Default

एक ‘युवा’ एथलीट जिनकी उम्र 92 वर्ष है!

आम तौर पर एक उम्र के बाद व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त, बेबस और लाचार हो जाते हैं. लेकिन अल्मोड़ा नगर के निवासी लक्ष्मण सिंह ऐठानी ने 92 वर्ष की उम्र में उत्साहपूर्वक एथलेटिक्स स्पर्धाओं में भाग लेते हैं. अजमेर  में आयोजित 7वीं नेशनल मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप (30 जनवरी से 2 फरवरी 2026) में भाग लेने के साथ ही दो स्वर्ण और एक रजत पदक जीत उन्होंने साबित कर दिया कि सकारात्मक सोच तथा सक्रिय जीवन व्यतीत कर चिरकाल तक युवाओं जैसी चुस्ती-फुर्ती बनाये रख सकते हैं. 35 साल से ज्यादा उम्र के हजारों खिलाडियों की भागीदारी वाले इस राष्ट्रीय आयोजन में 90 प्लस वर्ग में 100 मीटर की दौड़ 22.48 सेकंड में पूरी करके वह प्रथम स्थान पर रहे जबकि 200 मीटर दौड़ में दूसरा स्थान हासिल किया. इसके अलावा शॉट पुट में भी उन्होंने गोल्ड मैडल जीता. 

ऐठानीजी को मलाल है कि वह 200 मीटर दौड़ में स्वर्ण पदक से चूक गये. लेकिन उन्होंने जिन हालातों में राष्ट्रीय खेलों में भाग लिया उन्हें जान कर किसी को भी हैरानी हो सकती है. इससे पहले नवम्बर 2025 में आयोजित हुए उत्तराखण्ड मास्टर्स चैंपियनशिप में भाग लेकर ऐठानीजी ने उपरोक्त तीनों स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक हासिल किये थे. लेकिन उसी बीच उनकी पत्नी (80 वर्षीय) का स्वास्थ्य अचानक ख़राब हो गया जिन्हें दिल्ली के अस्पताल में भर्ती करना पड़ा. जिस वक़्त राष्ट्रीय खेलों के लिये चयन होने की सूचना मिली वह अस्पताल में भर्ती अपनी पत्नी की तीमारदारी में लगे हुए थे. बच्चों ने जोर दिया कि आपको ज़रूर खेलने जाना है और माताजी की देखभाल हम कर लेंगे. ऐसे में तैयारी और रिहर्सल कहाँ से होता? पत्नी का मार्च के महीने में देहान्त हो गया.

इन दिनों ऐठानीजी अल्मोड़ा नगर के चौसार मोहल्ले में स्थित अपने मकान में अकेले ही रहते हैं जहाँ मेरी उनसे 10 मई (2026) को भेंट हुई. उन्होंने आत्मीयता से स्वागत किया और उत्साह के साथ बातचीत की. उनके चेहरे पर न तो अधिक उम्र के कारण चिंता या निराशा दिखी न पत्नी की हाल में हुई म्रत्यु के कारण दुःख या अवसाद. बैठक का कमरा उनको मिले पदकों, प्रमाणपत्रों और स्मृति-चिन्हों से सुसज्जित था. इन्हें दिखाते समय उनमें गज़ब का उत्साह और आँखों में चमक दिखी. जीवन के शतक के करीब पहुँच रहे किसी इंसान में इनका दिखना सच में आश्चर्यजनक है.

लक्ष्मण सिंह ऐठानी

बात-चीत में लक्ष्मण ऐठानी जी ने बताया कि उनका जन्म बागेश्वर ज़िले के ऐठाण गाँव में हुआ जो सरयू नदी के किनारे स्थित है. यहीं उनका बचपन बीता. कपकोट से हाईस्कूल पास करने के बाद अल्मोड़ा आकर गवर्नमेंट इंटर कॉलेज से 1953 में इंटर, 1955 में बी.ए. और फिर बी.टी. पास किया. विद्यार्थी जीवनकाल से ही खेलों में गहरी रूचि थी. अल्मोड़ा डिग्री कॉलेज में वॉलीबॉल के कप्तान भी रहे. बेरीनाग कस्बे में अध्यापक के रूप में पहली नियुक्ति (1958-62) हुई तो पीटीआई के पद पर न होते हुए भी वहाँ छात्रों को खूब प्रशिक्षित तथा प्रोत्साहित किया. उनकी मेहनत और लगन का ही फल था कि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थी साधनों के अभाव के बावजूद जिला व प्रदेश स्तरों की खेल स्पर्धाओं तक पहुँच पाये. इसके बाद ऐठानीजी का चयन लोक सेवा आयोग से शिक्षा अधिकारी के पद पर हो गया. जोशीमठ, अल्मोड़ा, नैनीताल, भीमताल, पिथोरागढ़ (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) इत्यादि जगहों में सेवा करते हुए दिसम्बर 1992 में बाराबंकी के जिला बेसिक शिक्षा शिक्षा अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हो गये.

