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रिंगाल: पहाड़ की बुनावट में छिपा रोजगार और जीवन

पहाड़ों में जीवन हमेशा प्रकृति के साथ जुड़कर चला है. यहाँ जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि लोगों की जरूरतों, परंपराओं और आजीविका का हिस्सा होते हैं. उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में मिलने वाला रिंगाल भी ऐसा ही एक प्राकृतिक उपहार है. देखने में साधारण सा लगने वाला रिंगाल पहाड़ के लोगों के जीवन में बहुत गहरी जगह रखता है.

बचपन से गाँवों में एक दृश्य बहुत सामान्य रहा है—घर के आँगन में बैठी महिलाएँ, हाथों में रिंगाल की पतली पट्टियाँ, और धीरे-धीरे उनसे आकार लेती एक टोकरी. यह सिर्फ एक वस्तु बनाने की प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि अनुभव, धैर्य और पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान का मेल होता है.

पहाड़ के जीवन में रिंगाल का उपयोग बहुत पुराना है. खेतों से घास लाने के लिए, जंगल से लकड़ी लाने के लिए, अनाज रखने के लिए, और घर के कई छोटे-बड़े कामों में रिंगाल से बनी टोकरियाँ और डलिया इस्तेमाल की जाती रही हैं. उस समय यह सिर्फ सुविधा का साधन नहीं था, बल्कि स्थानीय जीवन का हिस्सा था.

समय बदला, बाजार बदले, लोगों की जरूरतें बदलीं, लेकिन रिंगाल की उपयोगिता खत्म नहीं हुई. आज यही रिंगाल ग्रामीण परिवारों के लिए आय का एक मजबूत साधन बन सकता है. खासकर महिलाओं के लिए यह आत्मनिर्भर बनने का रास्ता खोलता है. घर के कामों के साथ-साथ महिलाएँ रिंगाल शिल्प के जरिए अपनी पहचान और आमदनी दोनों बना रही हैं.

पहाड़ों से युवाओं का शहरों की ओर पलायन एक बड़ी चुनौती है. ऐसे में रिंगाल जैसे पारंपरिक शिल्प स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा कर सकते हैं. यदि युवाओं को इस कला से जोड़ा जाए, नए डिजाइन सिखाए जाएँ और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो गाँव में ही काम और सम्मान दोनों मिल सकते हैं.

आज दुनिया पर्यावरण के अनुकूल चीजों की तरफ लौट रही है. प्लास्टिक की जगह प्राकृतिक उत्पादों की मांग बढ़ रही है. ऐसे समय में रिंगाल से बने बैग, टोकरियाँ, सजावटी सामान और घरेलू उपयोग की वस्तुएँ बाजार में अच्छी पहचान बना सकती हैं.

जरूरत सिर्फ इतनी है कि इस कला को सही मंच मिले, कारीगरों को उचित मूल्य मिले और पहाड़ की इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए. क्योंकि रिंगाल सिर्फ एक पौधा नहीं है—यह पहाड़ की मेहनत, महिलाओं की कला और गाँव की अर्थव्यवस्था को जोड़ने वाला एक मजबूत धागा है. जब एक रिंगाल की टोकरी बनती है, तब उसमें सिर्फ बाँस नहीं बुना जाता—उसमें पहाड़ का जीवन, संघर्ष और उम्मीद भी बुनी जाती है.

डॉ. निधि सजवान

मूल रूप से टिहरी गढ़वाल की रहने वाली निधि सजवान शोधकर्ता है। वर्तमान में निधि सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं. निधि हिमालयी संस्कृति, लीक परम्पराओं, समाज और महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लिखने में रुचि रखती हैं।

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