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कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा

रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के पनघट पर पहुँचीं, तो अचानक सुबनी की नज़र एक ऐसे व्यक्ति पर पड़ी जो बांझ के पेड़ के नीचे, खुले आसमान में अपनी लोईया (ऊन की शॉल) का सिरहाना बनाकर निश्चिंत होकर गहरी नींद में सोया हुआ था. उसने अपने मुँह को सफ़ेद टोपी से ढक रखा था. सुबनी ने अपने तांबे के घड़े से थोड़ा पानी अपने हाथ में लेकर उसके मुँह पर पानी के छींटे मारे.

अचानक कानिया नेगी की नींद खुल गई. उसकी नज़र सीधे खुले आसमान की तरफ़ गई. आसमान बिल्कुल साफ़ था. उसे लगा कि इस स्वच्छ आसमान में पानी की बूँदें कहाँ से बरस रही हैं! इससे पहले कि वह इस कश्मकश से बाहर निकलता, सामने पेड़ के पीछे से सुबनी और लाली के हंसने की खिलखिलाहट गूंज उठी.

सुबनी बोली – “अरे! यह तो कानिया नेगी है.” कानिया की नज़र सीधे सुबनी की आँखों से जा टकराई. एक पल के लिए दोनों जैसे कल्पना के आकाश में खो गए. फिर लाली ने दोनों को जगाते हुए कहा— “जागो! धूप निकल आई है, अब घर जाना चाहिए.” कानिया नेगी ने तांबे के घड़े को सुबनी के सिर पर रखने के लिए अपने हाथों का सहारा दिया तथा ऊन का खरीदार व्यापारी बनकर, बातें करते-करते सुबनी के घर जा पहुँचा.

शिखर राज जनपद शिमला के पास ही, ठियोग तहसील में गिरी नदी के किनारे बसा है ‘बलग’ गाँव, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और रमणीक वादियों से आज भी सराबोर है. इसी गाँव की एक अल्हड़ बालिका, जो धीरे-धीरे अपने यौवन की ओर बढ़ रही थी, उसका नाम था सुबनी. सुबनी अपने क्षेत्र की बेहद खूबसूरत लड़की थी, जिसकी सुंदरता के चर्चे पूरे हिमाचल में फैले हुए थे. आशिक मिज़ाज के जवान लड़के उसके आगे-पीछे भँवरों की तरह मंडराते रहते थे. सुबनी उस दौर की थोड़ी बहुत पढ़ी-लिखी लड़की थी और बढ़ते यौवन की मादकता उसके दिल में हिलोरे मार रही थी.

सुबनी का बचपन का एक दोस्त था, जिसका नाम कानिया नेगी था. मूल रूप से कानिया नेगी जाड़ग गाँव का रहने वाला था, जो ज़िला सिरमौर की राजगढ़ तहसील के अंतर्गत आता है. कानिया नेगी की पारिवारिक रिश्तेदारी बलग गाँव के आसपास के गाँवों में थी, इसलिए उसका उस क्षेत्र में आना-जाना बचपन से ही लगा रहता था. गेहूंआं रंग, लंबा कद, ऊंची नाक, चौड़ा माथा, सुगठित कद-काठी, बलिष्ठ भुजाएं तथा घुंघराले बालों वाला कानिया नेगी अब एक खूबसूरत जवान मर्द बन चुका था. नृत्य और संगीत में पारंगत, होशियार, मधुरभाषी तथा अपनी मृदुल मुस्कान से सबको सम्मान देने वाला साहसी पुरुष कानिया नेगी अपने पूरे क्षेत्र में विख्यात था. वह सुबनी को बचपन से जानता था और उसके प्रति बेहद आकर्षित रहता था. सुबनी की आसक्ति भी कानिया की तरफ़ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी. कुछ ही सालों में कानिया और सुबनी का प्रेम परवान चढ़ने लगा. इन दोनों का प्यार इस चरम सीमा तक पहुँच गया था कि वे दोनों एक साथ वैवाहिक जीवन बिताने की कसमें खाने लगे.

कानिया नेगी जाड़ग गाँव के एक किसान परिवार से था. उसके पास खेती-बाड़ी बहुत अधिक थी, इसलिए वह हर समय अपने मज़दूरों के साथ काम में व्यस्त रहता था. दूसरी तरफ़, सुबनी की तड़प कानिया के लिए बढ़ती जा रही थी. अचानक एक दिन सुबनी की छोटी बहन लाली का खत कानिया नेगी को मिलता है. कानिया ने जब खत खोला तो उसे पढ़कर हैरान रह गया. उसमें लिखा था— “मेरी बड़ी बहन सुबनी दीदी की शादी हो गई है. आपने आने में बहुत देर कर दी. लेकिन जिस पुरुष से उनकी शादी हुई है, वह उसे नापसंद करती हैं. बदकिस्मती से पिताजी ने सुबनी की शादी एक ऐसे लड़के से कर दी है जो निठल्ला, आवारा और शराबी है. वह सुबनी को बेहद परेशान करता है. पिताजी को उसके इस निष्ठुर और दुर्व्यवहार की पहले कोई जानकारी नहीं थी. अब सुबनी का जीवन नरक के समान बन गया है.”

