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जनपद पिथौरागढ़ के मेले

लोक जीवन में मेलों का एक अलग स्थान है. मेले, कष्टसाध्य जीवन जीते पर्वतीय लोगों को अपने प्रियजनों, नाते-रिश्तेदारों और मित्रों आदि से मिलने का सुअवसर होते हैं. मेले, वर्षभर अपने खेतों और जंगलो में खटती महिलाओं को संज-संवर कर अपने स्त्रीत्व को याद करने का अवसर देते हैं. आज बात करते हैं पिथौरागढ़ जिले के तीन मेलों की.

थल मेला

यह एक व्यापारिक मेला है, जो पिथौरागढ़ से पचास किमी दूर स्थित थल नामक कस्बे में प्रतिवर्ष वैशाखी के अवसर पर लगता है. थल में स्थित प्रसिद्द शिव मंदिर ही इस मेले का केंद्र है. थल के अन्य मंदिरों में बालेश्वर मंदिर की महिमा का वर्णन मिलता है. इस मंदिर में स्थित शिवलिंग का मेले के अवसर पर विशेष दर्शन प्राप्त किया जाता है.

स्कन्द पुराण के एकादश अध्याय में उल्लेख है कि मानसरोवर जाने वाले यात्री को रामगंगा में स्नान कर बालीश तथा शिव के गणों का पूजन कर पावन पर्व की ओर जाना चाहिये. आज भी थल के शिव मंदिर में शिव तथा उनके गणों का अर्चन कर यात्री मानसरोवर की ओर प्रस्थान करते हैं. (सक्सेना, 1994 , पृ. 258)

किंवदतिया के अनुसार यह मेला जलियावाला बाग़ दिवस के दिन से शुरू होता है. पहाड़ के अन्य मेलों की तरह यहाँ भी सांस्कृतिक एवं व्यापारिक गतिविधियां चलती रहती हैं. यह मेला करीब पन्द्रह दिन चलता है. चूँकि यह व्यापारिक मेला है इसलिये पुरातन काल में इसका अत्यधिक महत्त्व था. यहाँ दूर-दूर से व्यापारी अपना माल बेचने आया करते थे. मुनस्यारी, कपकोट और धारचूला के व्यापारियों के लिए इस मेले का विशेष महत्त्व था. रिंगाल, मोस्टे, कालीन, पंखी, हल, कुदाल, कुटले से लेकर ऊनी वस्त्र आदि सभी यहाँ पर बेचे-खरीदे जाते थे. यहाँ के ऊनी वस्त्रों के लिए लोग साल भर इंतज़ार करते थे. यह मेला कुमाऊँ, सोरघाटी, जोहार, गोरखा आदि संस्कृतियों के संगम का अनूठा स्थल है. कालान्तर में वक्त के थपेड़ो ने इस मेले की चमक को कम तो किया है किन्तु मेला पुरातन रूप समेटे हुये है.

जौलजीबी मेला

जौलजीबी पिथौरागढ़ से अड़सठ किमी दूर मानसरोवर मार्ग पर स्थित एक कस्बा है. यहाँ प्रतिवर्ष वृश्चिक संक्रांति के दिन काली तथा गोरी नदी के संगम स्थल पर मेला लगता है. इस पवित्र स्थल पर अस्कोट के गजेन्द्र पाल द्वारा जौलेश्वर महादेव मंदिर स्थापित कर मेले के अवसर पर गंगा स्नान की परम्परा डाली.

आरम्भिक दौर में इस आयोजन को भव्यता प्रदान करने के लिए अस्कोट के रजवार द्वारा मह्त्त्वपूर्ण चौदह ग्राम सभाओं के प्रधानों को ग्रामवासियों के साथ इस उत्सव में समिल्लित होने के आदेश दिए और साथ ही गजेन्द्र पाल ने मैदानी रियासतों के अपने रिश्तेदारों, मित्रों व प्रतिष्ठित व्यापारियों को पत्र लिख कर आमंत्रित किया. शेष भारत से अलग-थलग इस सीमान्त में कठिन पहुँच के बाद भी रजवार का निमंत्रण स्वीकार करते हुये सोर(पिथौरागढ़) से शिवलाल, रामलाल साह, लाला जयराम खत्री, मिठाई विक्रेता, काशीपुर से हाफिज़ काजी, शेख छोटे मियां आदि छुट-पुट दैनिक प्रयोग की वस्तुओं को लेकर दुकान लगाने जौलजीबी पहुঁचे. इधर जोहार, दारमा, व्यास के शौका तिब्बती माल और पश्चिमी नेपाल के लोग स्थानीय उत्पादों के साथ जौलजीबी पहुंचने लगे. देखते ही देखते जौलजीबी में जनजुड़ाव ने कौतिक का रूप ले लिया. (पंत ल. , पृ. 390)

