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मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब

2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ छापकर सराहनीय कार्य किया है. 140 रुपये मुनासिब दामों की यह किताब मेवाड़ी ने खुद के बचपन को केन्द्र में रखकर लिखी है. किताब की परिधि में उसके स्थायी गांव, ‘कालाआगर’ से लेकर शीतकालीन प्रवास के, खेड़ा कहे जाने वाले ‘माल-ककोड़’ के भाबर तक का भूगोल है. इस भूगोल के ऋतुचक्र से अन्योन्याश्रित लोक जीवन के विदग्ध शब्दांकन हैं इसमें. काला आगर गांव नैनीताल जिले के ओखलकांडा क्षेत्र में है. माल-ककोड़ है चोरगलिया के भाबर के करीब, उसी जिले के तराई-भाबर के मैदान में.

विषयगत वैविध्य से भरी हुई इस किताब की रचना का प्रेरणा काल 20वीं सदी के साठ के दशक का है. लेखक अपनी बाल्यकालीन मायुसी के साथ, निरंतर विकसित होती जाती बौद्धिक व्याप्ति को शब्द देता है. इस व्याप्ति में पशु-मवेशियों, खेती-बाड़ी, वनस्पतियों का वैभव व वन्य जीवों की सन्निकटता का मनोहारी वर्णन है. दैनिक चर्याओं को संज्ञान में लाने और उनका दस्तावेजीकरण करने के प्रयास में लोक-विरासतों, मौखिक साहित्य की निधियों, भाषा और संस्कृति का मौलिक अध्ययन खुद-ब-खुद ही होता गया है. बच्चे से, सीखते जाने की नैसर्गिक प्रवृत्ति के अनुकरण को शब्दायित करने के प्रयास में इस किताब की शैली का निर्माण भी नितांत अपने ही ढंग की मौलिकता में हुआ है.

पौगण्ड काल यानि स्कूलिंग की उम्र से शुरू करके 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने की उम्र तक की यह ‘आत्मकथा’ भी है, जो दादी मां ‘कह एक कहानी’ की शैली में तो कहीं बच्चे के आं-आं के ‘हिंगुर’ की शैली में सवार होकर चलती है. पूर्व अवलोकन शैली में सूपे में छनते चावल के दानों से कन-कन को ‘सारते’ लोक कथा की जैसी रस माधुरी घोलती जाती है यह किताब. अभिव्यक्ति की क्षमता और कौशल का अनूठा संयोजन इस की संरचना में हुआ है. किसी विशिष्ट विधा और रूप के बंधे-बंधाये ढर्रे पर न होते हुए भी लोक ज्ञान के समग्र के साथ शास्त्रीय शुरुआतों के आयामों को छूने की कोशिश ने किताब को ‘अध्ययनों’ की एक नयी ही रचनात्मक स्थानीयता का सरस भाष्य बना डाला है.

जिस स्वातंत्र्योत्तर काल- खण्ड के ‘लोक’ का यह भाष्य है उसमें हमारी समकालीन पीढ़ियों को औपचारिक प्राथमिक शिक्षाएं सर्व सुलभ नहीं थीं. जिन गिने चुने लोगों को वह उपलब्ध हो पाई वे अनौपचारिक लोक-शिक्षा की मजबूत पृष्ठभूमि को लेकर स्कूलों में दाखिल होते थे. आज के दिन शिष्टों में शुमार हो चुकी वह पीढ़ी इसीलिये हमे सर्वदर्शी, उदार और विरासतों की हिफाजत की पक्षधर दिखती है. परन्तु अनेक के मनों में अपनी बोली के व्यवहार के प्रति हीनताबोध और कुंठायें हैं. ऐसों को, मातृ बोली की संचेतना जगाना और उसकी अभिव्यक्ति की ऊर्जस्विता का साक्षात्कार करा देना इस कृति की आत्मवत्ता है. दिन प्रतिदिन विकसित होते जाने की बजाय, अपने सम्पूर्ण अतीत के थिगलों को वह उतार फेंक कर दुनिया भर की चीजों को अपने भीतर भरते जाने की होड़ में लगी पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शी है यह कृति. 

