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नारायण सिंह थापा: बन्दूक से कैमरा तक का सफर

जब एन.एस. थापा की पहली डॉक्युमैन्ट्री फिल्म देखी मैं 10-11 साल का था और कैलेन्सी हाईस्कूल मथुरा में कक्षा 6 का छात्र था. गांव लौटने पर फिल्में दूर हो गई. फिर कालेज में आने पर बालीवुड या हालीवुड फिल्मों से पहले जो फिल्म प्रभाग की डॉक्युमैन्ट्री दिखाई जाती थी, उनमें अक्सर निर्माता निर्देशक के रूप में एन.एस. थापा का नाम होता था. इन डॉक्युमैन्ट्रीज की क्षमता और संदेश का कायल होना स्वाभाविक था. थापा नाम से तब भी नेपाली या नेपाली मूल के व्यक्ति का अनुमान होता था.

एन. एस. थापा

फिर जब उत्तराखण्ड और हिमालय के इतिहास पर काम करने लगा, यहां की समाज-संस्कृति , आर्थिक, पर्यावरण और सामाजिक आन्दोलनों में दिलचस्पी बढ़ी और कुछ काम करने की ठानी तो जो नाम सामने चमके उनमें एन.एस. थापा भी थे. 1995 से, जब एक प्रकार से फिल्म डिवीजन भी डॉक्युमैन्ट्रीज का सक्रिय युग समाप्त हो चुका था. मैंने एन.एस. थापा की खोज शुरू की. थापा के कारण उनके कही नेपाल में होने कर संभावना लगती थी. दिल्ली, मुम्बई और काठमाण्डू के मित्रों से पत्राचार शुरू किया. हिमाल के संपादक कनकमणि दीक्षित को भी पत्र डाला. उनका उत्तर आया कि नेपाल में एन.एस. थापा तो हैं पर डॉक्युमैन्ट्री मेकर थापा नहीं है. वे शायद बम्बई में हैं. और वे नेपाली नहीं भारतीय हैं.

मैंने पुनः मुम्बई के कुछ मित्रों को और फिल्म डिविजन को पत्र डाला. उत्तर सिर्फ अर्जुन सिंह गुसाई का आया. वे बीमार थे पर पत्र देने में तनिक भी देर नहीं की. गुसाई जी ने लिखा कि थापा उनके मित्र रहे हैं और उनका पता भेजा 3-बी, अजन्ता एपार्टमेंट्स, एम.एल. डहुनाकर रोड़, मुम्बई-261 दरअसल या पेडर रोड के पास स्थित था. लता मंगेशकर के घर के बिल्कुल करीब. इस तरह 1999 में मैंने विधिवत श्री थापा को पहला पत्र भेजा. 2 माह तक उत्तर का इन्तजार किया. फिर एक पत्र और डाला. 1999 के अंतिम माह में थापा जी का पत्र आया कि वे तो अमेरिका चले गये थे और ये पत्र घर पर पड़े थे. आकर देखा तो उत्तर दे रहा हूं.

मैं उछलने लगा कि आखिर मैंने उन्हें ढूंढ लिया. मैंने तत्काल उन्हें पत्र के साथ पहाड़ के अंक, हम जो कुछ कर रहे हैं उसका विवरण भेजा और कुछ लिखने का आग्रह किया. वे मेरे पत्र मिलने के बाद खुश और आश्चर्यचकित तो हुये पर कुछ लिखने में उन्होंने दिलचस्पी नहीं दिखाई. वे दूसरे पत्र के साथ पहाड़ के आजीवन सदस्य बन गये. उन्होंने यह भी लिखा कि वे नेपाल से नहीं पिथौरागढ़ जिले के दूरस्थ गांव से हैं.

अगले पत्र में गांव का नाम पूछा तो उनका उत्तर आया कि मढ़ मनाले उनका गांव है. सौभाग्य से हम उस गांव में पहले गये थे और वहां से ध्वज मन्दिर भी. पर पिथौरागढ़, अल्मोड़ा या नैनीताल में रहते हुए कभी यह नहीं जाना कि थापा इस गांव के हैं.