जौलजीबी का व्यापारिक महत्त्व  धीरे-धीरे बढ़ने लगा यहाँ नेपाल व तिब्बत से आयी ढेरों वस्तुयें जैसे सांभर खाल,चंवर गाय की पूँछ, कस्तूरी, जड़ी-बूँटिया, ऊनी वस्त्र आदि मिलने लगे. यह नेपाल, तिब्बत और भारत का व्यापार स्थल बना. यह मेला चीन आक्रमण के बाद सबसे अधिक प्रभावित हुआ क्योंकि तिब्बत से आने वाला माल बंद हो गया. 1992 में भारत तिब्बत व्यापार पुन: आरंभ होने के बाद मेले का आकर्षण पुन: बढ़ा किन्तु अब मेला  स्वत: स्फूर्त कम रह गया है फिर भी यह एक प्रसिद्ध मेला है.

मोष्टमानू मेला

पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से लगभग छ: किमी दूर एक ऊंची चोटी पर स्थित मंदिर पर ऋषि पंचमी को लगता है. मोष्टमानू शब्द का अर्थ है मोष्ट देव का मंडप. मोष्ट देवता को जल या वर्षा का देवता माना जाता है. मोष्टा को नागदेवता माना जाता है, उनकी आकृति मोष्टा या चटाई की तरह मानी गयी है. उन्हें विषयुक्त नाग माना जाता है. इसलिए जो लोग नाग पंचमी को नागदेवता की पूजा नहीं कर पाते, वे मेले के दिन यहाँ  आकर उनका पूजन सम्पन्न करते थे. (सक्सेना, 1994 , पृ. 262)

जनश्रुतियां बताती है कि मोष्टा देवता को वृमवंशीय एक शासक नेपाल के काठमांडू से यहाँ लाये और प्रतिष्ठित किया. मेले के दिन मोष्टा देवता के डोले को ढोल नगाड़ों के साथ घुमाया जाता है. डोले में देवता की मूर्ति न हो कर देवता का डंगरिया जागृत रूप में विराजमान होता है, इसी कारण दूर-दूर से श्रद्धालु देव के दर्शनों हेतु आते हैं.

ऐसी मान्यता है कि यदि पूजा अर्चना से मोष्टा देव प्रसन्न होते हैं तो वर्षा जरुर होती है. इस वर्षा को दैवीय आशीर्वाद माना जाता है. मेले में की दिन यहाँ अनेक अस्थायी दुकानें लगती हैं जिनमें स्थानीय उत्पादों के साथ-साथ, अनेक हस्तशिल्प व खाने पीने की वस्तुयें मिलती हैं. भारत चीन युद्ध से पूर्व यहाँ तिब्बत के व्यापारी भी अपने-अपने उत्पादों की दुकानें लगाया करते थे, जो की मेले के व्यापारिक महत्त्व को बढ़ाती थी किन्तु 1962 में हुए चाइना युद्ध के बाद पहले ये बंद हुआ और फिर कम हो गया. अब मेले का धार्मिक महत्त्व ज्यादा है.

डॉ. अपर्णा सिंह

इतिहास विषय पर गहरी पकड़ रखने वाली डॉ. अपर्णा सिंह वर्तमान में सोमेश्वर महाविद्यालय में इतिहास विषय ही पढ़ाती भी हैं. महाविद्यालय में पढ़ाने के अतिरिक्त अपर्णा को रंगमंच पर अभिनय करते देखना भी एक सुखद अनुभव है.

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