हिमालय को जानने समझने व पहाड़ की समस्याओं को समझने की दृष्टि चार पीढ़ियों में विकसित हुई. एटकिंसन का हिमालयन गजेटियर (1882-86) कुमाऊं-गढ़वाल की भौगोलिक-आर्थिक और सांस्कृतिक विशिष्टता को तार्किक रूप से प्रस्तुत कर व्यापक शोध का आधार देता रहा. इस अध्ययन से यह धारणा सबल हुई कि हिमालय के पर्वत संयुक्त प्रान्त के मैदानी क्षेत्र से भिन्न हैं जिनके लिए अलग प्रशासनिक राज होना चाहिये.
एटकिंसन ने कृषि, वन, पशु पालन का आपसी घनिष्ठ संबंध चित्रित किया जिसके आधार पर वन व भूमि नीति बनी. उन्होंने जंगल, खनिज, खेती, जमीन, परिवार संचालित कुटीर व अन्य उद्योग धंधों के साथ पहाड़ के व्यापार पथ व उपपथों का वर्णन किया व यह भी निर्दिष्ट किया कि औपनिवेशिक ढांचे के राज काज में इस जानकारी का उपयोग शासन के हित में कैसे हो. उन्होंने पहाड़ के जातीय समूह, पेशेगत संरचना व भू-स्वामित्व का विवेचन किया जिससे प्रशासन की समझ में आया कि सामाजिक समूह से श्रम संसाधन व राजस्व कैसे प्राप्त करें.
पहाड़ से सैनिक भर्ती हुए क्योंकि उन्होंने पर्वतीय समाज के बारे में लिखा कि पहाड़ी शरीर से मजबूत अनुशासित व यहाँ के कठिन भूगोल के अभ्यस्त होने से हर कठिन परिस्थिति का सामना करना जानते हैं. उन्होंने हिमालय को केवल खास पहचान ही नहीं बल्कि रणनीतिक सीमा क्षेत्र के रूप में भी देखा. संसाधनों के उपयोग, आवंटन व गतिशील करने की प्रणाली औपनिवेशिक नीतियों के समर्थन में रची गई थी जिनसे वन नियंत्रित किए गये. भूमि व समाज की समझ से राजस्व वसूली के तरीके विकसित हुए व अतिरेक श्रम की आपूर्ति से सेना व कार्यालयों में भर्ती का सिलसिला चला.
एटकिंसन का लेखन शासन की नीतियों का ब्लू प्रिंट इसी कारण कहा गया क्योंकि यह पहाड़ की सामाजिक -सांस्कृतिक संरचना के साथ आर्थिकी का प्रशासनिक मानचित्र था एवम औपनिवेशिक नीतियों को संचालित करने के लिए ज्ञान का आधार. उन्होंने कुमाऊं और गढ़वाल के समाज को “स्थिर व गतिहीन” कहा क्योंकि यह सामाजिक रूप से तो स्थिर था पर आर्थिक गतिविधियों में परिवर्तन की दृष्टि से गतिशील या प्रावैगिक नहीं बन पाया. इस कारण ब्रिटिश नीति का लक्ष्य बना “शांत प्रशासन व संसाधन नियंत्रण” न कि आर्थिक विकास. समाज स्वाभाविक रूप से स्थिर था इसलिए आरम्भ में प्रशासनिक हस्तक्षेप सीमित रहे. पहाड़ में वन को प्राथमिक आर्थिक संसाधन माना गया तदन्तर उसके विदोहन की कठोर नीतियाँ बनायी गईं.
ब्रिटिश नीतियां “निम्न उत्पादकता का दुश्चक्र” बनीं क्योंकि भूमि व्यवस्था राजस्व केंद्रित बनाई जा चुकीं थीं. वन संसाधनों पर कठोर नियंत्रण था.उन्होंने अर्थव्यवस्था का विविधीकरण न होने दिया और श्रम प्रवाह से हुए प्रवास को संस्थागत बना दिया था. जब जीवन निर्वाह कृषि का ढांचा कमजोर हुआ तो उपज उत्पादन में ह्रास दिखने लगा. आय के वैकल्पिक स्त्रोत सीमित थे. ऐसे में उपभोग व बचत प्रवृति बनी नहीं. विनियोग की गुंजाईश न थी और यह घेरा चलता रहा.
औपनिवेशिक नीतियों के साथ पहाड़ की आतंरिक संरचना भी इस जाल के लिए जिम्मेदार थीं जिसमें भूमि बंदोबस्त से कृषि जीवन निर्वाह स्तर से ऊपर उठ न पाई. वन नियंत्रण से कृषि पर आधारित जल-जंगल-जमीन के समीकरण दुर्बल हुए. कृषि जंगल से जुड़ी थी. गाँव की जमीन के पास अवलम्ब क्षेत्र व फिर जंगल पर निर्भरता पर आधारित परंपरागत व्यवस्था कमजोर पड़ी तो उत्पादकता ह्रास होता गया. खेती की संरचना में छोटी जोत, परंपरागत खेती के तरीके व सीमित उद्यमिता थी. कृषि उपज कम थी उस पर उचित मूल्य न मिल पाता. स्थानीय उद्योगों के पनपने के प्रयास कमजोर थे.जोर सिर्फ संसाधन दोहन पर बना जिससे विनिर्माण का सिलसिला बन न पाया. स्थानीय रोजगार के अवसर बहुत सीमित रहे. बाजार अपूर्ण थे तो आवागमन के पथ सीमित आवाजाही-पैदल-घोड़े-खच्चर व सीमांत व्यापार में माल ढुलान भेड़,बकरी व याक की स्थानीय प्रजातियों पर निर्भर रहा. स्थानीय श्रम शक्ति का सम्यक उपयोग तो सेना भरती की ओर ही हुआ.
