भारतीय परम्परा और धरती मां

हमारी भारतीय परंपरा में धरती को हमेशा से ही मां कह कर पुकारा गया है. ‘माता भूमिः पुत्रो ऽहम् पृथिव्याः’ यानी धरती मेरी मां और मैं उसका पुत्र हूं. भारतीय साहित्य व लोक मान्यताओं में प्रकृति को सर्वोच्च सत्ता के रुप में आसीन करने और भूमि को देवत्व स्वरुप प्रदान करने की सार्थक परिकल्पना की गयी है. देखा जाय तो सन्ध्या पूजा के दौरान वाचित होने वाले ‘गंगा यमुनाश्चैव गोदावरी सरस्वती नर्मदे सिंधु कावेरी जले सन्निधिम कुरु तथा अयोघ्या मथुरा माया काशी कांची अवंतिका पुरी द्वारावती चैव सप्तैदा मोक्ष्यदायका’ जैसे श्लोकों में मूलतः नदियों और नगरों को पवित्र मानते हुए उन्हें गन्दगी अथवा प्रदूषण से दूर रखने का गूढ़ भाव निहित है. आचमन, स्नान, धूप-दीप, होम यज्ञों एवं सुगंधित द्रव्यों के द्वारा वातावरण में व्याप्त प्रदूषण को दूर करने के यत्न किये जाते थे.

हमारे देश में धरती मां की महत्ता को युगों पूर्व ही महसूस कर लिया गया था. अथर्ववेद की धारणा हमें मातृभूमि के उस विस्तृत फलक की ओर ले जाती है जहां वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धान्त को मान्यता दी गयी है. गहराई से देखें तो मातृ देवो भव का मतलब केवल जन्म देने वाली मां की सेवा करना ही नहीं है अपितु उस धरती मां की सेवा और सुरक्षा भी करना है जो हमें अपने अन्न व जल से पोषित कर रही है.हमारे पुरातन वेदों में धरती को चेतन पदार्थ के रुप में दर्शाया गया है. दानवों के अत्याचारों व प्रतिकूल कार्यों से जब पृथ्वी पर भार बढ़ जाता है तो वह इसके निवारण के लिए सृष्टि के जनक से प्रार्थना भी करती है, तब जाकर विष्णु विविध अवतारों में प्रकट होते हैं. 

धरती के प्रतिकूल तथा अनूकूल कर्म से जुड़े ऐसे कई दृष्टान्त हमें प्राचीन भारतीय साहित्य में मिलते हैं. मनुष्य में धरती के प्रति आदर भाव विकसित हो और वह इसके शोषण के लिये किंचित मात्र भी उद्वत न हो इस दृष्टि से ही हमारे धर्म-शास्त्रों में इसकी आराधना की गयी है. सुबह उठने पर जब मनुष्य जमीन पर पैर रखता है तो वह धरती मां से क्षमा मांगते हुए कहता है- समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले,विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे अर्थात समुद्ररुपी वस्त्र धारण करने वाली,पर्वतरुपी स्तन वाली श्री विष्णु जी की पत्नी पृथ्वी देवी तुझे प्रणाम मेरे पैर से तुझ पर जो स्पर्श हो रहा है उसे तू क्षमा कर.

लोकजीवन के विविध पक्षों में भी धरती मैया की महत्ता को पग-पग पर स्वीकारा गया है. मांगलिक कार्यों में देवी देवताओं के साथ ही प्रकृति की पूजा का भी विधान रखा गया है. विभिन्न व्रत-पर्वों में पृथिवी के प्रतीक कलश की स्थापना कर सूर्य, चन्द्र, नवग्रह, जल, अग्नि सहित दूर्वा, वृक्ष, बेल व पत्तियों को पूजने की परम्परा चली आ रही है. पूजा अर्चना में प्रयुक्त इनकी स्तुति हमें इस बात का अहसास कराती है कि इस धरती मैया की गोद में उपजने वाली ये प्राकृतिक शक्तियां हमें जीवन प्रदान करती हैं. उत्तराखण्ड के इलाके में आज भी लोग खेती का कार्य करने से पहिले और नयी फसल को देवताओं को अर्पित करते समय भूमि के रक्षक भूम्याल (भूमिपाल) का आह्वान करते हैं – सुफल है जाया हो… गणेशा देवा हो… भूम्याला देवा हो… दैना होया हो भूमि का भूम्याला. 

यहां कई जगहों पर देववनों की स्थापना भी की गयी है. संरक्षण की दृष्टि से गांव समाज के सामूहिक जंगलों को पांच साल के लिये स्थानीय देवी देवताओं को अर्पित किया गया है. लोक नियमानुसार इस अवधि में इन देववनों से पेड़ की एक भी पत्ती नहीं तोड़ी जा सकती . पहाड़ के पारम्परिक जल स्रोत नौलों की दीवारों पर अंकित वनस्पतियों व फूलों के चित्र भी कतिपय रुप से प्रकृति संरक्षण का संदेश देते हैं. हमारी भारतीय परम्परा में निहित इस अद्भुत प्रकृति प्रेम की मिसाल सम्भवतः अन्यत्र देखने को मिले आखिर धरती मां के प्रति इससे बड़ी आस्था और क्या हो सकती है.

