एटकिंसन : पहाड़ आधारित प्रशासन का निर्माता

तत्कालीन नार्थ वेस्टर्न प्रोविनेंस यानी उत्तर प्रदेश के जिस ब्रिटिश अधिकारी ने उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में सेवारत रहते हुए पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष व्यवस्था और भिन्न स्वरूप का प्रशासन किया, वह एडविन थॉमसन एटकिंसन थे जो सांख्यिकीविद के साथ गजेटियर लेखक रहे. उनकी मुख्य कृति “द हिमालयन गजेटियर” कुमाऊं-गढ़वाल के भूगोल, समाज, अर्थव्यवस्था व प्रशासनिक समस्याओं की बहु खंडो में रची रचना बनी जो प्रमाणिक व विश्वसनीय रही. वह ज्ञान संकलक इतिहासकार थे जिन्होंने हिमालय के समाज, जातिगत विभाजन, स्तरीकरण, लोक परंपरा व लोक थात का विस्तृत व सारगर्भित वर्णन किया. पहाड़ की भूमि, राजस्व व नियत कानूनों पर विस्तृत टिप्पणी लिखीं जिससे वित्तीय नियमावली की कई धारा उपधाराओं को निर्धारित करना सम्भव बना.प्रशासन की कुशलता के लिए आर्थिक आंकड़े एकत्रित किये जिसकी सांख्यिकीय विवेचना कर ऐसे निष्कर्ष मिले जो प्रशासनिक निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण बने.

वह हिमालय के औपनिवेशिक ज्ञान निर्माता कहे जाते हैं. उनकी व्याख्या ब्रिटिश शासन की पक्षधर थीं जिसमें स्थानीय समाज को अक्सर “राजस्व इकाई” के रूप में देखा गया. एटकिंसन तर्क संगत रूप से तथ्यों को जुटाने वाले हिमालय के पहले इतिहासकार बने जिनका लेखन उपनिवेश सत्ता के लिए “ज्ञान उत्पादक आधार” रहा जिससे भावी नीतियाँ निर्दिष्ट हुईं. वह हिमालय की खोज बीन में निरंतर लगे रहे. उन्होंने पहाड़ की जमीन का उपरांऊ -तलाऊं,ऊंचाई -निचाई के आधार पर भेद किया. यह समझा कि इस भेद के साथ कौन सी भूमि पर कौन सी फसल ज्यादा उपज देती है. उन्होंने भूमि की पैमाइश करवाई तो साथ में इसके अवलम्ब क्षेत्र व आगे वन संसाधनों की प्रकृति को भी समझा. इस सम्पदा के बीच गांव-गांव कितनी जनसंख्या है का विवरण जाना. उनके लेखन में खेती व खेतिहरों की दशा, भूमि व्यवस्था, जनांकिकी के साथ इलाके की लोक संस्कृति व राजवंशो का इतिहास है तो यह भी कि देश के किन भागों, प्रांतों से लोग यहाँ आ कर बस गये.

एडविन थॉमसन एटकिंसन

पहाड़ के लिए उनकी स्पष्ट सोच थी कि वह मैदानों से भिन्न हैं इसलिए इसके प्रशासनिक ढांचे का स्वरुप भी बिल्कुल अलग बनाना होगा. उन्होंने लिखा कि पहाड़ की अर्थव्यवस्था जीविका आधारित है. भूमि सीमित है, विखंडित है ऐसे में पर्वतीय क्षेत्रों को मैदान के सामान्य कानूनों से नहीं चलाया जा सकता. कुमाऊं व गढ़वाल को उन्होंने “विशिष्ट भौगोलिक-सामाजिक इकाई” बताया जिसके लिए “पहाड़ आधारित प्रशासन” चाहिए. पहाड़ की समस्याओं पर उनका चिंतन वैज्ञानिक-प्रशासनिक आधार पर इसी नये दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता था. उनकी रिपोर्टें बाद के नीति निर्माताओं के लिए आधार बनीं व भिन्न प्रशासन की अवधारणा को दस्तावेजी वैधता मिली.