पहाड़ के लिए सन 1865 से 1920 की समय अवधि उस निर्णायक मोड़ पर पहुंची जब ब्रिटिश नीतियाँ बंदोबस्त व वन नियंत्रण से कठोर हो गईं.1920 के बाद ग्रामीण प्रतिरोध व वन सत्याग्रह का सिलसिला शुरू हुआ अब तक आत्मनिर्भर खेती की जगह पलायन पर आधारित संरचना जड़ पकड़ चुकी थी. आजादी के बाद भी वन नियंत्रण, उद्योग ढांचे की अनुपस्थिति, सेवा क्षेत्र पर निर्भरता बनी रही. कृषि उत्पादकता के दुर्बल होते रहने, वन नियंत्रण से परंपरागत अवलम्ब संसाधनों पर हक छिन जाने से खाने कमाने व परिवार का पेट पालने के लिए पलायन ही विकल्प रहा. ऐसी दशा में स्थानीय अर्थव्यवस्था का विविधीकरण न हो पाया. पहाड़ में निम्न उत्पादकता का जाल फैलते रहा. इनके पीछे औपनिवेशिक नीतियों का प्रपंच था.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से बीसवीं सदी के मध्य तक पहाड़ के बुद्धिजीवी वर्ग, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन विसंगतियों को खंडित करने के लिए पृथक प्रशासनिक राज की संकल्पना को तार्किक स्वरूप देने के प्रयास भिन्न-भिन्न स्तरों पर किए. इससे प्रेरणा प्राप्त कर जन आंदोलन हुए. अलग प्रशासन की सोच के पीछे एटकिंसन के तीन तर्क थे जो पृथक राज्य के समर्थकों के मूल आधार बने. इनमें पहला तो पहाड़ के भौगोलिक स्वरूप के कारण हुआ अलगाव था. दूसरा पहाड़ के जंगल, पशुपालन व सीमित खेती की विशेष आर्थिकी व तीसरा पृथक सांस्कृतिक पहचान व लोकथात रही. इससे पहाड़ के प्रति संवेदनशील लोगों में यह चेतना विकसित हुई कि पहाड़ का प्रशासन भिन्न तरीके से होना चाहिये. पहले पहल पृथक राज्य की मांग तो नहीं हुई पर विशेष प्रशासनिक इकाई की सोच उभरने लगी.
इस दिशा में चिंतन करने वाले विचारकों में पत्रकार व इतिहासकार बद्री दत्त पांडे, सामाजिक आंदोलन नेता हरगोविंद पंत, राजनीतिक प्रस्तावक अनुसूया प्रसाद, इतिहासकार व चिंतक शिवप्रसाद डबराल, कानूनी -प्रशासनिक विश्लेषक इंद्र सिंह नयाल, दया किशन पांडे एवम ऐतिहासिक साक्ष्य एकत्रित कर निष्कर्ष प्रदान करने वाले कैप्टन शूरवीर सिंह पंवार के साथ बुद्धिजीवियों व पहाड़ की जन भावना से जुड़े कई समूह रहे.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में नये उभरे शिक्षित मध्य वर्ग में बद्री दत्त पांडे ने अल्मोड़ा से शक्ति अखबार निकाला व “कुमाऊं का इतिहास” पुस्तक लिखी जिसके माध्यम से पहाड़ की पृथक पहचान को रेखांकित किया गया.वह कुली बेगार आंदोलन के अगुवा रहे. उनका सोचना भी यही था कि पहाड़ की समस्याएं मैदानों से भिन्न हैं इसलिए उनका प्रशासन स्थानीय लोगों के द्वारा होना चाहिये. अलग राज्य की चेतना को बुद्धि जीवियों के साथ जन आंदोलनों ने और सबल बनाया.कुमाऊं परिषद व सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय हरगोविंद पंत थे जिन्होंने कुली बेगार का प्रबल विरोध किया व पहाड़ी समाज को संगठित कर राजनीतिक चेतना विकसित की. उनके नेतृत्व से यह भावना उभरी कि पहाड़ के निवासी अपनी समस्याओं के समाधान के लिए संगठित हो सकते हैं व प्रशासनिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर सकते हैं.
