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बीमारी का बहम और इकदँडेश्वर महाराज का ज्ञान

संसार मिथ्या और जीवन भ्रम है, मनुष्य का मानना है वह जीवों में श्रेष्ठ व बुद्धिमान है. लेकिन खुद असंख्य मायावी बंधनों से जकड़ा हुआ छटपटाता रहता है, छुटकारा पाना चाहता है. फिर भी इन बंधनों को खाद पानी दे कर पालता पोषता और मजबूती देता है. सांसारिक और स्थूल जीवन को तत्वज्ञानी भी समझ पाने में असमर्थ हैं. मेरा ये मानना है. जीवन छोटा सा अहसास है. जन्म से शुरू होता है मृत्यु तक खत्म होता है. खुशियों से भरी हो तो पता भी नहीं चलता, कब गुजर गई… दुख-दर्द ही इसे लंबा विस्तार देते हैं. 

जीवन है तो जीना पड़ेगा. अजब पहेली है यदि गंभीरता से न लो तो बुढ़ापे में पछताना पड़ता है यदि लो तो पूरा जीवन बोझ बन जाता है. चलो! यदि बोझ भी है तो ढोना पड़ेगा. कुछ तत्व ज्ञानी जरूर इन बातों को समझते है लेकिन खुद अशक्ति के मकड़जाल में फंसे रहते हैं. खुद सोना-चांदी रत्न-जड़ित सिंहासन पर आसीन होकर त्याग विरक्ति के अनुपयोगी ज्ञान का व्यापार करते हैं. एक सूत्र को सुलझाते हैं दूसरे में उलझ जाते हैं. हो सकता हो हमारा चिंतन हमारी औकात से बहुत बडा हो . कुल मिला कर मेरा तो यह मानना है. 

‘समझदार’ लोगों का जीवन ‘मूर्खों’ से अधिक कठिन होता है. यह समझना भी मुश्किल है कौन समझदार?कौन मूर्ख है? शक्ल दोनों की एक सी ही होती हैं. अंतर सफलता का होता है. खैर, छोड़ो कुल मिला के जीवन एक गाड़ी है स्टेरिंग आपके हाथों में है इसे आप चाहो तो किसी भी दिशा में ले जा सकते हो सड़क ऊबड़-खाबड़ घुमावदार ऊंची नीची कैसी भी हो यदि आप नियंत्रित होकर जिन्दगी का लुफ़त लेते हुए चलते जाओ सांप-सीढी खेलते हुए भी कहीं न कहीं तक पहुँच ही जाओगे. सफलता असफलता का लेखा-जोखा तो आपके सांसारिक सिस्टम के पास है हंस-हंस के या रो-रो कर भी कैसे भी पहुचना ही है. 

इन दृष्टान्तों से इतर विषय पर आते हैं. इस कथा के नायक चिराग की चित्तवृत्ति अजीब सी चल रही थी. मन भ्रमित था क्या करें? उसे अपने शरीर से बहुत सी शिकायतें थी. शरीर के अंग-प्रत्यंग ईश्वर ने भली-भाँति पेस्ट किये थे. न जाने क्यों उसे उन पर भरोसा न था. उसे लगता ईश्वर ने उसे जन्म देकर कोई फ्रॉड किया है. कभी पेट में गैस की शिकायत, तो कभी दिल की धड़कनों का बहम. साँसों में तकलीफ़ तो कभी जोड़ों का दर्द शरीर दिन प्रति दिन कमजोर पड़ रहा था. पढ़ा-लिखा था. वह भी कानून का स्नातक. कहाँ जिन्दगी तर्क से चलनी थी बहम से नर्क बन गई. कहाँ कानून की गुत्थियाँ सुलझानी थी. वहीं शरीर विज्ञान से उलझ गया. जिरह करता निष्कर्ष तक नहीं पहुच पाता. 