औपनिवेशिक शासन में ज्ञान का उपयोग प्रशासनिक कुशलता व नियंत्रण बनाए रखने के लिए हुआ. उनकी व्यापक खोजबीन व लेखन का आधार निष्पक्ष अकादमिक न था. हिमालयी समाज के दस्तावेज कर्ता होने के साथ वह औपनिवेशिक सत्ता का अंग थे तो उस सोच का प्रभाव दिखता रहा. उनके कई निष्कर्ष पाश्चात्य दृष्टि से प्रेरित थे जिनमें स्थानीय धारणाओं की न्यून उपस्थिति रही.

पहाड़ के प्रशासन की भिन्न अवधारणा भावनात्मक नहीं वरन तर्कसंगत आधार पर रची गई थी. उन्होंने प्रथक राज्य की मांग नहीं की पर पहाड़ के अलग प्रशासनिक ढांचे को महत्वपूर्ण समझते हुए इसी के आधार पर अलग रणनीति निर्मित की जो प्रथक पर्वतीय राज्य का सुद्रढ़ आधार बनी. उत्तराखंड राज्य की वैचारिक जड़ो की खोज बीन का तर्कसंगत व मौलिक विवेचन गजेटियर रहा.1860से 1880 तक उन्होंने पहाड़ के भूगोल, समाज और आर्थिकी पर लगातार लेखन किया. 

उनका जन्म सन 1840 में ब्रिटेन में हुआ. युवा होते ही वह ब्रिटिश सिविल सेवा में चयनित हुए. वह इतिहास व सांख्यिकी में गहन रूचि रखते थे. वह ऐसे ब्रिटिश अधिकारी का सम्मान प्राप्त कर गये जो गहन शोध और लेखन के साथ शासन के दायित्व कुशलता से संचालित करने में समर्थ बना.एटकिंसन बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रहे. वह विज्ञान के विद्यार्थी रहे. उनकी कानून में गहरी रूचि रही. उन्होंने कीट विज्ञान -इंटोमोलोजी में शोध की. वह एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के अध्यक्ष रहे. उनका विवाह केरोलिन के साथ हुआ जो ब्रिटिश सैन्य अधिकारी मेजर निकोलेट्स की बेटी थीं. उनके पुत्र का नाम फ्रांसिस था. एटकिंसन सक्रिय रहते अपने जीवन के अंतिम समय में कलकत्ता में रहे. 1890 में किडनी रोग-ब्राइट्स डिजीज से उनकी मृत्यु हुई.

कई खंडो में रची उनकी कृति “हिमालयन गजेटियर” हिमालयी क्षेत्र के सबसे विस्तृत औपनिवेशिक दस्तावेजों में गिनी जाती है. उन्होंने सम्पूर्ण हिमालय की समंक आधारित रुपरेखा बनाई जिसमें यहाँ के भूगोल, समाज, जातीय संरचना, आर्थिकी, खेती व परंपरागत धंधों का विस्तृत वर्णन है.एटकिंसन लिखते हैं कि पहाड़ एक सामाजिक इकाई है.पहाड़ी समाज आत्मनिर्भर, सामुदायिक सद्भाव में जीने वाला पर सीमित संसाधनों वाला होता है. इसलिए इसे मैदान की व्यवस्था व प्रशासन से चलाना कठिन होता है. पहाड़ को मैदानी कानूनों से शाषित नहीं किया जा सकता. उनका यह विचार पहाड़ी राज्य आंदोलन के बौद्धिक आधार में सम्मिलित हुआ.प्रशासन हेतु उन्होंने सिद्धांत रचा कि शासन का मॉडल क्षेत्र के भूगोल के अनुसार बदलना चाहिए, अर्थात पहाड़ के लिए अलग नीति हो तो मैदान के लिए अलग.

उनकी कार्य शैली दूसरे अधिकारियों से भिन्न थी. वह मौका-मुआयना करते थे. स्थलीय निरीक्षण से आंकड़े एकत्रित करते थे व कारण व परिणाम के संबंधों के साथ सांख्यिकीय विश्लेषण करते थे. यह पहाड़ की समस्याओं का वैज्ञानिक विवेचन बना. प्रशासन नीतियों की आधार शिला समंको पर आधारित हुई. हिमालय क्षेत्र का सबसे विश्वसनीय दस्तावेज तैयार हुआ.औपनिवेशिक काल का सबसे व्यवस्थित अध्ययन गजेटियर है जो “प्रशासनिक डेटा एटलस” जैसा है.