बाद के पत्रों में लगातार उनसे अपने संस्मरण, संघर्ष गाथा आदि लिखने का आग्रह करता रहा. पर वे इन्कार करते थे और लिख देते थे कि मेरा जीवन मामूली सा है, कोई उपलब्धियां नहीं हैं आदि-आदि. उनकी निरन्तर मनाही के बाद ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया कि उनका जीवन हमारा भी है और उनके संघर्ष नयी पीढ़ी की अमानत. मढ़ मनाले से मुम्बई या सेना से सैल्यू लाइड तक की गाथा प्रेरक अवश्य होगी. उसे उगाजर होना चाहिए. हम उनके जीवन और रचनात्मकता को जानने के हकदार हैं. यह पत्र काम कर गया और उन्होंने सहजता से यह भी बताया कि एक बार उन्होंने अपने संस्मरण लिखने भी शुरू किये थे पर फिर छोड़ दिये. अब फिर कोशिश करेंगे.

21 मई 2000 के पत्र में थापाजी ने लिखा कि यदि उनके स्वास्थ्य ने सहयोग दिया तो वे साल के अन्त तक अपने संस्मरण लिखकर भेज देंगे. कुछ ही समय में चंदन डांगी बम्बई जाकर उनसे मिल आये और मैं और चंदन डांगी उनके दूसरे और तीसरे बेटे हो गये. (मेरी पहली और अन्तिम मुलाकात तो उनसे 2004 में उनकी आत्मकथा के विमोचन के समय ही हो सकी) 2001 के प्रारम्भ में हमारे हाथ में उनकी आत्मकथा का पहला ड्राफ्ट आ गया, जिसे अगले 6 माह में हमारे अनेक मित्रों द्वारा पढ़ा गया. सुझाव आये और प्रारम्भिक समीक्षाएं भी. हमने इन सबको उन्हें भेज दिया. कुछ सुझाव उन्हें पसन्द आये और उन्होंने उन्हें माना और कुछ को खारिज कर दिया. उन्होंने लिखा कि शब्द आपके भीतर से आने चाहिए शब्दकोश से नहीं. बहुत सारे सुझाये शब्द या भावाभिव्यक्ति को बदलने से उन्होंने इन्कार कर दिया पर जहां पर कथाक्रम टूट रहा था, वह उन्होंने भरने का प्रयास किया. फिर फोटो भी आ गई. फिल्म डिवीजन के एन.वी.के. मूर्ति ने भूमिका लिख दी.

इस तरह हमारे सुझाव को मानते हुए उन्होंने किताब को ‘द बाय फ्राम लम्बाटा’ शीर्षक देना स्वीकार किया. सन 2000 में किताब प्रकाशित हो गई और हम किताब का विमोचन उनके सार्वजनिक अभिनंदन के साथ पिथौरागढ़ में करना चाहते थे. उनका स्वास्थ्य ठीक न था पर वे पत्रों में लिखते थे कि इस साल (2000) वे पहाड़ आयेंगे और तभी किताब का विमोचन होगा. पर ऐसा नहीं हो सका. 2004 में हमने निश्चय किया कि उनके स्वास्थ्य को देखते हुए मुम्बई से बाहर विमोचन की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए और शीघ्र मुम्बई में विमोचन होना चाहिए.

अन्ततः मई 2004 में यह संभव हुआ.मुम्बई के फिल्म्स डिविजन के सभागार में छोटे पर आत्मीय समारोह में प्रसिद्ध फिल्मकार श्याम बेनेगल ने किताब का विमोचन किया और कहा कि मुझे काम की तमीज सिखाने और अनुशासित करने में नारायण का हाथ रहा. थापा जी थोड़ा बोले उनकी आंखें गीली हो गई. उनके अनेक सहयोगियों ने वे आत्मीय संस्मरण सुनाये, जिनसे थापा जी की ऊंचाई बढ़ती जाती थी. यही उनसे पहली मुलाकात थी.