1921 में कुमाऊं का बड़ा जन आंदोलन हुआ जिसने ब्रिटिश प्रशासन द्वारा कुली बेगार यानी ग्रामीणों से मुफ्त श्रम करवाए जाने का विरोध हुआ. महात्मा गाँधी ने इसे रक्तहीन क्रांति कहा. 1916 से 1926 की अवधि में गोविन्द बल्लभ पंत व बद्रीदत्त पांडे के नेतृत्व में कुमाऊं परिषद बनी जिसमें पहाड़ के लिए अलग विकास नीति व प्रशासनिक व्यवस्था बनाने पर बल दिया गया. 1924 में पहली बार पहाड़ी राज्य का विचार औपचारिक रूप से रखा गया. 1930 के दशक में कुमाऊं -गढ़वाल की अलग प्रशासनिक इकाई का प्रस्ताव रखने वालों में अनुसूया प्रसाद बहुगुणा थे. पहाड़ के नेताओं ने स्वायत्त इकाई की मांग की. 1938 में श्रीनगर-गढ़वाल में कांग्रेस अधिवेशन हुआ जिसमें पहाड़ी क्षेत्र की अलग पहचान स्वीकृत की गई. पहाड़ी जिलों का प्रशासन स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार किए जाने पर बल दिया गया. 1940 में हल्द्वानी में बद्री दत्त पांडे के नेतृत्व में हल्द्वानी में सम्मेलन हुआ जिसमें पर्वतीय राज्य की अवधारणा स्पष्ट रूप से सामने आई. बौद्धिक आधार बनाने वाले इतिहासकारों व चिंतकों में शिवप्रसाद डबराल मुख्य रहे. उन्होंने उत्तराखंड के इतिहास पर विस्तृत अनुसन्धान किया व स्पष्ट किया कि कुमाऊं-गढ़वाल कि ऐतिहासिक पहचान अलग रही है.
एटकिंसन के भौगोलिक अलगाव, आर्थिक विशिष्टता एवम अलग सांस्कृतिक पहचान के आधार पर पहाड़ के प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि जब पहाड़ की परिस्तिथियां भिन्न हैं तो प्रशासन का ढांचा भी अलग होना चाहिये. यह विचार धीरे-धीरे अलग राज्य की मांग में बदल गया. अलग राज्य की चेतना तीन स्तरों पर बनी. पहला किसान जिन्होंने सबसे पहले कुली बेगार का विरोध किया व अपने वन अधिकारों के हक प्राप्त करने को एकजुट हुए. दूसरा ब्रिटिश सेना में हुई भर्ती से राजनीतिक चेतना आई.तीसरा प्रवासी पहाड़ियों व शहरों व बड़े नगरों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिक्षित युवाओं ने आंदोलन का मार्ग पकड़ा.
ब्रिटिश प्रशासन व स्थानीय बुद्धिजीवियों के बीच वैचारिक मतभेद थे. ब्रिटिश अधिकारी मानते थे कि पहाड़ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है इसलिए इसे अलग प्रशासनिक इकाई के रूप में रखना चाहिये उनका उद्देश्य राजस्व नियंत्रण व सैन्य भर्ती तथा वन संसाधन प्रबंधन था लेकिन वह अलग राज्य के पक्ष में न थे. स्थानीय बुद्धिजीवियों का तर्क था कि मैदान केंद्रित प्रशासन से उनके हितों की उपेक्षा हो रही है. पहाड़ में आर्थिक वृद्धि नहीं हो रही है. ग्रामीण जीवन निर्वाह स्तर पर जीने को बाध्य हैं. इसलिए पहाड़ की समस्याओं को देखते हुए इसका समाधान पृथक राज्य होना चाहिये.इतिहास लेखन की परम्परा से हिमालय की विशिष्ट सामाजिक व आर्थिक संरचना स्पष्ट हुई, क्षेत्रीय पहचान बनी व अलग प्रशासनिक इकाई की वैचारिक जमीन बनी. इसी पृष्टभूमि में उत्तराखंड आंदोलन को बौद्धिक आधार मिला.
ब्रिटिश शासन में कुमाऊं-गढ़वाल को सामान्य प्रशासन से अलग रख विशेष प्रशासनिक कमिश्नरी बनाया गया था. यह निर्णय मात्र सुविधा का नहीं वरन हिमालय क्षेत्र की विशिष्ट परिस्थितियों पर आधारित था जिसे स्पष्ट करने के लिए वर्ष 1815 के बाद की स्थितियों को देखना पड़ेगा. जब गोर्खाओं से युद्ध के बाद अंग्रेजों को यह क्षेत्र मिला तो कुमाऊं-गढ़वाल ब्रिटिश प्रशासन के अधीन आया. यहाँ रहे कमिशनर ट्रेल,रामजे व एटकिंसन ने पाया कि पहाड़ों पर मैदानों सा प्रशासन लागू करना असंगत है. इसके कारणों में सर्वप्रथम तो हिमालय की भौगोलिक स्थिति प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती थी जिसमें अत्यधिक ऊंचाई, खड़ी ढाल, सीमित परिवहन व बिखरे हुए बसाव थे. वहीं मैदानी प्रशासनिक ढांचे में नियमित न्यायालय, पुलिस तंत्र, राजस्व प्रणाली को पहाड़ में लागू करना कठिन था इसलिए अंग्रेजों ने कमिश्नर आधारित प्रशासन बनाया.