लाली का खत पढ़कर कानिया के होश उड़ गए और उसकी आँखों से अश्रु की धारा बहने लगी. उसने लाली को एक संदेश भेजकर लिखा कि मैं एक बार सुबनी से मिलना चाहता हूँ. उसे मायके बुला लो, मैं मिलने के लिए तुम्हारे गाँव बलग आ रहा हूँ; पनघट के पास मुलाकात कर लेना. कानिया नेगी अपने गाँव से सीधा बलग गाँव जा पहुँचा तथा पूरी रात गाँव के बाहर पनघट पर एक पेड़ के नीचे आराम से गहरी नींद में सो गया. कानिया नेगी की नींद अगली सुबह तब खुली, जब सुबनी ने उसके मुँह पर पानी के छींटे मारे.

पनघट से घर तक बातें करते-करते कानिया नेगी सुबनी के घर के बाहर आँगन में बैठ गया. सुबनी ने घर के भीतर से पीतल की हुक्का-चिलम में तंबाकू भरकर उसे पीने के लिए पेश किया, ताकि उसकी रात भर की थकान उतर जाए. कानिया जब भी हुक्के का कश मारकर धुआँ छोड़ता, उस धुएँ के बीच सुबनी का चेहरा ऐसे दमक उठता जैसे बादलों के बीच से चाँद का कोई टुकड़ा चमक रहा हो. सुबनी ने डबडबाई आँखों से कानिया से पूछा – “क्या तुम मेरे जीवनसाथी बनोगे?”

“हाँ सुबनी! मैं पक्का तुम्हें अपने घर ले जाऊँगा, पर अभी थोड़ा रुकना होगा. मैं बहुत जल्द तुम्हें लेने आऊँगा, तुम मेरा इंतज़ार करना.” अपने इस वादे के साथ कानिया ने सुबनी से विदा ली.

कानिया नेगी अपने गाँव आकर अपनी खेती-बाड़ी के काम में व्यस्त हो गया. इस तरह कई महीने बीत गए और उसे सुबनी के पास जाने की दोबारा फुर्सत ही नहीं मिली. उधर कानिया के इंतज़ार में सुबनी ने अपना खाना-पीना कम कर दिया, उसकी भूख-प्यास पूरी तरह मर चुकी थी.

काफ़ी समय गुज़र जाने के बाद सुबनी ने कानिया नेगी को एक खत लिखा— “कानिया तुम कब आओगे? मैं तुम्हारे इंतज़ार में सूखती जा रही हूँ.” कानिया ने वापस खत का जवाब भेजा कि अभी धान की रोपाई का काम लगा हुआ है, मैं धान की रोपाई के बाद आ जाऊँगा. पूरा सावन-भादो बीत गया, मगर कानिया नेगी को सुबनी के पास जाने की फुर्सत नहीं मिली. इस तरह सुबनी द्वारा कानिया को कई खत भेजे गए, मगर कानिया कुछ न कुछ बहाना बनाकर बात टालता रहा. सुबनी परेशान होकर कई बार आक्रोशित खत भी लिखती और कानिया नेगी को उसके वादे-कसमों की याद दिलाती. यहाँ तक कि वह उसे झूठा भी कह देती. आखिरकार, हार मानकर उसने कानिया को अपना अंतिम खत लिखा:

“कानिया! मेरा प्यार सच्चा है. यह मेरा तुम्हारे लिए आखिरी खत है. मैं अब तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊँगी. अगर तुम अब भी नहीं आए, तो मुझे मौत को गले लगाना पड़ेगा और मेरी मौत की खबर तुम तक अवश्य पहुँच जाएगी. कार्तिक का महीना आ गया है और कुछ ही दिनों में बलग गाँव में एक मेला (जातर) लगने वाला है. हो सके तो उस मेले में ज़रूर आ जाना. अगर तुम इस जातर मेले में नहीं आए, तो मैं समझ जाऊँगी कि तुम बेवफ़ा हो, फिर मैं कभी तुम्हें अपना मुख नहीं दिखाऊँगी.”

