इस तस्वीर में आपको दिख रहे हैं “पंडित नैन सिंह रावत” — 19वीं सदी के उन महान भारतीय खोजकर्ताओं में से एक, जिन्हें “पंडित ऑफ पंडित्स” कहा जाता है. क्या आप जानते हैं कि बिना सैटेलाइट, GPS या आधुनिक उपकरणों के, एक साधारण हिमालयी व्यक्ति ने तिब्बत का पूरा नक्शा बना दिया था?
नैन सिंह रावत का जन्म 21 अक्टूबर 1830 को उत्तराखंड के जोहार घाटी के मिलम गांव में एक साधारण भोटिया परिवार में हुआ था. शुरुआती जीवन संघर्षपूर्ण था. उन्होंने पिता के साथ तिब्बत व्यापार किया, तिब्बती भाषा सीखी और बाद में मिलम गांव में स्कूल टीचर (पंडित) बन गए. 1860 के दशक में ब्रिटिश सर्वे ऑफ इंडिया के कर्नल मॉन्टगोमरी ने उन्हें चुना और गुप्त रूप से ट्रेनिंग दी. ब्रिटिश उन्हें “पंडित” की उपाधि से पुकारते थे (जो मूल रूप से उनके शिक्षक होने के कारण पड़ी थी).
तिब्बत उस समय विदेशियों के लिए पूरी तरह बंद था, इसलिए ब्रिटिश ने उन्हें बौद्ध भिक्षु (लामा) के भेष में भेजा. नैन सिंह ने तिब्बती लामा का वेश धारण किया, प्रार्थना की माला से कदम गिने, प्रेयर व्हील में गुप्त नोट्स छिपाए और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर सर्वेक्षण किया. उन्होंने काठमांडू से ल्हासा तक का रास्ता नापा, त्सांगपो नदी (ब्रह्मपुत्र) का सर्वेक्षण किया, ल्हासा शहर की सटीक लोकेशन और ऊंचाई तय की. 1867 में उन्होंने थोक जलुंग के प्रसिद्ध सोने के खानों की भी खोज की.
इन यात्राओं में उन्होंने अपार कष्ट सहे — भयंकर ठंड, बर्फीले तूफान, भूख-प्यास, फ्रॉस्टबाइट, डाकुओं का खतरा और मौत से कई बार करीबी सामना. फिर भी उन्होंने 40,000 किलोमीटर से ज्यादा पैदल यात्रा की और लाखों कदम गिनकर नक्शे तैयार किए. 1877 में उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें रॉयल ज्योग्राफिकल सोसाइटी का प्रतिष्ठित पैट्रॉन मेडल मिला — वे पहले भारतीय थे जिन्हें यह सम्मान प्राप्त हुआ. ब्रिटिश सरकार ने उन्हें CIE का खिताब भी दिया.
आखिरी दिनों में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण वे सक्रिय यात्राओं से दूर हो गए और सर्वे ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार 1895 में उनका निधन हो गया. आज जब हम भूगोल और खोज की बात करते हैं, तो पंडित नैन सिंह रावत की कहानी याद दिलाती है कि सच्चा साहस और लगन किसी भी आधुनिक उपकरण से बढ़कर होती है.
काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें
हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं. तस्वीरें खिंचती हैं, अभियान…
आज उत्तराखंड का लोक पर्व हरेला है जो हरियाली और प्रकृति से जुड़ा है. हरेले…
आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…
खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया…
Στο Verde Casino, η διασκέδαση εκκινεί με αυθεντικότητα. Δουλεύουμε πάνω στην πλατφόρμα μας για να…
Die Luft zittert vor Vorfreude https://instanttcasino.com/de-be. Heute Abend verspricht das Instant Casino spannende Spielrunden, besondere…