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स्याल्दे बिखौती मेला:  यहाँ आज भी जीवित है कत्यूरी काल की परंपराएं

उत्तराखंड के कुमाऊँ अंचल में मेलों और त्योहारों का इतिहास बहुत पुराना है. ऐसा ही एक ऐतिहासिक और प्रसिद्ध मेला है – स्याल्दे बिखौती मेला. यह मेला कुमाऊँ के प्राचीन शहर द्वाराहाट के विभान्डेश्वर मंदिर में लगता है. विभान्डेश्वर मंदिर द्वाराहाट से लगभग आठ किलोमीटर दूर स्थित है, जो उत्तराखंड के सर्वपूज्य देव महादेव (भगवान शिव) का एक पावन मंदिर है. आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक मेले के स्वरूप, इसके पीछे की कहानियों और इसकी अनोखी रस्मों के बारे में: (Syalde Bikhoti Mela Uttarakhand)

इस मेले की शुरुआत चैत्र महीने की आखिरी तारीख (गते) से होती है, जिसे हिंदू नव वर्ष (सम्वत्सर) की शुरुआत भी माना जाता है. यह मेला मुख्य रूप से दो अलग-अलग हिस्सों और दिनों में लगता है, जिसे स्थानीय भाषा में “द्वरैं” भी कहा जाता है. ऊँची-ऊँची पहाड़ियों की श्रृंखलाओं के बीच बसे विभान्डेश्वर मंदिर में चैत्र महीने के आखिरी दिन की रात को एक मेला लगता है, जिसे ‘बिखौती मेला’ कहते हैं. इसके अगले दिन यानी वैशाख महीने की पहली तारीख (गते) को द्वाराहाट के मुख्य बाजार में मेला सजता है, जिसे ‘स्याल्दे मेला’ कहा जाता है.  इन दोनों भागों को मिलाकर ही इस पूरे आयोजन को ‘स्याल्दे बिखौती मेला’ नाम दिया गया है.

मेले का इतिहास और “वीर खम्भ” की कहानी

इस मेले का धार्मिक संबंध माँ शीतला देवी से माना जाता है और इसकी शुरुआत प्राचीन कत्यूरी काल से मानी जाती है. पुराने समय में विभान्डेश्वर मंदिर की परिक्रमा करने की बात को लेकर राजपूतों के तीन दलों— ‘आल’, ‘गरख’ और ‘नौल्यू’ के बीच अक्सर खूनी टकराव हो जाया करता था. ऐसे ही एक बड़े खूनी संघर्ष के दौरान जीतने वाले दल ने हारने वाले दल के नेता का सिर काट दिया था. जिस स्थान पर उस नेता का सिर जमीन में गाड़ा गया था, वहाँ आज भी एक पत्थर का खंभा खड़ा है, जिसे “विर खम्भ” कहा जाता है. 

जब देश में अंग्रेजों का शासन था, तब तत्कालीन अधिकारी सर कुटवुल ने इस निरंकुश और हिंसक लड़ाई पर रोक लगा दी. उन्होंने दोनों क्षेत्रों के निवासियों को तीन धड़ों, आल, गरख और नौल्ज्यूला में बांट दिया और मंदिर की परिक्रमा करने का एक पक्का क्रम तय कर दिया. इस नियम के अनुसार, ये तीनों दल एक-एक साल के अंतर से अपनी-अपनी बारी आने पर मंदिर की परिक्रमा और पूजा-अर्चना करते हैं. तब से लेकर आज तक इसी बारी-बारी वाली व्यवस्था के तहत मंदिर की परिक्रमा और पूजा का काम शांति से चलता आ रहा है. 
(Syalde Bikhoti Mela Uttarakhand)

ओढ़ा भेंटना और ओढ़ा पीटना की रस्म

इस मेले का सबसे मुख्य आकर्षण ‘ओढ़ा’ भेंटना और पीटना है, जिसे देखने भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं. मेले के पहले दिन को ‘बाट्पूजै’ (रास्ते की पूजा) या ‘नानस्याल्दे’ कहा जाता है. रास्ता पूजने का यह काम हर साल ‘नौल्ज्यू’ धड़े के लोग ही करते हैं और वही माँ देवी को मेले के लिए निमंत्रित भी करते हैं. माँ शीतला देवी की पूजा के साथ ही मेला शुरू हो जाता है. 

पूजा के बाद नौल्यू और नौल्ज्यू धड़े के लोग गाजे-बाजे के साथ ‘वीर खंभ’ के पास आते हैं और वहाँ अपने उस वीर योद्धा पूर्वज को श्रद्धांजलि देते हैं. इसी को स्थानीय भाषा में “ओढ़ा भेटना” कहा जाता है. मेले के बाकी दो दिनों में अन्य दो धड़े यानी ‘आल’ और ‘गरख’ अपने पारंपरिक बाजों के साथ वीर खंभ के पास आते हैं. वे लाठियों से उस खंभे को पीटते हैं, जिसे “ओढ़ा पीटना” कहा जाता है. रात के समय सभी धड़ों के लोग एक साथ मिलकर लोकगीत गाते हैं और पारंपरिक नृत्य के रंगों में डूब जाते हैं. 

स्याल्दे मेले के दौरान द्वाराहाट का पूरा बाज़ार बहुत ही सुंदर तरीके से सजता है. कुमाऊँ क्षेत्र में यह स्याल्दे मेला अपनी जलेबी के लिए भी बहुत मशहूर है. मेले में जगह-जगह झोड़ा और भगनौल जैसे पारंपरिक लोकगीतों पर झूमते, नाचते-गाते लोगों के समूह इस मेले की रौनक को कई गुना बढ़ा देते हैं और यही इस ऐतिहासिक मेले की मुख्य विशेषता भी है.
(Syalde Bikhoti Mela Uttarakhand)

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