अपनी संस्कृति के सरोकारों की भाषा की शब्दावलियों का जम कर इस्तेमाल हुआ है इसमें. लोक के दैनंदिन जीवन के रूटीन को आत्मकथा के तागे में मणियों के मनको की तरह पिरोया गया है. इस गुंथन में कुमाउंनी तो खिली ही है, हिन्दी भी सुसमृद्ध हुई है. लोकभाषा की ऐसी आफ़ताबी चमक को झलका देनी वाली रचना पहली बार ही पढ़ने में आई. पुराकथा, लोक सिद्धियाँ, मुहावरे, पहेलियाँ, विश्वास, आस्थाएं, रिवाज, चलन, वर्जनाएँ, परहेज, निषेध, अपाकर्म, नातव्य-सुतव्य, भेद-भाव आदि अनगिनत चीजों से मिलकर जिस लोक जीवन को संस्कृति की परिपूर्णता दी हुई है वह सब स्वाभाविक और इतने सहज रूप से किताब के निर्माण की सामग्री बनकर आया है कि लगता ही नहीं कि वह ‘लोक अध्ययन’ है. उपन्यास की जैसी संघटित रचना-वस्तु की तरह माहिर कलाकारिता की निदर्शक हो उठी है वह. लोक अभिव्यक्ति की शायद ही कोई विधा हो जो उसमें आने से रह गई हो. लोक के यथातथ्य को अंकित करने का एक नमूना दृष्टव्य है-

‘वहां आये दिन ऐसी-ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं जिन्हें लिखने वाले को किस्सागो बनने में बखत नहीं लगता. रमदा और शेरदा जैसे लोग ऐसे किस्सों के विषय बने रहते हैं. बच्चे लोग उनसे यों ही डरते हैं कि वे दाढ़ी बाल बढ़ाये रहते हैं और अपनी धुन में जिधर चाहे उधर बिचरते रहते हैं, स्वच्छन्द. वे समाज के साथ तालमेल बनाने की नहीं सोचते. कोई कहता है कि द्यो-देवता के बिगड़ने पर वह ऐसे हुए हैं. कोई कहता किसी ने उन्हें कुछ खिला दिया है. कोई कहता कुछ तंत्र-मंत्र का वशीकरण है. हुआ यों कि एक दिन शेरदा अपने सुर में बाटै-बाट चल दिये माल-ककोड़ की ओर. खाली हाथ. किसी ने कहा कापड़ाक-चांच के नीचे देखे, किसी ने कहा गाजा के जंगल में तो किसी ने बताया श्यूं-बाघ के भारी डर-भर वाले अदवाड़ के जंगल में देखे. आखिर में उन्हें ककोड़ से नीचे उतरकर अग्यार, कलौट फिर स्याला की गाड़ के पार नाकुलि के घने जंगल की ओर जाते हुए देखा गया. गांव के लोग गए. ढूंढा. यहां वहां आवाजें लगाईं. लेकिन कुछ पता नहीं लगा.’

समानार्थी शब्द-सम्पदा की खोज के कई झडबाटो की सिनाख्त है इसमें. बच्चों के शोर-शराबे के लिए चिड़ियों के कलरव जैसा शब्द ‘कलकलाट’ तो सुनते आये थे. यहा ‘कलाट’ नाम का नया शब्द, उमदराज खुर्राटों की कड़कड़ के लिये आया है. उस ‘ख’ में ‘कल’ शब्द कितनी बेरहमी से गायब हुआ है, यह देखने लायक है. दया की भावना के लिए व्यवहार में आया ‘टीठ’ शब्द भी ध्यान देने लायक है. आकाश से गिरने वाले बारीक ओलों की बौछार के लिये ‘छांछर’, अन्धड़ या आंधी-पानी के लिए इस्तेमाल हुआ ‘डडूर’, उटपटांग-उद्दण्डों के कारनामों के लिये प्रयुक्त हुए ‘किदल’, चौंधियाहट के लिए ‘त्योंर’ जैसे शब्द भी रेखांकित करने लायक है. कुमाउंनी लोकगाथा की ‘हुड़किया बोल’ शैली के लिये ‘झौल’ शब्द भी पहली बार पढ़ने को मिला. कुमाउंनी भाषा की व्यंजना शक्ति, ध्वन्यात्मकता, लहजा और तकिया-कलाम जैसे शब्दों की आवृत्तियों, भाषा में उनकी स्थान-स्थिति पुरअसर सटीक प्रयोगों ने तो मानो हिन्दी की एक भव्य आंचलिक शैली का प्रकार मिल गया है.

