुंचा

यानी तूने आमों के ऊपर अपनी मसीहाई का ऐसा मंतर फूंका कि माल बिना खराब हुए आराम से ठिकाने पर पहुँच गया.

जोशुआ काडीसन ने एक बड़ी दिलचस्प किताब लिखी है ‘आम खाने के सत्रह तरीके’. जे. नाम के एक युवा वनस्पतिशास्त्री को उसकी मल्टीनेशनल कम्पनी एक सुदूर द्वीप में भेजती है. कम्पनी वहां आमों की पैकिंग करने के लिए एक कारखाना लगाने की सोच रही है. जे. को उसी बारे में एक रिपोर्ट तैयार करनी है. संयोगवश उसकी मुलाक़ात द्वीप में रहने वाले एक साधु से होती है. साधु जे. को आम खाने के सत्रह तरीके बतलाता है. ये तरीके जीवन की सबसे साधारण बातों के जटिल सौन्दर्य को समझने के लिए किसी दार्शनिक गाइडबुक का काम करते हैं. किताब के एक हिस्से में साधु उसे एक आम चखने को देता है और कहता है कि उसने आम के साथ उन सारी चीज़ों को चखने की कोशिश करनी चाहिए जिनसे आम बना है – बौर, पेड़ का तना, पत्तियां, जड़ें, मिट्टी, धूप और गर्मियां.

जे. आँखें बंद कर ऐसा करने की कोशिश कर ही रहा होता है कि साधु आगे कहता है – “यह भी महसूस करो कि किस जगह आम ख़त्म हो रहा है और आसमान शुरू हो रहा है.”

मुझे यह कल्पना करना अच्छा लगता है कि इसके बाद वह युवा वनस्पतिशास्त्री लंगड़ा आम के भीतर मौजूद आसमान को खोजना शुरू कर देता है जिसकी हल्की नारंगी आभा एक नई सुबह का ऐलान कर रही है.

–अशोक पाण्डे

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