उन्होंने हिमालय को सामान्य पहाड़ नहीं बल्कि बहुस्तरीय परिस्थितिकी का क्षेत्र कहा. यहाँ प्राकृतिक संसाधन बहुमूल्य पर सीमित हैं. ऊंचाई के हिसाब से मौसम भिन्न होता जाता है और खान -पान पहनावा भी. हर ऊंचाई की अपनी खास कृषि पद्धति है.खेती वर्षा पर निर्भर है. खेत भी छोटे व सीढ़ी दार हैं. इनसे प्रायः जीवन निर्वाह या गुजारे लायक की उपज हो पाती है. ऐसे में पहाड़ की खेती का आधार व्यापारिक नहीं जीवित रहने की व्यवस्था है. खेतोँ पर यदि लगान अधिक वसूल करें तो यह खेतिहर की गरीबी और बढ़ाएगा.पहाड़ का समाज कम संसाधन में भी संतुलित जीवन जीता है.

एटकिंसन ने पहाड़ी समाज की कुछ विशिष्टताएं बताईँ, कहा कि यह ग्राम आधारित सामाजिक ढांचा है जिसमें आपसी मेल मिलाप बने रहता है. कई कुनबों-राठों के बीच फैला हुआ सामुदायिक सहयोग, तो कुछ बंदिशें भी.औरतों की स्थिति सबल बनी रहती है.

गजेटियर का सबसे महत्वपूर्ण भाग प्रशासनिक विश्लेषण का अध्याय है जहाँ उदाहरण दे उन्होंने सिद्ध किया कि मैदान के कानून पहाड़ में विफल हैं क्योंकि यह दुर्गम है, भंगुर है अर्थात इसका भूगोल भिन्न है. एक गांव से दूसरे गाँव की दूरी अधिकांशत: काफी अधिक है. संचार के माध्यम हैं नहीं, बस जब मिल-भेंट होती है तभी आशल-कुशल पता चलती है. इसलिए उन्होंने स्थानिक प्रशासन, सरल कानून और कम वसूली को न्याय संगत बताया.

ब्रिटिश प्रशासन ने पहाड़ के कई इलाकों में सीमित प्रशासनिक हस्तक्षेप की नीति अपनाई. उन्होंने बड़े बुनियादी ढांचे का विकास नहीं किया. प्रशासनिक विनियोग भी कम रहा. समझा गया कि समाज बने बनाए ढांचे में स्थिर है जिसमें हस्तक्षेप करना अनुकूल नहीं. यह औपनिवेशिक धारणा तदन्तर नीतियों में भी नियमित दिखी. प्रशासन कठोर भी हुआ. स्वतंत्रता के बाद भी पहाड़ में बुनियादी ढांचे व उद्योग के काम धंधों की गति विनियोग की कमी से थमी रही. अर्थव्यवस्था में खेती जीवन निर्वाह स्तर से आगे बढ़ न पाई. काम धंधे सब मैदानी क्षेत्र में थे, सेवा क्षेत्र भी. पहाड़ से रोजगार अवसर व सुविधा पाने को पलायन जारी रहा.

गांव की आबादी और कई दशाओं में लोगों का घर छोड़ कर जाने के सिलसिले को देखते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पहाड़ में जन घनत्व कम है. किशोर और युवा काम पाने मैदान की ओर रुख करते हैं. आज उत्तराखंड में पलायन व प्रवास जिस प्रकार विकट समस्या बन गया है उसका उल्लेख उन्होंने उन्नीसवीं शताब्दी में ही कर दिया था.

अपने लेखन में एटकिंसन ने कुमाऊं-गढ़वाल को “स्थिर लेकिन गतिहीन समाज” बताया जिसका तात्पर्य था कि यह सामाजिक रूप से स्थायित्व की अवस्था में है पर आर्थिक रूप से परिवर्तन शील या गतिशील नहीं. यह धारणा औपनिवेशिक प्रशासन की नीति दृष्टि को प्रभावित करने वाली बनी. जब कोई समाज गतिहीन माना जाता है तो प्रशासन यह धारणा बना लेता है कि वहाँ किसी तीव्र आर्थिक परिवर्तन की संभावना अल्प है. इसी धारणा पर आश्रित रहते हुए पहाड़ में औद्योगिक विनियोग नहीं किया गया और न ही कोई आर्थिक बदलाव वाले प्रयोग हुए.ब्रिटिश नीति का आरंभिक उद्देश्य यह ही रहा कि प्रशासन शांति पूर्वक चले और पहाड़ के संसाधनों पर उसका नियंत्रण हो. यह ऐसा समय था जब उपनिवेश नीति अपनाने वाले देश दूसरी औद्योगिक क्रांति के लाभ प्राप्त करने में समर्थ होने लगे थे. बस उन्हें कच्चे माल की जरुरत थी.