जब मुम्बई में उनके फ्लैट में चन्दन और मैं पहुंचे तो वे बहुत देर से बैठक में हमारा इन्तजार कर रहे थे. व्हील चेयर छोड़कर सोफे में बैठ गये थे. उनकी खुशी देखने लायक थी और हमारे हाथों को उन्होंने जिस तरह अपने हाथों में लिया वह दुर्लभ-सा अनुभव था. फिर वे हमारे हाथों के सहारे उठे और उनकी अङवाल आत्मीयता और प्यार से भरी थी. देवी जी (श्रीमती थापा) यह सब देखकर आश्चर्यचकित थी. चुप, निर्मम, अपने काम में हर समय डूबे थापा का यह रूप उन्होंने शायद पहली बार देखा था.

फिर हम बहुत देर उनके साथ बैठे रहे. शाम को ही हमें लौटना था. उनका चेहरा प्रमुदित और आंखें गीली थी. उन्होंने 1-2 दिन रुकने को कहा और यह इच्छा जताई कि स्वास्थ्य ठीक रहा तो पहाड़ों में आऊंगा. मैंने व्यस्ततम सालों में भी साल में एक बार अपने गांव जाना कभी नहीं छोड़ा पर हमारे लिए यह उनका अन्तिम दर्शन था. शाम को वापसी के समय भी उनकी आंखें हार्दिकता और शुभकामनाओं से भरी थी. हमारे लिए यह भी कम बड़ी बात नहीं थी कि हम यह कह सकें कि हमने नारायण सिंह थापा को देखा है.
भारत-नेपाल सीमा पर पिथौरागढ़ जिले में स्थित मढ़ मनाले गांव में श्रीमती जसुली देवी और श्री गजाई सिंह के घर दिसम्बर 1924 से फरवरी 1925 (यानी उन जाड़ों में) के बीच श्री थापा दरअसल धामी परिवार में जन्मे थे. काली नदी के दाहिने किनारे की पहाड़ी ध्वज के शिखर तक चली जाती और इसी पहाड़ी के मध्य में मढ़ मनाले गांव में लम्बाटा नामक तोक हैं, जहां थापा जी का पैतृक घर था और उनका जन्म वहीं हुआ था. किसी जमाने में यह परिवार काली के उस पर (वर्तमान नेपाल) से इस पार आ गया था.

गजाई सिंह धामी का खेतीहर परिवार था. बस भाई तेज सिंह ‘थापा’ नामान्त में जोड़कर गोरखा राइफल्स में भर्ती होने में कामयाब हुये. अनपढ़ गजाई सिंह शिक्षा का अर्थ समझते थे और उन्होंने अपने दोनों बच्चों-नारायण और होशियार को चार किमी दूर स्थानीय स्कूल में भेजा यह पहाड़ी बचपन कठिन और संघर्षों भरा था. थापा जी की आत्मकथा पढ़कर पता चला है कि कैसे जब वे दोनों भाई छोटे थे तो मां घास-लकड़ी के लिये जाते समय उन्हें अपने धोती से एक थूमे (जिस पर दही मथा जाता है) पर बांध गई. कमरे के बीच चूल्हा था जिसमें आग थी. नारायण तो धोती से बंधे रहे पर होशियार छूट गये और उन्होंने चूल्हे में हाथ डाल दिया. जिससे उनकी एक हाथ की अंगुलियां जल गई. कैसे वे खेती, पशुचारण में मां की मदद करते थे, यह पहाड़ों में सामान्य बात थी.

गांव में रहने पर संभव नहीं था कि नारायण कक्षा 4 से आगे जा पाते क्योंकि फिर स्कूल पिथौरागढ़ में ही था, जहां जाने की उनके परिवार की आर्थिक हैसियत न थी. नारायण के चाचा तेज सिंह एक प्रकार से नारायण के जीवन को एक अलग दिशा में ले जाने के निमित्त बने. 1935 में नारायण अपने चाचा के साथ शिलोंग चले गये, फिर क्वेटा आदि. इन स्थानों पर नारायण को शिक्षित होने के साथ खेल-कूदों में भाग लेने और जगहों को देखने का मौका मिला. 16वें साल में उन्होंने मैट्रिक पास किया. इस समय द्वितीय विश्वयुद्ध अपने उफान पर था. हिटलर की पराजय नहीं हुई थी और जापान के दो शहरों में एटम बम अभी गिरना था.