सम्पूर्ण जगत में जल को जीवन का प्रमुख आधार माना जाता है. समस्त जीवों की कल्पना जल के बिना नहीं की जा सकती. भारतीय वैदिक ग्रन्थों में सृष्टि की उत्पत्ति जल और जल-प्लावन जैसी घटनाओं के परिणाम स्वरुप मानी गयी है. इसका उल्लेख शतपथ ब्राह्मण में मिलता है. ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक कोषों में जल का उल्लेख विविध पर्यायवाची शब्दों के रुप में हुआ है. पुरातन वैदिक साहित्यों में जल के लिए आपः शब्द को सर्वाधिक प्रयुक्त किया गया है इसके अलावा पयः, अम्भः व सलिल जैसे शब्द भी कई बार आये हैं. पंचतत्वों में जल को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है –  क्षिति, जल, पावक,गगन, समीरा, पंच तत्व यह रचित शरीरा. वैदिक विज्ञान की बात मानें तो जल विश्व जगत का सर्वाधिक कल्याणकारी तत्व है तभी तो उसे विश्व भेषजी कहा गया है.

जल में सम्पूर्ण औषधियां समाहित हैं विश्व का कल्याण करने वाली अग्नि जल में निहित है. जल हमारी सभी अशुद्धियों को धोकर निर्मल व पवित्र कर देता है तथा साथ ही शरीर व मन से हमें संस्कारवान होने की प्रेरणा देता है. तभी तो ऋग्वेद में कहा गया है ‘आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु‘ . भारत की प्राचीन जल संस्कृति में नदियों को बहुत महत्ता प्रदान की गयी है. यहां के अनेक नगर और तीर्थ नदियों के किनारे ही स्थित हैं. इन्हीं स्थानों से भारतीय सभ्यता नदी की धारा के साथ सतत रुप से आगे बढ़ी. भारतीय लोक में नदियों का स्वभाव दूसरों का हित करने वाला बताया गया है. नदियां अपने जल से जीव जगत की प्यास बुझाती है, वह मोक्ष प्रदान करती है, जल सिंचन से अन्न उपजाती हैं और तो और अपने जल शक्ति से विद्युत पैदा कर जगत को आलोकित भी करती है. कुल मिलाकर भारतीय परम्परा में नदियां सृजन व चेतना के तौर पर मुखरित होती दिखायी देती हैं. नदियों का जल कितना शुद्ध और पवित्र होता है इस बात का भान हमारे ऋषि-मुनियों को हजारों साल पूर्व ही हो गया था. आज भी स्नान के दौरान सप्त नदियों के पवित्र जल का ध्यान इस मंत्र द्वारा किया जाता है. गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती. नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेस्मिन सन्निधिं कुरु. अर्थात गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी इन सभी नदियों का पवित्र जल मेरे स्नान के लिए रखे गये जल पात्र में समाहित हों जांय.

आज के वैश्विक दौर में जिस तरह धरती पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं यह मानव के लिये गहन चिन्ता का विषय बनते जा रहा है. प्रश्न चाहे हिमालयी क्षेत्र की नष्ट हो रही हरियाली का हो अथवा नगरों- महानगरों में बढ़ते जा रहे प्रदूषण का, आखिर इन सारे सवालों का दीर्घकालिक समाधान हम प्रकृति के साथ अनुकूल व्यवहार करके ही पा सकते हैं. प्रकृति में निहित सिद्वान्तों के अनुरूप ही हमें अपने उपभोग और आकांक्षाओं में समुचित तालमेल रखने की जरुरत समझी जानी चाहिए. इसके लिये पग-पग पर धरती से सहयोग करना उतना ही जरुरी समझा जाना चाहिये जितना उससे लाभ कमाने की इच्छा हो. 

धरती मैया के इस मर्म को गहराई से समझते हुए हमें उसकी सुरक्षा के लिये अपने व्यक्तिगत जीवन शैली में बदलाव लाने जैसी कोशिशें जारी रहनी चाहिए.धरती को विनाश के रास्ते पर ले जाने के बजाय हमें उसकी सहेजने की प्रवृति और उसे विकसित करने की ओर लौटाना होगा. भले ही आज हम लोग कुछ समय के लिये जोर शोर से पृथ्वी दिवस मनाकर उसके लिये थोड़ी हमदर्दी जरुर जता लें पर इससे कुछ खास हासिल होने वाला नहीं. अन्ततः धरती मैया की देखभाल व सुरक्षा के लिये हमें भारतीय परम्परा में निहित दूरदर्शी सोच की ओर लौटना ही पड़ेगा वह भी एक व्यापक जन मुहिम के साथ.

चंद्रशेखर तिवारी. 

पहाड़ की लोककला संस्कृति और समाज के अध्येता और लेखक चंद्रशेखर तिवारी दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र, 21,परेड ग्राउण्ड, देहरादून में रिसर्च एसोसियेट के पद पर कार्यरत हैं.

इसे भी पढ़ें: परम्परागत घराट उद्योग

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