ब्रिटिश प्रशासन ने जब यह प्रवृति देखी कि पहाड़ की जीवन निर्वाह कृषि और अधिक उत्पादक नहीं हो सकती तो उनका ध्यान जंगलों में गया जो बहुविध प्रजातियों से भरे सघन व समृद्ध थे. अतः जंगलों को राजकीय संसाधन घोषित किया गया और लकड़ी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था में शामिल हुई. इसके लिए 1878 में इंडियन फारेस्ट एक्ट ला उसे दृढ़ता से लागू करने का निर्णय किया गया. खेती की सीमाओं को समझ वन संसाधन के दोहन की रणनीति बनी.एटकिंसन ने अपने अनुभव जन्य अवलोकन से पाया कि पहाड़ की आर्थिकी तो गतिहीन है. स्थानीय रोजगार भी सीमित है. इसलिए गाँव में विद्यमान श्रम का उपयोग गाँव से बाहर ले जा कर गतिशील किया जाना सम्भव है. आरम्भ में समान लाने ले जाने वाले कुलियों की भर्ती हुई और फिर पहाड़ की स्वस्थ मेहनती व आदेश मानने में कुशल किशोर व युवा शक्ति को सैन्य भर्ती में अवसर मिलते रहे. पहाड़ सैन्य भर्ती क्षेत्र के रूप में चिन्हित हो गया. “रिक्रूटिंग एरिया” की धारणा पहाड़ से जुड़ गई.

स्थिर पर गतिहीन समाज की धारणा ने तीन नीतिगत परिणाम दिए. पहला तो आर्थिक वृद्धि के स्थान पर संसाधन पर नियंत्रण व शोषण. दूसरा जंगल आधारित कठोर एक्ट लागू करना व तीसरा मानव संसाधन अर्थात श्रम का अपने हित में उपयोग अर्थात कुली, कर्मचारी व सैनिक भर्ती. इस सिलसिले से पूरे पहाड़ की दशा में बदलाव दिखे. इन नीतियों की दिशा पलायन उन्मुख हो चली.

जनसंख्या व पलायन के आपसी संबंध को बताते एटकिंसन ने कहा कि पहाड़ में जन घनत्व कम है.संसाधन सीमित हैं. खेती व्यापार के लिए नहीं जीवन निर्वाह के लिए होती है युवा रोजगार की तलाश में गाँव से बाहर निकल जाते हैं.यह समस्या आज और गहरी हो गई है कि परिवार के मर्द ही नहीं पूरा परिवार गाँव छोड़ देता है. जीवन स्तर बेहतर करने, बच्चों की लिखाई पढ़ाई और तबियत बिगड़ने पर इलाज की सुविधा इसके पीछे के सामान्य कारक हैं. तब से आज तक चले आ रहे इस सिलसिले से हजारों गांव आंशिक व पूरी तरह खाली हो चुके हैं. एटकिंसन की यह भविष्यवाणी सटीक रही. उन्होंने कहा था कि कृषि जोत का आकार छोटा है, खेती वर्षा पर निर्भर है और पहाड़ी किसान बाजार की प्रतिस्पर्धा में कमजोर है. तब से आज तक पहाड़ की खेती भी व्यावसायिक नहीं बन पाई. वह यह भी स्पष्ट लिख गये कि दूरस्थ गाँवों में प्रशासन की पहुँच कमजोर होती है. कारिंदे वहाँ जाने से बचते हैं. वर्तमान में भी जबकि संचार और आवागमन के साधन बहुत बेहतर हो गये हैं दूर के इन इलाकों में पानी, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र बदहाल हैं. गिनती के आयुक्त व जिलाधिकारी होंगे जो पैदल चल मौका मुआयना करने पहुँचते हैं.

