चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये जाते हैं. चीड़ के तने व शाखाओं को मुख्य रूप से इमारती लकड़ी, ईधन, काग़ज व माचिस उद्योग में इस्तेमाल किया जाता है जबकि इससे प्राप्त होने वाले लीसे से तारपीन का तेल बनता है.
चीड़ के पेड़ की पत्तियां जिन्हें पिरूल कहा जाता है अत्यन्त ज्वलनशील होने के कारण जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण बनती हैं. चीड़ के पेड़ की छाल का स्थानीय नाम बगेट है जिसे अल्मोड़ा के पारंपरिक ताम्र उद्योग में ईंधन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन पिछले कुछ दशकों से कुमाऊं क्षेत्र में गिने-चुने (तीन-चार) कलाकार बगेट को तराश कर सुन्दर कलाकृतियों का रूप दे रहे हैं. अल्मोड़ा नगर के बांसभीड़ा मोहल्ले में रहने वाले 67 वर्षीय धीरेन्द्र कुमार पाण्डे इस नवाचार को गति दे रहे शिल्पियों में शामिल हैं.
धीरेन्द्र पाण्डे के पुश्तैनी घर में उनसे भेंट 9 जून 2026 होने पर मेरी पहली जिज्ञासा यह थी कि बगेट से कलाकृतियां बनाने का विचार उनके मन में कैसे पैदा हुआ. उन्होंने बताया कि उनका बचपन और शिक्षा अल्मोड़ा में हुई. कुमाऊं विश्वविद्यालय से वनस्पति शास्त्र में एम.एससी. करने के बाद उन्होंने देश की प्रमुख कृषि व उर्वरक कंपनी इंडियन पोटाश लिमिटेड में 29 साल नौकरी की. माताजी का स्वास्थ्य खराब होने के कारण उनकी सेवा के इरादे से 2016 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर अल्मोड़ा आ गये. इस दौरान दिन में खाली समय रहता था.
एक मित्र ने उन्हें बगेट का एक टुकड़ा देकर इससे कलाकृतियां बनाने का सुझाव दिया. इस तरह वह अपने खाली समय में बगेट आर्ट पर काम करने लग गये. घर पर आने वाले शादी के निमंत्रण-पत्रों में भगवान गणेश के चित्र देख कर उन्हें सबसे पहले गणेशजी की मूर्तियां बनाने का विचार आया. उन्होंने बगेट से बनी गणेशजी की मूर्तियां अपने मित्रों व रिश्तेदारों को उपहारस्वरूप देना शुरू किया और बदले में मिली प्रशंसा ने उन्हें उत्साहित किया. इस तरह वह बगेट आर्टिस्ट बन गये.
धीरेन्द्र पाण्डे की कलाकृतियों में तकनीकी कौशल के साथ साथ उनकी कल्पनाशीलता तथा उत्तराखण्ड की प्रकृति व संस्कृति लगाव भी झलकता है. उनकी कलाकृतियों में भगवान गणेश और नंदा-सुनंदा देवियां हैं तो पहाड़ों से होने वाला पलायन, वृक्षों का विनाश करके खड़े किये गये कंक्रीट के जंगल और समाज में व्याप्त “अनेक हाथों व पैरों वाला” भ्रष्टाचार भी है. ध्यान में बैठे भगवान बुद्ध, माता-पिता और संतान, स्वस्थ मानव शरीर, कोरोनाकाल की विचित्र मनोस्थिति दर्शाती कलाकृतियां भी हैं. मैंने धीरेन्द्र पाण्डे से पूछा कि बगेट आर्ट को सीखने में कितना वक्त लगा और क्या किसी से प्रशिक्षण लिया. “करत-करत अभ्यास, जड़़मति होत सुजान” कहावत का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने स्वयं सीखा लेकिन प्रतिभा ईश्वर से उपहार में मिली.
धीरेन्द्र पाण्डे ने बताया कि जब भी बगेट का टुकड़ा उनके हाथ में आता है तो सबसे पहला काम यह सोचना होता है कि इसका क्या किया जा सकता है. इसे एक कलाकृति का रूप देने के लिये इसके आकार-प्रकार को ध्यान में रखना सबसे ज़रूरी होता है. फिर आरी तथा बड़े व छोटे कटर से काट-छांट कर कलाकृति का रूप दिया जाता है. तराशने और मुलायम बनाने के लिये सैंड पेपर से रगड़ने के काम में सबसे ज्यादा मेहनत लगती है. इसके बाद इसमें पॉलिश की जाती है. एक अच्छी कलाकृति को तैयार करने में एक से डेढ़ सप्ताह का समय लग जाता है जबकि छोटे आकार की कलाकृति दो-तीन घंटे में बना लेते हैं.