औपनिवेशिक दृष्टि एटकिंसन की थी जिन्होंने हिमालय को सीमांत इलाके के रूप में देखा. समाज को स्थिर व पारम्परिक बताया. मैदानों में प्रशासन का मुख्य आधार भूमि से प्राप्त राजस्व था पर पहाड़ में सीढ़ी दार खेतोँ, कम उत्पादन, पशु पालन, वन संसाधनों पर निर्भरता व सीमित बाजार था. इस कारण यहाँ सामान्य राजस्व व्यवस्था लागू करना कठिन था. इस कारण आरम्भ में यहाँ कम कर एवम लचीली व्यवस्था रखी गई. पहाड़ में स्थानीय समाज की अपनी व्यवस्था बनी थीं जैसे जंगल का अपनी आवश्यकता के अनुसार उपयोग, सामुदायिक चारागाह व परंपरागत पंचायतें. ब्रिटिश अधिकारियों ने अनुमान लगा लिया कि यदि मैदानों की तरह कठोर कानून लागू किए गये तो अशांति हो सकती है. इस कारण स्थानीय प्रथाओं को अधिकतम रूप से जारी रखा गया. फिर हिमालय ब्रिटिश भारत के लिए एक सुरक्षित सीमा था जहाँ नैपाल व तिब्बत की सीमाऐं मिलती थीं. यह मध्य एशिया की राजनीति का यह बड़ा केंद्र व सैन्य भर्ती का क्षेत्र बना इसलिए प्रशासन सरल होना चाहिये. कमिश्नर प्रणाली से ब्रिटिश सरकार सीधे नियंत्रण रख सकती थी.
कुमाऊं को ब्रिटिश अधिकारियों ने एक प्रयोगात्मक प्रशासन क्षेत्र बनाया जहां कानून कम थे, स्थानीय प्रथाओं का सम्मान था व प्रशासन को अधिक विवेकाधिकार थे इसलिए इसे “अविनियमित प्रान्त” कहा गया. इसका अर्थ था कि भारत के सामान्य कानून यहाँ स्वतः लागू नहीं होते. प्रशासनिक अधिकारी परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेते थे.हेनरी रामजे (1856-1884) ने पहाड़ रहते कह दिया था कि यहाँ की स्थितियाँ इतनी अलग हैं कि मैदान सा प्रशासन लागू नहीं किया जा सकता. एटकिंसन ने अपने व्यापक सर्वेक्षण से इसे पुष्ट किया. विशेष प्रशासन व्यवस्था आगे दो महत्वपूर्ण परिणाम लाई. पहला तो यह कि पहाड़ अलग है इसलिए इसका प्रशासन भी अलग होना चाहिये अर्थात इसकी एक “क्षेत्रीय पहचान” है.बाद में बीसवीं सदी में जनमानस की आवाज उठी कि जब ब्रिटिश शासन ही पहाड़ को अलग प्रशासनिक इकाई मानता था तो स्वतंत्र भारत में भी इसे अलग राज्य होना चाहिये अर्थात यह विचार राज्य आंदोलन की वैचारिक नींव बना.
ब्रिटिश सरकार की विशेष प्रशासन व्यवस्था ने बाद में पहाड़ के आर्थिक पिछड़े पन व पलायन को आरम्भ किया. एक तरफ तो उन्होंने पहाड़ को अलग प्रशासन इकाई बनाया तो दूसरी ओर संसाधन उपयोग की ऐसी संरचना निर्मित की जिसने आर्थिक चरों की गतिविधि सुप्त ही रहीं.पहले क्रम में यह स्थिर ग्रामीण अर्थव्यवस्था बनी जो आगे चल कर विकास के लिए बाधाकारक ही बनी. पहाड़ की अर्थव्यवस्था वन आधारित मिश्रित प्रणाली पर चलती थी पर 1865 व 1878 से ग्रामीणों के वन अधिकार सीमित हुए. चराई, घास व लकड़ी पर नियंत्रण बढ़ गया. जिससे खेती व पशुपालन दोनों प्रभावित हुए. पारम्परिक अर्थव्यवस्था सीढ़ी दार खेती, पशुपालन व जंगल के उपयोग पर आश्रित थी. वन नियंत्रण के बढ़ने से यह संतुलन टूटा व कम खेती, उद्योग धंधे ठहर गये और स्थानीय रोजगार था नहीं. सैनिक भर्ती आरम्भ होने के बाद पहाड़ को “सेना के लिए भर्ती का आधार” बना दिया गया जिससे नकद आय का स्त्रोत तो बना पर आंचलिक अर्थव्यवस्था का विकास नहीं हुआ. ब्रिटिशों ने सैनिक छावनी, भव्य कोठियाँ व हिल स्टेशन बनाये. वन संसाधनों का दोहन किया पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इससे समुचित वृद्धि का आधार न मिला. इसलिए बुद्धिजीवियों ने स्पष्ट कहा कि पहाड़ की समस्याएं प्रशासनिक उपेक्षा का परिणाम हैं.