खाँसता तो फेफड़े खराब, भूलता तो दिमाग पर शक, कभी दिल की धड़कनों का बहम. ऐसे ही कई झंझट थे. डिजिटल थर्मामीटर हमेशा जेब में रखता, बार-बार नापता तापमान में जरा भी अंतर आता तो बेचैन हो जाता. ब्लड प्रेशर नापता, संतोष न होता फिर जा के दो-2 मुहल्ला अस्पतालों में नपवाता. यार-दोस्तों को अपणा दुखड़ा सुनाता वे भला समाधान देते. उसे और उलझा देते. कहीं इसका कारण शुगर तो नहीं डाइबीटीज नापने की मशीन भी घर पर थी. कह सकते हैं, उसका जीवन एक मर्ज बन गया. अब तो घर पर ही हर मर्ज नापने की मशीनें थी. और घर का इंटीरीयर एक अस्पताल सा हो गया. बड़े-2 अच्छे से अच्छे और महंगे से महंगे डॉक्टरों इलाज भी करवाया, बोतलों खून निकाला. खून के साथ जमा पूंजी भी खर्च हो रही थी. अब वह तन-मन-धन तीनों से कंगाल हो चुका हैं. कन्फर्म करने एक ही रोग के दो-2 विशषज्ञों के पास जाता दोनों की रिपोर्टें अलग होती. फिर तो उसका शक और बढ जाता. कुछ भले डॉक्टरों ने तो साफ जवाब दे दिया कि तुम्हारी तबीयत खराब होने के कोई लक्षण भी हमें नजर नहीं आ रहे ज़िद करने पर वे ज्यादा से ज्यादा एक ताक़त की टौनिक लिख देते. 

चिराग का मन डॉक्टरों से खट्टा हो गया. बहमी कहीं का? समझ में नहीं आता जब लक्षण नहीं थे तो डॉक्टर ने इतने महंगे टेस्ट क्यों करवाए. फिर किस बात के डॉक्टर हैं ये..? कहते हैं डॉक्टरों की सिखाई बड़ी कठिन और सालों खर्च करके पूरी होती है. ताज्जुब है ये मेरे अंदर का एक रोग तक नहीं ढूंढ पाए.फैल हो गई ना मेडिकल साइंस. यदि रोग नहीं तो मैं क्यों परेशान हूं. टेस्ट पर टेस्ट बड़ी-2 दम घोटू मशीनों में घुसेड़ा निकाला गया. कुछ बीमारियां इस वजह से भी बढ गई हैं. लोगों के पास तो अपनी पासपोर्ट से लेकर फुल साइज़ कश्मीर, से कन्याकुमारी तक की बहुतेरी रोमेन्टीक तस्वीरे होंगी. मेरे तो अंग-प्रति अंग क्य दिमाग तक की बहु आयामी बहुरंगी तस्वीरों से अलमारी भरी हैं रोग के नाम पर सूई पर सूई..पूरा शरीर छलनी हो चुका है. इतनी आप चाहो तो आटा छान सकते हो मैदा बन कर निकलेगा. सब लुटेरे हैं जाल फैला रखा है. बॉर्डर में होता ज्यादा से ज्यादा एक गोली ही तो भेदती इस पापी शरीर को! मुक्ति मिलती! शहीदों में गिना जाता. हर बरस मेले लगते.. पर मैं तो गोली पर गोली झेल रहा हूं. 

जब प्राइवेट डॉक्टरों से विश्वास उठा. चिराग के शुभ चिंतक रौनक ने बताया बसंत बाजार में एक सिद्ध पुरुष पधारे हैं चेहरा देख के ही रोग पहचान लेते हैं. वे एक चूरन देते हैं जिससे जुकाम से लेकर कैंसर तक ठीक हो जाते हैं. मन ललचा उठा लेकिन भीड़ वहाँ बहुत थी. उस धक्का-मुक्की वाले भीड़-भड़ाके में घुसने की हिम्मत ना हुई लौट ही रह था अचानक सामने सरकारी अस्पताल दिया. चलो कुछ नहीं से कुछ सही.. हार-थक कर एक सरकारी डाक्टर के पास जाने का निश्चय किया. पूरा समाज चिल्ला-2 कर कहता है दवाइयाँ तो हजम नहीं होती कम से कम इलाज तो फ्री का है. जेब खाली थी और कोई चारा भी नहीं था. ये सामान्य धारणा है सरकारी डाक्टर मुफ़्त में इलाज करते हैं पर लोग इन पर विश्वास नहीं करते.. लोग कहते ये बस नौकरी बजा रहे हैं. पर सलाह ईमानदारी से देते हैं. जहां सन्नाटा पसरा था. फ्री इलाज के होते भी सरकारी अस्पताल में भीड़ नहीं होती मन खुश हो गया इक्का-दुक्का लोग चहलकदमी कर रहे थे. उन में से अधिकांश मेडिकल प्रमाणपत्र बनवाने आए थे. मैं बेंच पर इंतजार कर ही रहा था मेरा नाम पुकारा गया. मैं सपत्नीक डॉक्टर के रूम में घुसा डॉक्टर ने मुझे समाने की स्टूल पर बैठने का इसारा किया. मुंह तो उसका पान मसाले से भरा हुआ था पास की डस्ट्बिन में थूकते हुए फिर पानी का कुल्ला थूकने के बाद उसने तौलिए से मुंह संभाते हुए पूछा “कब से बीमार हो?” 