इस समय तेजी से फौज में भर्ती हो रही थी. विभिन्न युद्ध क्षेत्रों पर लड़ने हेतु भारतीय युवक ढूंढे जा रहे थे. नारायण सिंह धामी ने भी धामी के स्थान पर ‘थापा’ प्रयुक्त कर गोरखा सेवा में भर्ती होने का निर्णय लिया. उम्र अभी 16 साल की ही थी. वे 2/10 गोरखा रायफल में भेजे गये. प्रशिक्षण के बाद वे तत्काल युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजे गये और मेट्रिक पास होने के कारण उन्हें पंचमढ़ी के आर्मी एजुकेशन स्कूल में भेजा गया ताकि वे नये रूंगरूटों को प्रशिक्षण दे सकें. इस तरह वे प्रशिक्षण कार्य में व्यस्त रहे.

1944 में उनका युद्ध की फिल्म बनाने हेतु कैमरा मैन के पद में चयन हुआ और बन्दूक के स्थान पर कैमरा और उसके प्रशिक्षण के साथ वर्मा चले गये. यहां अंग्रेजों की जापानियों के साथ लड़ाई चल रही थी. उनका काम युद्ध सम्बन्धी फिल्में बनाना था. इस सीरीज को इंग्लैण्ड में दिखाने हेतु बनाया जा रहा था ताकि वहां बताया जा सके कि साम्राज्य के सैनिक यानी इंग्लैण्ड की सेना कैसे लड़ रही है. थापा एक-दो बार मौत से बाल-बाल बचे, जब उनके अगल-बगल से गोलियां निकल गई थी. यह अनुभव इस अर्थ में महत्वपूर्ण है कि शेष जीवन उन्हें कैमरे के साथ ही बिताना था. युद्धोपरान्त 1945 में वे कलकत्ता वापस आये और उन्हें फील्ड मार्शल क्लाउड आचिनलैक (भारतीय सेना प्रमुख) की काठमाण्डू यात्रा की फिल्म बनानी थी.

युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश सत्ता को सैनिकों की ज्यादा जरूरत नहीं थी और बड़ी संख्या में उन्हें सेना से हटाया गया या रिर्जव भेजा गया. संयोग से 1946 में उनके एक अफसर ने सेना मुख्यालय में उन्हें देखा और वह नारायण को लेकर शिमला चला गया ताकि वे उन फिल्मों को पहचान सकें जो उन्होंने सूट की थी. यह कैबिनेट मिशन का समय था और नारायण ने अनेक नेताओं को शिमला में देखा. 1947 में भारत की आजादी के समय उन्हें किसी फिल्म को बनाने का काम नहीं सौंपा गया लेकिन वे आधी रात को आ रही आजादी और नये देश के जन्म के गवाह थे और संसद भवन के भीतर थे.

1948 में इन्फारमेशन फिल्म को बंद कर फिल्म्स डिविजन शुरू हुआ. 24 साल के नारायण का चयन कैमरामैन के पद पर हो गया. 30 नवम्बर 1948 से उनकी नयी सेवा पटना में नियुक्ति के साथ शुरू हुई और भारतीय पुनर्निमाण के साथ कोसी और ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को भी कवर करने गये. सिक्किम, नेपाल, पाकिस्तान और भूटान को भी उन्होंने कवर किया.

फिल्म डिविजन में एक पारसी लड़की नारायण को चाहती थी और नारायण इससे बेखबर थे. जब पता चला तो 14 मई 1953 को नारायण का शुभ विवाह देवी झंगियानी से हुआ और विवाह के तुरन्त बाद नारायण एवरेस्ट अभियान कवर करने नेपाल चले गये. अगले साल उनका लड़का मुकुन्द पैदा हुआ. (जो आईआईटी बम्बई और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से शिक्षित होकर अभी अमेरिका में है और बंगलोर में भी एक कम्पनी चलाता है.) 1950 में नारायण ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को कवर करने डिब्रूगढ़ गये और जवाहर लाल नेहरू ने ‘अपनी जान का ख्याल न करने वाले’ इस नौजवान को देखा और वे नेहरू की नजरों में आ गये. फिल्म चर्चित हुई और दर्शकों ने बाढ़ की विभीषिका को समझा.