पहाड़ दुरूह हैं, भंगुर संरचना है, अलग-थलग हैं, अलगाव की दशा है जहाँ व्यवस्था संभालने के लिए नीति भी भिन्न चाहिये. सामान्य रूप से पहाड़ का प्रशासन उसके भूगोल के अनुसार होना चाहिये. आधुनिक क्षेत्रीय विकास के सिद्धांत भी इसी दर्शन का आधार लेते हैं कि पहाड़ के लिए प्रथक विकास नीति होनी चाहिये.आर्थिक विशेषज्ञ गजेटियर को विश्वस्त संन्दर्भ स्त्रोत मानते हैं क्योंकि यह तथ्य व आंकड़ों पर आधारित दस्तावेज है. इसी कारण यह लोक प्रशासन का सबल आधार बना.

एटकिंसन का दृढ़ मत था कि पहाड़ पर सामान्य मैदानी नीति लागू करना प्रशासन की सबसे बड़ी चूक होगी. तमाम तकनीकी कुशलता व नवीनतम विधि से काम करने का प्रपंच रचता लोक निर्माण विभाग व उनके तथाकथित दक्ष कांट्रेक्टर द्वारा बनाई पहाड़ की सड़क परियोजनाऐं हर बरसात में अवरुद्ध होने का क्रम जारी रखती हैं. निर्माण के नियमों की उपेक्षा से कई अनियमितताएं हुईं हैं जिनकी परिणति जान माल का नुकसान है.सुरंगे भी धंसती हैं.पुल भी झुकते हैं. जल विद्युत परियोजना कभी शुरू होती हैं तो कभी घिसटती हैं. 

एटकिंसन गहरे पर्यवेक्षक थे. उन्होंने जो देखा उसे जाँचा परखा. वह एक सौ पचास साल से भी पहले जो अनुभव करा गये उनके अचीन्हे फैलाव आज उत्तराखंड की मुख्य चुनौतियाँ हैं. ब्रिटिश शासन से पहले पहाड़ की आर्थिकी का स्वरूप आत्मनिर्भर जीवन निर्वाह का रहा पर यह पूरी तरह बंद या अलग-थलग न थी. यह परंपरागत ढांचा मिश्रित कृषि प्रणाली, पशुपालन, जंगल के अपनेपन, लोगों के हस्तकौशल, परिवार आधारित कुटीर उद्योग व सामुदायिक मेलजोल से गतिशील था. लघु जोत वाली सीढ़ीदार खेती होती थी मोटे अनाज मडुआ, झिंगोरा, जौ, गहत, भट्ट, मसाले, सब्जी होती रही. खेती वर्षा पर टिकी थी और खेतिहर जानते थे कि कौन सी फसल इसके अभाव में भी कहाँ और कैसे उगेंगी. परिवार द्वारा किया उत्पादन जीवन निर्वाह के लिए था बाजार के लिए कम.

खेती पूरी तरह जंगल से जुड़ी थी. जल के प्राकृतिक स्त्रोत थे. खेतोँ के लिए कई किस्म की पत्ती, पशुओं के चरने को घास, चारा,उनसे मिलने वाला गोबर, घरेलू उपयोग के लिए सूखी लकड़ी, आयुष के लिए जड़ी बूटी आदि से स्थानीय पारिस्थितिकी आधारित संसाधन प्राप्त होते थे. स्थानीय शिल्प-कारीगरी थी. ओढ़-बारुड़ी-ल्वार-कुल्ली- कभाड़ी की संगत से कई परंपरागत पेशे चलते थे. मिट्टी पाथर के कामगार, स्थानीय कलाकारी जानने वाले बढ़ई, लोहे के बर्तन, खेती के औजार धोंकने-पीटने वाले लोहार, ताँबे का शिल्प आम जरुरत को पूरा कर देता. कुमाऊं और गढ़वाल से तिब्बत तक व्यापार होता जो हिमालयी दरों को पार कर सीमांत की मंडी तक पारम्परिक रीति से चलता था. सामुदायिक संसाधन प्रबंधन पहाड़ के हर इलाके में था. जल-जंगल-जमीन की व्यवस्था सामुदायिक थी. ग्राम समुदाय जंगल की रक्षा करते जिसकी परम्परा चली आ रही विधियों व प्रयोगों पर आधारित थी. वन उत्पाद के उपयोग पर सामाजिक नियंत्रण था. इसी परंपरा का अनुसरण कर 1931 में कुमाऊं फारेस्ट एक्ट बना.