ऐठानीजी ने बताया कि जब वे अल्मोड़ा में पढ़ते थे तब कपकोट से अल्मोड़ा की 44 मील की दूरी अन्य बच्चों के साथ एक ही दिन में पैदल तय करके आते-जाते थे. उन दिनों मोटर रोड नहीं बनी थी. माँ का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने तथा पिता के घर से दूर होने की वजह से पढ़ाई के साथ साथ घर, खेती, मवेशियों आदि से सम्बन्धित कामों को भी करन पड़ता था. पिताजी सेना में होने के कारण बहुत अनुशासन पसंद थे. वह कहते, “तुम्हें अगर नौकरी करनी है तो रूपये कमाने के लिए नहीं, नाम कमाने के लिये करना.” यह भी कहा करते कि नाम कमाने में समय लगता है लेकिन बदनाम होने में नहीं लगता. पिता की यह सीख हमेशा मन में रही इसलिये जिंदगीभर ईमानदारी और निस्वार्थ सेवा का भाव रखा.

ऐठानीजी कहते हैं, “कभी निष्क्रिय नहीं बैठा.” रिटायरमेंट के बाद भी ज़िन्दगी में हमेशा किसी न किसी उपयोगी गतिविधि में लगे रहना उनकी सेहत का एक रहस्य है. दूसरी महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने बतायी वह है सकारात्मक और आशावादी सोच. “मैं कभी निराश नहीं होता और न उम्र को बाधक समझता हूँ.” वह नित्य ही सुबह जल्दी उठ जाते हैं. सुबह उठते ही गर्म पानी और काढ़ा पीने के अलावा सुबह-शाम दूध में हल्दी मिलाकर अवश्य पीते हैं. हरी सब्जियां खूब खाते हैं. तली-भुनी चीजों से परहेज करते हैं. हल्का व्यायाम, किचन गार्डन में काम करना और पैदल घूमना-फिरना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं. इसके साथ ही निस्वार्थ सेवा उनको अच्छा लगता है. “कोई काम मुझे सौंप दिया जाता है तो पूरा होने तक लगे रहता हूँ.” 

अंत में, सामाजिक बदलावों के बारे में चर्चा करने पर कहते हैं कि आज बहुत कम दूर भी लोग पैदल चल कर नहीं जाते. आज के बच्चे शारीरिक गतिविधि/खेलकूद के बजाय मोबाइल/टीवी में लगे रहते हैं. कोई बच्चा खेलता नहीं दिखता. मोबाइल से, खासकर बच्चों को, फायदा कम नुकसान ज्यादा है. पहले आपसी मेल-मिलाप ज्यादा था लेकिन आज व्यक्ति भौतिकतावादी और अपने तक सीमित हैं जिन्हें दूसरों के सुख-दुःख से मतलब नहीं रहता. आज के दौर की जीवनशैली और आदतों के नतीजे हम अनुभव कर रहे हैं. ऐसे में लक्ष्मण सिंह ऐठानी से बहुत कुछ सीख सकते हैं.

-कमल जोशी

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम

हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं. तस्वीरें खिंचती हैं, अभियान…

5 days ago

हरेले के रंग में पहाड़ : फोटो निबन्ध

आज उत्तराखंड का लोक पर्व हरेला है जो हरियाली और प्रकृति से जुड़ा है. हरेले…

5 days ago

अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत

आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…

1 week ago

खड़कमाफी के जीवन में एक दशक से विचरते एकदंत गजराज

खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया…

1 week ago

क्या उत्तराखंड, पारिस्थितिक वहन क्षमता को लागू कर सकता है?

हाल ही में मेरी उत्तराखंड यात्रा, हरिद्वार, मसूरी, देहरादून और टिहरी, ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि…

4 weeks ago

रिंगाल आधारित शिल्प : उत्तराखण्ड का एक परम्परागत कुटीर उद्योग

उत्तराखण्ड की पर्वतीय संस्कृति में प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरा और आत्मीय संबंध दिखाई…

1 month ago