चिराग कुछ बोलता पहले ही पत्नी बोल पड़ी “डाक्टर साब शादी के बाद से मैं इन्हें ऐसा ही देख रही हूं… हर दिन नई बीमारी…” 

“हूं! कौन सी कछ्छा तक पढे हो….?” 

“जी एम.ए, एल.एल. बी .पास हूं.” 

“पर करते कलरकी हैं बहमी न होते वकालात न करते?” मुंह फट पत्नी बोल उठी 

डाक्टर के लिए ये गैरजरूरी वक्तव्य था. पत्नी की तरफ उपेक्षित दृष्टि से देखते हुए मुझसे कहा. 

“यार तुमने पढ़ाई दिल से ले ली.. अनपढ़ होते तो ज्यादा ज्यादा स्वस्थ और सुखी होते. उसने यहाँ तक कह दिया. कुपात्र को शिक्षा मिलना बहुत अनिष्टकारी है. शिक्षा सीधे-सादे विचारों को जलेबी की तरह जटिल बना देती है. कभी देश-दुनिया में अशिक्षा अंधविश्वास हर तरफ फैला था हम सोचते थे शिक्षा आएगी उसकी रोशनी में भूत-भूख का अंधकार दूर भागेगा. आज तो आज तो तीक्ष्ण ज्ञान की रोशनी भ्रमित कर रही है.”

मैं डाक्टर बकवास से झल्ला सा गया. इतना क्रोधित था, जी करता पान से सड़े दांत तोड़ लूं. आसानी से टूट भी जाते ऐसा करता तो दो धराये मुझ पर लगती (1) सरकारी काम में बाधा आईपीसी धारा 186 और (2) IPC की धारा 307 अटेम्प्ट तो मर्डर का मामला बनाता और जेल में होता..! फिर अस्पतालों ही नहीं कोर्ट झमेलों में भी फँसता मैं अपने कुविचारों से सिहर उठा. 

डाक्टर फिर रिवोलविंग चेयर पर झूलते और डकार छोड़ते हुए बेहद ईमानदारी से बोला- “देखो, डॉक्टरों के पीछे भागना भी एक बीमारी है. तुम्ही नहीं तुम से ज्यादा पढ़े लिखे लोग भी खाना कम दवा ज्यादा खा रहे हैं. रोग से नहीं बहम से ज्यादा मर रहे हैं. बहम की कोई दवा नहीं!” 

“ये डाक्टर है या कथा वाचक? ऐसे नालायक सरकारी नौकरियों में ही खप पाते हैं प्राइवेट होता….गहन जांच के दायरे में होता” आगे मैं कुछ बोलता.. मुँहफट पत्नी.. बीच में टपक पड़ी 

“इनके लिए आपकी बात तो सही है तो फिर आप इतना तंबाकू क्यूं खा रहे हैं? आपको भी तो कैन्सर हो सकता है. 