भंगीरा, तिल, चूड़े, वगैरह रह को मिलाकर चबाने के लिये बनाये गए चबैने को ‘खाजा’ कहा जाता रहा है. उसमें भांगे के बीज व भुने हुये भट भी मिलाये जा सकते हैं. इन ‘खाजों’ के लिए ‘उत्योल’ शब्द का प्रयोग भी पुराने समय में होता रहा. दो सौ वर्ष पूर्व के कवि गुमानी ने स्थानीय फल केला, नींबू, अखरोट, गन्ना, नारंगी, अदरक आदि फल, कंदों सहित गडेरी के तले हुए गाबों के साग, जमालों के चावलों के कलकले भात, गाढ़े जमे हुए दही, गाय के दानेदार घी, बाखड़े पशु के दूध और सुंदर स्वादिष्ट धबड़ुवा मोगिया (डुबका) आदि खाद्य के साथ ताजी, भुने ‘उत्पलों’ का नाम स्मरण किया है. ये स्वादिष्ट उत्पोल और धबडवा हमारी भाषा से गायब जैसे हो गये थे. मेवाड़ी के इलाके में उनकी पहचान बची हुई जान कर गुमानी का काव्यार्थ समझ में आया.

पशु-पक्षियों के प्रतीकार्थ भी यहां खूब देखने में आये. घुघु के लिये हुमन शब्द भदेस या मजहए आदमी के लिये ऐसे प्रयोग हुए है जैसे ‘शैतान’ या ‘खबीस’ होते है. बेवकूफ के वाचक उल्लू शब्द का जैसा अर्थ-विस्तार है इसमें. श्री विहीन मुख-मण्डल के लिए ‘धुतएल’ या ‘कुंश्यालू’ शब्द आये हैं जो एक ऐसे जन्तु का अभिधेय है जो मधुमक्खियों के छत्रों को नष्ट करने में माहिर होता है. ये सब लोक से ग्रहीत सादृश्य, रूपक या उपमान है. इसी तरह लोक-ज्ञान की बातें है जो विज्ञान की तरह अकाट्य हैं. जैसे लिगुड़ा, फर्न प्रजाति की वनस्पति के रूप में पहचानी गयी है. पयां के पेड़ में चेरी की कलम होती है. कलचुड़िया चिड़िया का शोरबा दमे की दवा है. बाघों की बहुत सारी हरकतें उसके बिल्ली वंश का पशु होने को प्रमाणित करती हैं. कीटभक्षी पौधा ड्रोसेरा, बांज की प्रजाति के पेड़ों पर उगने वाला परजीवी पौधा है जिसे कुमाउंनी में ‘बान्’ या ‘बांदा’ कहते हैं. कुदरत का करिश्मा देखें कि परजीवी बान् को एक दूसरा परजीवी चूसता है जिसे ‘सिमलटो’ कहते हैं. परजीवी का भी परजीवी है यह. ऐसे ही लोक के खोजे हुए बहुत से सत्य भी आए हैं जिनमें एक, ‘अंयार’ के जहरीले होने से सम्बन्धित है. उसके चिपचिपे खासकर बसंत  में पलुराय हुए पत्तों को गायें-बकरियां चरती हैं तो काल-कवलित हो जाती हैं. इसी तरह का एक लोक सन्दर्भ ‘बूस’ या ‘ब्वांस’ नाम के जंगली जन्तु का है जो छ: – सात के झुण्डों में जंगल में चरने गये पशुओं को निवाला बनाता है. सुना जाता है जंगली कुत्ते जैसा आकार में तनिक छोटा यह जन्तु उछल कर पशु की पीठ पर चढ़ता है और शरीर को सिकोड़कर उसके मल द्वार को दांतों से फाड़ता है फिर भीतर घुस कर कलेजा खा डालता है. आहत पशु जमीन पर गिरता है तो झुण्ड के सभी ‘ब्वांस’ उस पर टूट पड़ते हैं.