धीरेन्द्र पाण्डे के अनुसार वह बगेट आर्ट को मुख्य रूप से शौक के तौर पर करते हैं. यदा कदा होने वाली बिक्री से प्राप्त आमदनी को ज़रूरतमंदों की मदद में खर्च कर देते हैं. अल्मोड़ा में प्रदर्शनियों के दौरान इन कलाकृतियों की तारीफ करने वाले अनेक होते हैं लेकिन खरीददार नहीं मिलते. स्थानीय स्तर पर उनकी एक कलाकृति के लिये एक हजार रुपये से अधिक नहीं प्राप्त हुए जबकि जयपुर में एक कलाकृति के बदले ग्यारह हजार रुपये तक मिले. उत्तराखण्ड के बाहर खरीददारों को बगेट क्या होता है यह समझाना कठिन लगता है.
बगेट की आपूर्ति के लिये नगर के ताम्र शिल्पियों और गांवों से बगेट लाकर बेचने वालों पर निर्भर रहना पड़ता है. धीरेन्द्र बताते हैं कि बगेट का एक बड़ा पीस दो सौ रुपये तक में मिलता है. बगेट एक वन उपज होने के कारण वन संरक्षण कानूनों से जुड़ी समस्याएं भी हैं. धीरेन्द्र पाण्डे बगेट के अलावा पेड़़ की जड़ों व टहनियों को काट-छांट कर अद्भुत कलाकृतियों का रूप दे रहे हैं. ऐपण आर्ट के साथ भी प्रयोग कर रहे हैं.
एक कलाकार होने के नाते धीरेन्द्र पाण्डे चाहते हैं कि अल्मोड़ा सहित कुमाऊं के अन्य पहाड़ी जिलों के बच्चे और युवा बगेट आर्ट को सीखें जिसे वह मुफ्त में खुशी से सिखाते हैं. अल्मोड़ा नगर के स्कूली बच्चों के अलावा हस्त-शिल्प विभाग के माध्यम से नैनीताल जनपद के प्यूड़ा में स्थित एक सरकारी विद्यालय में प्रशिक्षण कार्यशाला भी आयोजित की. अल्मोड़ा नगर के एक स्कूल द्वारा बच्चों को उनके घर शैक्षिक भ्रमण पर लाया गया. धीरेन्द्र पाण्डे के अनुसार सीखने में रुचि दिखी लेकिन सीखने वालों के मन में इसकी व्यावसायिक संभावनाओं को लेकर सवाल भी थे. दूसरी अड़़चन मोबाइल से चिपके रहने की प्रवृत्ति लगती है –
मैं सीखने वाले बच्चों से अपना मोबाइल बाहर रख कर आने को कहता हूं लेकिन मोबाइल की घंटी बजते ही वे काम को बीच मे छोड़ मोबाइल की तरफ भागते हैं. धीरेन्द्र पाण्डे को बुरा लगता है जब बहुत से प्रशिक्षणार्थी प्रशिक्षण बीच में ही छोड़ देते हैं. उनमें बगेट आर्ट का इतना जुनून है कि वह अल्मोड़ा से बाहर जयपुर, पूना या बंगलौर में रहने जाते हैं तो बगेट के पीस साथ ले जाते हैं.
धीरेन्द्र पाण्डे का मानना है कि यदि सरकार से प्रोत्साहन मिले तो बगेट आर्ट व्यवसाय के तौर पर सफल हो सकता है. वह हल्द्वानी में रहने वाले जीवन जोशीजी का उदाहरण देते हैं जिनके बगेट आर्ट की तारीफ प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में की और इसके बाद उनके प्रशंसकों, ग्राहकों व सीखने के इच्छुक लोगों की संख्या एकाएक बढ़ गयी. वह कुमाऊं की पारंपरिक ऐपण चित्रकला का उदाहरण भी देते हैं जिसे सरकार द्वारा प्रोत्साहन मिलने के बाद व्यवसाय के रूप में अपनाया जाने लगा है. उनका सुझाव है कि सरकार बगेट आर्ट के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा दे साथ ही हस्त-शिल्प व कला प्रदर्शनियों में इसके स्टॉल को रियायती दर पर उपलब्ध कराये. प्रधानमंत्री की वोकल फॉर लोकल की अपील का उल्लेख करते हुए धीरेन्द्र पाण्डे कहते हैं कि बगेट आर्ट हमारी अपनी चीज़ है जिसे बढ़ावा मिलना चाहिये. बगेट मैन के रूप में मिल रही नई पहचान उन्हें प्रसन्नता, संतोष और प्रेरणा देती है.
कमल जोशी
अल्मोडा के रहने वाले कमल जोशी का यह लेख काफल ट्री को ईमेल आईडी पर भेजा गया. कमल से उनके मोबाइल नम्बर 9412909566 पर सम्पर्क किया जा सकता है.
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