ब्रिटिश शासन से अलग प्रशासन कर पहाड़ी अर्थव्यवस्था की अलग पहचान का सच सामने आया जहां वन नियंत्रण से गांव-घर की दशा खराब हो चली थी. परंपरागत उद्योग घिसट रहे थे. रोजगार था नहीं. सैनिक भर्ती से पलायन हुआ. प्रवास, सीमित खेती व कमजोर धंधों से पृथक राज्य के आंदोलन को गति मिली.बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी व क्षेत्रीय पहचान की सोच उभरी जिसमें हिमालय को मात्र सीमांत इलाका नहीं बल्कि ऐतिहासिक सांस्कृतिक विशेषताओं से समृद्ध क्षेत्र के रूप में देखा जाने लगा. इस सोच से स्थानीय इतिहास के पुर्नलेखन, लोक थात व परम्परा के अनुरक्षण व क्षेत्रीय पहचान का पक्ष पृथक राज्य की मांग की वैचारिक पृष्ट भूमि बना.
पहाड़ के आर्थिक पिछड़ेपन को शिव प्रसाद डबराल (1904-99) ने ऐतिहासिक नीतियों से संबंधित किया. कारण यही कि वन कानूनों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने संकट उभरे थे. खेती जीवन यापन के लिए की जा रही थी. उद्योग का ढांचा पारम्परिक था और क्रय शक्ति के अभाव में बाजार सीमित . ऐसे में पलायन शुरू हुआ. इस चक्र को तोड़ने के लिए जब तक पहाड़ की स्थानिक विशेषताओं के अनुरूप नीतियाँ नहीं बनेंगी तब तक विकास संभव नहीं. यह तभी संभव है जब पहाड़ी इलाके का अलग प्रशासनिक ढांचा हो. डबराल ने कठिन भूगोल, लघु कृषि जोत, सीमित संसाधन और अलग जीवन शैली के आधार पर स्पष्ट किया कि पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां बिल्कुल भिन्न हैं व मैदानों की प्रशासनिक व विकास नीतियाँ यहाँ लागू नहीं की जा सकती उनकी यह धारणा एटकिंसन के दृष्टिकोण सी ही है.
डबराल का महत्वपूर्ण तर्क सांस्कृतिक पहचान रहा. उन्होंने अपनी विस्तृत श्रृंखला “उत्तराखंड का इतिहास” से स्थापित किया कि कुमाऊं-गढ़वाल सांस्कृतिक -ऐतिहासिक क्षेत्र है मात्र प्रशासनिक इकाई नहीं. यहाँ की राजनीतिक परंपराएं भिन्न रहीं जिनमें कत्यूरी, चंद व गढ़वाल के राजवंश रहे. ऐतिहासिक रूप से यह एक “प्राकृतिक-सांस्कृतिक इकाई” रही. प्राचीन काल में हिमालय का यह क्षेत्र “मानस खंड” व “केदार खंड” कहा गया. डबराल ने सांस्कृतिक पहचान के आधार पर स्पष्ट किया कि उत्तराखंड की लोक संस्कृति, लोक भाषा, लोकदेवता व सामाजिक तानाबाना मैदानों से भिन्न है इसलिए सांस्कृतिक संरक्षण के लिए पर्वतीय राज्य को अलग पहचान मिलनी चाहिये.
डबराल ने ऐसे पहाड़ी राज्य की संकल्पना की जो मात्र राजनीतिक नहीं सांस्कृतिक-आर्थिक पुर्नगठन की अपेक्षा करता है जिसमें स्थानीय संसाधनों, जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय जनता के अधिकार हों. ऐसी आर्थिकी जो छोटे पैमाने की हो. खेती, सब्जी, मसाले, दाल की फसलों के साथ कृषि आधारित छोटे उद्योग चलें, हस्तशिल्प व कारीगरी फले फूले. लोक थात व स्थानीय भाषाओं के संरक्षण-संवर्धन से सांस्कृतिक चेतना विकसित होती रहे. डबराल ने ऐतिहासिक अवलोकन पर आधारित क्षेत्रीय पहचान को महत्ता दी. यह हिमालय के विकास की अलग अवधारणा रही जो संस्कृति के संरक्षण की भावना उपजाती थी. इसीलिए उन्हें “उत्तराखंड की ऐतिहासिक चेतना का निर्माता” कहा जाता है. वह ऐतिहासिक एकता, भौगोलिक विशिष्टता, आर्थिक दशा व सांस्कृतिक पहचान से संबंधित सभी आयाम व तथ्यों को तर्कसंगत रूप से रखने में समर्थ चिंतक रहे. डबराल राजनीतिक आंदोलन के मुखर प्रतिनिधि नहीं थे पर उनकी सुस्पष्ट विचारधारा ने कई नेताओं को प्रभावित किया जिनसे इन्द्रमणि बडोनी व अन्य बुद्धिजीवी वर्ग प्रेरित हुआ व उत्तराखंड राज्य आंदोलन को सबल आधार मिला. हिमालय की नीतियों पर हुए चिंतन से यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक नीतियों से पहाड़ के प्रशासन व संसाधनों के उपयोग की संरचना बदली. राष्ट्रवादी सोच ने पहचान व संस्कृति के पक्ष उभारे. पर्यावरण की दृष्टि ने विकास विरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ किया.
उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी. पृथक प्रशासन से पृथक राज्य की वंशावली में कई विचारकों का योगदान रहा. उत्तराखंड राज्य की मांग अचानक नहीं आई. इसका बौद्धिक आधार 1880 से ही बनना आरम्भ हो गया था. 1900 से 1930 के मध्य सामाजिक-राजनीतिक चेतना उभरी व आगे पहाड़ के बुद्धिजीवियों, सामाजिक राजनीतिक आंदोलनों व क्षेत्रीय असमानता के निवारण के लिए सम्यक नीतियों के चुनाव को अधिमान मिला. सदियों से सांस्कृतिक एकता पर अवलंबित कुमाऊं-गढ़वाल के लिए भिन्न अवधारणा को डबराल ने वैचारिक आधार दिया जिसे राज्य आंदोलन के नेताओं में इंद्रमणि बडोनी ने संस्कृति की पहचान और क्षेत्रीय विभिन्नता की दृष्टि से राज्य आंदोलन का आधार बनाया. उन्हें उत्तराखंड राज्य आंदोलन का जनक कहा गया.1970 के दशक के बाद यह प्रश्न उभरा कि क्या विकास की मौजूदा नीतियाँ हिमालय के लिए उपयुक्त हैं? इस दौर में चिपको आंदोलन उभरा जो परिस्थितिकी व समाज की संसाधन की लूट के खिलाफ आवाज बुलंद कर गया.
ब्रिटिश वन नीति ने पहाड़ की आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को दुर्बल किया जिससे दीर्घकालीन प्रवास का घेरा फैलता गया. उत्तराखंड से पलायन, दमन कारी वन नीति व औपिनेशिक राज काज पर शेखर पाठक ने महत्वपूर्ण व सार गर्भित पुस्तक-पुस्तिकाऐं लिखीं जो शोध एवं सन्दर्भ की दृष्टि से उपयोगी होने के साथ उत्तराखंड आंदोलन के चरमोत्कर्ष व उसके बाद की स्थितियों का संतुलित दृष्टिकोण उपजाने में सार्थक भूमिका प्रस्तुत करती रहीं. “पहाड़” पत्रिका के माध्यम से पहाड़ की अद्यतन समस्याओं व सांस्कृतिक-राजनीतिक-सामाजिक व आर्थिक पड़ताल करने वाले चिंतकों, वैज्ञानिकों व लेखकों का समूह हिमालयी परिदृश्य का जीवंत दस्तावेज बन गया. रामचंद्र गुहा पर्यावरण इतिहासकार रहे जिन्होंने हिमालयी समाज व वन नीति का अध्ययन करते हुए स्पष्ट किया कि औपनिवेशिक वन नीति ने सामुदायिक संसाधन प्रबंध को समाप्त किया. इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ी.
पर्यावरण अर्थशास्त्री व परिस्थितिकी विशेषज्ञ माधव गाडगिल के अनुसार केंद्रीकृत वन नीति टिकाऊ नहीं बनी. हिमालय क्षेत्रों का विकास व संसाधन उपयोग स्थानीय समुदाय की अपेक्षाओं के अनुरूप ही होना चाहिये. अनिल अग्रवाल पर्यावरण नीति विशेषज्ञ रहे जिन्होंने भारत के दुर्लभ प्राकृतिक संसाधनों व आर्थिक विकास की पर्यावरण समस्याओं पर लगातार लेखन किया. उन्होंने “डाउन टु अर्थ “पत्रिका के माध्यम से हिमालय की समस्याओं के साथ स्थानीय संसाधन व स्थानीय समुदायों की सहभागिता को केंद्र में रख विकास व पर्यावरण नीति के अध्ययन को महत्वपूर्ण माना.
हिमालयी इकोतंत्र व विकास विशेषज्ञ जयंत बंधोपाध्याय के अनुसार हिमालय के विकास प्रारूप मैदानी विकास प्रारूपों से भिन्न होने चाहिये. पर्यावरण के हित चिंतन के साथ क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था की प्रगति गतिशील की जानी सम्भव होगी. बी एम भाटिया अर्थशास्त्री व नीति विश्लेषक रहे. खाद्य नीति व खेती के विकास में उनकी शोध महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने हिमालय की कृषि उत्पादकता पर विमर्श किया व छोटी जोत व सीमित संसाधनों की समस्याओं को सुलझाने हेतु नीतियाँ सुझायीं. उन्होंने यह प्रमाणित किया कि पहाड़ जीवन निर्वाह कृषि के स्तर में सिमट गया है.