‘ऐसा सुना जाता है’ या ‘लोक प्रसिद्ध है’ जैसे वाक्यों को कहने के लिए कुमाउंनी में दो अक्षरों का छोटा शब्द ‘बल’ इस्तेमाल हुआ करता है. गढ़वाली लोग इस ‘बल’ और ‘ठैरा’ शब्द से कुमाउंनी भाषा – भाषी की पहचान करने के अभ्यस्त रहे हैं. भाषा की इस तरह की खूबियां भी किताब में खूब इस्तेमाल होने से उक्त कृति बोली की शैली की भी प्रतिनिधि हो गई है. किताब के अंत में ऐसी खूबियों पर टिप्पणियाँ भी दी हुई है. इतनी सारी, सामान्य और विविधता भरी देसांचली जानकारियों का समाहार होते हुए भी किसी की मजाल नहीं जो कह सके कि यह किताब देवेन्द्र मेवाड़ी की कहानी नहीं है? कथारस को इतनी चीजों ने मिलकर भी कुस्वाद नहीं किया है. उलटे यह कहना पड़ता है कि इतनी चीजें यदि नहीं होतीं तो वह आंचलिक गल्प या जल्प जैसी कोई चीज होती. आंचलिक जल्प और गल्प से अनोखा एक क्लासिकल रच डाला है कृतिकार ने मानो.

ये लोकज्ञान की बातें हैं’, ‘ये विज्ञान की जानकारियाँ हैं’, ‘ये किंवदंतियाँ हैं’, ‘ये रिश्तेवाची शब्द लाड़-प्यार जताने के लिये हैं’, ‘यह आदर्श वादी रिश्ते का शब्द पारिवारिक रिश्ते के ऊपर हावी हो गया है’, आदि – सूत्र तो किसी किताब की समीक्षा के लिए हम बुनते हैं. उक्त कृति में ये सब चीजें मुसलसल कथा की रौ में आती गई हैं. विवेचना मेवाड़ी को अभीष्ट नहीं है. पाठक यह न समझे कि मेवाड़ी ने सामान्य हिन्दी में कोई पाठ्य पुस्तक लिखी है. उत्तराखण्ड के शिक्षा विभागों की यह विडम्बना है कि जो लोक जीवन जिये जाने के लिये है उसे कोर्स में पढ़ाने की चीज बनाया गया है. उसके भी सरलीकरण, सतहीकरण, इम्तहानीकरण आदि के लिए परीक्षोपयोगी किताबें बाजारों में देखने में आती हैं. हा हन्त!

इस किताब में खेतों में छिड़के जाने वाले बीजों की तरतीबवारी को व्यक्त करने वाले ‘एकसार’ जैसे शब्द से लेकर वस्तु प्रणाली को समझाने वाले शब्दों तक की खोज – खबर है. रांई रांई रांई करके चीखने वाले नन्हे झींगुर कीट सरीखे जीवों से लेकर कितनी ही चिड़ियों, जंगली जानवरों और पालतू मवेशियों के चिचियाने, रेंकने, टेरने-टर्राने, फुत्कारने, अलाटने-अड़ाने, कामातुरता में क्रोंकारने आदि से व्यक्त होती वृत्ति-व्यथाओं की शब्दावली उसमें आई है. कितने ही ऐसे नाम शब्द हैं जिनकी मदद से हम अंग्रेजी की किताबों में पढ़े हुए नामों की स्थानीय पहचान कर सकते हैं. उदाहरण के लिए जिस चिड़िया को ह्विसलिंग थ्रश कहा जाता है वह हमारी भाषा की कलचुड़िया है. अंग्रेजी की बैब्लर हमारी मुश्याचड़ी है. उनकी नाइटजार हमारी छापका चिड़िया है.