शायद डाक्टर बुरा मान गया यह उसकी तौहीन थी अपने बेतरतीब माथे पर बल डालते हुए मुंह बना कर बोला, 

“बहिन जी आफ्टर ऑल मैं एक डाक्टर हूं आप मुझे सलाह दे रही हैं… इन्हें संभालिए, इनकी चिंता करिए और आप भी मुटया रही हो. हाँ तो वकील साहेब चूर्ण लिख रहा हूं पचास ग्राम दो लीटर पानी में तब तक उबालो जब तक ये आधा न हो जाए फिर सुबह गुनगुना पानी के नींबू निचोड़ कर एक चम्मच शहद के साथ मिला कर रोज पीओ. थोड़ी कसरतें करो और मन का बहम निकालो. ठीक होने की गारंटी मेरी!” फिर पत्नी की ओर देख के बोला “हाँ मैडम यही दवा आप के लिए लिए भी लिख रहा हूं. सुनो ये शहद और दवा भोला पनसारी से ही लियो” 

चिराग अनमना सा डॉक्टर के केबिन से बाहर निकाला पत्नी से बोला “कुछ समझ में नहीं आता.. प्राइवेट डाक्टर पाँच लाख की दावा खिला चुके है ये कुछ कसरतें पचास रुपये का नुस्खा बता रहा है.. हाँ सरकारी डाक्टर है. इसका क्या जा रहा है रोगी मरे या जिए इसको तो जेबें भर भर के तनख्वा मिलनी है ..प्राइवेट होता… ” 

“बीमारी होती तब तो लिखता!” पत्नी चीखी” 

खैर किसी तरह घर पहुंचे… चिराग बोला “मेरी तो खाने की खास इच्छा नहीं तुम खा लेना.” 

रोशनी दुखी थी वह उस घड़ी को कोसती जब इस इंसान से गठबंधन हुआ था. शादी भी कोई पसंद की नहीं थी मम्मी-पापा ने बाकायदा पंडित जी से जन्मपत्री मिलवाई थी. पंडित ने चार-2 बार उंगलियों को फेरा, पत्री उलटाई-पलटाई जब यथा योग्य गुण, नक्षत्र मिल कर आपस में राजी हुए थे. तभी तो शादी हुई थी. फिर भी इतनी बड़ी गलती? तुम्हारे इतने सारे रोगों से मुझे ही क्यों लड़ना पड़ता हैं..? पंडित पहुंचे हुए थे. क्या यह ग्रह नक्षत्रों की साजिश थी घर परिवार देखा.. घर-बार भी अच्छा था. सूरत देख तुम भी तो अच्छे लगे थे. संतुष्ट हुए तब जाके शादी हुई थी. मुझे क्या पता था. अंदर से तुम इतने ‘ब्लेंक’ हो. चिराग तुम्हारे नाम पर तो मैं मर मिटी थी.. उफ्फ़ कभी सुख रोशनी नहीं दिखी..तिल-2 कर जल रही हूं. खुली हवा में उसका हाथ पकड़ कर सांस ले तो कैसे..? रोमांस की कोशिश करती तो चिराग बहम का धुआ छोड़ने लगता. मैं दिल की बात करती तो उसका दिमाग खराब हो जाता..हार्ट बीट बढ जाती. फर्स्ट ऐड मुझे ही देनी पड़ती . बस चलता सारे बंधन तोड़ दू! खुद को कोसती.. क्यों ऐसे युग और समाज में जन्मी? .. आत्म निर्भर भी न थी जीना तो चिराग की तनख्वा के आलोक में ही था. कोई रास्ता न था. अपने दिवंगत मां बाप की इज्जत और कुल मर्यादा का सवाल था. खानदान में आज तक ऐसा किसी ने भी नहीं किया था. मुझ अभागन को सब ने अंधेरे में रखा. इच्छा ये करती हूं उन्मुक्त होके जियूँ! हँसूं खेलूं पर किससे..? चिराग तो चिराग हैं रोशन होता कुछ तो दिखता .. शक्की है. किसी से हंस-बोल भी नहीं सकती फिर समाज खानदान जाति धर्म मान मर्यादा की बेड़ियों से भी तो जकड़ी हुई हूं. 