प्रखर भौतिक वैज्ञानिक डॉ डी डी पंत कुमाऊं विश्व विद्यालय के कुलपति एवम उच्च शिक्षा निदेशक रहे. उन्होंने हिमालय के विकास में शिक्षा की गुणात्मक संवृद्धि को प्राथमिकता दी. वैज्ञानिक सोच के द्वारा स्थानीय अर्थव्यवस्था व मानव संसाधन प्रबंध की सम्भावनाएं सामने रखीं. पृथक राज्य हेतु उत्तराखंड में राजनीतिक चेतना के प्रस्फुटन में योगदान दिया. उनके विचार में पहाड़ में प्रगति ज्ञान आधारित व स्थानीय संसाधनों के विवेकशील उपयोग द्वारा संभव होगी.
पहाड़ की समस्याओं के समाधान में अमिता बाविष्कर सामुदायिक संसाधनों के प्रबंधन, पर्यावरणीय न्याय व विकास प्रारूपों की पुनर्व्याख्या पर जोर देती रहीं. शेखर पाठक ने पारम्परिक ज्ञान की महत्ता के साथ पर्यावरण को इतिहास, समाज व लोकजीवन के संदर्भ में देखा. आर्थिक विशेषज्ञ स्थानीय संसाधनों व तकनीक के उपयोग, जैविक कृषि व जल प्रबंधन को पहाड़ के विकास की नीतियों में सम्मिलित करने को प्राथमिक मानते रहे तो शिव प्रसाद डबराल ने इतिहास से सीख ले कर नीति निर्माण को सर्वोपरि समझा.
पहाड़ के विकास पर मुख्यतः दो दृष्टिकोण रहे जिनमें पहला औपनिवेशिक व पारम्परिक विकास की नीति पर चला जहां पहाड़ को संसाधन क्षेत्र माना गया व विकास को वाहय विनियोग. वैकल्पिक हिमालयी विकास नीति को प्राथमिकता देने वाले विद्वानों के अनुसार इसे स्थानीय संसाधन आधारित अर्थ व्यवस्था बनाना होगा जहाँ समुदाय आधारित वन प्रबंध हों, छोटे व लघु कुटीर उद्योग धंधे विकसित हों. सेवा क्षेत्र का विस्तार व विकेंद्रित विकास हो. इतिहासकारों और विकास अर्थशास्त्रियों में यह बहस रही कि ब्रिटिश राज से पहले पहाड़ की अर्थव्यवस्था काफी हद तक आत्मनिर्भर थी पर यह पूरी तरह से अलग-थलग या बंद नहीं थी. पारम्परिक पहाड़ी अर्थव्यवस्था का ढांचा मिश्रित कृषि प्रणाली का था जो जीवन निर्वाह के लिए था बाजार के लिए नहीं. कृषि पूरी तरह से जंगल से जुड़ी थी जिससे एक स्थानीय परिस्थितिकी व्यवस्था बनती थी. स्थानीय शिल्प व कुटीर उद्योग थे. जजमानी प्रणाली थी तिब्बत से सीमित पर महत्वपूर्ण व्यापार होता था. सामुदायिक संसाधन प्रबंध था जिसका आधुनिक स्वरूप कुमाऊं पंचायत फारेस्ट रूल 1931 के अंतर्गत वन पंचायत में दिखा. ब्रिटिश नीति के जंगल नियंत्रण, कर प्रणाली के बदलाव व बाजार अपूर्णताओं के बढ़ने से जीवन निर्वाह व्यवस्था कमजोर पड़ती गई. स्थानीय कला कौशल व शिल्प कमजोर पड़े व वाहय रोजगार पर निर्भरता बढ़ी. पलायन होता रहा.
इतिहासकार मानते हैं कि ब्रिटिश शासन से पहले पहाड़ की अर्थव्यवस्था पूरी तरह समृद्ध नहीं थी पर वह स्थानीय साधनों पर निर्भर संतुलित प्रणाली थी. औपनिवेशिक नीतियों ने इस संतुलन को खंडित कर दिया और पहाड़ को संसाधन आपूर्ति व प्रवासन क्षेत्र में बदल दिया. अमिता बाविष्कर ने राज्य और विकास नीतियों को खनन और वन विदोहन से स्थानीय समाज पर पड़ने वाले नुकसान का जिम्मेदार बताया. शेखर पाठक ने औपनिवेशिक वन नीति व उसके बाद राज्य नीतियों की आलोचना की व तर्क दिया कि ब्रिटिश काल से ही पहाड़ के संसाधनों पर वाहय नियंत्रण बढ़ गया. डबराल स्थानीय समाज को सांस्कृतिक व ऐतिहासिक निरंतरता का आधार मानते रहे . उनका ऐतिहासिक विवेचन था कि हिमालयी समाज की अर्थव्यवस्था स्थानीय संसाधनों व सामुदायिक व्यवस्था पर आधारित थी. राज्य की नीतियों ने पारंपरिक व्यवस्था को धीरे धीरे कमजोर कर दिया.
अमिता बाविष्कर ने पर्यावरणीय समाजशास्त्र व राजनीतिक परिस्थितिकी के द्वारा स्पष्ट किया कि पर्यावरण की समस्याएं केवल प्राकृतिक या परिस्थितिक संकट नहीं होतीं वरन सत्ता द्वारा संसाधनों के नियंत्रण व विकास नीतियों से इनका गहन संबंध होता है. विकास की मुख्य धारा की नीतियों में खनन, बांध व वन नीतियाँ स्थानीय समाज व प्रकृति के बीच के संतुलन को तोड़ देती हैं. इससे स्थानीय समुदाय विस्थापित होते हैं. प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य व सरकार का नियंत्रण बढ़ता है. स्थानीय जनों की पारम्परिक जीवन निर्वाह दशा दुर्बल हो जाती है.