पहाड़ को आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था के रूप में समझने वाले चिंतकों में माधव गाडगिल व रामचंद्र गुहा मुख्य हैं जिन्होंने इसके संतुलित ढांचे व निवास करने वाले समुदाय व प्रकृति के बीच तालमेल की दशाओं का स्पष्ट विवेचन किया. वहीं दूसरी ओर सीमित उत्पादन, निर्धनता के दुश्चक्र, बाजार की अपूर्णता, रोग व महामारी जैसे लक्षण पहाड़ को सीमित आत्मनिर्भरता व असहाय दशा में जीवन यापन करने के यथार्थ का संकेत देते रहे.

एटकिंसन के गजेटियर में उत्तराखंड के पिछड़े पहाड़ वाले आख्यान के उदाहरण हैं जहां आय कम थी और गुजारे के लिए अपने इलाके से बाहर काम की तलाश व अवसर खोजना तात्कालिक समाधान. ब्रिटिश सरकार ने मानव शक्ति का अपने हित में भरपूर उपयोग किया. भर्ती खुली. पलायन की गति बढ़ती रही. यह लक्षण वर्तमान में समस्या बन चुके हैं और विकास के लिए निर्दिष्ट नीतियाँ असमंजस से ग्रस्त दिखती हैं.यह मुद्दा मुख्यतः पहाड़ की अर्थव्यवस्था, संसाधन दोहन व आम जन के अधिकारों अर्थात हक हकूक से जुड़ा है. यह जानने समझने की कोशिश बनी रहती है कि ब्रिटिश सरकार और बाद में उभरी सरकारी नीतियों ने हिमालयी समाज की पारंपरिक व्यवस्था को कैसे खंडित कर डाला.

हक-हकूक पहाड़ियों के परम्परा से चले आ रहे वह अधिकार थे जिनसे वह अपने आस पास उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते रहे. इसमें घर बनाने का पत्थर, छत की स्लेट व पाथर, ईमारती काष्ट, जलाने की सूखी लकड़ी, पशुओं को जंगल में चराना व उनके लिए मौसम के हिसाब से हरी पत्ती, घास व चारा, पेड़ों से फल, खोद खाद कर निकाली भेषज, जड़ी-बूटी, किस्म-किस्म के रेशे-रस्सी अर्थात छोटी मोटी वन उपज प्राप्त करते रहे. धीरे धीरे शासन स्थानीय समुदाय को परम्परा व राजस्व पंजिका के तय पैमाने के हिसाब से हक-हकूक देता रहा. औपनिवेशिक राज के बाद आजादी के दौर के हील हवाले ने हिमालयी समाज की पारम्परिक व्यवस्था को खंडित कर दिया.

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से गढ़वाल के जंगलों में संक्र मण की प्रक्रिया का नया दौर शुरू हुआ जो स्थानीय व सामुदायिक उपयोग से हट व्यवसायिक संसाधन बन गये. इस परिवर्तन का जनक रहा फ्रेडरिक विल्सन जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का सैनिक था. 1840 के दशक में वह फौज से भाग गया और गढ़वाल हिमालय में गंगा घाटी के दूरस्थ इलाके हर्षिल में बस गया. औद्योगिक क्रांति के बाद ब्रिटिश फर्मों ने भारत से प्राप्त लकड़ी की भारी मांग करी जिसका उपयोग रेल के स्लीपर, सेना के बैरक, पुल व इमारतों के लिए होता. गढ़वाल में देवदार की मजबूत और टिकाऊ लकड़ी प्रचुर मात्रा में थी. विल्सन ने टिहरी रियासत से जंगलों का ठेका लिया. हज़ारों पेड़ काट गंगा नदी में डाल दिए जाते जो नीचे बहते मैदानी भाग में पहुँच जाते. विल्सन इसे रेलवे व ब्रिटिश निर्माण इकाइयों को बेच कर मालामाल हो गया. इससे जंगल पहली बार नकद आय का स्त्रोत बने.जंगल व्यवस्था में आए इस बदलाव ने लकड़ी के व्यापार व नकद अर्थव्यवस्था का विकास किया. स्थानीय लोगों को चिरान, ढुलान,पल्लेदारी, बढ़ई गीरी, मुंशीगिरी, चौकीदारी के काम मिले. ठेकेदारी का चलन बढ़ा.1815 से 1860 के मध्य वनों का सीमित दोहन था. इनका व्यावसायिक दोहन 1860 के पश्चात किया गया.