रोशनी ने अपनी बूढ़ी सास से भी पूछा इतने दुख और अवसाद से भरपूर बिना तेल-बत्ती के इंसान का नाम चिराग किसने रखा, क्यों कर रखा? किस पंडित के कहने पर रखा? भोली सास ने बताया “जब चिराग पैदा हुआ था पंडित ने नक्षत्रों गहरा अध्ययन कर नाम ‘चि’ अक्षर से रखने की राय दी पंडित का नाम भी खुशीराम था बडा खुश दिल इंसान था. बहुत हवा छोड़ता था. पहला मंत्र भी सर्वप्रथम उसी ने इसके कान में फूका था शहद भी चटवाया था”. “पंडत के ही दो गुण तो आते. किससे शिकायत करूं पिताजी तो स्वर्ग सिधार गए उस पंडित का भी कोई आता-पता नहीं..मिलता तो बताती उसे! पर क्या कर लेती उसका?”  

विचारों का सिलसिला चल ही रहा था. चिराग और रोशनी को तभी समाने से जाते मुरली काका दिखाई दिए . चिराग का मन खिन्न था. पत्नी ने आवाज दी “मुरली काका!” 

चाचा ने पुकार सुन ली. पलट कर हमारि तरफ आने लगे . चिराग खीज उठा “अरे रहने दिया होता… चचा बकवास बहुत करता है हमेशा अपणी टांग ऊपर रख कर बात करता है. काका है तो मस्तमौला साथ ही खब्ती अर दिमाग चाटु हैं… घोर अंधविश्वासी बेसर-पैर बातें करता और हर बात पर अपनी टांग ऊपर रखता हैं अनपढ़ अनघड़… दलाल कही का. मैं जो कुछ भी हूं आखिर एक पढ़ा लिखा वकालत किये हूं… भले ही क्लार्क हूं… स्कॉलर हूं… मेरे अपने तर्क हैं. लेकिन चाचा ने रोशनी की पुकार सुन ली थी 

मन नहीं था बतियाने का तब ‘इंडिविजुवल्टी’ का सम्मान न था. हर तरफ नाते रिस्तेदारों की चलती सामाज में बेहद अनपढ़ अनगढ़, राय विशेषज्ञों सी देते… समाज के बंधन बहुत कड़े थे मूर्ख थे सब! अनाप-सनाप विश्वास थे. उसने खुद को सम्हाला ! होंठों में हल्की और मजबूर मुस्कान ले उनका अभिवादन किया. 

“खुश रहो” 

रोशनी फट पड़ी “कैसे खुश रहो चाचा!” थैला ही नहीं अलमारियाँ तक डाक्टरों के पर्चे रिपोर्टों भरी पड़ी हैं घर अस्पताल बन गया है ! डाक्टरों फीस भरते-2 लुट गये..हम”

“फैक डाल इन दवाई और डाक्टरों के पर्चों को! घर में अपसगुन फैलाते हैं.”

“मैं क्या करूं” 

“ज्यादा डाक्टर-डाक्टर मत खेल मेरे साथ मेरे घर चल आज तेरि समस्याओं का निराकरण करता हूं 

चिराग की तो इच्छा नहीं थी पत्नी की जिद से साथ चल दिया घर पहुँच कर चाचा एक विशेष कक्ष में ले गए कमरे में अजीब सी खुशबू मिश्रित बदबू आ रही थी. न वह सुगंध थी न दुरगंध जो भी थी बेचैन कर रही थी. दीवार पर माला जड़ित एक मुस्कराते बाबा की वरदहस्त युक्त तस्वीर टंकी थी. पत्नी दंडवत थी इच्छा न होते हुए मुझे तस्वीर में मढ़े गुरुदेव को प्रणाम करणा पड़ा. 

“जब डाक्टर फ़ेल हो गए जरूर किसी माया का साया होगा. मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ था. बाबा की शरण में जा पहुंचा. इन्हीं के कहने पर ही सच्चे ज्ञान की अनुभूति हुई. मैंने डॉक्टरों की अल्ट्रा साउन्ड, ऐक्स-रे से और भी न जाने किन-2 पर्चों को मसाला कुचला और जला डाला. अपसगुनी होते ये! इन्हें घर पर नहीं रखना चाहिए इन घोर सांसारिक बातों से भरोषा खत्म हो गया. तब से स्वस्थ हूं… मस्त हूं.  एक अच्छे जीवन के लिए अच्छे गुरु और कृपा की आवश्यकता होती है डॉक्टरों की नहीं! तू ये बता तेरी रगों में बहता खून ,आँखों की रोशनी, दिल की धड़कन साँसों की आवत-जवात डॉक्टर की नियामत हैं…”

मैं निरुत्तर था. 