पर्यावरण बचाने के प्रतिरोध. वास्तव में जनता के अधिकार के संघर्ष हैं. जल-जमीन-जंगल पर राज्य का अंकुश रहने से स्थानीय समुदायों का परंपरागत अधिकार समाप्त होता है. स्थानीय अधिकार नहीं रहता. हिमालय की अर्थव्यवस्था में वन कानूनों के कारण ग्रामीणों की आजीविका छिनी. इससे आर्थिक संकट उभरे. परिवार के गुजारे के लिए गांव से बाहर जा कर आय कमाने के अलावा कोई विकल्प न बचा जिससे पलायन होता रहा. चिपको जैसे आंदोलन में महिलाऐं, खेतिहर व सारा ग्रामीण समुदाय केवल पेड़ ही नहीं बचा रहे थे बल्कि अपनी जीविका की रक्षा भी कर रहे थे. यह संघर्ष सामाजिक न्याय व पहचान का था. पहाड़ की अर्थव्यवस्था को समझने के लिए संसाधनों पर अधिकार, स्थानीय समाज की भूमिका व विकास नीतियों का सामाजिक प्रभाव देखना जरुरी है. पर्यावरण सांस्कृतिक व सामाजिक पहचान से जुड़ा पक्ष है इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों के स्थानीय समुदाय की भागीदारी, प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार,पारम्परिक ज्ञान के उपयोग व छोटे पैमाने के उद्योग विकास व सेवा संरचना का आधार जरूरी बना.
उत्तराखंड के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ संसाधन सीमित हैं. परिस्थितिकी संवेदनशील है व स्थानीय ज्ञान समृद्ध है.पर्यावरण के संघर्ष केवल पेड़-पौंधों की रक्षा का प्रश्न ही नहीं बल्कि संसाधनों के नियंत्रण एवम सत्ता के वितरण के प्रश्न हैं. पहाड़ में जंगल पर अधिकार, जल संसाधनों के उपयोग, विकास योजनाओं से विस्थापन व स्थानीय आजीविका बनाम राज्य नीतियों के विरुद्ध जो संघर्ष किये वह पर्यावरणीय न्याय के आंदोलन बने.
राजनीतिक परिस्थितिकी से हिमालय में हुए प्रतिरोधों की समझ मिलती रही. चंडी प्रसाद भट्ट ने चिपको आंदोलन में जंगल के संरक्षण व ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सहभागिता के साथ गौरा देवी के साथ उठ खड़ी हुई स्त्री शक्ति के संबंध को महत्वपूर्ण समझा व कहा कि स्थानीय समाज जंगल को आजीविका का बुनियादी आधार मानता था जबकि राज्य व प्रशासन उसे राजस्व का स्त्रोत समझते रहे. यह तो संसाधन नियंत्रण का संघर्ष था. सुंदरलाल बहुगुणा ने वनों के व्यवसायिक दोहन व बड़े बांधों का विरोध कर सन्देश दिया कि राज्य व बाजार की परियोजनाएँ स्थानीय समाज ही नहीं पूरे इको तंत्र का विनाश करने पर तुलीं हैं. शेखर पाठक ने संसाधनों पर स्थानीय अधिकार की वकालत की तथा लोक, इतिहास व स्थानीय ज्ञान के आपसी संबंधों पर विस्तृत अध्ययन किया. यह सांस्कृतिक-राजनीतिक पर्यावरण की अवधारणा बनी. पर्यावरण को सत्ता संसाधन व विकास नीति के सन्दर्भ में देखे जाने से स्पष्ट होता है कि पर्यावरण के संकट अक्सर राज्य व बाजार के संकट से उत्पन्न होते हैं यहाँ पर्यावरणीय न्याय व राजनीतिक इकोतंत्र के साथ सामुदायिक संसाधन प्रबंध की महत्ता स्पष्ट होती है.
उत्तराखंड में 1990 के दशक से जो बौद्धिक विमर्श उभरा उसमें पृथक राज्य का आंदोलन, वन अधिकार व हिमालयी विकास नीति में प्रश्न केवल संसाधनों के संरक्षण का नहीं बल्कि आर्थिक राजनीतिक संरचना के ढांचे का भी था. इसमें एक ओर राजनीतिक पारिस्थितिकी थी जिससे प्राकृतिक संसाधनों व सत्ता संरचना के संबंध को समझा जाना सम्भव हुआ. दूसरा पर्यावरणीय न्याय जिससे यह अनुभव हुआ कि विकास की कीमत कौन चुकाता है व तीसरा स्थानीय ज्ञान का महत्व अर्थात पारम्परिक पहाड़ी अर्थव्यवस्था को केवल पिछड़ा न मान उसे सतत मॉडल के रूप में देखना.
(जारी)
जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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