नई वन व्यवस्था अब देवदार, चीड़, बांज व अन्य टिकाऊ प्रजातियों के छपान-कटान व निजी ठेकेदारी पर चलने लगी. लीसा-बिरोजा, पुल व सड़क के साथ खनन की ठेकेदारी व परिवहन का काम शुरू हुआ. विल्सन जैसे ठेकेदारों के साथ मिल ब्रिटिश शासन ने वनों को राज्य नियंत्रित व्यापारिक साधन बना दिया. कुमाऊं में पांडे, बिष्ट व रावत परिवार उभरे. इनमें से कई परिवार प्रशासनिक सेवा, फौज और व्यापार से जुड़े थे. गोविन्द बल्लभ पाण्डे और जगन्नाथ पांडे अनाज के व्यापार और तिब्बत से होने वाले व्यापार में रंग-शौका व्यापारियों के साथ शामिल थे. खड़क सिंह बिष्ट व दीवान सिंह बिष्ट जंगल के ठेके लेते, लीसे का कारबार व परिवहन से जुड़े. गुमान सिंह रावत, बहादुर सिंह रावत खच्चर, लकड़ी व तिब्बत व्यापार में लगे. ठाकुर देव सिंह बिष्ट लकड़ी कटाई, अंग्रेजों के लिए मजदूरों का इंतज़ाम, खच्चर व नदी के माध्यम से लकड़ी का परिवहन करते थे. जंगल के ठेकों, तिब्बत से व्यापार व अन्य स्थानीय व्यापार से स्थानीय शहरी पूंजी का निर्माण हुआ और ये परिवार मालदार कहलाए. ये औपनिवेशिक राज्य के स्थानीय सहयोगी थे जिन्होंने जंगल को व्यापार से जोड़ा. दूसरी तरफ स्थानीय लोगों के हक हकूक प्रभावित हुए. चारे व ईंधन पर नियंत्रण लगा. खेती पशुपालन कमजोर पड़ा, जंगल से मिलने वाले कच्चे माल से बने माल को बनाना कठिन हुआ तो प्राप्त आय गिरती गई. ठेकेदार की नौकरी कुछ ही स्थानीय लोग पा सके. नेपाल से आए मेट व डोटियाल भी सस्ते श्रम आपूर्ति का हिस्सा बने.

औपनिवेशिक नीतियों और ज्ञान उत्पादन की प्रक्रिया ने उत्तराखंड की सामाजिक आर्थिक संरचना को स्तरीकृत कर दिया. सामाजिक स्तर पर नए वर्ग उभरे जिन्होंने तत्कालीन शासन का सहयोग पा आर्थिक आधार मजबूत किया. दूसरी तरफ गाँवों की जीवन निर्वाह आधारित व्यवस्था दुर्बल होती गई. सांस्कृतिक स्तर पर सेना की भर्ती व प्रवास का प्रभाव पड़ा. मनोवैज्ञानिक धरातल पर बाहरी अवसरों की ओर झुकाव बढ़ता गया. इन सबसे ग्रामीण समाज में असमानता बढ़ी जिससे स्तरीकरण हुआ जबकि औपनिवेशिक शासन के कठोर होने से पूर्व तक पहाड़ का समाज खेती, पशुपालन व सामुदायिक संस्थाओं पर आधारित था.

एटकिंसन ने पर्वतीय समाज में सामूहिक श्रम, सामुदायिक सहयोग व सामाजिक संतुलन बने रहने की विशेषता रेखांकित की. आज भी आपदा -संकट में यह एकजुटता देखी जाती है अर्थात सामाजिक संरचना की शक्ति बनी हुई है.

कुमाऊं और गढ़वाल के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों को उन्होंने अलग-अलग इकाईयां बताया था जो क्षेत्रीय असमानता का पूर्व संकेत था. दोनों क्षेत्रो के बीच कई स्तरों में पनपी विषमता आज भी विवाद का कारण बनती है. उनका अनुमान था कि पहाड़ हमेशा कम जन घनत्ववाला रहेगा. उनका यह निरीक्षण उन पर्यटन क्षेत्रों में लागू नहीं हुआ जहाँ धारक क्षमता से अधिक बसाव हो गया.