नहीं! वह बस रिपेर भर कर सकता है मेरे पास एक ऐसे चमत्कारी सिद्ध पुरुष हैं जिन्होंने वर्षों तपस्या कर सिद्धियां हासिल की हैं 

“चाचा जी माफी चाहता हूं इन बातों पर मैं विश्वास नहीं करता हूं..” 

“अरे मैं भी नहीं करता था. बाते माननी पड़ती हैं. जब सारी शक्ति खतम हो जाती हैं. तब भक्ति काम आती है. बाबा ने मेरी जिन्दगी बदल दी. बीज मंत्र लिया, ऐसे ही नहीं पूजता हूं मैं उन्हें! यदि कोई अनिष्ट की संभावना हो बाबा स्वप्न में चेतावनी दे देते हैं. फिर तो मैं शरणागत हो जाता हूं. विवेक अरण्य सेवा आश्रमपहुच जाता हूं.. चल कल मेरे साथ चल बहूरानी को भी ले चल”

 चिराग उत्तर दिए बिना.. बेमन से बाबा जी की तसवीर और चाचा को हाथ जोड़ वापस घर आ पहुंचा.

रोशनी स्पष्ट रूप से चाचा और उनकी गुरु वाणी से सहमत थी वह चिराग किसी तरह रास्ते में लाना चाहती थी मैं भ्रमित था पहले डाक्टरों ने लूटा अब तांत्रिक लूटेंगे.. अगले दिन मैं ऑफिस से लौटा ही था. चिंतित चाचा घर आ धमके थे आँशुओं में डूबी पत्नी विलाप कर रही थी.

“थक गए चाचा.. डॉक्टरों का पीछा करते-करते कहीं से भी राहत नहीं मिली आज घर अस्पताल बन चुका है बैंक बैलेंस ब्लैंक, थैला, इन डॉक्टरी परचों और दवाइयां के रेपर से फूल के कुप्पा बन चुका है. घर की आलमारियां डाक्टरी रिपोर्टों और अल्ट्रा साउन्ड, ऐक्स-रे से न जाने किस-2 तरह की भूतही फोटूओं पटी पड़ी हैं.. चाचा क्या करूं किसी आदमी के पल्ले पड़ी कहना भी तो नहीं मानते बंदरों की तरह एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर छलाँगे मार रहे हैं प्राइवेट से सरकारी आखिर कब तक चलेगा शरीर में इतना मांस नहीं है जितनी दवाइयां घुस चुकी है आप ही लाए थे इनका रिस्ता..”

मेरे आते ही वह संभाली उठ कर पानी लेने रोसोई में चली गई 

अरे बेटे बहु ठीक कह रही है तू कहे बहम में पड़ा हुआ है पहले मैं भी इस झमेले में फंसा हुआ था डॉक्टर पर डॉक्टर एक दिन मुझे मेरे मित्र मेरे मुझे परम ज्ञानी इकदँडेश्वर महाराज के पास ले गए महाराज के साक्षात दर्शन हुए और तब से मैं शरणागत हूं फूक डाले मैंने सारे पर्चे सारी दवाइयां आज में जरा भी कष्ट में होता हूं तो गुरुजी का स्मरण करता और यदि कष्ट दूर ना हो तो गुरु के दरबार में मत्था टेकने जाता हूं सब समस्याएं हल हो जाती हैं 

छोड़ दो इन डॉक्टरों को ये सांसारिक डिग्रियों से बनते हैं और कौन इन डिग्रियों को किस तरीके से प्राप्त कर रहा है कुछ बुद्धिमान जरूर होंगे लेकिन एक बड़ी संख्या पैसे देकर डॉक्टर बनते हैं लेकिन संत बनने के लिए पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है घर त्यागना होता है घोर तपस्या करनी पड़ती है तब जाकर वर्षों के साधना के पश्चात सिद्धियां प्राप्त होती है चल मैं तुझे अपने गुरु इकदँडेश्वर महाराज के पास ले चलता हूं वह तेरी समस्या का निदान अवश्य करेंगे.