एक जैसे पशुओं के फर्क को समझने के लिये उनकी आवाजों को पहचान के आधार बनाना पड़ता है. इस सादृश्य प्रजाति का उदाहरण ‘सियार’ और ‘फ्यूंण’ हैं. दोनों जानवरों को, देखकर नहीं पहचाना जा सकता. कौवे और कोयल की जैसी सूरत है. उनकी पहचान उनकी आवाजों से होती है. सियार हुआं- हुआं करता है जबकि फ्यूंण फ्यूं फ्यूं फ्यूं करके बासता है. पशु-पक्षियों की हरकतें, उठने-बैठने के ढंगों, झुण्डों में कतारबद्ध या बेकतार होकर चलने की भी एक भाषा होती है. जुगाली, त्रास और हिंसक या भूखी हरकतों से भी उनकी भावनाओं की पहचान होती है. उन पहचानों से अवगत कराने वाली शब्दावली का लोक से किया गया ग्रहण सटीक और स्वाभाविक है.

रचना कर्म के लिये मेवाड़ी ने ऐसा अक्षत क्षेत्र चुना जिसमें उसका खुद का बचपन पेड़ की तरह उगा और बढ़ा. उसने अपनी जड़ों की जमीन से सारे प्राकृतिक पोषक तत्व खींचे और उन्हें पत्तों तक पहुँचाकर अपने को ऊँचा उठाया है. वह उठान ऐसी है जिसमें परिवार और पड़ोसी मानवीय प्राणी ही नहीं, पालतू पशु, पक्षी और उद्भिज भी साथी हैं. सबकी अनन्यता को प्रमाणित किया है इस कृति ने.

छ्वां..छवां करते गाड़-गधेरों, अमां-अमां करते गाय-भैंसों के बागूडों, दांय फेरते बैलों, घर की चिनाई करते हुए ओड़ों, टोकरियाँ बुनते हुए चुनारों, काफलों से भरी हुई छापरियों, काठ के ड्वाबों, चड़ी, डौकी, पाली आदि बरतनों, पत्थरछाये घरों की दानों पर बीजों के लिये लटकाए गए मक्का, भंगीरा, कोंणी और लहसुन आदि की झालरों, लड़ियों को, ससुराल के लिये विदा होती स्त्रियों, पाटी-दवात लेकर स्कूल जाते हुए बच्चे आदि के मानसी द्वारा तैयार किये गये 123 रेखांकनों ने इस किताब की ‘विषयवस्तु’ के प्रत्यक्षीकरण को एक और आयाम दे दिया है. 

बहुआयामी किताब में एक और आयाम है यह. ये रेखांकन लोक जीवन की तमाम सजीव-निर्जीव चीजों को किताब के पन्नों में ले आये हैं. उनके अभिप्राय इतने सर्वविदित है कि दो – ढाई वर्ष का बच्चा भी उन्हें पहचानने में कठिनाई नहीं महसूसेगा. ग्राम्य परिवेश से उखड़ कर दूर जा बसी पीढ़ियाँ, किताब को पढ़े बिना भी चित्रों के माध्यम से उसकी अन्तर्निहित वस्तु का प्रत्यक्षीकरण कर सकती हैं. सामान्य पेंसिल से खीचीं गयी ये रेखाकृतियां मेवाड़ी और मानसी की उन संवेदनाओं की बदौलत हैं जिन्हें उनकी माताओं के आंगड़ों के भीतर छिपी हुई दूध की घूंट और ददाओं के भीतर छिपे हुए अध्यापक-संरक्षकों ने सुसंस्कृत किया हुआ है. शब्द-शब्द पर चढ़ी हुई आत्मसातता की शान लेखक की अपनी है. इन तीनों चीजों ने मिलकर विषयवस्तु और प्रस्तुतीकरण को पाठकों के उतने समीप ला खड़ा कर दिया है जितने करीब दर्पण में मुख होता है.

डॉ. प्रयाग जोशी

डॉ. प्रयाग जोशी का यह लेख लोक गंगा पत्रिका में २०१३ के सितम्बर अंक में छपा था। काफल ट्री में यह लेख लोक गंगा से साभार लिया गया है. अवकाश प्राप्त प्रोफेसर डॉ. प्रयाग जोशी हिंदी और लोक-साहित्य के विद्वान हैं. लोक-साहित्य पर उन्होंने उल्लेखनीय शोधकार्य किया है.

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