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अहंकार ही है हमारा सबसे चालाक दुश्मन

जीवन में हमारे जितने भी शत्रु हैं, उनमें सबसे खतरनाक वह है जो दिखता नहीं. जो सामने आकर वार नहीं करता. जो इतनी चालाकी से काम करता है कि हम उसे पहचान ही नहीं पाते. और जब तक पहचानते हैं, तब तक वह अपना काम कर चुका होता है. यह शत्रु बाहर नहीं है. यह हमारे भीतर रहता है. इसका नाम है – अहंकार.

अहंकार के बारे में एक बड़ी गलतफहमी है. हम सोचते हैं कि अहंकारी वह होता है जो अकड़कर चलता है, जो सबको नीचा दिखाता है, जो हमेशा अपनी बड़ाई करता है. लेकिन यह अहंकार का सबसे स्थूल रूप है. असली अहंकार बहुत सूक्ष्म होता है. वह इतने कोमल रूपों में आता है कि हम उसे पहचान नहीं पाते.

कभी वह प्रेम का रूप लेता है. हम कहते हैं – मैं उसके लिए इतना करता हूँ, पर वह समझता ही नहीं. यहां प्रेम कम है, अपेक्षा अधिक है. और अपेक्षा अहंकार की ही संतान है. कभी वह स्वाभिमान बनकर आता है. हम कहते हैं – मैं किसी के आगे झुकूंगा नहीं. यह स्वाभिमान है या अकड़ – यह प्रश्न हम खुद से नहीं पूछते. कभी वह सिद्धांत का चोला पहन लेता है. हम अपनी ज़िद को मूल्य कहने लगते हैं. अपनी असहमति को साहस कहते हैं. और इस तरह अहंकार हमारे सबसे पवित्र लगने वाले भावों में छिपकर बैठ जाता है.

वेदांत कहता है कि अहंकार वह भ्रम है जिसमें हम अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर एक सीमित पहचान से जुड़ जाते हैं. मैं यह शरीर हूं, मैं यह नाम हूं, मैं यह पद हूं, मैं यह सफलता हूं – यही तो अहंकार है. और जब यह पहचान खतरे में पड़ती है, तब मन तुरंत रक्षात्मक हो जाता है. तर्क करने लगता है, लड़ने लगता है, या चुप होकर भीतर से टूटने लगता है. अहंकार का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह हमें दूसरों से नहीं, खुद से काटता है. जब अहंकार प्रबल होता है तब हम सुन नहीं सकते. हम बस सुनाना चाहते हैं. हम सीख नहीं सकते. हम बस सिखाना चाहते हैं. झुक नहीं सकते. भले ही झुकना सही हो. हम बस झुकाना चाहते हैं. और इस कठोरता में हमारे रिश्ते टूटते हैं, हमारे अवसर हाथ से जाते हैं और भीतर एक गहरा अकेलापन जन्म लेता है.

अहंकार की एक और चाल है जो बहुत कम लोग पहचान पाते हैं. वह हमें दूसरों की पीड़ा के प्रति अंधा बना देता है. जब हम अपनी पहचान में इतने डूबे होते हैं, तब हमें केवल अपना दुख दिखता है, अपनी ज़रूरत दिखती है. दूसरे का दर्द, दूसरे की मजबूरी, वह हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती है. और तब हम रिश्तों में होते हुए भी अकेले होते हैं. साथ होते हुए भी दूर होते हैं. यही अहंकार की सबसे बड़ी त्रासदी है कि वह हमें भीड़ में भी एकाकी बना देता है. इसीलिए जो व्यक्ति अहंकार को गलाने लगता है, उसके रिश्ते गहरे होने लगते हैं. उसके आसपास के लोग सहज महसूस करने लगते हैं. क्योंकि तब वह केवल अपने लिए नहीं, दूसरे के लिए भी जगह बनाता है.

तो इससे मुक्ति कैसे? पहला कदम है पहचानना. जब भी भीतर कोई तीव्र प्रतिक्रिया उठे, एक क्षण रुककर पूछिए कि यह मेरा सत्य है या मेरा अहंकार? यह छोटा सा प्रश्न बहुत बड़ा परिवर्तन ला सकता है. दूसरा कदम है ध्यान और साक्षी भाव. जब हम अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को देखने लगते हैं, तब अहंकार की पकड़ धीरे-धीरे ढीली होने लगती है. क्योंकि जो देख रहा है, वह अहंकार से परे है. और तीसरा कदम है – सेवा और कृतज्ञता. जब हम दूसरों के लिए निःस्वार्थ भाव से कुछ करते हैं, जब हम जीवन में मिली हर छोटी बड़ी चीज़ के लिए आभारी होते हैं, तब अहंकार की जड़ें कमज़ोर पड़ने लगती हैं. क्योंकि कृतज्ञता और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते. अहंकार को मारना नहीं है. उसे समझना है. क्योंकि जिस दिन हम उसे पहचान लेते हैं उसी दिन वह कमज़ोर पड़ने लगता है.

सुन्दर चन्द ठाकुर

सुन्दर चन्द ठाकुर

कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे. सुन्दर ने कोई साल भर तक काफल ट्री के लिए अपने बचपन के एक्सक्लूसिव संस्मरण लिखे थे जिन्हें पाठकों की बहुत सराहना मिली थी.

इसे भी पढ़ें: बातें करके लोगों का दिल कैसे जीतें

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