“.. इकदँडेश्वर महाराज..! अजीब नाम है?” मैं बुदबुदाया

चाचा ने बात सुन ली “बेटा ग्यारह साल तक एक दंड याने एक पाँव पर खड़े होकर तप करने के बाद सिद्धियाँ पै थी महाराज ने.“ 

“डॉक्टर भी तो दस-बारह साल की घोर तपस्या के बाद ही बन पाते हैं” 

“ये सब सांसारिक सिद्धियाँ हैं.. कुतर्क न करो! मानो तो गंगा जल है न मानो तो बहता पानी.. विश्वास न हो तो तुम्हारि मर्जी” 

“नहीं चाचा जी इन्हें रहने दो बीत तो आपकी बहू पर रही है न! इस इंसान की बुद्धि पर..” माथा पीटते रोशनी बोली 

चिराग लज्जित था सर झुका के सहमति दे दी 

“बड़े महाराज गोलोक वासी हो गए हैं.” 

“जब इतने सिद्ध थे तो खुद इतनी जल्दी क्यों चले गए?”

“देख गलत धारणा है.. सिद्धपुरुष मरते नहीं समाधि लेते हैं चचा विश्वास में भर के बोले “उनकी गद्दी मई लीन बड़े महाराज को पाना ईश्वर को पाने के बराबर है वे समाधि में लीन रहते है उन्हे तो तपोबल से ही प्राप्त किया जा सकता है हो सकता है कि आश्रम में छोटे महाराज ही तुम्हारी समस्या का हल कर डालें देर न करो कल ही पूर्णमासी है वहां पर एक मेला लगता है जिसमें याचक अपनी समस्याओं का निदान करवाते हैं तो मेरे साथ चल 

चिराग ने फिर असहमति जाहिर की. अंधविश्वासों पर तर्क कुतर्क किये पर पत्नी लाचार थी. झल्ला उठी “तुम खुद तो नहीं मरोगे हमे मार डालोगे. तुम जैसे नहीं मरते! सारा पैसा डाक्टर और दवाओं में जा रहा है.. न साज न शृंगार, न साड़ी न सलवार जिंदा ही मार दिया तुमने मुझे! समझ में नहीं आता कि ससुराल में हूं या अस्पताल में? जी करता है फांस खा लू.. दयावश चुप हो जाती हूं तरस आता है तब तुम अस्पताल नहीं थाने कोर्ट और जैल के चक्कर लगाते रहोगे. मेरी मरी आत्मा दुख और संताप से छटपटाती रहेगी 

कोर्ट कचहरी में तर्क-वितर्क का महत्व हो सकता है लेकिन विधि के विधान बीबी के ज्ञान के आगे अदालतें फैल हैं, चिराग लाचार था अब कोई चारा नहीं था जब व्यक्ति खंड-खंड हो जाए तो पाखंड के सिवाय कोई रास्ता नहीं है ऐसा मेरा सोचना था.. अब मैं गुरु जी की शरण में हूं आज भी चक्कर पर चक्कर मार रहा हूं. शुक्र है किसी अस्पताल और थाने के नहीं, मेरे जीवन की डोर रोशनी और चाचा की हाथों है… अब मैं कीर्तन कर रहा हूं.

दुगड्डा, पौड़ी गढ़वाल में रहने वाले जागेश्वर जोशी मूलतः बाडेछीना अल्मोड़ा के हैं. वर्त्तमान में माध्यमिक शिक्षा में अध्यापन कार्य कर रहे हैं. शौकिया व्यंगचित्रकार हैं जनसत्ता, विश्वामानव,अमर उजाला व अन्य समसामयिक में उनके व्यंग्य चित्र प्रकाशित होते रहते हैं. उनकी कथा और नाटक आकाशवाणी से भी प्रसारित हो चुके  हैं.

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