फिर रूस और पूर्वी यूरोप के देशों की यात्रा में वे नेहरू के साथ गये और ‘मित्रता की यात्रा’ बहुत चर्चित हुई. 80 रूसी फोटोग्राफरों की टीम के मुकाबले वे अकेले थे. स्वयं नेहरू ने इस फिल्म की सराहना की.

फिर उन्होंने लगभग 400 डॉक्युमैन्ट्रीज बनाई. कदाचित ही कोई विषय बचा हो जिस पर उन्होंने फिल्म न बनाई हो. बम्बई से और देश से बाहर लगातार वे अपने कार्य में व्यस्त रहते. कुछेक बार उन्हें विदेशों में फिल्म अध्ययन हेतु फैलोशिप मिली पर उन्होंने जाने में उत्सुकता नहीं दिखाई. उनकी दर्जनों फिल्में देश और विदेश में पुरस्कृत हुई. भारत के उस दौर के लगभग हर राष्ट्रपति ने उन्हें पुरस्कृत किया. वे पहले फिल्म सैन्सर बोर्ड के रीजनल आफीसर और बाद में फिल्म सलाहकार परिषद् के सदस्य रहे. 1977 में वे ज्वाइंट प्रोड्यूसर (न्यूजरील) बने तो 1981 में फिल्म्स डिविजन के चीफ प्रोड्यूसर नियुक्त हुए. 1982 में एशियाड पर डॉक्युमैन्ट्री बनाने हेतु उनका चयन हुआ. 1983 में वे पद्मश्री से सम्मानित हुए और 31 मार्च 1983 में 43 वर्ष की सेवा के बाद उन्होंने अवकाश ग्रहण किया.

यह अनेकों को अविश्वसनीय लग सकता है कि उन्होंने 43 साल की सेवा में सिर्फ 6 बार अवकाश लिया. एक बार अपने विवाह हेुतु और बाकी बार मढ़ मनाले में अपनी बूढ़ी माता से मिलने के लिए.

अवकाश प्राप्त करने के बाद श्रीमती गांधी ने उनसे फिल्में बनाने को कहा. वो स्पोर्ट आथीरिटी तथा जर्मन फिल्म टीवी नेटवर्क जैड डी एफ के परामर्शी, नेहरू पर फिल्म बनाने वाली समिति तथा भारतीय पर्वतारोहण फाउण्डेशन के सदस्य थे. 1996 में मुम्बई इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टेवल के जूरी, लघु फिल्मों की जूरी के अध्यक्ष के साथ नेशनल फिल्म फेस्टिवल 1997 तथा श्याम बेनेगल कमेटी (फिल्म डिविजन) के सदस्य थे.

2004 में थापा जी की मृत्यु हुई. उससे पहले उन्हें लाइफ टाइम एचीवमैंट सम्मान मिला. उनकी पत्नी देवी थापा कभी मुम्बई और कभी अमेरिका में अपने बेटे के साथ रहती हैं. मुकुन्द और उनका परिवार कैलीफोर्निया में हैं. थापा की सादगी, कर्मठता और अपने काम के प्रति समर्पण का पता तब चला जब द बाय फ्राम लम्बाटा के विमोचन में श्याम बेनेगल ने कहा कि उन्होंने अनुशासन नारायन से सीखा. फिल्म डिविजन के अनेक लोगों ने नारायन (यही नाम उनका प्रचलित था) के जीवन के उन पहलुओं को उजागर किया जो उनके पहाड़ी गुणों के बम्बई और फिल्म्स डिविजन में भी बने रहने की स्वीकृति थे.

पहाड़ के सदस्यों को सदा यह मलाल रहेगा कि हम उन्हें पहाड़ में किसी आयोजन में नहीं ला पाये.

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(शेखर पाठक का यह लेख ‘पहाड़’ में प्रकाशित हो चुका है. ‘पहाड़’ से साभार)

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Sudhir Kumar

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