गजेटियर की सीमाऐं यह बताई गईं कि उसमें स्थानीय समाज की आवाज कम थी, उपनिवेश की सोच मुख्य थी. उसमें वर्णित कई सांस्कृतिक व्याख्याऐं अस्पष्ट थी फिर भी हिमालय पर इतना व्यापक विवरण उन्नीसवीं शताब्दी में किसी और ने नहीं लिखा. वह ब्रिटिश नीति का सीधा ब्लू प्रिंट न था पर ज्ञान का ऐसा ढांचा बना जिस पर शासन ने नीतियाँ अवलंबित कीं.

पहाड़ के विकास पर एटकिंसन का दीर्घकालिक प्रभाव रहा क्योंकि उनके दस्तावेजों के आधार पर बाद की नीतियाँ बनी, शोध कार्य हुए व प्रशासनिक वर्गीकरण हुआ. इससे पूर्व रामजे का प्रभाव अल्पकालिक रहा क्योंकि उन्होंने सीधे प्रशासन चलाया.रामजे परोपकारी निरंकुश थे जिनकी स्थानीय समाज से अपेक्षाकृत अधिक सहानुभूति रही.वह पहाड़ के व्यावहारिक शासक रहे. एटकिंसन औपनिवेशिक ज्ञान परम्परा के प्रतिनिधि थे जिन्होंने समंकों के वर्गीकरण व सारणीयन से निष्कर्ष निकाल राज्य के हित में उनका उपयोग किया.दोनों के योगदान के आधार पर ब्रिटिश शासन का वह आधार बना जिसके तदन्तर राजस्व व्यवस्था,वन कानून व प्रशासन का दृढ़ ढांचा खड़ा हुआ.

जिज्ञासा बनी रही कि क्या एटकिंसन का गजेटियर एक विवरणात्मक ग्रन्थ था जो बाद में औपनिवेशिक नीतियों का ब्लू प्रिंट बन गया. इतिहासकार मानते हैं कि गजेटियर ही भावी नीतियों का आधार रहा क्योंकि इसमें भूमि उपयोग, वन संसाधन, जाति संरचना, कृषि उत्पादन व व्यापार पथों का विस्तार से वर्णन किया गया था. इस आधार पर ही ब्रिटिश प्रशासन ने राजस्व वर्गीकरण किया, वनों पर नियंत्रण लगाए और पहाड़ में उपलब्ध संसाधनों को प्रबंधित किया.

औपनिवेशिक शासन का सिद्धांत था “पहले जानो फिर राज करो” इस विचार के समर्थक रामचंद्र गुहा व शेखर पाठक रहे. दूसरा दृष्टिकोण गजेटियर को नीति नहीं रिकॉर्ड मानता था जिसका उद्देश्य प्रशासन को जानकारी देना था. नीति निर्माण अलग स्तर पर होता रहा. कई नीतियाँ गजेटियर से पहले ही बन चुकी थीं जैसे वन अधिनियम 1865 व राजस्व बंदोबस्त. इसलिए कहा गया कि नीतियों को लागू करने में यह उपयोगी रहा पर उसे निर्मित नहीं किया. तीसरा दृष्टिकोण यह था कि गजेटियर ने पहाड़ की छवि बदल दी जिससे हिमालय को तीन रूपों में देखा गया. पहला सीमांत क्षेत्र, दूसरा संसाधन क्षेत्र व तीसरा भर्ती क्षेत्र. इस वर्गीकरण का बाद की नीतियों पर गहरा प्रभाव पड़ा जैसे वन नीति, प्रशासनिक नियंत्रण और सेना भर्ती नीति.

(जारी)

प्रोफेसर मृगेश पाण्डे

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

इसे भी पढ़ें : हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

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  • पहाड़ और एटकिंस को समझने का यह महत्वपूर्ण आलेख है । प्रोफ़ेसर मृगांक जोशी का आभार । यह लेख औपनिवेशिक उत्तराखंड के शासकों की नीति और नीयत का ख़ुलासा करता है साथ ही यह उत्तराखंड को समझने ,उसे विकसित करने का रोडमैप भी देता है । उत्तराखंड की ऐतिहासिक,सामाजिक ,सांस्कृतिक ज्ञान परम्परा को इसके आलोक में समझने में हमें कुछ हद तक सहायता मिल सकती है ।प्रोफेसर शेखर पाठक कुमाऊँ का विस्तृत अनुसंधान परक लौकिक विश्लेषण किया लेकिन गढ़वाल का समग्र रूप से विवेचन अभी बाक़ी है ।

  • प्रोफेसर मृगेश पांडे भूल सुधार

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