कानिया अपने खेतों में धान की फ़सल कटाई की तैयारी कर रहा था. सुबनी का यह संदेश पढ़कर उसने बलग जातर में जाने का फ़ैसला कर लिया. उसने अपने भाई नरगू को मज़दूरों का इंतज़ाम करने को कहा, ताकि उसकी अनुपस्थिति में धान की फ़सल काटी जा सके. जाने से पहले उसने अपने पुरोहित पंडित तिलकू से सलाह-मशविरा लिया. पंडित तिलकू ज्योतिष के बड़े विद्वान थे. उन्होंने कानिया नेगी को जातर (मेले) में जाने से स्पष्ट मना कर दिया. उन्होंने कहा— “आपके सिर पर कालचक्र मंडरा रहा है, आपको वहाँ जान का ख़तरा है.” परंतु प्यार तो अंधा होता है; कानिया नेगी ने पंडित की बात न मानकर जातर में जाने का ही फ़ैसला किया.

बलग का जातर एक बहुत प्रसिद्ध मेला था, जिसमें आसपास के कई गाँवों के लोग शरीक होते थे. कानिया की नज़रें तो केवल सुबनी के दीदार को तरस रही थीं और सुबनी की आँखें भी कानिया की तलाश में बेचैन थीं. अचानक कानिया की नज़र सुबनी पर पड़ी. सिर पर पीले रंग का ढांटु (पारंपरिक स्कार्फ़) तथा आसमानी सूट के साथ लाल रंग की कोटी पहने हुए सुबनी बेहद खूबसूरत लग रही थी. दोनों की मुलाकात हुई और दोनों ने मेले में खूब वक्त बिताया. पता ही नहीं चला कि शाम कब ढल गई.

अचानक वहाँ का मौसम खराब हो गया और तेज़ आँधी-तूफ़ान चलने लगा. खराब मौसम के कारण कानिया और सुबनी ने मेले से थोड़ी दूरी पर स्थित एक जोगी के डेरे में शरण ली और वहीं पर रात गुज़ारने का फ़ैसला किया, ताकि वे अपने प्रेम और भविष्य की योजना बना सकें.

इस बात की खबर किसी के द्वारा सुबनी के पति तक पहुँच गई कि सुबनी, कानिया नेगी के साथ जोगी के डेरे में रुकी हुई है. सुबनी का पति अपने 10-12 साथियों के साथ आया और उसने जोगी के डेरे को चारों तरफ़ से घेर लिया. उधर सुबनी और कानिया एक-दूसरे की बाँहों में प्रेम की अठखेलियों में मदमस्त थे. उनका प्रेम प्यासी धरती पर बरसते सावन के मेघों के समान था. इतने दिनों बाद की यह मुलाकात उस नदी के समान थी जो सागर में समाकर कभी अलग नहीं होना चाहती.

हाथों में शस्त्र लिए सुबनी के पति ने अपने साथियों के साथ कानिया पर अचानक धावा बोल दिया. निहत्था कानिया अकेले ही उनसे मुकाबला करता रहा, परंतु दुश्मनों के हथियारों के आगे वह ज़्यादा समय तक टिक न पाया. उसका पूरा शरीर लहूलुहान हो गया. आखिरकार, उन सबने मिलकर डांगरे (धारदार फरसे) से कानिया की निर्मम हत्या कर दी. सुबनी उनके आगे दया की भीख माँगती रही, चिल्लाती रही, मगर उन दुष्टों पर उसकी चीखों का कोई असर नहीं हुआ.

जब सुबनी ने देखा कि दरिंदों ने कानिया का सिर काटकर धड़ से अलग कर दिया है, तो उसने पास में ही बह रही गिरी नदी में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी. प्रेम न तो किसी सीमा में कैद रहता है और न ही किन्हीं बाधाओं में; उसे तो बस स्वच्छंद आज़ादी चाहिए. आड़े-तिरछे और बेबुनियाद सामाजिक रिश्तों की नींव पर वह कभी नहीं टिक पाता. प्रेम-दीवानी सुबनी ने कानिया के वियोग में खुद को भी कुर्बान कर दिया.

कानिया और सुबनी की यह अमर प्रेम कहानी आज भी उत्तराखंड और हिमाचल के पारंपरिक लोकगीतों, लोकगाथाओं तथा हारूलों में जीवित है. जौनसार-बावर, रंवाई, बंगाण और हिमाचल की घाटियों में आज भी इस अमर प्रेम कहानी को बेहद भावुक लोक धुनों में गाया जाता है.

फकीरा सिंह चौहान स्नेही

फकीरा सिंह चौहान स्नेही वर्तमान में भारत सरकार रक्षा मंत्रालय के विभाग ए. एफ. एम. एस.डी लखनऊ में कार्यरत है. इनकी कहानियां संस्मरण आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मे समय-समय पर प्रकाशित होते रहे हैं.

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